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  • रक्षाबंधन क्यों मनाते हैं? जानिए राखी से जुड़ी पौराणिक कहानियां

    रक्षाबंधन क्यों मनाते हैं? जानिए राखी से जुड़ी पौराणिक कहानियां


    उज्जैन।
    रक्षाबंधन भारत के उन त्योहारों में शामिल है, जिनका अर्थ केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने तक सीमित नहीं है। सावन की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह पर्व भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। समय के साथ राखी की परंपरा ने भी अलग-अलग रूप लिए और इसका अर्थ पारिवारिक रिश्ते से आगे बढ़कर सामाजिक एकता और भाईचारे तक पहुंचा।

    रक्षाबंधन का मतलब क्या है?

    ‘रक्षाबंधन’ शब्द संस्कृत के ‘रक्षा’ और ‘बंधन’ से मिलकर बना है, जिसका सामान्य अर्थ रक्षा का बंधन माना जाता है। इस दिन बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं, तिलक करती हैं, आरती उतारती हैं और उसके सुख-स्वास्थ्य की कामना करती हैं। भाई भी बहन की रक्षा और हर परिस्थिति में उसका साथ देने का संकल्प लेता है।

    हालांकि आज यह परंपरा सिर्फ सगे भाई-बहन तक सीमित नहीं है। कई जगह चचेरे-ममेरे भाई-बहन, मित्र और सामाजिक रूप से जुड़े लोग भी एक-दूसरे को राखी बांधते हैं।

    कृष्ण और द्रौपदी की कहानी

    रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित पौराणिक कथाओं में भगवान कृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग शामिल है। महाभारत की प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार कृष्ण की उंगली में चोट लगने पर खून निकल आया। द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया।

    मान्यता है कि कृष्ण ने इस स्नेह और अपनत्व को याद रखा। इसी प्रसंग को बाद में रक्षा के भाव से जोड़कर देखा गया और इसे राखी की परंपरा से संबंधित लोकप्रिय कथाओं में जगह मिली।

    राजा बलि और माता लक्ष्मी का प्रसंग

    रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि की है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके राज्य की रक्षा के लिए वहां रहने लगे थे।

    माता लक्ष्मी विष्णु से अलग नहीं रहना चाहती थीं। कथा के अनुसार उन्होंने श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई माना। इसके बाद बलि ने भगवान विष्णु को उनके साथ वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। इस कहानी को श्रावण पूर्णिमा पर रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

    यमराज और यमुना की कहानी

    एक अन्य लोकप्रिय कथा मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार यमुना ने यमराज की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र की कामना की थी।

    इसी प्रसंग के आधार पर रक्षाबंधन को भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है।

    इंद्र की कलाई पर शुचि ने बांधा रक्षा सूत्र

    रक्षा सूत्र की शक्ति से जुड़ी एक और पौराणिक कथा देवताओं और असुरों के युद्ध की है। कहा जाता है कि युद्ध में इंद्र कमजोर पड़ रहे थे। तब उनकी पत्नी शुचि ने गुरु बृहस्पति की सलाह पर इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा।

    इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय हासिल की। इस कथा में रक्षा सूत्र को सुरक्षा, शक्ति और आत्मविश्वास के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।

    सिकंदर की पत्नी और राजा पुरु की कहानी कितनी प्रसिद्ध है?

    राखी से जुड़ी एक लोकप्रिय ऐतिहासिक कथा सिकंदर और भारतीय शासक राजा पुरु से संबंधित है। कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने राजा पुरु को राखी भेजकर उन्हें अपना भाई बनाया था। बाद में सिकंदर और पुरु के बीच युद्ध हुआ और प्रचलित कथा के अनुसार पुरु ने राखी के रिश्ते का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया।

    हालांकि इस प्रसंग को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं और इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना की बजाय लोकप्रिय कथा के रूप में देखना अधिक उचित माना जाता है।


    रानी कर्णावती और हुमायूं की कहानी

    रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित ऐतिहासिक कहानियों में मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल शासक हुमायूं का प्रसंग भी है। लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, संकट के समय रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर मदद मांगी थी।

    कहा जाता है कि हुमायूं ने इस रिश्ते का सम्मान किया और रानी की सहायता के लिए आगे बढ़ा। हालांकि इस कहानी के ऐतिहासिक प्रमाणों और घटनाक्रम को लेकर भी इतिहासकारों में बहस है।

    जब राखी बनी हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक

    रक्षाबंधन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बंगाल विभाजन के विरोध से जुड़ा है। 1905 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल विभाजन की घोषणा के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने राखी को सामाजिक एकता और भाईचारे के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया।

    टैगोर ने लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधकर एकता का संदेश देने की अपील की। इस तरह राखी का अर्थ केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक सद्भाव और एकजुटता का प्रतीक भी बनी।

    रक्षाबंधन पर कैसे होती है पूजा और रस्म?

