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  • अमेरिकी विदेश मंत्री बोले- परमाणु हथियार के चलते पाकिस्तान से संबंध रखना जरूरी

    अमेरिकी विदेश मंत्री बोले- परमाणु हथियार के चलते पाकिस्तान से संबंध रखना जरूरी


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पाकिस्तान के साथ अमेरिका के संबंधों को लेकर अपनी नीति स्पष्ट करते हुए कहा है कि कई मतभेदों के बावजूद अमेरिका को पाकिस्तान के साथ संवाद बनाए रखना पड़ता है। उन्होंने इसके पीछे पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और उसकी भौगोलिक स्थिति को प्रमुख कारण बताया। रुबियो ने स्पष्ट किया कि अमेरिका दुनिया में कहीं भी आतंकवाद को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ है।

    सीएनएन-न्यूज18 को दिए एक साक्षात्कार में रुबियो ने कहा, “हम उन सभी के खिलाफ हैं, जो आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं।” पाकिस्तान के साथ संबंधों पर उन्होंने कहा कि अमेरिकी विदेश मंत्री के रूप में उनकी जिम्मेदारी देश की विदेश नीति को संभालना है। इसके लिए अमेरिका को कई देशों के साथ संबंध बनाए रखने पड़ते हैं, भले ही उनके साथ कुछ मुद्दों पर मतभेद हों।

    उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के मामले में भी यही स्थिति है। यह एक ऐसा देश है, जिसके पास परमाणु हथियार हैं। साथ ही, उसकी भौगोलिक स्थिति भी ऐसी है कि अमेरिका को उसके साथ बातचीत करने की जरूरत पड़ती है। रुबियो ने इसकी तुलना भारत के ईरान के साथ संबंधों से करते हुए कहा कि भारत सरकार भी ईरान के नेताओं के साथ संपर्क और संवाद बनाए रखती है।

    पाकिस्तान से बातचीत क्यों जरूरी?

    पांच महीने में दूसरी बार भारत यात्रा पर आए रुबियो ने कहा कि विभिन्न हितों और मतभेदों के बीच संतुलन बनाना मुश्किल है, लेकिन विदेश नीति के तहत ऐसा करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के साथ संवाद बनाए रखना सकारात्मक परिणाम भी दे सकता है।

    रुबियो के मुताबिक, यदि अमेरिका के पाकिस्तान के साथ संबंध बने रहते हैं और दोनों पक्षों के बीच बातचीत होती है, तो इससे उन गतिविधियों को रोकने में मदद मिल सकती है, जिनको लेकर भारत चिंतित है। उनके इस बयान को पाकिस्तान के साथ अमेरिकी कूटनीतिक संबंधों और भारत की सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन बनाने की नीति के तौर पर देखा जा रहा है।

    भारत-अमेरिका व्यापार समझौता जल्द होने की उम्मीद

    मुंबई पहुंचे अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठक में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के जल्द होने की उम्मीद जताई। बैठक में दोनों देशों के संबंधों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की गई और वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बनाने पर जोर दिया गया।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, रुबियो की यात्रा दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय वार्ता की गति को दर्शाती है। मंत्रालय ने कहा कि दोनों पक्ष 21वीं सदी के लिए भारत-अमेरिका सहयोग को आगे बढ़ाने को महत्व देते हैं।

    भारत को बताया तेल रिफाइनरी क्षेत्र की महाशक्ति

    जयशंकर के साथ बैठक के बाद रुबियो ने भारत की तेल रिफाइनिंग क्षमता की सराहना करते हुए उसे इस क्षेत्र की महाशक्ति बताया। रूस से भारत की कच्चे तेल की खरीद पर उन्होंने कहा कि भारत ने बार-बार अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की इच्छा जताई है और इस दिशा में प्रगति हो रही है।

    उन्होंने कहा कि अमेरिका भी भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक अच्छा स्रोत बन सकता है। बैठक में दोनों देशों के बीच ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई। रुबियो ने भारत से ऊर्जा क्षेत्र में साझेदारी मजबूत करने और अमेरिकी तकनीक का उपयोग बढ़ाने की अपील भी की।

