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  • आर.डी. बर्मन और आनंद बख्शी की जादुई रचना का खुलासा, विशाल ददलानी ने बताया ‘चिंगारी कोई भड़के’ का अनसुना किस्सा

    आर.डी. बर्मन और आनंद बख्शी की जादुई रचना का खुलासा, विशाल ददलानी ने बताया ‘चिंगारी कोई भड़के’ का अनसुना किस्सा

    नई दिल्ली /मुंबई। हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर के कई गीत आज भी लोगों की यादों में उतने ही ताज़ा हैं जितने अपने समय में थे। ऐसे ही एक अमर गीत ‘चिंगारी कोई भड़के’ के बनने की कहानी हाल ही में संगीतकार और गायक विशाल ददलानी ने साझा की, जिसने एक बार फिर इस क्लासिक गीत के प्रति लोगों की रुचि बढ़ा दी है। यह किस्सा न केवल संगीत की रचनात्मकता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कैसे एक साधारण जीवन अनुभव कालजयी कला में बदल सकता है।

    विशाल ददलानी ने एक सिंगिंग रियलिटी शो के दौरान इस गीत की पृष्ठभूमि का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस गीत की धुन मशहूर संगीतकार आर. डी. बर्मन ने तैयार की थी, जिन्हें संगीत की दुनिया में पंचम दा के नाम से जाना जाता है। धुन तैयार होने के बाद इसे गीतकार आनंद बख्शी को दिया गया ताकि वह इसके बोल लिख सकें।

    कहानी के अनुसार, उस समय मौसम बेहद सुहावना था और बारिश हो रही थी। आनंद बख्शी देर रात घर लौट रहे थे, और रास्ते में उन्होंने सिगरेट जलाने की कोशिश की। लेकिन लगातार बारिश की वजह से उनका लाइटर बार-बार बुझ जा रहा था। यह बेहद साधारण सा पल था, लेकिन इसी क्षण ने उनके मन में एक गहरी कल्पना को जन्म दिया।

    उन्हीं परिस्थितियों में उनके दिमाग में एक ऐसी पंक्ति आई, जो आगे चलकर हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार गीतों में से एक बन गई—“चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाए।” यह पंक्ति केवल एक गीत का हिस्सा नहीं बनी, बल्कि भावनाओं और प्रतीकों का ऐसा संगम बन गई, जिसने सुनने वालों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी।

    विशाल ददलानी ने इस अनुभव को साझा करते हुए कहा कि असली कलाकार वही होता है जो जीवन के छोटे-छोटे पलों को भी गहराई से महसूस करता है और उन्हें कला में बदल देता है। उनके अनुसार, सामान्य लोग ऐसे अनुभवों को शायद नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन महान रचनाकार उन्हीं क्षणों को अमर बना देते हैं। उन्होंने आर. डी. बर्मन और आनंद बख्शी की जोड़ी को भारतीय संगीत का एक अनमोल रत्न बताया।

    यह गीत वर्ष 1972 में रिलीज हुई फिल्म ‘अमर प्रेम’ का हिस्सा था, जिसमें राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। फिल्म के साथ-साथ इसके गीतों ने भी दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई थी। ‘चिंगारी कोई भड़के’ को प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार ने अपनी आवाज दी थी, जिसने इस गीत को और भी भावनात्मक और प्रभावशाली बना दिया।

    आज भी यह गीत संगीत प्रेमियों के बीच उतनी ही लोकप्रियता रखता है जितनी इसके रिलीज के समय थी। इसकी गहराई, शब्दों की सादगी और संगीत की भावनात्मक पकड़ इसे समय से परे एक क्लासिक बनाती है। विशाल ददलानी द्वारा साझा किया गया यह किस्सा एक बार फिर याद दिलाता है कि महान कला अक्सर सबसे साधारण क्षणों से जन्म लेती है।

  • संगीतकार ने गरारे की ध्वनि को रिकॉर्ड करके फिल्म का सबसे यादगार और डरावना पार्श्व संगीत तैयार किया था।

    संगीतकार ने गरारे की ध्वनि को रिकॉर्ड करके फिल्म का सबसे यादगार और डरावना पार्श्व संगीत तैयार किया था।


    नई दिल्ली: 
     भारतीय सिनेमा का इतिहास केवल शानदार कहानियों और अभिनय तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे तकनीकी नवाचारों और संगीत की अद्भुत दुनिया छिपी हुई है। अस्सी के दशक की एक ऐसी ही कल्ट क्लासिक फिल्म ने दर्शकों के दिलों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी थी। इस फिल्म में नायक के एक नकारात्मक और रहस्यमयी हमशक्ल पात्र के पर्दे पर आगमन के समय बजने वाले डरावने पार्श्व संगीत ने उस दौर में सिनेमाघरों में बैठे लोगों के रोंगटे खड़े कर दिए थे। दशकों तक इस विशिष्ट ध्वनि को लेकर फिल्म प्रेमियों के मन में कौतूहल बना रहा कि इसे किस आधुनिक वाद्य यंत्र या तकनीक से बनाया गया होगा। अब इस संगीत के पीछे की वास्तविकता सामने आई है जो यह स्पष्ट करती है कि एक महान कलाकार के लिए पूरी दुनिया ही संगीत का एक मंच है और वह साधारण वस्तुओं से भी असाधारण कला का सृजन कर सकता है।

