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  • महाकाल की शरण में पहुंचे नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद महेश केवट, बोले- जीत बाबा के आशीर्वाद और कार्यकर्ताओं की मेहनत का परिणाम

    महाकाल की शरण में पहुंचे नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद महेश केवट, बोले- जीत बाबा के आशीर्वाद और कार्यकर्ताओं की मेहनत का परिणाम


    मध्यप्रदेश । नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद Mahesh Kevat सोमवार को उज्जैन पहुंचे, जहां उन्होंने विश्व प्रसिद्ध Shri Mahakaleshwar Jyotirlinga Temple में बाबा महाकाल के दर्शन कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होने के बाद पहली बार महाकाल मंदिर पहुंचे केवट ने इसे अपने लिए आध्यात्मिक और भावनात्मक क्षण बताया। उन्होंने भगवान महाकाल का आशीर्वाद प्राप्त कर प्रदेश और देश की सुख-समृद्धि की कामना की।

    मंदिर पहुंचने पर भाजपा पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया। इस दौरान उनके साथ भाजपा जिला अध्यक्ष संजय अग्रवाल सहित संगठन के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता मौजूद रहे। दर्शन के दौरान महेश केवट ने नंदी हॉल में बैठकर ध्यान लगाया और परंपरा के अनुसार नंदी महाराज के कान में अपनी मनोकामना भी व्यक्त की।

    दर्शन-पूजन के बाद मीडिया से चर्चा करते हुए महेश केवट ने राज्यसभा चुनाव में भाजपा की सफलता को बाबा महाकाल का आशीर्वाद बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के तीनों प्रत्याशियों की जीत संगठन की मजबूती, कार्यकर्ताओं की अथक मेहनत और जनता के विश्वास का परिणाम है। उन्होंने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पूरी निष्ठा के साथ संगठन को मजबूत बनाने का कार्य किया है, जिसका सकारात्मक परिणाम चुनावों में देखने को मिला।

    इस दौरान उन्होंने कांग्रेस पर भी निशाना साधा। केवट ने दावा किया कि राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी का नामांकन निरस्त होना भाजपा की किसी रणनीति का परिणाम नहीं था, बल्कि कांग्रेस की अपनी प्रक्रियागत कमियों और लापरवाही का नतीजा था। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस लगातार भ्रम और झूठ की राजनीति कर रही है तथा जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रही है।

    महेश केवट ने कहा कि न्यायिक और संवैधानिक संस्थाओं के निर्णयों का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस को अपनी आंतरिक कमजोरियों पर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है, बजाय इसके कि वह हर मुद्दे पर दूसरे दलों को जिम्मेदार ठहराए।

    लोकसभा चुनावों को लेकर भी उन्होंने भाजपा की जीत का भरोसा जताया। केवट ने कहा कि मध्य प्रदेश में भाजपा को जनता का व्यापक समर्थन प्राप्त है और आने वाले चुनावों में भी पार्टी मजबूत प्रदर्शन करेगी। उन्होंने दावा किया कि जनता विकास, सुशासन और स्थिर नेतृत्व के पक्ष में खड़ी है।

    राज्यसभा सांसद के रूप में अपनी प्राथमिकताओं पर बात करते हुए महेश केवट ने कहा कि वे प्रदेश के विकास, गरीबों, किसानों, युवाओं और समाज के सभी वर्गों के हितों से जुड़े मुद्दों को संसद में मजबूती से उठाएंगे। उन्होंने आश्वासन दिया कि जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने और मध्य प्रदेश के विकास को नई गति देने के लिए वे पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य करेंगे।

    महाकाल मंदिर में दर्शन के बाद उन्होंने देशवासियों के सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हुए कहा कि बाबा महाकाल का आशीर्वाद सभी पर बना रहे और प्रदेश निरंतर विकास की राह पर आगे बढ़ता रहे।

  • ‘सप्लीमेंट्री की कभी गुंजाइश नहीं रही’: राज्यसभा सांसद रजनीश अग्रवाल बोले- संगठन ने जो जिम्मेदारी दी, उसे परिणाम देकर साबित किया

