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  • भारत-चीन रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने शीर्ष चीनी अधिकारियों से की कई महत्वपूर्ण बैठकें

    भारत-चीन रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने शीर्ष चीनी अधिकारियों से की कई महत्वपूर्ण बैठकें

    नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने के उद्देश्य से विदेश सचिव विक्रम मिस्री इन दिनों चीन की आधिकारिक यात्रा पर हैं। यात्रा के दौरान उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सेंट्रल पार्टी स्कूल (नेशनल एकेडमी ऑफ गवर्नेंस) के उपाध्यक्ष ली वेनतांग सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों से महत्वपूर्ण मुलाकातें कीं। इन बैठकों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने, शैक्षणिक आदान-प्रदान, राजनीतिक संवाद, आर्थिक संबंधों और सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।

    भारतीय दूतावास की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने मंगलवार को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सेंट्रल पार्टी स्कूल के उपाध्यक्ष ली वेनतांग से मुलाकात की। इस दौरान उन्हें संस्थान के ऐतिहासिक महत्व, बौद्धिक योगदान और विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों की जानकारी दी गई। दोनों पक्षों ने भविष्य में अकादमिक सहयोग, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और संस्थागत आदान-प्रदान की संभावनाओं पर भी विचार-विमर्श किया। इस बैठक को दोनों देशों के बीच ज्ञान, प्रशासनिक अनुभव और संस्थागत सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इससे पहले विदेश सचिव ने चीन की विदेश उप मंत्री हुआ चुनयिंग के साथ भी विस्तृत वार्ता की। दोनों पक्षों ने भारत-चीन संबंधों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करते हुए इस बात पर सहमति जताई कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखना द्विपक्षीय संबंधों के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। बैठक में दोनों देशों के नेताओं की उस साझा सोच को आगे बढ़ाने पर भी चर्चा हुई, जिसके तहत भारत और चीन को एक-दूसरे के विकास में सहयोगी और साझेदार के रूप में देखा गया है।

    वार्ता के दौरान व्यापार और आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाने, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने तथा लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के उपायों पर भी विचार किया गया। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि पारस्परिक हितों के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत किया जा सकता है। साथ ही संवाद और आपसी विश्वास को बढ़ाने के लिए नियमित संपर्क बनाए रखने की आवश्यकता पर भी सहमति व्यक्त की गई।

    सोमवार को विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने चीन की 14वीं राष्ट्रीय जन राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन (सीपीपीसीसी) की समिति के उप महासचिव होंग लियांग से भी मुलाकात की। इस बैठक में राजनीतिक स्तर पर संवाद को मजबूत करने और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के विभिन्न उपायों पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने माना कि जनसंपर्क, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से आपसी समझ और विश्वास को और बेहतर बनाया जा सकता है।

    चीन यात्रा के पहले दिन विदेश सचिव ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के अंतरराष्ट्रीय विभाग की उप मंत्री सन हैयान से भी मुलाकात की। इस बैठक में द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने, राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसरों पर विचार-विमर्श किया गया। अधिकारियों के बीच हुई इन लगातार बैठकों को भारत और चीन के बीच संवाद प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के समय में दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने की कोशिशें क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक सहयोग और आपसी विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। विदेश सचिव विक्रम मिस्री की यह यात्रा दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय संपर्क बनाए रखने, मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने और सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल मानी जा रही है।

  • UP: लखनऊ अग्निकांड के बाद कानपुर में चला विशेष अभियान, फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थान सील

    UP: लखनऊ अग्निकांड के बाद कानपुर में चला विशेष अभियान, फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थान सील


    कानपुर।
    उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की राजधानी लखनऊ (Lucknow) में कोचिंग संस्थान (Coaching Institute) से जुड़े हादसे के बाद कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) ने शहर के प्रमुख कोचिंग हब काकादेव में बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू कर दी है. सोमवार को चलाए गए विशेष अभियान (Special Campaign) के दौरान फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया गया. जांच में इन संस्थानों में भवन और सुरक्षा संबंधी मानकों के उल्लंघन की बात सामने आने पर यह कार्रवाई की गई।

    केडीए अधिकारियों की टीम ने अलग-अलग क्षेत्रों में निरीक्षण कर उन संस्थानों को चिह्नित किया, जहां आवश्यक नियमों का पालन नहीं किया जा रहा था. कार्रवाई के दौरान संस्थानों को खाली कराया गया और बाद में उन्हें सील कर दिया गया।