    वेनेजुएला में तेल उत्पादन पर रिलायंस से चर्चा करेगा अमेरिकी दल

    रुबियो ने बुधवार को गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की रिफाइनरी के प्रस्तावित दौरे को लेकर मीडिया के सवालों का जवाब भी दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल वेनेजुएला में तेल उत्पादन से जुड़े मुद्दों पर रिलायंस के साथ चर्चा करेगा। इस संभावित बातचीत को ऊर्जा क्षेत्र में भारत-अमेरिका सहयोग के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।

  • PM मोदी की जिनपिंग को दो टूक… बोले- सीमा पर शांति होगी .. तभी आगे बढ़ेंगे रिश्ते…

    PM मोदी की जिनपिंग को दो टूक… बोले- सीमा पर शांति होगी .. तभी आगे बढ़ेंगे रिश्ते…


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने पिछले सप्ताह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) से इतर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) के साथ हुई मुलाकात के दौरान चीन के साथ संबंधों को लेकर भारत (India) की चिंताओं को स्पष्ट रूप से सामने रखा। भारत सरकार के अनुसार, मोदी ने कहा कि दोनों देशों को एक-दूसरे की मूल चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के संबंध में विदेश मंत्रालय चीनी पक्ष की ओर से जारी बयान पर पूछे गए सवाल का जवाब दिया। चीनी बयान में मोदी के हवाले से कहा गया था कि तिब्बत और ताइवान को लेकर भारत की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है और भारत अपनी धरती पर किसी को भी चीन विरोधी गतिविधियां संचालित करने की अनुमति नहीं देता। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘प्रधानमंत्री ने भारतीय चिंताओं का भी उल्लेख किया और इस बात पर जोर दिया कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे की मूल चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।’


    सीमा पर शांति को रिश्ते आगे बढ़ाने की बुनियाद बताया

    जायसवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग के साथ बातचीत में इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों के बीच संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए सीमा पर शांति और स्थिरता जरूरी है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों पक्षों को तीन पारस्परिक सिद्धांतों- आपसी सम्मान, आपसी हित और आपसी संवेदनशीलता से निर्देशित होना चाहिए।


    भारत ने चीन के साथ संबंधों में अपनी चिंताएं रखीं

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शी जिनपिंग को यह भी स्पष्ट किया कि सीमा पर शांति दोनों देशों के बीच संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए एक आवश्यक आधार है। भारत और चीन के बीच सीमा पर बार-बार पैदा हुए तनाव के बीच भारत ने पिछले 16 वर्षों से सार्वजनिक रूप से अपनी ‘वन चाइना’ नीति को उसी तरह स्पष्ट रूप से व्यक्त करना बंद कर दिया है।


    तिब्बत और ताइवान पर भारत की नीति में बदलाव नहीं

    हालांकि व्यवहार में तिब्बत और ताइवान को लेकर भारत की स्थिति लगातार बनी हुई है। केंद्र सरकार का कहना है कि ताइवान को लेकर उसकी नीति स्पष्ट और निरंतर है। भारत व्यापार, निवेश, पर्यटन, संस्कृति, शिक्षा और लोगों के बीच आपसी संपर्क जैसे क्षेत्रों में ताइवान के साथ संबंधों को बढ़ावा देता है और सहयोग की सुविधा प्रदान करता है।


    तिब्बत को लेकर भारत का रुख भी स्पष्ट

    तिब्बत के मामले में भारत अब भी यह मानता है कि तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र चीन जनवादी गणराज्य के क्षेत्र का हिस्सा है। यह स्थिति वर्ष 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के बीच हस्ताक्षरित ‘संबंधों और व्यापक सहयोग के सिद्धांतों पर घोषणा’ में भी दर्ज की गई थी। इस घोषणा में यह भी कहा गया था कि भारत अपनी जमीन से तिब्बतियों को चीन विरोधी राजनीतिक गतिविधियां संचालित करने की अनुमति नहीं देता।


    चीन के बयान में भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का भी जिक्र
    चीनी पक्ष की ओर से जारी बयान के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग से यह भी कहा कि भारत एक स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है और चीन के प्रति भारत के दृष्टिकोण का किसी तीसरे देश से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि, भारत की ओर से जारी आधिकारिक बयान में तिब्बत या ताइवान का कोई उल्लेख नहीं किया गया।


