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  • दिवाली पर पुराने पर्दों को फेंकने की बजाय अपनाएं ये 5 तरीके, कम खर्च में चमकेगा आपका घर

    दिवाली पर पुराने पर्दों को फेंकने की बजाय अपनाएं ये 5 तरीके, कम खर्च में चमकेगा आपका घर


    नई दिल्ली ।
    दिवाली का त्योहार नजदीक आते ही घरों में साफ-सफाई और सजावट की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इस दौरान लोग घर को आकर्षक बनाने के लिए नई लाइट्स, कुशन कवर, फूलों और सजावटी सामान की खरीदारी करते हैं। हालांकि, घर को नया और खूबसूरत लुक देने के लिए हर बार बाजार से महंगी चीजें खरीदना जरूरी नहीं है। घर में रखे पुराने पर्दों का इस्तेमाल करके भी कई आकर्षक सजावटी सामान तैयार किए जा सकते हैं। थोड़ी रचनात्मकता और मेहनत से पुराने कपड़ों को उपयोगी होम डेकोर आइटम में बदला जा सकता है।

    पुराने पर्दों से सजावट करने का एक आसान तरीका नए कुशन कवर तैयार करना है। अगर आपके पास मोटे या खूबसूरत प्रिंट वाले पर्दे हैं, तो उनके अच्छे हिस्से का इस्तेमाल सोफा और बेड के कुशन कवर बनाने में कर सकते हैं। इसके लिए कपड़े को कुशन के आकार के अनुसार काटकर किनारों पर सिलाई करनी होगी। तैयार कवर को अधिक आकर्षक बनाने के लिए पुराने बटन, लेस और रंगीन धागों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे घर के बैठने वाले हिस्से को नया अंदाज मिलेगा।

    डाइनिंग टेबल की सजावट के लिए पुराने पर्दों से टेबल रनर भी बनाया जा सकता है। यदि पर्दे का कपड़ा मजबूत और अच्छी स्थिति में है, तो उसे टेबल की लंबाई के अनुसार काटकर चारों तरफ सिलाई कर दें। इसके बाद इसे टेबल के बीच में बिछाया जा सकता है। इसके ऊपर फूलदान, सजावटी कटोरी या एलईडी कैंडल रखने से डाइनिंग एरिया आकर्षक दिखाई देगा। दिवाली पर मेहमानों के स्वागत के लिए यह एक अच्छा और कम खर्च वाला विकल्प हो सकता है।

    घर के मुख्य दरवाजे और अंदरूनी दरवाजों को सजाने के लिए पुराने पर्दों से डोर हैंगिंग तैयार की जा सकती है। इसके लिए कपड़े की लंबी-लंबी पट्टियां काटकर लकड़ी की छड़ी या गोल रिंग पर बांध दें। इसके निचले हिस्से में रंगीन धागे, छोटे लटकन और मोती लगाकर इसे सजाया जा सकता है। तैयार डेकोरेशन को दरवाजे या खाली दीवार पर टांगकर घर की सजावट में इस्तेमाल किया जा सकता है।

    पूजा घर को सजाने के लिए भी पुराने पर्दे उपयोगी साबित हो सकते हैं। अगर पर्दे का कपड़ा सिल्क, वेलवेट या आकर्षक डिजाइन वाला है, तो उससे पूजा की चौकी के लिए सुंदर आसन बनाया जा सकता है। इसके अलावा कपड़े को मंदिर के पीछे बैकड्रॉप के रूप में भी लगाया जा सकता है। किनारों पर लेस लगाकर इसे और आकर्षक बनाया जा सकता है। हालांकि, पूजा स्थल पर कपड़े का इस्तेमाल करते समय उसे दीये, अगरबत्ती और मोमबत्तियों से सुरक्षित दूरी पर रखना जरूरी है।

    दिवाली पर मिठाई और उपहार देने के लिए पुराने पर्दों से कपड़े के गिफ्ट बैग भी बनाए जा सकते हैं। इसके लिए कपड़े को जरूरत के अनुसार काटकर तीन तरफ से सिलाई करें और ऊपर दो पट्टियां लगाकर हैंडल तैयार कर लें। इन बैग को लेस, बटन या कपड़े से बने छोटे फूलों से सजाया जा सकता है। इनका इस्तेमाल त्योहार के दौरान गिफ्ट देने के साथ भविष्य में भी किया जा सकता है।

    पुराने पर्दों को सजावटी सामान में बदलने से पहले उनकी अच्छी तरह सफाई करना जरूरी है। कपड़े को धोकर पूरी तरह सुखा लें और छेद, फंगस या खराब हिस्सों का इस्तेमाल करने से बचें। सिलाई से पहले सही नाप लेना भी जरूरी है, ताकि कपड़ा बेकार न हो। बचे हुए छोटे टुकड़ों से रिबन, कपड़े के फूल और सजावटी पैच भी बनाए जा सकते हैं।

    इस तरह पुराने पर्दों का दोबारा इस्तेमाल करके दिवाली पर घर की सजावट को नया रूप दिया जा सकता है। इससे बेकार पड़े कपड़े उपयोग में आएंगे और नई सजावटी चीजें खरीदने का खर्च भी कम होगा।

