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  • G4 देशों ने UNSC की 80 साल पुरानी संरचना में सुधार को जरूरी बताया, दिल्ली में होगी अगली समीक्षा बैठक

    G4 देशों ने UNSC की 80 साल पुरानी संरचना में सुधार को जरूरी बताया, दिल्ली में होगी अगली समीक्षा बैठक

    नई दिल्ली ।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में सुधार को लेकर भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान ने एक बार फिर अपनी साझा मांग दोहराई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र से इतर 22 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में हुई G4 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में जल्द सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

    बैठक में चारों देशों ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सुरक्षा परिषद में सुधार पहले की तुलना में अधिक जरूरी हो गया है। G4 का मानना है कि परिषद की मौजूदा संरचना करीब 80 साल पुरानी है और आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करती। इसी वजह से परिषद की प्रतिनिधित्व क्षमता, वैधता, विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    बैठक में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा, जर्मनी के विदेश मंत्री डॉ. योहान डेविड वाडेफुल और जापान के विदेश मंत्री मोतेगी तोशिमित्सु शामिल हुए। मंत्रियों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार से जुड़ी अंतर-सरकारी वार्ताओं में हुई प्रगति और चर्चाओं की समीक्षा की।

    G4 देशों ने सुरक्षा परिषद की सदस्यता में स्थायी और गैर-स्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार को सुधार प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। चारों देशों ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच दोनों श्रेणियों में सदस्यता बढ़ाने के समर्थन की व्यापक मौजूदगी है।

    अफ्रीका के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की जरूरत पर भी बैठक में जोर दिया गया। G4 देशों ने सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वकारी और प्रभावी बनाने के लिए ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता बताई, जो वर्तमान वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को बेहतर तरीके से दर्शा सके।

    G4 की ओर से सुधार प्रक्रिया को जल्द आगे बढ़ाने और ठोस परिणाम हासिल करने की मांग की गई। देशों ने सुरक्षा परिषद की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में व्यापक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए अंतर-सरकारी वार्ता प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है और G4 इस प्रक्रिया में लगातार सक्रिय भूमिका निभाता रहा है।

    न्यूयॉर्क में हुई चर्चा के बाद अब G4 देशों की अगली समीक्षा बैठक दिल्ली में प्रस्तावित है। इसमें सुधार प्रक्रिया में हुई प्रगति और आगे की दिशा पर चर्चा की जाएगी। इस बैठक के जरिए चारों देश सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व बढ़ाने, स्थायी और गैर-स्थायी सदस्यता के विस्तार तथा सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से जुड़े मुद्दों पर अपने समन्वय की समीक्षा करेंगे।

    G4 देशों की बैठक ऐसे समय हुई है जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना को वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बनाने की मांग लगातार उठ रही है। सुधार समर्थक देशों का जोर परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वकारी, विश्वसनीय और प्रभावी बनाने पर है। G4 ने भी इसी दिशा में प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और लंबे समय से लंबित सुधार को ठोस रूप देने की आवश्यकता पर अपना रुख दोहराया है।

  • सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कॉजपा संस्थापक का सुझाव, जनप्रतिनिधि सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं अपने बच्चे

    सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कॉजपा संस्थापक का सुझाव, जनप्रतिनिधि सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं अपने बच्चे

    नई दिल्ली । देश में सरकारी शिक्षा प्रणाली की स्थिति और उसमें आवश्यक सुधारों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने एक बयान जारी कर मांग की है कि शिक्षा विभाग से जुड़े सभी मंत्रियों, प्रशासनिक अधिकारियों, प्राचार्यों और शिक्षकों को अपने बच्चों का दाखिला अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूलों में ही कराना चाहिए। उनका मानना है कि यदि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अपने बच्चों को इन संस्थानों में भेजेंगे, तो सरकारी स्कूलों की व्यवस्था में बहुत जल्द सकारात्मक और व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा।

    अभिजीत दीपके ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक सरकारी नीतियों को लागू करने वाले अधिकारी और जनप्रतिनिधि स्वयं इन सेवाओं का उपयोग नहीं करेंगे, तब तक वास्तविक सुधार संभव नहीं है। उन्होंने पूछा कि आखिर क्यों अधिकारी और मंत्री अपने बच्चों को निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाना पसंद करते हैं। क्या उन्हें अपने ही विभाग और सरकारी नीतियों की कार्यप्रणाली पर भरोसा नहीं है। उनका यह बयान देश भर में सरकारी स्कूलों के कायाकल्प के लिए चलाए जा रहे विभिन्न अभियानों के संदर्भ में आया है।