    ‘दोस्त, प्रतिद्वंद्वी नहीं’ वाले फॉर्मूले पर भी चर्चा

    दिलचस्प बात यह है कि इस बार भारत ने अपने बयान में चीन के उस ‘दोस्त, प्रतिद्वंद्वी नहीं’ वाले फॉर्मूले का इस्तेमाल नहीं किया, जिसका उल्लेख पिछले साल तियानजिन में मोदी-शी मुलाकात के बाद चीन की ओर से जारी बयान में किया गया था।


    जयशंकर और वांग यी की बातचीत में भी उठा था मुद्दा

    जुलाई में मनीला में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अपने चीनी समकक्ष वांग यी के साथ हुई मुलाकात के बाद भी चीन ने जयशंकर के हवाले से भारत द्वारा चीन की संप्रभुता का सम्मान करने जैसी बातें कही थीं। इसके बाद विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा था कि जयशंकर ने वांग यी से बातचीत में यह बात कही थी कि संप्रभुता से जुड़े मुद्दे भारत को चीन के सामने उठाने चाहिए।

    चीन के कब्जे को लेकर भारत ने जताई आपत्ति
    उन्होंने कहा कि भारत किसी भी तरह से चीन की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं करता। हालांकि, चीन 1963 से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के कुछ हिस्सों पर अवैध कब्जा किए हुए है, जबकि इन क्षेत्रों पर भारत के अधिकार को चीन भी स्वीकार करता रहा है।

  • भारत से रिश्ते नए सिरे से मजबूत करना चाहता है बांग्लादेश, विदेश राज्य मंत्री ने द्विपक्षीय बातचीत को बताया जरूरी

    भारत से रिश्ते नए सिरे से मजबूत करना चाहता है बांग्लादेश, विदेश राज्य मंत्री ने द्विपक्षीय बातचीत को बताया जरूरी

    नई दिल्ली । बांग्लादेश ने भारत के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से आगे बढ़ाने की इच्छा जताई है। बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा कि ढाका नई दिल्ली के साथ ऐसा रिश्ता बनाना चाहता है, जो आपसी हितों पर आधारित हो। उन्होंने दोनों देशों के बीच सीधे संवाद को संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी बताया।

    हुमायूं कबीर के मुताबिक भारत और बांग्लादेश के बीच बातचीत किसी बहुपक्षीय मंच के जरिए नहीं, बल्कि सीधे द्विपक्षीय स्तर पर होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को नए रिश्ते की दिशा में आगे बढ़ने के लिए आपसी हितों को प्राथमिकता देनी होगी।

    कबीर ने शेख हसीना के प्रधानमंत्री रहने के दौरान भारत और बांग्लादेश के संबंधों को असहज बताया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश को भारत के साथ संबंधों को लेकर जरूरत से ज्यादा ध्यान देने वाली सोच से बाहर निकलना होगा। उनका कहना था कि नई दिल्ली के साथ रिश्तों को संतुलित तरीके से देखा जाना चाहिए और इसे बांग्लादेश के दूसरे देशों के साथ संबंधों के व्यापक हिस्से के रूप में समझना चाहिए।

    बांग्लादेश का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत में BRICS समिट अपने अंतिम दौर में है। बांग्लादेश ने कहा था कि उसके प्रधानमंत्री तारिक रहमान BRICS समिट में शामिल नहीं होंगे, क्योंकि उन्हें बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के तौर पर निमंत्रण नहीं दिया गया था। ढाका के अनुसार, उन्हें BIMSTEC के अध्यक्ष के रूप में आमंत्रित किया गया था। BIMSTEC बंगाल की खाड़ी से जुड़े दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के सात देशों का क्षेत्रीय संगठन है।

    इससे पहले अगस्त में भी प्रधानमंत्री तारिक रहमान का भारत दौरा टल गया था। BRICS समिट से पहले भारत ने दोनों देशों के बीच अलग द्विपक्षीय बैठक के लिए उन्हें 22 अगस्त को भारत आने का निमंत्रण दिया था। हालांकि यात्रा से पहले ही यह कार्यक्रम स्थगित हो गया।