    ‘सप्लीमेंट्री की कभी गुंजाइश नहीं रही’: राज्यसभा सांसद रजनीश अग्रवाल बोले- संगठन ने जो जिम्मेदारी दी, उसे परिणाम देकर साबित किया


    मध्‍य प्रदेश । मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीनों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी की निर्विरोध जीत के बाद राजधानी भोपाल में भाजपा प्रदेश कार्यालय में जश्न का माहौल देखने को मिला। इस अवसर पर मुख्यमंत्री Mohan Yadav, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष Hemant Khandelwal सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसदों को शुभकामनाएं दीं। इस दौरान राज्यसभा सदस्य चुने गए Rajneesh Agrawal ने अपने राजनीतिक सफर, संगठन के भरोसे और भविष्य की प्राथमिकताओं पर विस्तार से बात की।

    राजनीतिक जीवन और राज्यसभा में अपनी भूमिका को लेकर रजनीश अग्रवाल ने कहा कि देश के सामने प्रधानमंत्री Narendra Modi ने वर्ष 2047 तक विकसित भारत का जो लक्ष्य रखा है, वही उनका भी विजन है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत और विकसित मध्य प्रदेश के निर्माण में जो भी जिम्मेदारी उन्हें मिलेगी, उसे पूरी प्रतिबद्धता के साथ निभाने का प्रयास करेंगे।

    अपने छात्र जीवन से लेकर वर्तमान तक के सफर पर उन्होंने कहा कि जीवन में जो भी जिम्मेदारी मिली, उसे उन्होंने पूरी निष्ठा और आनंद के साथ निभाया। उनके अनुसार व्यक्ति को नियति द्वारा सौंपे गए कार्य को पूरी प्रतिबद्धता से करना चाहिए और परिणाम देने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अब तक के जीवन में उन्हें जो अवसर मिले, उनमें उन्होंने अपनी पूरी क्षमता से काम किया।

    राज्यसभा और लोकसभा के पिछले चुनावों में नाम चर्चा में आने के बावजूद अवसर नहीं मिलने के सवाल पर अग्रवाल ने कहा कि पार्टी नेतृत्व का निर्णय सर्वोपरि होता है। उनके मुताबिक नेतृत्व परिस्थितियों और संगठन की जरूरतों के आधार पर निर्णय लेता है और एक कार्यकर्ता के रूप में उनका दायित्व उन निर्णयों का सम्मान करना है।

    बुंदेलखंड क्षेत्र से जुड़े होने के कारण क्षेत्रीय अपेक्षाओं के सवाल पर उन्होंने कहा कि उनकी मातृभूमि, गांव और क्षेत्र के प्रति उनकी जिम्मेदारी हमेशा बनी रहेगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि केवल आश्वासन देने के बजाय परिणामों के आधार पर काम को परखा जाना चाहिए। जहां भी उनकी भूमिका होगी, वे अपनी जिम्मेदारी निभाने का पूरा प्रयास करेंगे।

    अपने जीवन की चुनौतियों और दिव्यांगता से जुड़े प्रश्न पर रजनीश अग्रवाल ने कहा कि संगठन और नेतृत्व ने उन पर हमेशा भरोसा जताया और कठिन से कठिन जिम्मेदारियां सौंपीं। उन्होंने कहा कि उन जिम्मेदारियों में असफलता की कोई गुंजाइश नहीं थी और उन्होंने हर बार परिणाम देकर उस भरोसे को साबित किया।

    उन्होंने कहा, “एक कार्यकर्ता से संगठन सौ प्रतिशत योगदान की अपेक्षा करता है। मेरा प्रयास हमेशा रहेगा कि मैं सौ प्रतिशत से भी अधिक देने की कोशिश करूं।” उनके अनुसार राज्यसभा सदस्य के रूप में मिली नई जिम्मेदारी भी संगठन के विश्वास का प्रतीक है और वे इस भरोसे पर खरा उतरने का प्रयास करेंगे।