    इस विचार को धरातल पर उतारने और व्यवस्था की कमियों को उजागर करने के उद्देश्य से उन्होंने महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में स्थित अपने पैतृक गांव संतुक पिंपरी का दौरा किया था। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जिला परिषद द्वारा संचालित स्थानीय स्कूल में पहुंचे दीपके ने वहां की बुनियादी सुविधाओं का जायजा लिया था। निरीक्षण के दौरान उन्होंने पाया कि कक्षाओं में खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे, सीसीटीवी कैमरे निष्क्रिय थे और स्वच्छता से जुड़ी कई मूलभूत सुविधाएं बदहाल स्थिति में थीं।

    उनके द्वारा उजागर की गई कमियों के बाद स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायत तुरंत हरकत में आई। संतुक पिंपरी के स्थानीय सरपंच विजय पुरी ने जानकारी दी है कि अभिजीत दीपके द्वारा चिन्हित की गई सभी समस्याओं को दूर करने का कार्य प्राथमिकता के आधार पर शुरू कर दिया गया है। स्कूल में क्षतिग्रस्त खिड़कियों और उनके फ्रेम को बदला जा रहा है, नए सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं, तथा शौचालयों में पानी की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए हैं।

    शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस पूरे मामले का संज्ञान लेते हुए स्कूल प्रबंधन को मरम्मत कार्य जल्द से जल्द पूरा करने के निर्देश जारी किए हैं। इस घटनाक्रम के बाद स्थानीय स्तर पर स्कूल की ढांचागत स्थिति में तेजी से सुधार देखने को मिल रहा है।

    मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में भी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और सुविधाओं को लेकर समय-समय पर इस तरह की मांगें उठती रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सार्वजनिक सेवाओं के उपयोग को अनिवार्य या प्रोत्साहित किया जाए, तो इससे प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ती है। अभिजीत दीपके की इस पहल और उनके सुझाव ने एक बार फिर शिक्षा के अधिकार और सरकारी शैक्षणिक संस्थानों के स्तर को ऊंचा उठाने की दिशा में गंभीर मंथन शुरू कर दिया है।

  • संसद के मानसून सत्र में कानूनों में बड़े बदलाव की तैयारी, निवेश, न्याय व्यवस्था और एमएसएमई सुधार पर सरकार का विशेष फोकस

    संसद के मानसून सत्र में कानूनों में बड़े बदलाव की तैयारी, निवेश, न्याय व्यवस्था और एमएसएमई सुधार पर सरकार का विशेष फोकस

    नई दिल्ली । संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू होने जा रहा है, जिसमें केंद्र सरकार व्यापक विधायी एजेंडे के साथ सदन में प्रवेश करेगी। इस सत्र के दौरान सरकार पांच नए विधेयक पेश करने की तैयारी में है। इन प्रस्तावित विधेयकों का उद्देश्य कर व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहन देना, न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करना, जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित बनाना तथा राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानूनों को और सख्त करना है। सरकार का मानना है कि इन विधेयकों से प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी और विभिन्न क्षेत्रों में आवश्यक सुधारों को गति मिलेगी।

    सरकार आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026 को सदन में प्रस्तुत करेगी, जिसके माध्यम से पहले जारी अध्यादेश का स्थान लेने वाला स्थायी कानून बनाया जाएगा। इस प्रस्ताव का उद्देश्य विदेशी निवेश को आकर्षित करना, सरकारी ऋण बाजार को अधिक मजबूत बनाना तथा वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच वित्तीय बाजार में स्थिरता और तरलता बनाए रखना है। सरकार का मानना है कि यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के विश्वास को बढ़ाने और भारतीय अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध कराने में सहायक होगी।

    मानसून सत्र में सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 भी पेश किया जाएगा। इस विधेयक के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव रखा गया है। सरकार का तर्क है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से लंबित मामलों के निस्तारण की गति तेज होगी और न्यायिक प्रणाली पर बढ़ते कार्यभार को कम करने में मदद मिलेगी।

    सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 के माध्यम से एमएसएमई क्षेत्र में कारोबार को और सरल बनाने का प्रयास किया जाएगा। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य भरोसे पर आधारित नियामकीय व्यवस्था विकसित करना, भुगतान में देरी से जुड़े विवादों के समाधान की प्रक्रिया को मजबूत करना तथा राज्यों को अधिक प्रशासनिक अधिकार प्रदान करना है। सरकार का मानना है कि इन बदलावों से छोटे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और निवेश के लिए बेहतर वातावरण तैयार होगा।

    जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 के जरिए विलंबित पंजीकरण से जुड़े नियमों को अधिक प्रभावी और व्यवस्थित बनाने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 के माध्यम से राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय सम्मान के विरुद्ध होने वाले कृत्यों पर अधिक कठोर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किए जाने की योजना है। सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य कानूनों को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक प्रभावी बनाना है।

    इन नए विधेयकों के अलावा सरकार संसद में पहले से लंबित कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों पर भी चर्चा आगे बढ़ाने का प्रयास करेगी। साथ ही अनुपूरक अनुदानों की मांग पर भी दोनों सदनों में विचार और मतदान कराया जाएगा। 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक बहस होने की संभावना है। सत्र शुरू होने से पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक और विपक्षी दलों की रणनीतिक बैठकों के बाद संसद की कार्यवाही राजनीतिक और विधायी दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण रहने की उम्मीद है।

  • संसद में नए सिरे से रणनीति तैयार, परिसीमन और एक राष्ट्र-एक चुनाव बिल को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ा

    संसद में नए सिरे से रणनीति तैयार, परिसीमन और एक राष्ट्र-एक चुनाव बिल को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ा

    नई दिल्ली । देश की चुनावी और संसदीय व्यवस्था से जुड़े बड़े सुधारों को लेकर केंद्र सरकार एक बार फिर सक्रिय हो गई है। परिसीमन विधेयक को संसद में पहले मिले झटके के बाद सरकार इसे नए रूप में दोबारा पेश करने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश में ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ व्यवस्था लागू करने की दिशा में भी तेजी से काम किया जा रहा है। इन दोनों प्रस्तावों को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है और विपक्षी दलों ने सरकार से व्यापक परामर्श और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने की मांग की है।

    सरकारी स्तर पर गृह मंत्रालय द्वारा परिसीमन से संबंधित नए विधेयक का मसौदा तैयार किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इस पहल का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के पुनर्गठन से जुड़े नियमों को अद्यतन करना बताया जा रहा है, ताकि जनसंख्या बदलाव और क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर प्रतिनिधित्व को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। इससे पहले संसद में इस विधेयक को लेकर सहमति नहीं बन पाई थी, जिसके बाद सरकार ने रणनीति में बदलाव करते हुए इसे फिर से पेश करने का निर्णय लिया है।

    राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि हाल के विधानसभा चुनावों में कुछ राज्यों में मिले परिणामों के बाद सत्ता पक्ष अपने संसदीय समीकरणों को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। इस बीच प्रमुख विपक्षी दल Indian National Congress ने सरकार पर आरोप लगाया है कि बिना व्यापक सहमति और सभी दलों से विचार-विमर्श के किसी भी बड़े चुनावी सुधार को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।

    वहीं सत्तारूढ़ दल Bharatiya Janata Party इस पूरे मुद्दे पर राजनीतिक और संसदीय रणनीति को और मजबूत करने में जुटा है। पार्टी नेतृत्व, जिसमें Narendra Modi और Amit Shah जैसे शीर्ष नेता शामिल हैं, चुनावी सुधारों को दीर्घकालिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बता रहे हैं। सरकार का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से न केवल खर्च कम होगा, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था भी अधिक प्रभावी बनेगी।

    इसके समानांतर ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ प्रस्ताव पर भी काम तेज कर दिया गया है। इस प्रस्ताव की समीक्षा के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करने में जुटी है और इसके कार्यकाल को आगे बढ़ाया गया है। समिति द्वारा किए जा रहे अध्ययन में चुनावी प्रक्रियाओं के समन्वय, राज्यों और केंद्र के चुनावों को एक साथ कराने की व्यवहारिकता और संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जा रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इन दोनों प्रस्तावों का असर केवल चुनावी प्रणाली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की संघीय संरचना और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। विपक्षी दलों, जिनमें All India Trinamool Congress और Dravida Munnetra Kazhagam शामिल हैं, ने भी इन प्रस्तावों पर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं और कहा है कि क्षेत्रीय संतुलन और राज्यों के अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

    कुल मिलाकर, परिसीमन विधेयक और एक राष्ट्र-एक चुनाव जैसे प्रस्तावों के चलते देश की राजनीतिक दिशा एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे रही है। आने वाले महीनों में संसद और राजनीतिक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर और अधिक बहस और निर्णय की संभावना है, जिससे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकता है।