    उस समय बांग्लादेश ने भारत के सामने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा उठाया था। दोनों देशों के बीच इस विषय को लेकर पहले से तनाव बना हुआ है। उस दौरान हुमायूं कबीर ने कहा था कि माहौल अनुकूल होने पर द्विपक्षीय दौरे होंगे और जल्दबाजी की आवश्यकता नहीं है।

    भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव बढ़ने की एक वजह शेख हसीना की भारत में मौजूदगी और उनके सार्वजनिक राजनीतिक बयानों को भी माना गया। 5 अगस्त को शेख हसीना ने दिल्ली से वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। यह कार्यक्रम अवामी लीग सरकार के सत्ता से हटने की दूसरी बरसी के मौके पर आयोजित किया गया था।

    इस प्रेस कॉन्फ्रेंस पर बांग्लादेश सरकार ने आपत्ति जताई थी। ढाका का कहना था कि भारत में रहते हुए हसीना का सार्वजनिक राजनीतिक बयान देना दोनों देशों के संबंध सामान्य करने की कोशिशों को प्रभावित कर सकता है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने दावा किया था कि भारत को पहले इस संबंध में आगाह किया गया था।

    भारत ने हालांकि शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस रोकने से इनकार किया था। भारत का कहना था कि कार्यक्रम एक निजी मीडिया संस्था की ओर से आयोजित किया गया था और सरकार का उससे कोई संबंध नहीं था। अब बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री की ओर से सीधे संवाद और आपसी हितों पर आधारित नए रिश्ते की बात दोनों देशों के संबंधों को लेकर ढाका के रुख को सामने रखती है।

  • भारत-चीन रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने शीर्ष चीनी अधिकारियों से की कई महत्वपूर्ण बैठकें

    भारत-चीन रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने शीर्ष चीनी अधिकारियों से की कई महत्वपूर्ण बैठकें

    नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने के उद्देश्य से विदेश सचिव विक्रम मिस्री इन दिनों चीन की आधिकारिक यात्रा पर हैं। यात्रा के दौरान उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सेंट्रल पार्टी स्कूल (नेशनल एकेडमी ऑफ गवर्नेंस) के उपाध्यक्ष ली वेनतांग सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों से महत्वपूर्ण मुलाकातें कीं। इन बैठकों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने, शैक्षणिक आदान-प्रदान, राजनीतिक संवाद, आर्थिक संबंधों और सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।

    भारतीय दूतावास की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने मंगलवार को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सेंट्रल पार्टी स्कूल के उपाध्यक्ष ली वेनतांग से मुलाकात की। इस दौरान उन्हें संस्थान के ऐतिहासिक महत्व, बौद्धिक योगदान और विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों की जानकारी दी गई। दोनों पक्षों ने भविष्य में अकादमिक सहयोग, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और संस्थागत आदान-प्रदान की संभावनाओं पर भी विचार-विमर्श किया। इस बैठक को दोनों देशों के बीच ज्ञान, प्रशासनिक अनुभव और संस्थागत सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इससे पहले विदेश सचिव ने चीन की विदेश उप मंत्री हुआ चुनयिंग के साथ भी विस्तृत वार्ता की। दोनों पक्षों ने भारत-चीन संबंधों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करते हुए इस बात पर सहमति जताई कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखना द्विपक्षीय संबंधों के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। बैठक में दोनों देशों के नेताओं की उस साझा सोच को आगे बढ़ाने पर भी चर्चा हुई, जिसके तहत भारत और चीन को एक-दूसरे के विकास में सहयोगी और साझेदार के रूप में देखा गया है।

    वार्ता के दौरान व्यापार और आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाने, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने तथा लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के उपायों पर भी विचार किया गया। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि पारस्परिक हितों के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत किया जा सकता है। साथ ही संवाद और आपसी विश्वास को बढ़ाने के लिए नियमित संपर्क बनाए रखने की आवश्यकता पर भी सहमति व्यक्त की गई।

    सोमवार को विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने चीन की 14वीं राष्ट्रीय जन राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन (सीपीपीसीसी) की समिति के उप महासचिव होंग लियांग से भी मुलाकात की। इस बैठक में राजनीतिक स्तर पर संवाद को मजबूत करने और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के विभिन्न उपायों पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने माना कि जनसंपर्क, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से आपसी समझ और विश्वास को और बेहतर बनाया जा सकता है।

