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  • NEET विवाद के बीच राघव चड्ढा की चुप्पी पर उठे सवाल, वायरल वीडियो को लेकर सोशल मीडिया में तेज हुई राजनीतिक बहस

    NEET विवाद के बीच राघव चड्ढा की चुप्पी पर उठे सवाल, वायरल वीडियो को लेकर सोशल मीडिया में तेज हुई राजनीतिक बहस

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) से जुड़े विवाद और पेपर लीक के आरोपों के बीच राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। हालांकि इस बार वजह उनका कोई बयान नहीं, बल्कि कथित तौर पर महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनकी चुप्पी बनी हुई है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो और उससे जुड़ी चर्चाओं ने उनके राजनीतिक रुख को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    राघव चड्ढा लंबे समय तक उन नेताओं में गिने जाते रहे हैं जो महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और आम नागरिकों से जुड़े मुद्दों पर लगातार मुखर रहते थे। संसद से लेकर सोशल मीडिया तक उनकी सक्रियता अक्सर चर्चा में रहती थी। लेकिन हाल के महीनों में उनकी सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं में आई कमी को लेकर राजनीतिक पर्यवेक्षक और सोशल मीडिया उपयोगकर्ता सवाल उठा रहे हैं।

    इसी बीच एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ, जिसमें कुछ लोग उनसे NEET पेपर लीक मामले पर प्रतिक्रिया देने की मांग करते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में कथित तौर पर उनसे पूछा जाता है कि वह इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर कुछ क्यों नहीं बोल रहे हैं। इसी दौरान व्यंग्यात्मक अंदाज में यह टिप्पणी भी सुनाई देती है कि उनका बोलना ही बंद हो गया है। वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।

    हालांकि वीडियो की परिस्थितियों और उसके पूरे संदर्भ को लेकर विभिन्न दावे किए जा रहे हैं, लेकिन इससे पैदा हुई राजनीतिक चर्चा लगातार तेज होती जा रही है। कई लोगों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े इतने बड़े विवाद पर प्रमुख राजनीतिक नेताओं की स्पष्ट राय सामने आनी चाहिए। वहीं कुछ समर्थकों का कहना है कि किसी एक मुद्दे पर सार्वजनिक बयान न देने को राजनीतिक निष्क्रियता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    राघव चड्ढा के राजनीतिक सफर में जनसरोकार से जुड़े मुद्दों की विशेष भूमिका रही है। उन्होंने समय-समय पर करदाताओं के हित, बढ़ती महंगाई, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं और शहरी समस्याओं को लेकर अपनी बात प्रमुखता से रखी है। यही कारण है कि उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी, जो सीधे आम लोगों से जुड़े विषयों पर सवाल उठाते रहे हैं। वर्तमान विवाद में भी उनकी पुरानी राजनीतिक शैली की तुलना मौजूदा स्थिति से की जा रही है।

    हाल के महीनों में उनके राजनीतिक जीवन में कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम भी सामने आए हैं। राज्यसभा में उनकी भूमिका और विभिन्न राजनीतिक निर्णयों को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में सोशल मीडिया पर उठ रहे सवालों ने उनके सार्वजनिक हस्तक्षेप और राजनीतिक सक्रियता को लेकर नई बहस को जन्म दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान दौर में सोशल मीडिया राजनीतिक संवाद का बड़ा माध्यम बन चुका है। ऐसे में किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति की सक्रियता या चुप्पी दोनों ही चर्चा का विषय बन जाती हैं। विशेष रूप से शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को लेकर लोगों की अपेक्षाएं पहले की तुलना में अधिक बढ़ गई हैं।

    फिलहाल NEET विवाद, वायरल वीडियो और राघव चड्ढा की कथित चुप्पी को लेकर चर्चा जारी है। आने वाले दिनों में इस विषय पर उनकी ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया आती है या नहीं, इस पर भी राजनीतिक हलकों और सोशल मीडिया की नजर बनी हुई है। वहीं यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर यह दिखाता है कि सार्वजनिक जीवन में नेताओं के बयान ही नहीं, बल्कि उनकी खामोशी भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाती है।

  • राज्यसभा चुनाव में NDA का दबदबा, 27 में 19 सीटें जीतकर ऊपरी सदन में बढ़ाई ताकत; INDIA गठबंधन को बड़ा राजनीतिक झटका