  • आत्मनिर्भर बैटरी इकोसिस्टम के लिए सेकंड-लाइफ तकनीक जरूरी, पुन: उपयोग और रीसाइक्लिंग पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

    आत्मनिर्भर बैटरी इकोसिस्टम के लिए सेकंड-लाइफ तकनीक जरूरी, पुन: उपयोग और रीसाइक्लिंग पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

    नई दिल्ली । भारत में मजबूत, आत्मनिर्भर और सर्कुलर बैटरी इकोसिस्टम विकसित करने के लिए केवल बैटरी निर्माण क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने बैटरियों के निर्माण से लेकर उनके उपयोग, सेकंड-लाइफ एप्लिकेशन और जीवनचक्र समाप्त होने के बाद प्रबंधन तक पूरी व्यवस्था को एक साथ विकसित करने की जरूरत बताई है।

    राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में बैटरी क्षेत्र से जुड़े अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा हुई। इसमें नीति निर्माताओं, उद्योग प्रतिनिधियों, शोधकर्ताओं और अन्य हितधारकों ने भारत में तेजी से विकसित हो रहे बैटरी इकोसिस्टम को लेकर विचार साझा किए।

    द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट की महानिदेशक डॉ. विभा धवन ने कहा कि बैटरी क्षेत्र पर चर्चा केवल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल के बाद भी जिन बैटरियों में पर्याप्त क्षमता बची रहती है, उनके सेकंड-लाइफ एप्लिकेशन की संभावनाओं पर ध्यान देना जरूरी है। इससे बैटरियों के उपयोगी जीवन को बढ़ाया जा सकता है और उनकी आर्थिक उपयोगिता का बेहतर इस्तेमाल संभव होगा।

    भारी उद्योग मंत्रालय के संयुक्त सचिव विजय मित्तल ने घरेलू विनिर्माण और सप्लाई चेन को मजबूत करने के साथ सेकंड-लाइफ बैटरियों, ट्रेसबिलिटी, मानकों और रीसाइक्लिंग से जुड़े ढांचे के विकास की जरूरत बताई। उनके अनुसार ऐसे प्रयास भारत में प्रतिस्पर्धी और सर्कुलर बैटरी अर्थव्यवस्था विकसित करने में मदद कर सकते हैं।

    नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के वैज्ञानिक कुलदीप राणा ने कहा कि सेकंड-लाइफ बैटरियों का इस्तेमाल केवल इलेक्ट्रिक वाहनों से जुड़े क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। इनका उपयोग घरेलू उपकरणों, रूफटॉप सोलर पीवी सिस्टम और यूपीएस सिस्टम जैसे क्षेत्रों में भी किया जा सकता है।

    सम्मेलन के दौरान बैटरी वैल्यू चेन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा हुई। इनमें घरेलू एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल निर्माण क्षमता का विस्तार, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का विकास और इस्तेमाल की जा चुकी बैटरियों के पुन: उपयोग, पुनर्प्रयोजन तथा रीसाइक्लिंग की बढ़ती जरूरत शामिल रही।

    वरिष्ठ निदेशक ए.के. सक्सेना ने कहा कि बैटरी क्षेत्र में केवल उत्पादन की मात्रा बढ़ाने के बजाय मूल्य सृजन को स्थानीय स्तर पर बढ़ावा देने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने बैटरियों को शुरुआती डिजाइन चरण से ही सर्कुलर दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर तैयार करने की आवश्यकता बताई।

    उन्होंने यह भी कहा कि सेकंड-लाइफ बैटरियों की बची हुई क्षमता और प्रदर्शन का सही आकलन जरूरी है। इससे इन बैटरियों के इस्तेमाल को लेकर उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

    इंडिया एनर्जी स्टोरेज एलायंस के प्रबंध निदेशक विनायक वालिम्बे ने भारत में मजबूत और प्रतिस्पर्धी बैटरी उद्योग के निर्माण के लिए घरेलू मूल्य संवर्धन बढ़ाने पर जोर दिया।

    वहीं, बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड की वरिष्ठ प्रबंधक सुगंधिता वाधेरा ने भविष्य में बढ़ने वाली बिजली मांग के प्रभावी प्रबंधन पर बात रखी। उन्होंने राज्यों के लिए क्षमता नियोजन, मजबूत भुगतान सुरक्षा व्यवस्था और वितरण क्षेत्र में अधिक लचीले ऊर्जा संसाधनों की जरूरत बताई। उनके अनुसार इससे ऊर्जा तंत्र को अधिक मजबूत बनाने और बदलती जरूरतों के अनुसार तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद मिल सकती है।

  • कड़ाही में बचे हुए इस्तेमाल शुदा तेल को फेंकने की न करें भूल, सेहत के लिए नुकसानदायक कुकिंग ऑयल घर के इन 4 कामों के लिए साबित होगा 'वरदान