    फिल्म में जब उस खूंखार पात्र का प्रवेश होता है तो पृष्ठभूमि में एक अजीब सी गूंज और कंपन सुनाई देता है जो दर्शकों के मन में भय का संचार करता है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि यह किसी विदेशी तकनीक या महंगे सिंथेसाइज़र का परिणाम है। वास्तविकता यह है कि संगीत जगत के उस दिग्गज जादूगर ने इस भयावह प्रभाव को पैदा करने के लिए किसी पारंपरिक साज का सहारा नहीं लिया था। उन्होंने इस ध्वनि को उत्पन्न करने के लिए पानी के साथ गरारे करने की क्रिया का उपयोग किया था। संगीतकार ने गरारे करते समय निकलने वाली आवाज को रिकॉर्ड किया और फिर उसे अपनी संगीत समझ के साथ इस तरह ढाला कि वह सिनेमाई इतिहास का सबसे चर्चित और डरावना बैकग्राउंड स्कोर बन गया। यह प्रयोग उनकी उस मौलिक सोच को दर्शाता है जहां वे रोजमर्रा की ध्वनियों में भी संगीत ढूंढ लेते थे।

    पंचम दा के नाम से मशहूर इस संगीतकार की यह विशेषता रही थी कि वे हमेशा लीक से हटकर सोचने के लिए जाने जाते थे। उन्होंने अपने करियर में कई बार कांच की बोतलों को टकराने रसोई के बर्तनों या फिर कागज फटने जैसी ध्वनियों को सुपरहिट गीतों का हिस्सा बनाया था। इस विशेष फिल्म के लिए उन्होंने गरारे की आवाज को इसलिए चुना क्योंकि वे उस नकारात्मक पात्र की क्रूरता और रहस्य को एक अलग पहचान देना चाहते थे। जब इस रचनात्मक रहस्य का खुलासा हुआ तो संगीत के जानकार भी हैरान रह गए। यह किस्सा आज भी फिल्म निर्माण की कक्षाओं में एक उदाहरण के रूप में सुनाया जाता है कि कैसे एक कलाकार अपनी कल्पनाशीलता के बल पर बहुत ही सीमित और साधारण संसाधनों से वैश्विक स्तर का प्रभाव पैदा कर सकता है।

    उस समय के सिनेमा में अमिताभ बच्चन जैसे महानायक की उपस्थिति फिल्म के हर पक्ष से सर्वश्रेष्ठ की मांग करती थी। संगीतकार ने इस मांग को बखूबी समझा और न केवल मधुर गीतों की रचना की बल्कि पार्श्व संगीत के जरिए फिल्म के तनावपूर्ण दृश्यों में प्राण फूंक दिए। नायक के सौम्य व्यक्तित्व और उसके खतरनाक हमशक्ल के बीच का मानसिक द्वंद्व पर्दे पर स्पष्ट करने में इस डरावनी ध्वनि का बहुत बड़ा योगदान था। आज के आधुनिक दौर में जहां कंप्यूटर के जरिए लाखों तरह की ध्वनियां बनाई जा सकती हैं वहां अस्सी के दशक के ये मौलिक प्रयोग यह याद दिलाते हैं कि तकनीक केवल एक साधन है असली जादू तो कलाकार के मस्तिष्क और उसकी रचनात्मकता में होता है।

    सिनेमा की यह विरासत हमें यह संदेश देती है कि महान कलाकृतियां केवल महंगे उपकरणों की मोहताज नहीं होतीं। कभी-कभी एक साधारण विचार और उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग ही इतिहास रचने के लिए काफी होता है। दशकों बीत जाने के बाद भी जब दर्शक उस फिल्म के उस विशेष दृश्य को देखते हैं तो वही पुराना रोमांच महसूस करते हैं। यह कहानी न केवल एक संगीतकार की सफलता को बयां करती है बल्कि भारतीय फिल्म संगीत के उस स्वर्णिम काल को भी समर्पित है जहां कलाकार नए-नए प्रयोगों से दर्शकों को आश्चर्यचकित करने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे।

  • पंचम दा का म्यूजिक मैजिक: कैसे साधारण कंघी ने ‘पड़ोसन’ के गाने को बनाया सुपरहिट