    राज्यसभा में प्रवेश के साथ अब रजनीश अग्रवाल की भूमिका राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठनात्मक अनुभव और लंबे सार्वजनिक जीवन का लाभ उन्हें संसद में प्रभावी भूमिका निभाने में मदद करेगा।

  • राज्यसभा रेस में कमलनाथ का नाम सबसे आगे, सियासी हलचल तेज

    राज्यसभा रेस में कमलनाथ का नाम सबसे आगे, सियासी हलचल तेज


    मध्यप्रदेश  मध्यप्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए नामांकन प्रक्रिया 8 जून तक पूरी होनी है। इनमें से दो सीटें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं, जबकि एक सीट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दावा है।इसी एक सीट को लेकर कांग्रेस के भीतर जबरदस्त सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। दिल्ली से लेकर भोपाल तक बैठकों का दौर जारी है और अगले दो दिनों में उम्मीदवारों के नाम तय होने की संभावना जताई जा रही है।

    कमलनाथ रेस में सबसे आगे, दिल्ली का फैसला निर्णायक
    सूत्रों के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ राज्यसभा उम्मीदवारों की दौड़ में सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। हालांकि अंतिम निर्णय पार्टी हाईकमान करेगा, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी की भूमिका अहम होगी। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पहले ही तीसरी बार राज्यसभा जाने से इनकार कर चुके हैं, लेकिन पार्टी नेतृत्व यदि चाहे तो उनके नाम पर भी अंतिम निर्णय संभव है।

    जातीय समीकरणों पर भी कांग्रेस का फोकस
    इस बार कांग्रेस केवल वरिष्ठता नहीं, बल्कि जातीय संतुलन को भी ध्यान में रखकर उम्मीदवार तय करने की रणनीति बना रही है। पार्टी OBC, SC, ST और सामान्य वर्ग से संतुलित प्रतिनिधित्व देने पर विचार कर रही है। इस सूची में पूर्व मंत्री अरुण यादव, सज्जन सिंह वर्मा, कमलेश्वर पटेल समेत कई नामों पर चर्चा चल रही है।

    पीसीसी अध्यक्ष जीतू पटवारी भी चर्चा में
    प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी हालांकि सार्वजनिक रूप से राज्यसभा की रेस से खुद को अलग बता चुके हैं, लेकिन पार्टी के अंदर उनकी सक्रियता और दिल्ली नेतृत्व से संपर्क को लेकर चर्चाएं तेज हैं। सूत्रों के अनुसार संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी के स्तर पर भी उनके नाम को लेकर समर्थन की बात सामने आ रही है।

    दिल्ली में होगा अंतिम फैसला
    कर्नाटक में नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के बाद कांग्रेस मुख्यालय में उच्चस्तरीय बैठक होने की संभावना है। इसी बैठक में मध्यप्रदेश राज्यसभा उम्मीदवारों के नामों पर अंतिम मुहर लग सकती है। पार्टी रणनीति यह भी है कि आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सभी वर्गों को साधते हुए उम्मीदवारों का चयन किया जाए।

    मध्यप्रदेश में राज्यसभा सीट को लेकर कांग्रेस के भीतर घमासान तेज है। कमलनाथ सबसे आगे जरूर माने जा रहे हैं, लेकिन अंतिम निर्णय पूरी तरह दिल्ली नेतृत्व के हाथ में है। जातीय समीकरण और राजनीतिक संतुलन इस फैसले में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

  • राघव चड्ढा का ही ये बिल अगर पास हो जाता तो नहीं बदल पाते पार्टी, चली जाती सांसदी! जानिए कैसे ?

    राघव चड्ढा का ही ये बिल अगर पास हो जाता तो नहीं बदल पाते पार्टी, चली जाती सांसदी! जानिए कैसे ?


    नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता राघव चड्ढा द्वारा हाल ही में राज्यसभा के 6 अन्य सदस्यों के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा के बीच एक दिलचस्प राजनीतिक विरोधाभास सामने आया है। अगर चार साल पहले उन्होंने खुद जिस दल-बदल विरोधी कानून को और सख्त बनाने का प्रस्ताव रखा था, वह कानून बन गया होता, तो आज उनकी राजनीतिक स्थिति पूरी तरह अलग होती।

    सूत्रों के अनुसार, मौजूदा नियमों के तहत राज्यसभा में किसी दल के दो-तिहाई (2/3) सांसदों के एक साथ अलग होने पर उन्हें दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता से छूट मिल जाती है। इसी आधार पर 10 में से 7 सांसदों (चड्ढा सहित) के एक साथ जाने से उनकी सदस्यता सुरक्षित रहने की बात सामने आई है। लेकिन मामला यहीं दिलचस्प मोड़ लेता है। वर्ष 2022 में राज्यसभा में प्रवेश के कुछ ही महीनों बाद राघव चड्ढा ने एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था, जिसमें उन्होंने दल-बदल कानून को और सख्त बनाने की मांग की थी।

    उनके प्रस्तावित बिल में क्या था खास?

    इस विधेयक में उन्होंने मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव सुझाए थे। प्रस्ताव था कि किसी पार्टी के विलय को वैध मानने के लिए 2/3 की जगह 3/4 (तीन-चौथाई) समर्थन जरूरी किया जाए। साथ ही, पार्टी बदलने वाले सांसदों और विधायकों पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का भी सुझाव दिया गया था। इसके अलावा, ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ और विधायकों की खरीद-फरोख्त रोकने के लिए भी सख्त प्रावधान प्रस्तावित किए गए थे, जिसमें सरकार गिरने की स्थिति में सांसदों/विधायकों को तय समय में सदन के सामने पेश होने की अनिवार्यता शामिल थी।

    संवैधानिक बदलाव का प्रस्ताव

    चड्ढा ने अपने विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 तथा दसवीं अनुसूची में संशोधन की मांग की थी, ताकि जनप्रतिनिधियों को अधिक जवाबदेह बनाया जा सके और दल-बदल पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

    वर्तमान स्थिति

    राज्यसभा रिकॉर्ड के अनुसार, राघव चड्ढा का यह प्राइवेट मेंबर बिल अब भी लंबित है और कानून का रूप नहीं ले पाया। इसी बीच राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि यदि उनका ही प्रस्तावित सख्त कानून लागू हो जाता, तो आज दल-बदल के मौजूदा नियमों के तहत उन्हें और उनके साथियों को मिलने वाली छूट संभव नहीं होती।

  • राज्यसभा से सेवानिवृत्त हो रहे 59 सांसदों को दी गई विदाई

    राज्यसभा से सेवानिवृत्त हो रहे 59 सांसदों को दी गई विदाई


    नई दिल्ली।
    राज्यसभा से सेवानिवृत्त हो रहे 59 सांसदों को बुधवार को विदाई दी गई। विदाई समारोह में 20 राज्यों के 59 सदस्य, जिनमें 9 महिलाएं भी शामिल हैं, ने सदन को अलविदा कहा।

    इस मौके पर उपसभापति हरिवंश ने कहा कि पहले लोग खुद नियम फॉलो करते थे, अब हमें कंट्रोल करके कराना पड़ते हैं।उन्होंने नीतीश कुमार, अमित शाह, वेंकैया नायडू और सभी दलों के सदस्यों को उनके समर्थन के लिए धन्यवाद दिया और उपसभापति के रूप में अपने कार्यकाल को “जीवन का सुनहरा अवसर” बताया।

    सांसद संजय सिंह ने कहा कि किसी को विदा करना पीड़ादायक व भावनात्मक पल होता है। हम जब कमेटी में काम करते तो दलों की दूरी कम रहती है, ज्यादा मिलना होता है। कई लोगों से रिश्ते बनते हैं। उन्होंने मांग की कि पहले सांसदों को सेवानिवृत्ति के बाद भी परिसर में दरवाजे तक आने की व्यवस्था थी, तो ऐसा ही फिर किया जाए।