    रक्षाबंधन के दिन बहनें पूजा की थाली तैयार करती हैं। इसमें आमतौर पर राखी, कुमकुम, अक्षत, दीपक और मिठाई रखी जाती है। भाई को तिलक लगाने और आरती करने के बाद उसकी कलाई पर राखी बांधी जाती है। इसके बाद मिठाई खिलाई जाती है और भाई बहन को उपहार देता है।

    आजकल राखियों के स्वरूप में भी काफी बदलाव आया है। पारंपरिक धागे वाली राखियों के साथ चांदी, सोने, रुद्राक्ष, मोती और कई तरह की डिजाइन वाली राखियां बाजार में उपलब्ध होती हैं।

    देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग परंपराएं

    श्रावण पूर्णिमा का महत्व भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में दिखाई देता है।

    • नारली पूर्णिमा: महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में मछुआरा समुदाय समुद्र देवता वरुण की पूजा करता है और समुद्र में नारियल अर्पित करता है।
    • अवनि अवित्तम: दक्षिण भारत में कई ब्राह्मण समुदायों में इस दिन यज्ञोपवीत बदलने की परंपरा है। इसे उपाकर्म भी कहा जाता है।
    • कजरी पूर्णिमा: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों में कजरी गीत, पूजा और अच्छी फसल की कामना से जुड़ी परंपराएं हैं।
    • झूलन पूर्णिमा: पश्चिम बंगाल और ओडिशा में राधा-कृष्ण को झूले पर विराजमान कर इस पर्व को मनाने की परंपरा है।

    समय के साथ बदल गया राखी का अर्थ

    रक्षाबंधन की सबसे खास बात यह है कि इसका मूल भाव रिश्ते में सुरक्षा और विश्वास है, लेकिन समय के साथ इसकी व्याख्या बदलती रही है। कभी यह भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक रहा, तो कभी सामाजिक एकता और भाईचारे का माध्यम बना।

    आज राखी को केवल भाई द्वारा बहन की रक्षा के वादे के रूप में देखने के बजाय एक-दूसरे के साथ खड़े रहने और रिश्ते की जिम्मेदारी निभाने के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। यही बदलता अर्थ रक्षाबंधन को हर दौर में प्रासंगिक बनाए रखता है।

  • पूर्णिमा सुबह 09:09 बजे से प्रारंभ…. आज पूरे दिन भद्रा का साया और कल पंचक, जानें राखी बांधने का शुभ मुहूर्त!

    पूर्णिमा सुबह 09:09 बजे से प्रारंभ…. आज पूरे दिन भद्रा का साया और कल पंचक, जानें राखी बांधने का शुभ मुहूर्त!


    नई दिल्ली।
    हिंदू धर्म ( Hinduism) में सावन पूर्णिमा (Sawan Purnima) का विशेष महत्व है। इस दिन रक्षा बंधन (Raksha Bandhan) या राखी का त्योहार मनाया जाता है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक है। इस साल सावन पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह 09: 09 मिनट पर प्रारंभ हो गई है और 28 अगस्त 2026 को सुबह 09:47 बजे समाप्त होगी।

    प्रदोष काल और चंद्रोदय के समय पूर्णिमा तिथि व्याप्त होने के कारण सावन पूर्णिमा व्रत आज 27 अगस्त को है। 27 अगस्त को पूर्णिमा व्रत के दिन भद्रा और पंचक का साया भी रहेगा। इस बार पूर्णिमा तिथि पर चंद्र ग्रहण का संयोग भी बन रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) के कारण सावन पूर्णिमा व्रत के दिन ही रक्षा बंधन मनाया जाएगा और भद्रा के कारण राखी बांधने में अड़चन आएगी या नहीं। आइए जानते हैं रक्षा बंधन कब मनाएं?