    राज्यसभा चुनाव में NDA का दबदबा, 27 में 19 सीटें जीतकर ऊपरी सदन में बढ़ाई ताकत; INDIA गठबंधन को बड़ा राजनीतिक झटका


    नई दिल्ली ।
    10 राज्यों की 27 राज्यसभा सीटों पर हुए चुनाव के नतीजों ने देश की संसदीय राजनीति में नया समीकरण खड़ा कर दिया है। चुनाव परिणामों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए 19 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि विपक्षी INDIA गठबंधन को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। इन नतीजों ने संसद के उच्च सदन में सत्तारूढ़ गठबंधन की स्थिति को और अधिक मजबूत कर दिया है।

    राज्यसभा चुनाव के परिणामों को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इनके जरिए आगामी विधायी और राजनीतिक रणनीतियों की दिशा तय होने की संभावना है। चुनाव परिणामों के बाद 245 सदस्यीय राज्यसभा में NDA की संख्या बढ़कर 152 तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा गठबंधन को पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली स्थिति प्रदान करता है और महत्वपूर्ण विधेयकों पर उसकी रणनीतिक क्षमता को मजबूत बनाता है।

    विपक्षी INDIA गठबंधन को इस चुनाव में केवल पांच सीटों पर सफलता मिली। चुनाव से पहले विपक्ष को कुछ राज्यों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी, लेकिन अंतिम परिणाम उसके पक्ष में नहीं रहे। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम विपक्षी एकजुटता और चुनावी प्रबंधन के लिए एक चुनौती के रूप में देखा जाएगा।

    चुनाव के सबसे चर्चित परिणामों में झारखंड का नाम प्रमुखता से सामने आया। यहां राज्यसभा की दोनों सीटों पर मुकाबला राजनीतिक हलकों में विशेष चर्चा का विषय बना रहा। एक सीट पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की, जबकि दूसरी सीट पर NDA समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार ने विपक्षी खेमे को बड़ा झटका देते हुए विजय हासिल की। इस परिणाम ने राज्य की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दिया है और विपक्षी दलों के भीतर भी रणनीतिक समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही है।

    झारखंड का परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि विधानसभा में संख्याबल को देखते हुए विपक्षी गठबंधन को बेहतर स्थिति में माना जा रहा था। इसके बावजूद चुनावी गणित और समर्थन जुटाने की रणनीति ने अंतिम परिणाम को प्रभावित किया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस जीत ने यह संकेत दिया है कि राज्यसभा चुनावों में केवल संख्याबल ही नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रबंधन भी निर्णायक भूमिका निभाता है।

    मध्य प्रदेश में भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिला। यहां संभावित मुकाबले की चर्चा के बीच विपक्षी उम्मीदवार की उम्मीदवारी निरस्त हो जाने के बाद एक सीट पर सत्तारूढ़ दल को निर्विरोध लाभ मिला। इससे NDA के कुल प्रदर्शन को अतिरिक्त मजबूती मिली और राज्यसभा में उसकी संख्या बढ़ाने में सहायता मिली।

    चुनाव परिणामों के बाद अब राजनीतिक चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि उच्च सदन में सत्तारूढ़ गठबंधन की बढ़ती ताकत का असर आगामी संसदीय सत्रों पर किस प्रकार पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि NDA को कुछ क्षेत्रीय और तटस्थ दलों का समर्थन मिलता रहा तो कई महत्वपूर्ण विधेयकों और नीतिगत प्रस्तावों को पारित कराने की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक आसान हो सकती है।

    राजनीतिक दृष्टि से यह चुनाव केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आगामी राष्ट्रीय राजनीति के संकेत भी देता है। राज्यसभा में मजबूत स्थिति किसी भी सरकार के लिए विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में हालिया परिणामों को सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए रणनीतिक बढ़त के रूप में देखा जा रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि इन नतीजों के बाद विपक्षी दलों को अपने संगठनात्मक ढांचे, समन्वय और चुनावी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है। वहीं NDA के लिए यह परिणाम राजनीतिक आत्मविश्वास बढ़ाने वाला साबित हुआ है, जिसने उच्च सदन में उसकी स्थिति को पहले से अधिक मजबूत कर दिया है।