    चीन यात्रा के पहले दिन विदेश सचिव ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के अंतरराष्ट्रीय विभाग की उप मंत्री सन हैयान से भी मुलाकात की। इस बैठक में द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने, राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसरों पर विचार-विमर्श किया गया। अधिकारियों के बीच हुई इन लगातार बैठकों को भारत और चीन के बीच संवाद प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के समय में दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने की कोशिशें क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक सहयोग और आपसी विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। विदेश सचिव विक्रम मिस्री की यह यात्रा दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय संपर्क बनाए रखने, मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने और सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल मानी जा रही है।

  • UP: लखनऊ अग्निकांड के बाद कानपुर में चला विशेष अभियान, फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थान सील

    UP: लखनऊ अग्निकांड के बाद कानपुर में चला विशेष अभियान, फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थान सील


    कानपुर।
    उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की राजधानी लखनऊ (Lucknow) में कोचिंग संस्थान (Coaching Institute) से जुड़े हादसे के बाद कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) ने शहर के प्रमुख कोचिंग हब काकादेव में बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू कर दी है. सोमवार को चलाए गए विशेष अभियान (Special Campaign) के दौरान फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया गया. जांच में इन संस्थानों में भवन और सुरक्षा संबंधी मानकों के उल्लंघन की बात सामने आने पर यह कार्रवाई की गई।

    केडीए अधिकारियों की टीम ने अलग-अलग क्षेत्रों में निरीक्षण कर उन संस्थानों को चिह्नित किया, जहां आवश्यक नियमों का पालन नहीं किया जा रहा था. कार्रवाई के दौरान संस्थानों को खाली कराया गया और बाद में उन्हें सील कर दिया गया।

    प्राधिकरण के अनुसार, अभियान के तहत विभिन्न जोनों में एक साथ कार्रवाई की गई. पहले चरण में 22 संस्थानों को चिह्नित किया गया है, जबकि अन्य कोचिंग संस्थानों की भी जांच की जा रही है. अधिकारियों का कहना है कि मानकों की अनदेखी पाए जाने पर आगे भी इसी तरह की कार्रवाई जारी रहेगी।

    सील किए गए संस्थानों में फिजिक्स वाला, वर्कस्पेस, महेंद्राज और केमिस्ट्री वाले संजीव राठौर जैसे चर्चित नाम शामिल हैं. कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी मौके पर मौजूद रहे। वहीं, इस कार्रवाई के बाद स्थानीय लोगों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल भी उठाए हैं. उनका कहना है कि शहर में लंबे समय से अनेक कोचिंग संस्थान बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों और निर्धारित मानकों के संचालित हो रहे हैं, लेकिन नियमित जांच नहीं की जाती।

    लोगों का आरोप है कि किसी बड़े हादसे के बाद ही विभाग सक्रिय होता है और फिर कुछ समय तक अभियान चलाकर कार्रवाई की जाती है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि समय-समय पर निरीक्षण और नियमों के अनुपालन की समीक्षा होती रहे, तो ऐसी स्थिति पैदा होने से पहले ही कमियों को दूर किया जा सकता है और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

  • जर्मनी से 5000 सैनिक वापस बुलाएगा US…. ईरान युद्ध के बीच सहयोगियों से बिगड़े रिश्ते

    जर्मनी से 5000 सैनिक वापस बुलाएगा US…. ईरान युद्ध के बीच सहयोगियों से बिगड़े रिश्ते


    वाशिंगटन।
    ईरान (Iran) के साथ चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिका (America) के उसके यूरोपियन सहयोगियों के साथ भी संबंध खराब होने लगे हैं। इसी बीच अमेरिका (America) ने जर्मनी (Germany) से अपने 5 हजार सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला किया है। बता दें कि अभी गुरुवार को ही डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज (German Chancellor Friedrich Merz) पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अपने “टूटे हुए देश” पर ध्यान दें और ईरान युद्ध के बारे में सोचने में समय बर्बाद न करें।