    27 या 28 अगस्त कब मनाएं रक्षा बंधन:

    पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, हिंदू धर्म में किसी भी पर्व या त्योहार को उदया तिथि में मनाना सर्वोत्तम माना गया है। सावन पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह प्रारंभ होगी। शास्त्रों में पूर्णिमा व्रत का विधान उस दिन है, दिन समय पूर्णिमा तिथि के साथ चंद्रोदय होता है। ऐसा संयोग 27 अगस्त को ही मिल रहा है। 28 अगस्त को सुबह के समय पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी जिसके कारण पूर्णिमा युक्त चंद्रोदय संभव नहीं है। इसलिए सावन पूर्णिमा का व्रत 27 अगस्त को मान्य रहेगा।

    अगर रक्षा बंधन के पर्व की बात करें तो यह त्योहार हमेशा भद्रा रहित पूर्णिमा में मनाना उत्तम माना गया है। 27 अगस्त को भद्रा सुबह 07 बजे से शाम 06:02 बजे तक रहेगी। 28 अगस्त को सूर्योदय से पूर्व भद्रा समाप्त हो जाएगी और उदया पूर्णिमा मिलेगी। इसलिए उदयाव्यापी पूर्णिमा में रक्षा बंधन और सावन पूर्णिमा का स्नान-दान मनाना उत्तम रहने वाला है। हालांकि इस दिन पंचक भी रहेगा। लेकिन रक्षा बंधन पर भद्रा ज्यादा महत्वपूर्ण मानी गई है। मान्यता है कि भद्रा काल में भाई को राखी बांधने से भाई-बहन दोनों को ही नकारात्मक फलों की प्राप्ति होती है। इसलिए भद्रा के समय राखी बांधने से बचना चाहिए।


    28 अगस्त को राखी बांधने का शुभ मुहूर्त:

    28 अगस्त 2026 को भाई की कलाई पर राखी बांधने का सबसे उत्तम और श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 5:57 बजे से सुबह 9:48 बजे तक रहेगा। अगर आप सुबह के समय राखी नहीं बांध पाते हैं तो दोपहर 12:04 बजे से दोपहर 12:53 बजे तक भी राखी बांधने का शुभ मुहूर्त रहेगा। शुभ मुहूर्त में राखी बांधना अत्यंत शुभ माना गया है। भद्रा विराजमान नहीं होने के कारण 28 अगस्त को पूरे दिन राखी का पर्व मनाया जा सकेगा। हालांकि राहुकाल का विचार अनिवार्य है।

    28 अगस्त को राहुकाल कब से कब तक है:
    ज्योतिष शास्त्र में राहुकाल को शुभ नहीं माना गया है। मान्यता है कि इस समय किए गए कार्यों का अशुभ फल प्राप्त होता है। 28 अगस्त को राहुकाल सुबह 10:46 बजे से दोपहर 12:22 बजे के बीच रहेगा।


    चंद्र ग्रहण का राखी पर असर:

    28 अगस्त को साल का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण लगेगा। भारतीय समयानुसार इस ग्रहण की शुरुआत सुबह 06 बजकर 53 मिनट पर होगी और दोपहर 12 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगा। यह ग्रहण अपने चरम पर सुबह 09 बजकर 43 मिनट के आसपास होगा। यह ग्रहण दिन में लगेगा, जिसके कारण भारत में यह नजर नहीं आएगा। ग्रहण नहीं दिखने के कारण इसका सूतक काल मान्य नहीं रहेगा। सूतक काल नहीं लगने के कारण चंद्र ग्रहण का राखी के पर्व पर कोई असर नहीं रहेगा।

  • रक्षाबंधन पर घर में बनाएं खस्ता मावा गुजिया, मावे और ड्राई फ्रूट्स की भरावन से बढ़ेगा त्योहार का स्वाद

    रक्षाबंधन पर घर में बनाएं खस्ता मावा गुजिया, मावे और ड्राई फ्रूट्स की भरावन से बढ़ेगा त्योहार का स्वाद

    नई दिल्ली ।रक्षाबंधन का त्योहार भाई और बहन के रिश्ते में मिठास और अपनापन बढ़ाने वाला अवसर है। इस खास दिन पर घर में बनी मिठाई का स्वाद अलग ही होता है। अगर इस बार बाजार से मिठाई खरीदने के बजाय कुछ खास तैयार करना चाहती हैं तो मावा गुजिया एक अच्छा विकल्प हो सकती है।