  • राज्यसभा की 26 सीटों पर मुकाबले से पहले तेज हुई रणनीतिक जंग, भाजपा के दांव से कांग्रेस सतर्क

    राज्यसभा की 26 सीटों पर मुकाबले से पहले तेज हुई रणनीतिक जंग, भाजपा के दांव से कांग्रेस सतर्क

    नई दिल्ली । राज्यसभा की रिक्त हो रही 26 सीटों के लिए 18 जून को होने वाले चुनाव से पहले देश की राजनीति में गतिविधियां तेज हो गई हैं। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन राज्यसभा में अपनी स्थिति और मजबूत करने की दिशा में सक्रिय दिखाई दे रहा है, जबकि विपक्षी दल अपने मौजूदा संख्या बल को सुरक्षित रखने और संभावित राजनीतिक चुनौतियों से निपटने की रणनीति तैयार कर रहे हैं। चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही कई राज्यों में राजनीतिक समीकरणों और संभावित क्रॉस-वोटिंग को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    इस बार सबसे अधिक चर्चा मध्य प्रदेश और झारखंड की हो रही है, जहां भाजपा के कुछ फैसलों ने विपक्षी दलों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन दोनों राज्यों में उम्मीदवारों के चयन और चुनावी गणित ने मुकाबले को अपेक्षा से अधिक दिलचस्प बना दिया है। भाजपा की कोशिश केवल अपनी सीटें सुरक्षित करने तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि वह विपक्षी दलों पर मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक दबाव बनाने का प्रयास भी कर रही है।

    मध्य प्रदेश में भाजपा द्वारा तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को मैदान में उतारना राजनीतिक हलकों में चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है। विधानसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है और वह दो सीटों पर सहज जीत की स्थिति में मानी जा रही है। हालांकि तीसरे उम्मीदवार की एंट्री ने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, को सतर्क कर दिया है। कांग्रेस का मानना है कि यह कदम चुनावी मुकाबले को जटिल बनाने और विपक्षी खेमे में असहजता पैदा करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

    राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट बनाए रखने के लिए विशेष कदम उठा सकती है। संभावित क्रॉस-वोटिंग या अनुपस्थिति की आशंकाओं के बीच पार्टी नेतृत्व लगातार अपने विधायकों के संपर्क में बताया जा रहा है। इसी कारण राज्यसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश की राजनीति में गतिविधियां सामान्य से अधिक तेज हो गई हैं।

    विधानसभा के वर्तमान गणित के अनुसार किसी उम्मीदवार को जीत के लिए निर्धारित संख्या में मतों की आवश्यकता होगी। ऐसे में अतिरिक्त उम्मीदवार की मौजूदगी चुनाव को केवल औपचारिक प्रक्रिया न बनाकर रणनीतिक मुकाबले में बदल सकती है। यही कारण है कि दोनों प्रमुख दल लगातार एक-दूसरे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी कर रहे हैं।

    झारखंड में भी राजनीतिक तस्वीर कम दिलचस्प नहीं है। यहां दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवार मैदान में हैं, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय स्वरूप ले चुका है। झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस ने अपने-अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को समर्थन देकर चुनावी समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। इस फैसले ने राज्य में राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है।

    झारखंड में अब नजर इस बात पर रहेगी कि उपलब्ध संख्या बल और सहयोगी दलों के समर्थन के आधार पर कौन-सा उम्मीदवार बढ़त हासिल कर पाता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि मतदान के दौरान कोई अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आता है तो परिणामों पर उसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।

    दूसरी ओर राजस्थान में स्थिति अपेक्षाकृत शांत दिखाई दे रही है। यहां रिक्त सीटों के मुकाबले उतने ही उम्मीदवार मैदान में होने के कारण निर्विरोध निर्वाचन की संभावना मजबूत मानी जा रही है। वहीं गुजरात में भी भाजपा के उम्मीदवारों की राह अपेक्षाकृत आसान दिखाई दे रही है और वहां बड़े मुकाबले की संभावना कम नजर आ रही है।

    राज्यसभा चुनाव भले ही प्रत्यक्ष जनमत से नहीं लड़े जाते, लेकिन इनका राजनीतिक महत्व बेहद व्यापक होता है। संसद के उच्च सदन में संख्या बल किसी भी सरकार की विधायी क्षमता को प्रभावित करता है। यही कारण है कि चुनाव से पहले प्रत्येक सीट को लेकर राजनीतिक दल पूरी ताकत और रणनीति के साथ मैदान में उतरते हैं। इस बार भी मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में विकसित हो रहे समीकरण चुनावी प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना रहे हैं।

  • राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के फैसले से बदले सियासी समीकरण, 93 वर्षीय एचडी देवेगौड़ा के संसदीय भविष्य पर गहराए सवाल

    राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के फैसले से बदले सियासी समीकरण, 93 वर्षीय एचडी देवेगौड़ा के संसदीय भविष्य पर गहराए सवाल

    नई दिल्ली । कर्नाटक से होने वाले राज्यसभा चुनावों ने देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण चर्चा को जन्म दे दिया है। भारतीय जनता पार्टी द्वारा राज्यसभा के लिए अपने उम्मीदवार की घोषणा के बाद पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के संसदीय भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। 93 वर्षीय देवेगौड़ा वर्तमान में संसद के सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं और उनका कार्यकाल इसी महीने समाप्त होने जा रहा है।

    भाजपा ने कर्नाटक से राज्यसभा चुनाव के लिए प्रो. डॉ. एम. नागराजा को अपना उम्मीदवार बनाया है। इस निर्णय के बाद यह लगभग स्पष्ट माना जा रहा है कि जनता दल (सेकुलर) के संरक्षक और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा को इस बार पुनः राज्यसभा भेजे जाने की संभावना बेहद सीमित रह गई है। राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चर्चा चल रही थी कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर सहयोगी दल होने के नाते जेडीएस को एक सीट मिल सकती है, लेकिन भाजपा के ताजा कदम ने इन संभावनाओं को काफी हद तक समाप्त कर दिया है।

    कर्नाटक की मौजूदा राजनीतिक स्थिति भी इस समीकरण को प्रभावित कर रही है। राज्य विधानसभा में कांग्रेस के पास स्पष्ट बहुमत है, जिसके कारण राज्यसभा की चार सीटों में से तीन सीटों पर उसकी जीत लगभग सुनिश्चित मानी जा रही है। विपक्षी दलों के लिए केवल एक सीट पर सफलता की संभावना दिखाई दे रही है। ऐसे में भाजपा ने अपने संगठनात्मक और राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए अपना उम्मीदवार मैदान में उतारने का फैसला किया है।

    एचडी देवेगौड़ा भारतीय राजनीति के उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने कई दशकों तक सक्रिय भूमिका निभाई है। वह देश के प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं और कर्नाटक की राजनीति में उनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहा। संसद और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को लेकर अक्सर राजनीतिक दलों के बीच सम्मानजनक सहमति दिखाई देती रही है। हालांकि बदलते राजनीतिक समीकरण और संख्या बल की वास्तविकताएं इस बार उनके पक्ष में नहीं दिखाई दे रही हैं।

    राज्यसभा चुनावों के साथ-साथ विभिन्न राज्यों में विधान परिषद और अन्य राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर भी दलों के बीच रणनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस ने कर्नाटक से अपने वरिष्ठ नेताओं को उम्मीदवार बनाया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी राज्यसभा में अपनी ताकत और बढ़ाने के लिए पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरी है। विधानसभा में मौजूद संख्यात्मक बढ़त उसके लिए सबसे बड़ा राजनीतिक आधार बन रही है।

    उधर मध्य प्रदेश में भी राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ी हुई हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपने-अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुछ सीटों पर क्रॉस वोटिंग और दलगत रणनीतियां चुनावी परिणामों को रोचक बना सकती हैं। हालांकि कुल संख्या बल को देखते हुए प्रमुख दलों की स्थिति काफी हद तक स्पष्ट मानी जा रही है।

    कर्नाटक के राज्यसभा चुनाव का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि यह केवल सीटों की लड़ाई नहीं बल्कि गठबंधन राजनीति और भविष्य की रणनीतियों का भी संकेत माना जा रहा है। एचडी देवेगौड़ा का संसदीय कार्यकाल समाप्त होने की संभावना के साथ भारतीय राजनीति का एक लंबा अध्याय नए मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि अनुभवी नेता राष्ट्रीय राजनीति में किस भूमिका में सक्रिय बने रहते हैं, लेकिन फिलहाल राज्यसभा में उनके अगले कार्यकाल की राह बेहद कठिन नजर आ रही है।