    पंचम दा का म्यूजिक मैजिक: कैसे साधारण कंघी ने ‘पड़ोसन’ के गाने को बनाया सुपरहिट


    नई दिल्ली।भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में अगर किसी संगीतकार को सबसे ज्यादा प्रयोगधर्मी और क्रिएटिव कहा जाता है तो वह हैं Rahul Dev Burman जिन्हें दुनिया प्यार से पंचम दा के नाम से जानती है। आरडी बर्मन को लोग यूं ही मैड जीनियस नहीं कहते थे। उनके संगीत में ऐसी अनोखी कल्पनाशीलता थी जिसे आज भी दोहराना आसान नहीं है। पंचम दा जब भी किसी गाने की रिकॉर्डिंग करते थे तो सिर्फ पारंपरिक वाद्ययंत्रों पर निर्भर नहीं रहते थे बल्कि रोजमर्रा की चीजों से भी ऐसी आवाजें निकाल लेते थे जो गाने में नई जान भर देती थीं।

    उनकी इसी क्रिएटिव सोच का एक दिलचस्प उदाहरण 1968 में आई फिल्म Padosan के सुपरहिट गाने Mere Samne Wali Khidki Mein में देखने को मिलता है। यह गाना उस दौर में जितना लोकप्रिय था उतना ही आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। अक्सर लोग इस गाने को गुनगुनाते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गाने में एक खास साउंड किसी म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट से नहीं बल्कि एक साधारण कंघी से निकाला गया था।

    दरअसल फिल्म में Sunil Dutt एक शरारती पड़ोसी की भूमिका निभाते हैं जो सामने वाली खिड़की में रहने वाली लड़की को अपने अंदाज में रिझाने की कोशिश करता है। गाने का माहौल भी हल्का फुल्का और शरारत से भरा हुआ है। जब इस गाने की रिकॉर्डिंग की तैयारी चल रही थी तब पंचम दा को लग रहा था कि गाने में कुछ ऐसा होना चाहिए जो उसकी मस्ती और शरारत को और ज्यादा उभार सके। स्टूडियो में उस समय बड़े बड़े संगीतकार मौजूद थे। वायलिन, गिटार और कई अन्य वाद्ययंत्र तैयार थे लेकिन पंचम दा को कुछ अलग चाहिए था।

    बताया जाता है कि काफी देर सोचने के बाद अचानक पंचम दा ने अपनी जेब में हाथ डाला और एक साधारण प्लास्टिक की कंघी निकाल ली। इसके बाद उन्होंने उस कंघी को एक खुरदुरी सतह पर रगड़ना शुरू किया। जैसे ही उससे कर्र कर्र जैसी आवाज निकली पंचम दा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्हें लगा कि यही वह साउंड है जो गाने के शरारती मूड को और दिलचस्प बना सकता है।

    स्टूडियो में मौजूद लोग पहले तो यह देखकर हैरान रह गए कि एक मशहूर संगीतकार रिकॉर्डिंग के दौरान कंघी से आवाज निकालने की कोशिश कर रहा है। खासतौर पर गायक Kishore Kumar को यह दृश्य काफी मजेदार लगा। उन्होंने पंचम दा को देखकर मजाक किया और सिर पकड़ लिया। लेकिन जब रिकॉर्डिंग पूरी हुई और गाना तैयार हुआ तो हर कोई उनकी प्रतिभा का कायल हो गया।

    गाने की शुरुआत और बैकग्राउंड में जो हल्की क्रिक क्रिक जैसी आवाज सुनाई देती है वह असल में उसी कंघी से पैदा की गई थी। यह छोटी सी ध्वनि गाने में एक अलग तरह की मस्ती और चुलबुलापन जोड़ देती है। यही वजह है कि आज भी यह गाना सुनते समय श्रोताओं को अलग आनंद मिलता है भले ही वे उस साउंड के पीछे की कहानी से अनजान हों।

    आरडी बर्मन की खासियत यही थी कि वे संगीत को सिर्फ सुर और ताल तक सीमित नहीं रखते थे बल्कि रोजमर्रा की चीजों को भी संगीत का हिस्सा बना देते थे। कभी पानी की छपाक, कभी कांच की बोतल की टनकार और कभी चम्मच और ग्लास की आवाजें उनके गानों में सुनाई देती थीं। उनकी यही प्रयोगधर्मिता उन्हें बाकी संगीतकारों से अलग बनाती है।

    आज जब लोग इस गाने को ध्यान से सुनते हैं और कंघी से निकली उस आवाज़ को पहचानने की कोशिश करते हैं तो उन्हें एहसास होता है कि पंचम दा की क्रिएटिविटी कितनी अनोखी थी। यही कारण है कि दशकों बाद भी आरडी बर्मन का संगीत उतना ही ताजा और दिलचस्प लगता है जितना अपने दौर में था।