    मावा गुजिया बाहर से कुरकुरी और अंदर से मुलायम तथा स्वादिष्ट होती है। इसकी भरावन में मावा, पिसी चीनी, काजू, बादाम, किशमिश और इलायची का इस्तेमाल किया जाता है। इन चीजों का मिश्रण गुजिया को पारंपरिक स्वाद के साथ खुशबूदार भी बनाता है।

    गुजिया बनाने के लिए सबसे पहले मैदा तैयार किया जाता है। दो कप मैदा में करीब दो बड़े चम्मच घी डालकर अच्छी तरह मिलाएं। घी और मैदा को हथेलियों के बीच रगड़कर देखें। अगर मिश्रण दबाने पर आसानी से बंधने लगे तो मोयन सही माना जा सकता है।

    इसके बाद थोड़ा थोड़ा पानी डालते हुए सख्त आटा गूंथ लें। गुजिया का आटा बहुत नरम नहीं होना चाहिए। आटा तैयार होने के बाद उसे ढककर करीब 15 से 20 मिनट के लिए रख दें। इससे आटा बेलने के लिए अच्छी तरह तैयार हो जाता है।

    अब गुजिया की भरावन तैयार करें। कड़ाही को धीमी आंच पर गर्म करके उसमें मावा डालें। मावे को लगातार चलाते हुए हल्का भूनें। इसका उद्देश्य मावे की अतिरिक्त नमी कम करना और उसकी खुशबू को उभारना है। मावा भुन जाने के बाद गैस बंद कर दें और उसे पूरी तरह ठंडा होने दें।

    मावा ठंडा होने के बाद इसमें पिसी चीनी, बारीक कटे काजू और बादाम, किशमिश तथा इलायची पाउडर डालकर अच्छी तरह मिला लें। मावा गर्म रहते हुए चीनी डालने से भरावन अधिक गीली हो सकती है, इसलिए ठंडा होने के बाद ही चीनी मिलाना बेहतर रहता है।

    इसके बाद तैयार आटे को बराबर हिस्सों में बांटकर छोटी छोटी लोइयां बना लें। प्रत्येक लोई को बेलकर छोटी पूरी जैसा आकार दें। पूरी को बहुत ज्यादा पतला न रखें, क्योंकि पतली परत भरावन डालते समय आसानी से फट सकती है।

    अब पूरी के बीच में तैयार मावे की उचित मात्रा रखें। किनारे पर हल्का पानी लगाकर पूरी को मोड़ दें और अर्धचंद्राकार आकार में बंद करें। किनारों को उंगलियों से अच्छी तरह दबाएं, ताकि तलते समय भरावन बाहर न निकले।

    कड़ाही में तेल या घी गर्म करें और गुजिया को मध्यम से धीमी आंच पर तलें। तेज आंच पर तलने से बाहरी हिस्सा जल्दी भूरा हो सकता है, जबकि अंदर की परत ठीक से नहीं सिकती। धीमी आंच पर तलने से गुजिया अच्छी तरह कुरकुरी और सुनहरी बनती है।

    गुजिया सुनहरी होने के बाद उसे निकालकर अतिरिक्त तेल या घी निकलने दें। कुछ देर ठंडा होने के बाद इसे परिवार के साथ परोसा जा सकता है। ऊपर से बारीक कटे पिस्ते या बादाम डालने से इसका स्वाद और प्रस्तुति दोनों बेहतर हो सकते हैं।

    खस्ता मावा गुजिया के लिए सबसे जरूरी बात आटे की सही consistency, मावे को ठंडा करना और तलते समय उचित तापमान बनाए रखना है। इन बातों का ध्यान रखकर रक्षाबंधन पर घर में स्वादिष्ट और कुरकुरी मिठाई तैयार की जा सकती है।

  • राखी बाजार में बढ़ी त्योहारी खरीदारी, दिल्ली समेत देशभर में स्वदेशी और थीम आधारित राखियों की मांग में तेजी

    राखी बाजार में बढ़ी त्योहारी खरीदारी, दिल्ली समेत देशभर में स्वदेशी और थीम आधारित राखियों की मांग में तेजी