    प्राधिकरण के अनुसार, अभियान के तहत विभिन्न जोनों में एक साथ कार्रवाई की गई. पहले चरण में 22 संस्थानों को चिह्नित किया गया है, जबकि अन्य कोचिंग संस्थानों की भी जांच की जा रही है. अधिकारियों का कहना है कि मानकों की अनदेखी पाए जाने पर आगे भी इसी तरह की कार्रवाई जारी रहेगी।

    सील किए गए संस्थानों में फिजिक्स वाला, वर्कस्पेस, महेंद्राज और केमिस्ट्री वाले संजीव राठौर जैसे चर्चित नाम शामिल हैं. कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी मौके पर मौजूद रहे। वहीं, इस कार्रवाई के बाद स्थानीय लोगों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल भी उठाए हैं. उनका कहना है कि शहर में लंबे समय से अनेक कोचिंग संस्थान बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों और निर्धारित मानकों के संचालित हो रहे हैं, लेकिन नियमित जांच नहीं की जाती।

    लोगों का आरोप है कि किसी बड़े हादसे के बाद ही विभाग सक्रिय होता है और फिर कुछ समय तक अभियान चलाकर कार्रवाई की जाती है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि समय-समय पर निरीक्षण और नियमों के अनुपालन की समीक्षा होती रहे, तो ऐसी स्थिति पैदा होने से पहले ही कमियों को दूर किया जा सकता है और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

  • जर्मनी से 5000 सैनिक वापस बुलाएगा US…. ईरान युद्ध के बीच सहयोगियों से बिगड़े रिश्ते

    जर्मनी से 5000 सैनिक वापस बुलाएगा US…. ईरान युद्ध के बीच सहयोगियों से बिगड़े रिश्ते


    वाशिंगटन।
    ईरान (Iran) के साथ चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिका (America) के उसके यूरोपियन सहयोगियों के साथ भी संबंध खराब होने लगे हैं। इसी बीच अमेरिका (America) ने जर्मनी (Germany) से अपने 5 हजार सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला किया है। बता दें कि अभी गुरुवार को ही डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज (German Chancellor Friedrich Merz) पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अपने “टूटे हुए देश” पर ध्यान दें और ईरान युद्ध के बारे में सोचने में समय बर्बाद न करें।


    जर्मनी के चांसलर और ट्रंप में बयानबाजी

    ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि मर्ज को “रूस-यूक्रेन को युद्ध समाप्त कराने” और “अपने टूटे हुए देश को ठीक करने (खास तौर पर आव्रजन और ऊर्जा के मामले में)” पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए तथा ईरान युद्ध के बारे में सोचने में कम समय खर्च करना चाहिए। इससे पहले बुधवार को ट्रंप ने धमकी दी थी कि अमेरिका जर्मनी में अपनी सैन्य मौजूदगी घटाने पर विचार कर रहा रहा है। जर्मनी उत्तर एटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का एक प्रमुख सहयोगी और यूरोपीय संघ (ईयू) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहां अमेरिका के कई अहम सैन्य अड्डा हैं।


    जर्मनी से बटालिय वापस बुलाएगा अमेरिका

    पेंटागन के एक सीनियर अधइकारी ने कहा था कि जर्मनी के चांसलर के बयान बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं और इससे उन्हें नुकसान होने वाला है। अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि जिस तरह से यूक्रेन पर रूस के हमले के वक्त यूरोप से सैनिकों को वापस बुलाया गया था, उसी तरह का अभियान इस बार भी चलाया जाएगा। यूरोप में बड़ी संख्या में सैनिकों में कटौती की जाएगी। इसके अलावा जर्मनी में मौजूद ब्रिगेड कॉम्बैट टीम को भी वापस बुला लिया जाएगा। यहां लॉन्ग रेंज फायर बटालियन पर भी रोक लगा दी गई है।

    ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिका के उसके यूरोपियन सहयोगियों के साथ भी संबंध खराब होने लगे हैं। इसी बीच अमेरिका ने जर्मनी से अपने 5 हजार सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला किया है। बता दें कि अभी गुरुवार को ही डोनाल्ड ट्रंप ने जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अपने “टूटे हुए देश” पर ध्यान दें और ईरान युद्ध के बारे में सोचने में समय बर्बाद न करें।

    जर्मनी के चांसलर और ट्रंप में बयानबाजी
    ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि मर्ज को “रूस-यूक्रेन को युद्ध समाप्त कराने” और “अपने टूटे हुए देश को ठीक करने (खास तौर पर आव्रजन और ऊर्जा के मामले में)” पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए तथा ईरान युद्ध के बारे में सोचने में कम समय खर्च करना चाहिए। इससे पहले बुधवार को ट्रंप ने धमकी दी थी कि अमेरिका जर्मनी में अपनी सैन्य मौजूदगी घटाने पर विचार कर रहा रहा है। जर्मनी उत्तर एटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का एक प्रमुख सहयोगी और यूरोपीय संघ (ईयू) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहां अमेरिका के कई अहम सैन्य अड्डा हैं।