    केरल से सांसद जॉन ब्रिटास ने विदाई सम्बोधन के बीच सांसद जयराम रमेश को कहा कि हमने सहयोग करके आपको मंत्री बनाया, आपको सत्ता के समय सहयोग किया, लेकिन आप भूल गए। जयराम ने इस पर जवाब दिया, तो ब्रिटास ने कहा कि आप मुझे उकसाईयें मत।

    राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि यदि मोह व आसक्ति हमें अपने गंतव्य तक जाने से रोके हैं। यदि भगवान राम वन नहीं जाते तो रावण का नाश कैसे होता। बहता पानी निर्मल होता है और रूका हुआ गंदा होता है। इसलिए हम हमारे साध्य और साधनों में पवित्रता रखते हुए आगे बढ़े।

    गुजरात के सांसद शक्ति सिंह ने कहा कि सदन में टोका-टोकी भी हुई, तारीफ भी मिली, लेकिन जनता और विचारधारा के लिए लड़ता रहा हूं और लड़ता रहूंगा। सामने विपक्ष वाले भी जनता से चुनकर आते हैं, उनको सुनने की परंपरा रही है, लेकिन गुजरात में यह परंपरा टूटी, इस पाप का हिस्सा कही मैं भी हूं, लेकिन मुझे खुशी है कि राज्यसभा में कुछ किस्सों को छोड़ दे तो आज भी सामने वालों को सुनने की वो परंपरा जीवित है।

    कांग्रेस सांसद दिग्विजय ने कहा कि छात्र जीवन में कभी राजनीति से कोई सम्पर्क नहीं था, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनी कि 22 साल की उम्र में नगर पालिका अध्यक्ष बन गया। फिर 30 साल में विधायक, 33 साल में मंत्री-सांसद और 40 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बन गया, लेकिन मैंने कभी अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया। मेरे मतभेद रहे हैं और आगे भी रहेंगे, लेकिन राजनीतिक जीवन में किसी से कटुता नहीं पाली। विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा में मेरे संंबंध उनसे भी अच्छे जिनकी विचारधारा से मैं सहमत नहीं। मैं सदन में व्यवधान के पक्ष में नहीं। सत्ता पक्ष पर समस्या का हल निकालने की जिम्मेदारी ज्यादा रहती, और रास्ता निकलता है। जिस प्रकार से साम्प्रदायिक कटुता बढ़ रही, वो देश के लिए उचित नहीं है। अटलजी की लाइनें याद आती है कि मैं टायर्ड हूं न रिटायर्ड हूं, आगे चलकर हम और काम करेंगे। दिग्विजय ने कबीर की लाइनों को भी दोहराया कि ना काहूं से दोस्ती और ना काहू से बैर।

    सभापति ने सभा को संबोधित करते हुए सदस्यों के द्विवार्षिक परिवर्तन की अनूठी संसदीय परंपरा पर प्रकाश डाला, यह बताते हुए कि यह निरंतरता और बदलाव दोनों को दर्शाती है—जहाँ अनुभव नए दृष्टिकोण के लिए मार्ग बनाता है और सदन की स्थायी भावना बनी रहती है। उन्होंने सेवानिवृत्त होने वाले सदस्यों के अमूल्य योगदान की सराहना की और कहा कि उनके ज्ञान, बहस और जन सेवा के प्रति प्रतिबद्धता ने सदन के कामकाज को समृद्ध किया और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत किया। उन्होंने यह भी विश्वास व्यक्त किया कि उनका अनुभव आगे भी जन जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा प्रदान करेगा।

    राज्य सभा सचिवालय के अनुसार 2025 में कुल 26 सदस्य सेवानिवृत्त हुए, जबकि 2026 में 73 सदस्य सेवानिवृत्त हो चुके हैं या होने वाले हैं, जिनमें उपसभापति, हरिवंश भी शामिल हैं। समारोह में, संसद कार्य मंत्री, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और विदाई आयोजन समिति के संयोजक किरेन रिजिजू ने राज्य सभा के सभापति, सी. पी. राधाकृष्णन, और अन्य गणमान्य व्यक्तियों का स्वागत किया।