  • झारखंड राज्यसभा सीटों पर सियासी गतिरोध खत्म, JMM-कांग्रेस में 1-1 सीट पर बनी निर्णायक सहमति

    झारखंड राज्यसभा सीटों पर सियासी गतिरोध खत्म, JMM-कांग्रेस में 1-1 सीट पर बनी निर्णायक सहमति

    नई दिल्ली । झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों को लेकर महागठबंधन के दो प्रमुख घटक दल, झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के बीच जारी विवाद अब समाप्त हो गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बताया कि दोनों दलों के लिए एक-एक सीट पर चुनाव लड़ने की सहमति हो गई है। इससे पहले झामुमो के विधायकों ने दोनों सीटों पर दावा ठोक दिया था, जिससे गठबंधन में तनातनी बढ़ गई थी।

    पूर्व विधायक बैद्यनाथ राम को झामुमो ने राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किया है। बैद्यनाथ राम लातेहार से पूर्व विधायक रह चुके हैं और आदिवासी एवं पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व को मजबूत करने में उनका योगदान सराहनीय माना जाता है। झामुमो के प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि बैद्यनाथ राम पार्टी के मजबूत और समर्पित कार्यकर्ता हैं और उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।

    जानकारी के अनुसार, इस विवाद को सुलझाने में पार्टी के वरिष्ठ पर्यवेक्षक, भूपेश बघेल और अजय शर्मा ने सीएम हेमंत सोरेन से लंबी चर्चा की। इसके बाद सीएम ने दोनों दलों के लिए एक-एक सीट पर उम्मीदवार तय करने पर सहमति दे दी। राज्यसभा की दो सीटों पर अब कांग्रेस और जेएमएम के एक-एक उम्मीदवार मैदान में होंगे।

    बताया जा रहा है कि झारखंड में पहले कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार प्रणव झा का नाम घोषित कर दिया था, जिससे जेएमएम नेतृत्व में नाराजगी उत्पन्न हो गई थी। पार्टी के नेताओं का आरोप था कि कांग्रेस ने जेएमएम को विश्वास में लिए बिना नाम की घोषणा की थी। हालांकि अब दोनों पार्टियों के बीच सभी मतभेद दूर होते दिख रहे हैं और सहमति से उम्मीदवार तय हो गए हैं।

    सीएम हेमंत सोरेन ने रविवार रात गठबंधन के सभी विधायकों को डिनर पर बुलाया। इस बैठक का मकसद गठबंधन के भीतर आपसी सामंजस्य बनाए रखना और भविष्य में सहयोग को मजबूत करना बताया गया है। इससे पहले JMM की ओर से दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारने की संभावना जताई गई थी, लेकिन अब विवाद खत्म होकर गठबंधन में स्थिरता लौट आई है।

    राज्यसभा चुनाव से पहले इस तरह का समाधान महागठबंधन के लिए राहत भरा है। विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों दलों की आपसी सहमति से न केवल राज्यसभा में प्रतिनिधित्व तय होगा, बल्कि भविष्य में झारखंड में गठबंधन को भी मजबूती मिलेगी। बैद्यनाथ राम के नाम पर सहमति से आदिवासी और पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व को भी ध्यान में रखा गया है।

    हालांकि चुनाव की प्रक्रिया अभी जारी है, लेकिन JMM और कांग्रेस के बीच विवाद के शांत होने से महागठबंधन की छवि बेहतर बनी है। दोनों दलों के नेताओं ने आपसी सहयोग और संवाद को ही भविष्य में निर्णय लेने का आधार बनाने का संकल्प जताया है। इससे राज्यसभा चुनाव की तैयारी और रणनीति को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

  • दो दशक बाद नया राजनीतिक कदम नीतीश कुमार राज्यसभा जाना चाहते हैं नई सरकार को मार्गदर्शन देने का वादा

    दो दशक बाद नया राजनीतिक कदम नीतीश कुमार राज्यसभा जाना चाहते हैं नई सरकार को मार्गदर्शन देने का वादा


    नई दिल्ली:
    बिहार की राजनीति में लंबे समय से चल रही अटकलों पर विराम लगाते हुए बिहार के मुख्यमंत्री Nitish Kumar ने साफ कर दिया है कि वे राज्यसभा जाना चाहते हैं उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि वह राज्यसभा का सदस्य बनने की इच्छा रखते हैं साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बिहार में जो भी नई सरकार बनेगी उसे उनका पूरा सहयोग और मार्गदर्शन मिलता रहेगा

    मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने संदेश में जनता के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले दो दशक से भी अधिक समय से बिहार की जनता ने उन पर भरोसा और समर्थन बनाए रखा है इसी विश्वास के कारण उन्हें राज्य की सेवा करने का अवसर मिला उन्होंने कहा कि जनता के भरोसे की ताकत से ही बिहार आज विकास और सम्मान की नई पहचान बना रहा है उन्होंने इस भरोसे और समर्थन के लिए एक बार फिर लोगों का धन्यवाद भी दिया

    अपने पोस्ट में उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की एक पुरानी इच्छा का भी जिक्र किया उन्होंने लिखा कि जब उन्होंने संसदीय जीवन की शुरुआत की थी तभी से उनके मन में यह इच्छा थी कि वे बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ साथ संसद के दोनों सदनों के भी सदस्य बनें इसी क्रम में अब वे राज्यसभा का सदस्य बनने की इच्छा रखते हैं

    नीतीश कुमार ने अपने संदेश में यह भी भरोसा दिलाया कि जनता के साथ उनका रिश्ता आगे भी पहले की तरह बना रहेगा उन्होंने कहा कि एक विकसित बिहार बनाने का उनका संकल्प आगे भी जारी रहेगा और वे भविष्य में भी जनता के साथ मिलकर राज्य के विकास के लिए काम करते रहेंगे उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य में जो भी नई सरकार बनेगी उसे उनका पूरा सहयोग और मार्गदर्शन मिलेगा

    गौरतलब है कि नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक माने जाते हैं वे पिछले करीब दो दशकों से राज्य की राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं वर्ष 2025 में उन्होंने दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी इसके साथ ही वे राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता बन चुके हैं

    उनका राजनीतिक सफर भी काफी लंबा और दिलचस्प रहा है वर्ष 1985 में वे पहली बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में बिहार विधानसभा के सदस्य चुने गए थे इसके बाद वर्ष 1989 में उन्होंने पहली बार लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया इसके बाद वे लगातार 1989 से 2004 तक बाढ़ संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने जाते रहे

    मार्च 2000 में उन्होंने पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में पद संभाला था हालांकि उस समय उनकी सरकार बहुमत साबित नहीं कर सकी और मात्र सात दिनों में ही गिर गई इसके बाद वर्ष 2001 से 2004 के बीच उन्होंने केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में काम किया और रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली

    बिहार में वर्ष 2005 के बाद से नीतीश कुमार की राजनीतिक पकड़ लगातार मजबूत होती गई हालांकि वर्ष 2014 से 2015 के बीच कुछ समय के लिए Jitan Ram Manjhi मुख्यमंत्री बने थे लेकिन उसके बाद फिर से नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली और तब से अब तक वे राज्य की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेता बने हुए हैं

    अब उनके राज्यसभा जाने की इच्छा जाहिर करने के बाद बिहार की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला राज्य की भविष्य की राजनीति और सत्ता संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है

  • सुधा मूर्ति ने राज्यसभा में पेश किया निजी संकल्प, सभी सांसदों ने प्रस्ताव को दिया समर्थन

    सुधा मूर्ति ने राज्यसभा में पेश किया निजी संकल्प, सभी सांसदों ने प्रस्ताव को दिया समर्थन


    नई दिल्‍ली । राज्यसभा(Rajya Sabha) में शुक्रवार को उस समय एक ऐसा दृश्य भी देखने को मिला जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के तमाम सांसद(Member of Parliament) एकसाथ खड़े नजर आए। विभिन्न दलों के सदस्यों ने मनोनीत सदस्य सुधा मूर्ति के एक निजी संकल्प की सराहना की, जिसमें उन्होंने तीन से छह साल के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा और पोषण गारंटी का प्रस्ताव दिया था। सुधा मूर्ति ने एक निजी संकल्प पेश करते हुए कहा कि एक शिक्षित माता अर्थव्यवस्था में अपना विशेष योगदान देती है। उन्होंने यह भी कहा कि गर्भवर्ती महिलाओं(Pregnant women) और स्तनपान कराने वाली माताओं को सही पोषण देने से बच्चों का समुचित शारीरिक एवं मानसिक विकास होता है। संकल्प में छोटे बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य सेवाएं और प्री-प्राइमरी(Pre-primary) शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएं शामिल किए जाने का भी संकल्प है।

    उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का नाम बदलकर आशा कार्यकर्ता या दीपम् कार्यकर्ता करना चाहिए। प्रस्ताव का समर्थन करते हुए डीएमके के पी. विल्सन ने कहा, 12वीं तक की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। आप की स्वाति मालीवाल ने भी इसका समर्थन किया।

    सुधा मूर्ति के निजी संकल्प में प्रावधान किया गया है कि तीन से छह वर्ष के सभी बच्चों के लिए पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं, प्री प्राइमरी शिक्षा सहित निशुल्क एवं अनिवार्य प्रारंभिक बाल्यवस्था एवं प्रारंभिक शिक्षा की गारंटी देने के लिए संविधान में एक नवीन अनुच्छेद अत:स्थापित करने पर विचार किया जाए। उन्होंने कहा कि तीन से छह वर्ष तक बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास समुचित ढंग से होना बहुत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कई बार बच्चे के अभिभावक इतने शिक्षित और जानकार नहीं होते कि वे इस पक्ष की ओर ध्यान दे पायें।

    मनोनीत सदस्य ने कहा कि यदि इस आयु में बच्चों को आंगनवाड़ी भेज कर उन्हें समुचित पोषण और शिक्षा दी जाये तो उन्हें आगे चलकर एक अच्छा नागरिक बनाने और साफ-सफाई का ध्यान रखने आदि के अच्छे गुण सिखाये जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे केंद्रों पर बच्चा जाता है तो उसके अंदर विभिन्न शारीरिक कमियों जैसे देखने, बोलने की क्षमता में कमी और कुपोषण से होने वाली समस्याओं का समय रहते पता लगाया जा सकता है क्योंकि वहां बच्चों की समय समय पर जांच होती है।

    मूर्ति ने सुझाव दिया कि जिस तरह से सरकार ने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढाओ’ का अभियान छेड़ा है ठीक उसी तरह तीन से छह साल तक के बच्चों को आंगनवाड़ी में भेजने के लिए अभियान चलाया जाए। उन्होंने कहा कि इस काम में निगमित दायित्व कोष (सीएसआर) की भी मदद ली जाए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का नाम बदलकर आशा कार्यकर्ता या दीपम् कार्यकर्ता करना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘यदि हमें अपने देश को विकसित राष्ट्र बनाना है तो हमें अपने बच्चों की तीन से छह वर्ष की आयु में विकास पर ध्यान देना होगा।’’

    उन्होंने अपने जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने जब इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की और जब जमशेदपुर में टाटा की नौकरी का विज्ञापन देखा जिसमें लिखा था कि इसमें महिलाएं आवेदन नहीं करें। उन्होंने जे आर डी टाटा को एक पोस्टकार्ड लिखकर कहा कि उनकी कंपनी देश की आधी आबादी से अवसर क्यों छीन रहीं है क्योंकि देश के विकास में आधी आबादी को भी भूमिका निभाने का अवसर मिलना चाहिए।

    मूर्ति ने कहा कि यह जेआरडी टाटा की महानता थी कि उन्होंने एक अपरिचित लड़की का सुझाव मानते हुए लड़कियों अपने यहां काम करने का अवसर दिया।

    भारतीय जनता पार्टी की मेधा विश्राम कुलकर्णी ने कहा कि वह मूर्ति द्वारा आंगनवाड़ी को सशक्त बनाने के लिए लाये गये इस प्रस्ताव का समर्थन करती हैं।

    उन्होंने कहा कि भाजपा की ओर से वह देश के विभिन्न भागों में आंगनवाड़ी के कामकाज देखने गयी थीं और उन्हें यह बताते हुए खुशी हो रही है कि अधिकतर राज्यों में आंगनवाड़ी में बहुत अच्छा कामकाज होता है।

    कुलकर्णी ने कहा कि कोविड के दौरान आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने जितना काम किया, जितनी चिकित्सकों की सहायता की, घर-घर जाकर रोगियों के बारे में जानकारी ली, वैसा कहीं और देखने को नहीं मिलता है।