    जर्मनी के चांसलर और ट्रंप में बयानबाजी

    ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि मर्ज को “रूस-यूक्रेन को युद्ध समाप्त कराने” और “अपने टूटे हुए देश को ठीक करने (खास तौर पर आव्रजन और ऊर्जा के मामले में)” पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए तथा ईरान युद्ध के बारे में सोचने में कम समय खर्च करना चाहिए। इससे पहले बुधवार को ट्रंप ने धमकी दी थी कि अमेरिका जर्मनी में अपनी सैन्य मौजूदगी घटाने पर विचार कर रहा रहा है। जर्मनी उत्तर एटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का एक प्रमुख सहयोगी और यूरोपीय संघ (ईयू) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहां अमेरिका के कई अहम सैन्य अड्डा हैं।


    जर्मनी से बटालिय वापस बुलाएगा अमेरिका

    पेंटागन के एक सीनियर अधइकारी ने कहा था कि जर्मनी के चांसलर के बयान बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं और इससे उन्हें नुकसान होने वाला है। अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि जिस तरह से यूक्रेन पर रूस के हमले के वक्त यूरोप से सैनिकों को वापस बुलाया गया था, उसी तरह का अभियान इस बार भी चलाया जाएगा। यूरोप में बड़ी संख्या में सैनिकों में कटौती की जाएगी। इसके अलावा जर्मनी में मौजूद ब्रिगेड कॉम्बैट टीम को भी वापस बुला लिया जाएगा। यहां लॉन्ग रेंज फायर बटालियन पर भी रोक लगा दी गई है।

    ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिका के उसके यूरोपियन सहयोगियों के साथ भी संबंध खराब होने लगे हैं। इसी बीच अमेरिका ने जर्मनी से अपने 5 हजार सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला किया है। बता दें कि अभी गुरुवार को ही डोनाल्ड ट्रंप ने जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अपने “टूटे हुए देश” पर ध्यान दें और ईरान युद्ध के बारे में सोचने में समय बर्बाद न करें।

    जर्मनी के चांसलर और ट्रंप में बयानबाजी
    ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि मर्ज को “रूस-यूक्रेन को युद्ध समाप्त कराने” और “अपने टूटे हुए देश को ठीक करने (खास तौर पर आव्रजन और ऊर्जा के मामले में)” पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए तथा ईरान युद्ध के बारे में सोचने में कम समय खर्च करना चाहिए। इससे पहले बुधवार को ट्रंप ने धमकी दी थी कि अमेरिका जर्मनी में अपनी सैन्य मौजूदगी घटाने पर विचार कर रहा रहा है। जर्मनी उत्तर एटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का एक प्रमुख सहयोगी और यूरोपीय संघ (ईयू) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहां अमेरिका के कई अहम सैन्य अड्डा हैं।


    जर्मनी से बटालिय वापस बुलाएगा अमेरिका

    पेंटागन के एक सीनियर अधइकारी ने कहा था कि जर्मनी के चांसलर के बयान बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं और इससे उन्हें नुकसान होने वाला है। अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि जिस तरह से यूक्रेन पर रूस के हमले के वक्त यूरोप से सैनिकों को वापस बुलाया गया था, उसी तरह का अभियान इस बार भी चलाया जाएगा। यूरोप में बड़ी संख्या में सैनिकों में कटौती की जाएगी। इसके अलावा जर्मनी में मौजूद ब्रिगेड कॉम्बैट टीम को भी वापस बुला लिया जाएगा। यहां लॉन्ग रेंज फायर बटालियन पर भी रोक लगा दी गई है।


    NATO में पैदा हो गया नया तनाव

    डोनाल्ड ट्रंप पहले से ही नाटो को महत्व कम देते थे। वहीं जब होर्मुज बंद होने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो देशों का आह्वान किया तो किसी ने साथ नहीं दिया। ऐसे में ईरान संकट के बीच नाटो में भी काफी तनाव पैदा हो गया है। डोनाल्ड ट्रंप बार-बार कहते रहे हैं कि नाटो देशों ने होर्मुज खुलवाने में उनका साथ नहीं दिया।

    इसी बीच वाइट हाउस ने संसद को लिखे एक पत्र में कहा है कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सशस्त्र बलों की निरंतर उपस्थिति के बावजूद वह ईरान के साथ युद्ध को खत्म ही मानता है। राष्ट्रपति ट्रंप के इस संदेश के जरिए ईरान के साथ युद्ध जारी रखने के लिए संसद सदस्यों की मंजूरी प्राप्त करने की एक मई की कानूनी समय सीमा को प्रभावी ढंग से दरकिनार कर दिया गया है।

