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  • संगीतकारों की पहली और आखिरी उम्मीद थे स्वर कोकिला के हमसफर मोहम्मद रफी: जानिए कैसे बिना किसी पूर्व योजना के रच दिया था संगीत का नया इतिहास

    संगीतकारों की पहली और आखिरी उम्मीद थे स्वर कोकिला के हमसफर मोहम्मद रफी: जानिए कैसे बिना किसी पूर्व योजना के रच दिया था संगीत का नया इतिहास

    नई दिल्ली । भारतीय संगीत जगत के सुनहरे दौर में पार्श्वगायक मोहम्मद रफी एक ऐसे अनमोल रत्न थे, जिनकी आवाज का जादुई दायरा हर प्रकार के भावों और गीतों को खुद में समेटने की अद्भुत क्षमता रखता था। रफी साहब की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे जिस भी अभिनेता के लिए पर्दे पर पार्श्वगायन करते थे, उनकी आवाज हुबहू उस अभिनेता के हाव-भाव और अंदाज में ढल जाती थी। अस्सी और नब्बे के दशक से बहुत पहले, वर्ष 1964 में आई निर्देशक के. शंकर की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘राजकुमार’ की रिकॉर्डिंग के दौरान रफी साहब ने अपनी गायकी का एक ऐसा ही अकल्पनीय करिश्मा दिखाया था, जिसने संगीत के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया।

    इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के बैकग्राउंड को समझें तो फिल्म ‘राजकुमार’ में शम्मी कपूर, साधना, पृथ्वीराज कपूर और प्राण जैसे दिग्गज कलाकार मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी उस दौर की सबसे सफल और कल्ट जोड़ी शंकर-जयकिशन के कंधों पर थी। इस फिल्म के गानों को सजाने के लिए मोहम्मद रफी के साथ लता मंगेशकर, आशा भोसले और सुमन कल्याणपुर जैसे महान गायकों को चुना गया था। शम्मी कपूर अपने गानों के फिल्मांकन और उनकी मेकिंग को लेकर हमेशा से बेहद गंभीर रहते थे, इसलिए वे अक्सर गानों की लाइव रिकॉर्डिंग के समय म्यूजिक स्टूडियो में खुद मौजूद रहा करते थे।

    इस फिल्म का एक विशेष और बेहद जोशीला गीत था— ‘दिलरुबा दिल पे तू सितम किए जाए’, जिसे मोहम्मद रफी और आशा भोसले को मिलकर गाना था। कहानी के दृश्य के अनुसार, रात के समय एक अस्तबल (तबेले) में कुछ लोग जश्न मना रहे थे और इसी पृष्ठभूमि के अनुरूप शंकर-जयकिशन ने गाने में बेहद अनूठे और भारी वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया था। आशा भोसले ने अपने हिस्से की रिकॉर्डिंग पूरी सहजता से कर ली थी, जिसके बाद मोहम्मद रफी ने अपनी कड़क आवाज में ‘हम भी तो आग में जलते रहे’ पंक्ति के साथ गाने में शानदार एंट्री ली। गाना अपनी पूरी लय में आगे बढ़ रहा था कि तभी इसके अंतिम अंतरे में कुछ ऐसा हुआ जिसने सबको चौंका दिया।

    गीत की आखिरी पंक्तियों तक पहुंचते-पहुंचते मोहम्मद रफी ने संगीत की तय धुन से हटकर अचानक अपनी आवाज के स्केल और अंदाज को पूरी तरह से बदल दिया। उनके गले से निकली वह एकदम नई और अप्रत्याशित तान सुनकर रिकॉर्डिस्ट ने घबराकर संगीतकार शंकर-जयकिशन की तरफ देखा, लेकिन अनुभवी संगीतकारों ने तुरंत भांप लिया कि यह कोई गलती नहीं बल्कि एक महान कलाकार की रूहानी कला है और उन्होंने गाने को बिना रोके जारी रखने का इशारा किया। पास ही खड़ीं आशा भोसले भी रफी साहब के इस अचानक बदले और रौद्र-जोशीले अंदाज को देखकर पूरी तरह हैरान रह गईं।

    रिकॉर्डिंग का फाइनल कट पूरा होने के बाद स्टूडियो का माहौल पूरी तरह से बदल चुका था और वहां मौजूद हर व्यक्ति रफी साहब की इस अद्वितीय प्रतिभा की सराहना कर रहा था। तब सह-गायिका आशा भोसले ने राहत की सांस लेते हुए हल्के-फुल्के अंदाज में कहा था कि यह बेहद अच्छा हुआ कि रफी साहब ने यह चमत्कारी बदलाव उनके गाने के बाद किया, अन्यथा वे डरकर वहीं रुक जातीं। अमूमन माना जाता था कि रफी साहब तय धुनों में बहुत ज्यादा फेरबदल नहीं करते थे, लेकिन जब भी वे अपनी मर्जी से ऐसा करते थे, तो वह गाना मील का पत्थर बन जाता था। यही कारण था कि जब भी कोई कठिन गाना अन्य गायकों के वश का नहीं होता था, तब पूरी इंडस्ट्री आंख मूंदकर मोहम्मद रफी के पास ही पहुंचती थी।