    उन्होंने सुझाव दिया कि आंगनवाड़ी की कक्षाएं चलाने के लिए ऐसी कार्यकर्ताओं को अधिक कोष दिया जाना चाहिए।

    चर्चा में भाग लेते हुए द्रमुक के पी विल्सन ने तमिलनाडु में स्कूली शिक्षा के लिए केंद्र द्वारा दिया जाने वाला धन रोके जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने शिक्षा अर्हता परीक्षा को अनिवार्य बनाये जाने के नियम का विरोध करते हुए कहा कि इससे देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की बड़ी कमी होने की आशंका है।

    आम आदमी पार्टी की स्वाति मालीवाल् ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि जापान सहित विभिन्न देशों में तीन से छह वर्ष की आयु के बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास पर बहुत ध्यान दिया जाता है। उन्होंने कहा कि आज भारत में शिक्षा का विश्व का सबसे बड़ा नेटवर्क है लेकिन इनकी गुणवत्ता में काफी अंतर है।

    उन्होंने कहा कि आज तीन से छह वर्ष के बच्चों के विकास के लिए गली गली में प्ले स्कूल हैं जो केवल अमीर एवं मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए ही खुले हैं। उन्होंने कहा कि गरीब एवं वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आंगनवाड़ी केंद्र होते है किंतु उनकी कार्यकर्ताओं पर इतना बोझ होता है कि वे बच्चों के विकास पर समुचित ध्यान नहीं दे पातीं।

  • दिल्ली कोर्ट में अर्जी दायर, 1978 के वोटर केस पर सोनिया गांधी पर कार्रवाई की मांग

    दिल्ली कोर्ट में अर्जी दायर, 1978 के वोटर केस पर सोनिया गांधी पर कार्रवाई की मांग


    नई दिल्‍ली । कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद सोनिया गांधी के खिलाफ वोट चोरी का मुकदमा दर्ज कराने के लिए एक शख्स ने दिल्ली के राउज़ एवेन्यू कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। अपनी अर्जी में उस शख्स ने मजिस्ट्रेट कोर्टके उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश देने से साफ तौर पर मना कर दिया गया था। अर्जी में आरोप लगाया गया है कि भारतीय नागरिकता लेने से तीन साल पहले ही सोनिया गांधी का नाम मतदाता सूची में जोड़ दिया गया था।

    यह केस शुक्रवार को राउज़ एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज (PC Act) विशाल गोगने के सामने आया। जज ने इसे 9 दिसंबर को विचार के लिए लिस्ट करने का आदेश दिया है। यह क्रिमिनल रिवीजन अर्जी विकास त्रिपाठी नाम के एक व्यक्ति ने फाइल की है। त्रिपाठी ने अपनी अर्जी में एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACMM) वैभव चौरसिया के 11 सितंबर के आदेश को चुनौती दी है।

    1983 में भारत की नागरिक बनी थीं सोनिया
    त्रिपाठी ने आरोप लगाया है कि सोनिया गांधी का नाम 1980 में नई दिल्ली चुनाव क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल किया गया था, जबकि वह अप्रैल 1983 में भारत की नागरिक बनी थीं। अर्जी में त्रिपाठी ने अन्य विवरण देते हुए आरोप लगाया है कि सोनिया गांधी का नाम सबसे पहले 1980 में मतदाता सूची में शामिल किया गया था, फिर 1982 में उसे हटा लिया गया था। इसके बाद 1983 में फिर से उनका नाम मतदाता सूची में शामिल किया गया, जब वह आधिकारिक तौर पर भारत की नागरिक बन गईं।

    कुछ जाली कागजात जमा किए होंगे?
    त्रिपाठी के वकीलों ने आरोप लगाया है कि 1980 में मतदाता सूची में उनका नाम शामिल होने का मतलब है कि तब उन्होंने कुछ जाली कागजात जमा किए थे। वकीलों के मुताबिक यह एक ऐसा केस है जो दिखाता है कि एक संज्ञेय अपराध किया गया है। इससे पहले सितंबर में जज चौरसिया ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि कोर्ट ऐसी जांच नहीं कर सकता क्योंकि इससे संवैधानिक अधिकारियों को सौंपे गए क्षेत्रों में गलत तरीके से उल्लंघन होगा और यह भारत के संविधान के आर्टिकल 329 का उल्लंघन होगा।