  • भारत-चीन के बीच सुधरते रिश्ते….दोनों देशों के बीच पहली बार हुई SCO द्विपक्षीय वार्ता

    भारत-चीन के बीच सुधरते रिश्ते….दोनों देशों के बीच पहली बार हुई SCO द्विपक्षीय वार्ता


    शांघाई।
    द्विपक्षीय सहयोग (Bilateral Cooperation) को बढ़ावा देने के प्रयासों और हाल ही में दोनों देशों के बीच सुधरे संबंधों के बीच, भारत और चीन (India and China) ने 16-17 अप्रैल को अपनी पहली शंघाई सहयोग संगठन (Shanghai Cooperation Organization- SCO) द्विपक्षीय वार्ता आयोजित की। साल 2024 में पूर्वी लद्दाख में हुए सैन्य गतिरोध के सुलझने के बाद से यह कदम दोनों देशों के बीच सुधरते कूटनीतिक रिश्तों की दिशा में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।


    बैठक के मुख्य विषय और चर्चा

    विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा जारी बयान के अनुसार दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने SCO नेताओं द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू करने और संगठन की भविष्य की रूपरेखा को लेकर अपने-अपने विचार साझा किए। भारत और चीन ने SCO से जुड़े मामलों में आपसी विचार-विमर्श और सहयोग को लगातार जारी रखने और उसे और अधिक मजबूत करने पर सहमति जताई है।

    दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने संयुक्त रूप से विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज से मुलाकात की। इस दौरान सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी (संपर्क) और दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी संबंधों सहित SCO ढांचे के भीतर सहयोग की व्यापक समीक्षा की गई।


    बहुपक्षीय मंचों (BRICS और SCO) पर बढ़ता सहयोग

    साल 2024 में सीमा विवाद सुलझने के बाद से दोनों देश ब्रिक्स (BRICS) और SCO जैसे अंतरराष्ट्रीय और बहुपक्षीय मंचों पर साथ मिलकर काम कर रहे हैं। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी SCO शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए चीन गए थे।


    आगामी उच्च स्तरीय दौरे

    बीजिंग ने भारत की मौजूदा ब्रिक्स अध्यक्षता के लिए अपना पूर्ण समर्थन जताया है। इसके तहत, चीनी विदेश मंत्री वांग यी 14-15 मई को ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए भारत का दौरा कर सकते हैं। इसके अलावा, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी सितंबर में होने वाले मुख्य ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने की उम्मीद है।


    SCO को लेकर भारत का स्पष्ट रुख

    भारत इस यूरेशियन समूह (SCO) में अपनी सदस्यता को अत्यधिक महत्व देता है और इसके उद्देश्यों को लेकर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट है। भारत का मानना है कि SCO का प्राथमिक और मूल उद्देश्य क्षेत्र में आतंकवाद, कट्टरपंथ और उग्रवाद का डटकर मुकाबला करना है।

    भारत क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए SCO को एक महत्वपूर्ण मंच मानता है। लेकिन भारत की स्पष्ट शर्त है कि इस तरह की कोई भी पहल सदस्य देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों का पालन करे, जो कि SCO चार्टर का भी मुख्य हिस्सा है।


    पीएम मोदी का कड़ा संदेश

    भारत के इसी रुख को दोहराते हुए पिछले साल तियानजिन में SCO शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि जो कनेक्टिविटी संप्रभुता को दरकिनार करती है, वह अंततः अपना भरोसा और अर्थ दोनों खो देती है।

  • पिछले 6 माह में बिगड़े भारत से रिश्ते… अमेरिकी ही कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप की नीति का विरोध

    पिछले 6 माह में बिगड़े भारत से रिश्ते… अमेरिकी ही कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप की नीति का विरोध