    नई दिल्ली । रक्षाबंधन से पहले देशभर के बाजारों में त्योहारी खरीदारी तेज हो गई है और कारोबारियों को इस वर्ष रिकॉर्ड स्तर पर बिक्री की उम्मीद है। व्यापारिक संगठनों के आकलन के अनुसार, रक्षाबंधन के अवसर पर देशभर में 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार हो सकता है। इसमें अकेले राखियों की बिक्री करीब 25 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।

    त्योहार में अब कुछ ही दिन बाकी हैं, ऐसे में दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों के बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही बढ़ गई है। राजधानी दिल्ली के प्रमुख बाजारों में राखियों, मिठाइयों, कपड़ों, उपहारों और अन्य त्योहारी सामान की खरीदारी के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। कारोबारियों को उम्मीद है कि त्योहार से पहले अंतिम दिनों में बिक्री की रफ्तार और बढ़ेगी।

    दिल्ली के चांदनी चौक, सदर बाजार, करोल बाग, लाजपत नगर, कमला नगर, राजौरी गार्डन, गांधी नगर, खारी बावली और लक्ष्मी नगर जैसे बाजारों में रक्षाबंधन से जुड़ी खरीदारी का असर दिखाई दे रहा है। स्थानीय बाजारों के अलावा छोटे और मध्यम व्यापारियों को भी त्योहार के कारण कारोबार बढ़ने की उम्मीद है।

    अनुमान के मुताबिक, देशभर में सिर्फ राखियों का कारोबार करीब 25 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। दिल्ली में राखियों की बिक्री लगभग चार हजार करोड़ रुपये रहने की संभावना जताई गई है। राखियों के अलावा मिठाई, परिधान, इलेक्ट्रॉनिक्स, सजावटी वस्तुएं, ड्राई फ्रूट्स, पूजा सामग्री और अन्य उपहारों की बिक्री को जोड़ने पर रक्षाबंधन से संबंधित कुल कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है।

    इस वर्ष बाजार में पारंपरिक राखियों के साथ अलग-अलग विषयों और संदेशों वाली राखियां भी दिखाई दे रही हैं। विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत, महिला सशक्तिकरण, राष्ट्र गौरव और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने वाले संदेशों से जुड़ी राखियों की मांग को लेकर व्यापारिक क्षेत्र में उत्साह है।

    विकसित भारत राखी, मोदी गारंटी राखी, ब्रह्मोस राखी, नारी वंदन राखी, आत्मनिर्भर भारत राखी और वोकल फॉर लोकल राखी जैसे डिजाइन बाजार में उपलब्ध हैं। इसके अलावा भारत गौरव राखी, लखपति दीदी राखी, नमामि गंगे राखी, राष्ट्र रक्षा सूत्र राखी और अमृतकाल राखी भी ग्राहकों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं।

    बच्चों और युवाओं में ब्रह्मोस राखी, राष्ट्र रक्षा सूत्र राखी और विकसित भारत राखी को लेकर खास रुचि बताई जा रही है। वहीं महिलाओं के बीच नारी वंदन और लखपति दीदी जैसी थीम वाली राखियों को पसंद किए जाने की बात सामने आई है। इससे राखी बाजार में डिजाइन और संदेश आधारित उत्पादों की विविधता बढ़ी है।

    व्यापारिक क्षेत्र का कहना है कि स्वदेशी राखियों की मांग बढ़ने से स्थानीय कारीगरों, महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और कुटीर उद्योगों को भी आर्थिक लाभ मिल रहा है। स्थानीय स्तर पर तैयार राखियों की बिक्री त्योहार के दौरान छोटे कारोबारियों के लिए अतिरिक्त आय का माध्यम बन रही है।

    रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा प्रमुख भारतीय त्योहार है, लेकिन इसके साथ जुड़ा बाजार भी लगातार विस्तृत हो रहा है। अब राखी के साथ उपहार, मिठाई, कपड़े और अन्य सामान की खरीदारी त्योहार के कारोबार को व्यापक बनाती है। इस बार बाजार में स्वदेशी उत्पादों और स्थानीय स्तर पर तैयार सामान को प्राथमिकता देने पर भी जोर दिया जा रहा है।

    कारोबारी वर्ग को उम्मीद है कि रक्षाबंधन से पहले खरीदारी के अंतिम दौर में बाजारों में भीड़ और बिक्री दोनों बढ़ेंगी। यदि राखियों और अन्य त्योहारी वस्तुओं की मांग अनुमान के अनुरूप रहती है, तो इस वर्ष रक्षाबंधन का कुल कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये के पार जा सकता है।