    जर्मनी से बटालिय वापस बुलाएगा अमेरिका

    पेंटागन के एक सीनियर अधइकारी ने कहा था कि जर्मनी के चांसलर के बयान बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं और इससे उन्हें नुकसान होने वाला है। अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि जिस तरह से यूक्रेन पर रूस के हमले के वक्त यूरोप से सैनिकों को वापस बुलाया गया था, उसी तरह का अभियान इस बार भी चलाया जाएगा। यूरोप में बड़ी संख्या में सैनिकों में कटौती की जाएगी। इसके अलावा जर्मनी में मौजूद ब्रिगेड कॉम्बैट टीम को भी वापस बुला लिया जाएगा। यहां लॉन्ग रेंज फायर बटालियन पर भी रोक लगा दी गई है।


    NATO में पैदा हो गया नया तनाव

    डोनाल्ड ट्रंप पहले से ही नाटो को महत्व कम देते थे। वहीं जब होर्मुज बंद होने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो देशों का आह्वान किया तो किसी ने साथ नहीं दिया। ऐसे में ईरान संकट के बीच नाटो में भी काफी तनाव पैदा हो गया है। डोनाल्ड ट्रंप बार-बार कहते रहे हैं कि नाटो देशों ने होर्मुज खुलवाने में उनका साथ नहीं दिया।

    इसी बीच वाइट हाउस ने संसद को लिखे एक पत्र में कहा है कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सशस्त्र बलों की निरंतर उपस्थिति के बावजूद वह ईरान के साथ युद्ध को खत्म ही मानता है। राष्ट्रपति ट्रंप के इस संदेश के जरिए ईरान के साथ युद्ध जारी रखने के लिए संसद सदस्यों की मंजूरी प्राप्त करने की एक मई की कानूनी समय सीमा को प्रभावी ढंग से दरकिनार कर दिया गया है।

  • भारत-चीन के बीच सुधरते रिश्ते….दोनों देशों के बीच पहली बार हुई SCO द्विपक्षीय वार्ता

    भारत-चीन के बीच सुधरते रिश्ते….दोनों देशों के बीच पहली बार हुई SCO द्विपक्षीय वार्ता


    शांघाई।
    द्विपक्षीय सहयोग (Bilateral Cooperation) को बढ़ावा देने के प्रयासों और हाल ही में दोनों देशों के बीच सुधरे संबंधों के बीच, भारत और चीन (India and China) ने 16-17 अप्रैल को अपनी पहली शंघाई सहयोग संगठन (Shanghai Cooperation Organization- SCO) द्विपक्षीय वार्ता आयोजित की। साल 2024 में पूर्वी लद्दाख में हुए सैन्य गतिरोध के सुलझने के बाद से यह कदम दोनों देशों के बीच सुधरते कूटनीतिक रिश्तों की दिशा में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।


    बैठक के मुख्य विषय और चर्चा

    विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा जारी बयान के अनुसार दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने SCO नेताओं द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू करने और संगठन की भविष्य की रूपरेखा को लेकर अपने-अपने विचार साझा किए। भारत और चीन ने SCO से जुड़े मामलों में आपसी विचार-विमर्श और सहयोग को लगातार जारी रखने और उसे और अधिक मजबूत करने पर सहमति जताई है।

    दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने संयुक्त रूप से विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज से मुलाकात की। इस दौरान सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी (संपर्क) और दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी संबंधों सहित SCO ढांचे के भीतर सहयोग की व्यापक समीक्षा की गई।


    बहुपक्षीय मंचों (BRICS और SCO) पर बढ़ता सहयोग

    साल 2024 में सीमा विवाद सुलझने के बाद से दोनों देश ब्रिक्स (BRICS) और SCO जैसे अंतरराष्ट्रीय और बहुपक्षीय मंचों पर साथ मिलकर काम कर रहे हैं। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी SCO शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए चीन गए थे।


    आगामी उच्च स्तरीय दौरे

    बीजिंग ने भारत की मौजूदा ब्रिक्स अध्यक्षता के लिए अपना पूर्ण समर्थन जताया है। इसके तहत, चीनी विदेश मंत्री वांग यी 14-15 मई को ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए भारत का दौरा कर सकते हैं। इसके अलावा, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी सितंबर में होने वाले मुख्य ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने की उम्मीद है।