    वाशिंगटन।
    भारत (India) और अमेरिका (America) के रिश्ते पिछले 6 महीनों से लगातार खराब स्थिति में हैं। ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) के बाद भारत ने खुले तौर पर अमेरिकी बयानों का विरोध किया, जिसके परिणाम स्वरूप ट्रंप प्रशासन (Trump Administration) ने पाकिस्तान (Pakistan) के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाते हुए भारत पर आर्थिक हमला करने की कोशिश की। राष्ट्रपति ट्रंप की इस नीति का अमेरिका में ही कई लोगों ने विरोध किया, यहां तक कि उनके सहयोगियों ने भी भारत को लेकर अपनाई जा रही इस नीति का विरोध ही किया। अब अमेरिकी वैश्विक मामलों के जानकार, लेखक और प्रोफेसर फ्रांसिस फुकुयामा ने ट्रंप की इस नीति को लेकर उन पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने अपने निजी व्यवहार के लिए अमेरिका के हितों को दरकिनार कर दिया।

    एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति पर बात करते हुए प्रोफेसर ने कहा कि उनकी वैश्विक नीति क्या है इस पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा, “ट्रंप की वैश्विक नीति निजी लाभ पर आधारित है। उदाहरण के लिए पिछले 20 से 30 वर्षों में अमेरिका में किसी की भी सरकार रही हो, वह भारत के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश करती रही है। क्योंकि हम दक्षिण एशिया में चीन को काउंटर करना चाहते हैं। लेकिन ट्रंप ने भारत के साथ रिश्तों को केवल इसलिए खराब कर दिया क्योंकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन नहीं किया था।”

    प्रोफेसर ने कहा, “ट्रंप के इस फैसले से आप पूरी तरह से समझ सकते हैं कि कैसे उन्होंने अपने निजी लाभ के लिए अमेरिकी हितों को अलग रख दिया। ऐसे में अगर कोई यह सोच रहा है कि ट्रंप प्रशासन की कोई वैश्विक नीति होगी, तो वह परेशान ही होगा।”

    आपको बता दें, इस साल जनवरी में जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आए थे, तो भारत में लोगों की राय यह थी कि भारत और अमेरिका के रिश्ते सही होंगे। ट्रंप और पीएम मोदी की निजी दोस्ती दोनों देशों के बीच में मजबूत साझेदारी का आधार बनेगी। शुरुआती समय में ऐसा दिखा भी। लेकिन मई के महीने में सबकुछ बदल गया।

    पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की तरफ से किए गए ऑपरेशन सिंदूर पर ट्रंप टीम का बयान दोस्ती वाला नहीं था। भारत सरकार के ऐलान करने से पहले ही ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए सीजफायर का ऐलान कर दिया। यह भारत सरकार के लिए असहज करने वाली स्थिति थी। इसके बाद ट्रंप लगातार इस बात को कहते रहे कि भारत और पाकिस्तान के बीच उन्होंने सीजफायर करवाया है, जबकि भारत ने शुरुआत से ही इस बात को कहा कि सीजफायर के लिए पाकिस्तानी डीजीएमओ की तरफ से फोन आया था इसके बाद यह हुआ।

    दोनों देशों के बीच बिगड़ती इस परिस्थिति का पाकिस्तान ने बड़ी अच्छी तरह से फायदा उठाया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुले तौर पर इस सीजफायर के लिए ट्रंप को धन्यवाद किया और लगे हाथ उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन भी दे दिया। इस पूरे वाकये के बाद भारत और अमेरिका के संबंध लगातार गिरावट की तरफ जाने लगे। अमेरिका ने भारत के ऊपर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया। ट्रंप और उनकी टीम की तरफ से लगातार भारत के खिलाफ बयानबाजी की जाने लगी। भारत ने भी अपनी स्थिति को साफ किया और ट्रंप या अमेरिका के आगे किसी भी तरीके से झुकने से इनकार कर दिया।

    दरअसल, कश्मीर और पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय स्थिति पर भारत की स्थिति दशकों से साफ रही है कि भारत इसमें किसी भी तीसरे देश का दखल नहीं चाहता है। शिमला समझौते के तहत पाकिस्तान भी इस पर राजी है, लेकिन पाकिस्तान हमेशा से ही इस मुद्दे में तीसरे देश को शामिल करने के लिए तैयार रहता है। ऐसे में अगर पीएम मोदी नोबेल के लिए ट्रंप को समर्थन देते तो यह भारत की साख के लिए सही नहीं होता और न ही भारत के स्टैंड के मुताबिक होता।