Tag: RBI Policy

  • लगातार चौथे दिन शेयर बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 571 अंक टूटा; निफ्टी 0.88 प्रतिशत नीचे, ऑटो सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित

    लगातार चौथे दिन शेयर बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 571 अंक टूटा; निफ्टी 0.88 प्रतिशत नीचे, ऑटो सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित

    मुंबई। भारतीय शेयर बाजार में लगातार चौथे कारोबारी सत्र गिरावट जारी रही। ऊर्जा की स्थिर कीमतों, बॉन्ड यील्ड में अस्थिरता और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका के बीच निवेशकों में सतर्कता बढ़ी, जिससे बाजार लाल निशान में बंद हुआ। कारोबार समाप्त होने पर बीएसई सेंसेक्स 570.59 अंक यानी 0.79 प्रतिशत गिरकर 71,909.70 पर पहुंच गया। वहीं, एनएसई निफ्टी 50 में 198.50 अंक यानी 0.88 प्रतिशत की गिरावट रही और यह 22,421.95 के स्तर पर बंद हुआ।

    दिनभर के कारोबार में प्रमुख सूचकांकों में उतार-चढ़ाव के साथ भारी गिरावट देखने को मिली। सेंसेक्स दिन के उच्चतम स्तर 72,573 से फिसलकर 71,293 के निचले स्तर तक पहुंच गया। इस दौरान इसमें करीब 1,280 अंकों की गिरावट दर्ज की गई और सूचकांक 2 अप्रैल 2026 को बने 71,545 के पिछले कैलेंडर वर्ष के न्यूनतम स्तर से भी नीचे चला गया। निफ्टी 50 में भी दिन के दौरान 1.7 प्रतिशत यानी 394 अंकों की गिरावट दर्ज हुई। सूचकांक 22,611 के उच्च स्तर से गिरकर 22,217 के निचले स्तर तक पहुंचा। अप्रैल में निफ्टी ने कैलेंडर वर्ष का 22,183 का न्यूनतम स्तर छुआ था।

    निफ्टी 50 में बजाज ऑटो, मारुति सुजुकी, श्रीराम फाइनेंस, टाटा स्टील, ग्रासिम इंडस्ट्रीज, आयशर मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा के शेयरों में सबसे अधिक गिरावट रही। इसके विपरीत इंफोसिस, एचडीएफसी लाइफ, एचडीएफसी बैंक, एसबीआई लाइफ, मैक्स हेल्थ और टीसीएस के शेयरों में तेजी दर्ज की गई। व्यापक बाजार में भी दबाव देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप 100 में 1.01 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप 100 में 0.97 प्रतिशत की गिरावट के साथ कारोबार समाप्त हुआ। क्षेत्रवार कारोबार में निफ्टी ऑटो, निफ्टी मेटल, निफ्टी मीडिया और निफ्टी एफएमसीजी में सबसे ज्यादा कमजोरी रही, जबकि निफ्टी आईटी में सबसे अधिक बढ़त दर्ज की गई।

    एक बाजार विशेषज्ञ के अनुसार, बाजार में गिरावट के पीछे मुख्य रूप से बाहरी कारण रहे। बॉन्ड यील्ड कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंचने और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बने रहने से 2026-27 के आर्थिक परिदृश्य को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। घरेलू स्तर पर निवेशक दूसरी तिमाही यानी क्यू2 के नतीजों और अगले सप्ताह आने वाली आरबीआई की मौद्रिक नीति को लेकर भी सतर्क हैं। विशेषज्ञ ने कहा कि क्यू2 की कमाई क्यू1 की तुलना में कमजोर रह सकती है, क्योंकि क्यू1 में परिचालन लागत के प्रभाव का लाभ मिला था, जो इस बार उसी स्तर पर नहीं मिल सकता।

    विशेषज्ञ के मुताबिक, पिछली मौद्रिक नीति में आरबीआई का रुख अपेक्षाकृत खुला था, लेकिन वैश्विक महंगाई के दबाव और रुपये को समर्थन देने की जरूरत को देखते हुए उसके रुख में बदलाव की संभावना पर विचार किया जा सकता है। इसके बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है और मौजूदा चुनौतियों से निपटने की स्थिति में है। लंबे समय के निवेशकों के लिए बाजार की कमजोरी में धीरे-धीरे निवेश बढ़ाने की बात कही गई है, जबकि कम अवधि के निवेशकों के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और सरकार के कदमों से वैश्विक वित्तीय बाजारों में स्थिरता आने तक इंतजार और निगरानी की रणनीति अपनाने की सलाह दी गई है।

  • अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी संकेत: खुदरा महंगाई में फिर तेजी के संकेत

    अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी संकेत: खुदरा महंगाई में फिर तेजी के संकेत


    नई दिल्ली । भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर जारी एक नई आकलन रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि आने वाले समय में महंगाई का दबाव फिर से बढ़ सकता है। अनुमान के अनुसार वित्त वर्ष 2027 में देश की औसत खुदरा महंगाई दर 5.1 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। हालांकि हाल के महीनों में महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित रही है, लेकिन वैश्विक और घरेलू परिस्थितियां आगे चलकर स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।

    पिछले कुछ समय में खुदरा महंगाई में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन यह अब भी सीमित दायरे में बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में उपभोक्ता कीमतों पर बड़ा दबाव पूरी तरह सामने नहीं आया है, लेकिन आने वाले समय में यह स्थिति बदल सकती है। ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती लागत इस दबाव का एक प्रमुख कारण मानी जा रही है, जिसका असर धीरे-धीरे परिवहन और उत्पादन लागत पर पड़ रहा है।

    कच्चे तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि भी एक अहम चिंता का विषय बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहने की आशंका है, जिससे आयात बिल बढ़ सकता है और इसका सीधा असर घरेलू बाजार की कीमतों पर पड़ सकता है। इससे न केवल ईंधन बल्कि वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी का जोखिम रहता है।

    हालांकि सरकार की ओर से ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने के प्रयासों से अभी तक उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिली है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति लंबे समय तक बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। जैसे-जैसे लागत बढ़ेगी, कंपनियां इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकती हैं, जिससे महंगाई में धीरे-धीरे बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

    इसके अलावा खाद्य महंगाई को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। मौसम से जुड़े जोखिम, खासकर कम मानसून और अल नीनो जैसी परिस्थितियां, कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। यदि फसल उत्पादन में गिरावट आती है तो खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक माना जा रहा है, जिससे आम लोगों की खर्च क्षमता पर असर पड़ सकता है।

    अर्थव्यवस्था से जुड़े जानकारों का मानना है कि फिलहाल महंगाई स्थिर दिख रही है, लेकिन यह स्थिरता अस्थायी हो सकती है। आने वाले महीनों में ऊर्जा, परिवहन और खाद्य क्षेत्रों से जुड़े कारक मिलकर महंगाई की दिशा तय करेंगे।