  • रक्षाबंधन 2026 पर राखी खरीदते समय रखें डिजाइन का ध्यान, जानिए भगवान की तस्वीर से काले धागे तक क्या मान्यताएं हैं

    रक्षाबंधन 2026 पर राखी खरीदते समय रखें डिजाइन का ध्यान, जानिए भगवान की तस्वीर से काले धागे तक क्या मान्यताएं हैं

    नई दिल्ली ।रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प से जुड़ा माना जाता है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं में राखी को केवल धागा नहीं माना जाता, बल्कि इसके रंग, डिजाइन और उस पर बने प्रतीकों को भी विशेष महत्व दिया जाता है। इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त को मनाया जाएगा।

    राखी खरीदते समय बाजार में कई तरह के डिजाइन देखने को मिलते हैं। इनमें देवी-देवताओं की तस्वीर वाली राखी, ॐ और स्वास्तिक जैसे शुभ चिह्नों वाली राखी, सूती या रेशमी धागे की राखी के अलावा बच्चों के लिए कार्टून और आधुनिक डिजाइन भी शामिल हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन सभी का महत्व एक जैसा नहीं माना जाता।

    भगवान गणेश, भगवान कृष्ण या भगवान हनुमान की तस्वीर वाली राखी को पारंपरिक रूप से शुभ माना जाता है। मान्यता है कि ऐसी राखी भाई के जीवन में ईश्वर की कृपा और सुरक्षा का प्रतीक बन सकती है। हालांकि धार्मिक चित्र वाली राखी को रक्षाबंधन के बाद सम्मानपूर्वक रखने की सलाह दी जाती है और उसे इधर-उधर फेंकने से बचने की परंपरा बताई जाती है।

    ॐ और स्वास्तिक जैसे शुभ चिह्नों वाली राखी को भी धार्मिक दृष्टि से सकारात्मक माना जाता है। इन प्रतीकों का संबंध मंगल, शांति और समृद्धि से जोड़ा जाता है। ऐसी राखी चुनने वाले लोग इसकी पवित्रता और साफ-सफाई का ध्यान रखते हैं। धार्मिक प्रतीकों वाली वस्तुओं को सम्मान के साथ रखने की परंपरा भी भारतीय संस्कृति में रही है।

    साधारण सूती या रेशमी धागे की राखी को सबसे पारंपरिक विकल्पों में माना जाता है। इसमें किसी विशेष सजावट की जरूरत नहीं होती और यह भाई-बहन के स्नेह तथा रिश्ते की सरलता का प्रतीक मानी जाती है। पारंपरिक रूप से सादे और पवित्र धागे को रक्षाबंधन की भावना से जोड़ा जाता है।

    बच्चों के बीच कार्टून और फैंसी राखियों का चलन काफी बढ़ा है। अलग-अलग पात्रों और आकर्षक आकृतियों वाली ऐसी राखियां बच्चों को पसंद आती हैं। हालांकि धार्मिक दृष्टि से इनका कोई विशेष महत्व नहीं माना जाता। इन्हें मुख्य रूप से पसंद और सुविधा के आधार पर चुना जा सकता है।

    इवल आई यानी नजर से बचाने वाले प्रतीक वाली राखियों को लेकर भी अलग-अलग धारणाएं हैं। आधुनिक मान्यताओं में इसे बुरी नजर से सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, लेकिन पारंपरिक वैदिक मान्यताओं में इसका कोई अनिवार्य धार्मिक महत्व नहीं है। इसलिए इसे न पूरी तरह शुभ माना जाता है और न ही अशुभ।

    काली राखी को लेकर कुछ धार्मिक मान्यताओं में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। इसी तरह टूटी, खंडित या बहुत नुकीली डिजाइन वाली राखी से बचने की बात कही जाती है। राखी बांधते समय उसके टूट जाने को भी कुछ परंपराओं में अपशकुन माना जाता है। प्लास्टिक से बनी राखियों को लेकर भी पारंपरिक पसंद कम बताई जाती है।

    हालांकि राखी के शुभ या अशुभ प्रभाव को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। ये बातें मुख्य रूप से धार्मिक विश्वास, ज्योतिषीय मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित हैं। इसलिए राखी चुनते समय भाई-बहन के रिश्ते की भावना, पसंद और सुविधा को प्राथमिकता देना सबसे महत्वपूर्ण है।