    कड़ाही में बचे हुए इस्तेमाल शुदा तेल को फेंकने की न करें भूल, सेहत के लिए नुकसानदायक कुकिंग ऑयल घर के इन 4 कामों के लिए साबित होगा 'वरदान


    नई दिल्ली ।
    मानसून के इस खुशनुमा मौसम में अक्सर हर घर के भीतर पूड़ी, पकौड़े, समोसे और पापड़ जैसी तली-भुनी चीजें बड़े चाव से बनाई जाती हैं। इन सभी पकवानों को तलने के बाद कड़ाही में अक्सर थोड़ा-बहुत तेल बच जाता है, जो एक बेहद सामान्य बात है। ज्यादातर लोग इस बचे हुए तेल को दोबारा खाना पकाने में इस्तेमाल करने से कतराते हैं, क्योंकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार तेल को बार-बार गर्म करके खाना सेहत के लिए बेहद हानिकारक माना जाता है। ऐसे में अधिकतर लोग इस इस्तेमाल किए गए तेल को बेकार समझकर सिंक या नाली में बहा देते हैं, जो कि बिल्कुल भी समझदारी भरा फैसला नहीं है।

    रसोई के जानकारों और घरेलू विशेषज्ञों के मुताबिक, कड़ाही में बचा हुआ यह तेल खाने के योग्य भले ही न बचा हो, लेकिन यह घर के कई छोटे-मोटे और मुश्किल कामों को मिनटों में आसान बना सकता है। अगर अब तक आप भी इस बचे हुए कुकिंग ऑयल को कचरा समझकर फेंकते आ रहे थे, तो इसके कुछ बेहद असरदार और जबरदस्त फायदों के बारे में जानना बेहद जरूरी है। इस तेल का सही तरीकों से उपयोग करके आप न केवल पैसों की बचत कर सकते हैं, बल्कि अपने घर की कई कीमती चीजों को खराब होने से भी बचा सकते हैं।

    इस तेल का सबसे पहला और बेहतरीन इस्तेमाल बर्तनों या अन्य सतहों से जिद्दी स्टिकर और गोंद हटाने के लिए किया जा सकता है। अक्सर नई कांच की बोतलों, प्लास्टिक के डिब्बों या नए बर्तनों पर लगे स्टिकर को निकालने के बाद वहां एक चिपचिपी गोंद की परत रह जाती है, जो आसानी से साफ नहीं होती। ऐसे में उस चिपचिपी जगह पर थोड़ा सा बचा हुआ तेल लगाकर करीब 10 मिनट के लिए छोड़ देना चाहिए। इसके बाद किसी कपड़े या स्पंज की मदद से हल्के हाथों से रगड़कर साफ करने पर वह जिद्दी गोंद बेहद आसानी से बिना किसी निशान के बाहर निकल जाता है।

    इसके अलावा, घर में रखे पुराने लकड़ी के फर्नीचर जैसे टेबल, कुर्सी, अलमारी या दरवाजों की खोई हुई चमक को वापस लाने में भी यह तेल बेहद मददगार साबित होता है। जब भी लकड़ी के फर्नीचर की चमक फीकी पड़ने लगे, तो एक साफ और मुलायम कपड़े पर इस इस्तेमाल किए गए तेल की कुछ बूंदें लें और उसे लकड़ी की सतह पर हल्के हाथों से रगड़ें। इसके बाद एक दूसरे सूखे और साफ कपड़े से अतिरिक्त तेल को अच्छी तरह पोंछ लें। ऐसा करने से लकड़ी का पुराना फर्नीचर एक बार फिर से बिल्कुल नए जैसा साफ और चमकदार दिखाई देने लगता है।

    घर की साफ-सफाई और मरम्मत के अलावा, यह बचा हुआ तेल एक बेहतरीन लुब्रिकेंट के रूप में भी काम करता है। घरों में अक्सर पुराने स्क्रू, नट या बोल्ट पर जंग लग जाता है, जिसके कारण उन्हें टूल्स की मदद से भी खोलना बेहद मुश्किल या नामुमकिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में जंग लगे हिस्सों पर थोड़ा सा बचा हुआ तेल डालकर कुछ समय के लिए छोड़ देना चाहिए। तेल के लुब्रिकेशन के प्रभाव से जंग ढीला पड़ जाता है और स्क्रू बिना किसी मशक्कत के आसानी से खुल जाते हैं।

    चमड़े से बनी कीमती चीजों जैसे बेल्ट, बैग, जैकेट या जूतों की देखभाल के लिए भी इस तेल का उपयोग किया जा सकता है। जब चमड़े के उत्पादों की चमक कम होने लगे या उनमें सूखापन आने लगे, तो बेहद कम मात्रा में तेल को सूती कपड़े पर लेकर चमड़े की सतह को पोंछना चाहिए, जिससे उनकी चमक लौट आती है। हालांकि, इन सभी प्रयोगों के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है कि यदि तेल पूरी तरह जल चुका हो या उसमें से तेज दुर्गंध आ रही हो, तो उसे तुरंत नष्ट कर देना चाहिए और भूलकर भी दोबारा भोजन बनाने में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।