    SCO को लेकर भारत का स्पष्ट रुख

    भारत इस यूरेशियन समूह (SCO) में अपनी सदस्यता को अत्यधिक महत्व देता है और इसके उद्देश्यों को लेकर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट है। भारत का मानना है कि SCO का प्राथमिक और मूल उद्देश्य क्षेत्र में आतंकवाद, कट्टरपंथ और उग्रवाद का डटकर मुकाबला करना है।

    भारत क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए SCO को एक महत्वपूर्ण मंच मानता है। लेकिन भारत की स्पष्ट शर्त है कि इस तरह की कोई भी पहल सदस्य देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों का पालन करे, जो कि SCO चार्टर का भी मुख्य हिस्सा है।


    पीएम मोदी का कड़ा संदेश

    भारत के इसी रुख को दोहराते हुए पिछले साल तियानजिन में SCO शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि जो कनेक्टिविटी संप्रभुता को दरकिनार करती है, वह अंततः अपना भरोसा और अर्थ दोनों खो देती है।

  • पिछले 6 माह में बिगड़े भारत से रिश्ते… अमेरिकी ही कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप की नीति का विरोध

    पिछले 6 माह में बिगड़े भारत से रिश्ते… अमेरिकी ही कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप की नीति का विरोध


    वाशिंगटन।
    भारत (India) और अमेरिका (America) के रिश्ते पिछले 6 महीनों से लगातार खराब स्थिति में हैं। ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) के बाद भारत ने खुले तौर पर अमेरिकी बयानों का विरोध किया, जिसके परिणाम स्वरूप ट्रंप प्रशासन (Trump Administration) ने पाकिस्तान (Pakistan) के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाते हुए भारत पर आर्थिक हमला करने की कोशिश की। राष्ट्रपति ट्रंप की इस नीति का अमेरिका में ही कई लोगों ने विरोध किया, यहां तक कि उनके सहयोगियों ने भी भारत को लेकर अपनाई जा रही इस नीति का विरोध ही किया। अब अमेरिकी वैश्विक मामलों के जानकार, लेखक और प्रोफेसर फ्रांसिस फुकुयामा ने ट्रंप की इस नीति को लेकर उन पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने अपने निजी व्यवहार के लिए अमेरिका के हितों को दरकिनार कर दिया।

    एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति पर बात करते हुए प्रोफेसर ने कहा कि उनकी वैश्विक नीति क्या है इस पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा, “ट्रंप की वैश्विक नीति निजी लाभ पर आधारित है। उदाहरण के लिए पिछले 20 से 30 वर्षों में अमेरिका में किसी की भी सरकार रही हो, वह भारत के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश करती रही है। क्योंकि हम दक्षिण एशिया में चीन को काउंटर करना चाहते हैं। लेकिन ट्रंप ने भारत के साथ रिश्तों को केवल इसलिए खराब कर दिया क्योंकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन नहीं किया था।”

    प्रोफेसर ने कहा, “ट्रंप के इस फैसले से आप पूरी तरह से समझ सकते हैं कि कैसे उन्होंने अपने निजी लाभ के लिए अमेरिकी हितों को अलग रख दिया। ऐसे में अगर कोई यह सोच रहा है कि ट्रंप प्रशासन की कोई वैश्विक नीति होगी, तो वह परेशान ही होगा।”

    आपको बता दें, इस साल जनवरी में जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आए थे, तो भारत में लोगों की राय यह थी कि भारत और अमेरिका के रिश्ते सही होंगे। ट्रंप और पीएम मोदी की निजी दोस्ती दोनों देशों के बीच में मजबूत साझेदारी का आधार बनेगी। शुरुआती समय में ऐसा दिखा भी। लेकिन मई के महीने में सबकुछ बदल गया।

    पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की तरफ से किए गए ऑपरेशन सिंदूर पर ट्रंप टीम का बयान दोस्ती वाला नहीं था। भारत सरकार के ऐलान करने से पहले ही ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए सीजफायर का ऐलान कर दिया। यह भारत सरकार के लिए असहज करने वाली स्थिति थी। इसके बाद ट्रंप लगातार इस बात को कहते रहे कि भारत और पाकिस्तान के बीच उन्होंने सीजफायर करवाया है, जबकि भारत ने शुरुआत से ही इस बात को कहा कि सीजफायर के लिए पाकिस्तानी डीजीएमओ की तरफ से फोन आया था इसके बाद यह हुआ।

    दोनों देशों के बीच बिगड़ती इस परिस्थिति का पाकिस्तान ने बड़ी अच्छी तरह से फायदा उठाया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुले तौर पर इस सीजफायर के लिए ट्रंप को धन्यवाद किया और लगे हाथ उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन भी दे दिया। इस पूरे वाकये के बाद भारत और अमेरिका के संबंध लगातार गिरावट की तरफ जाने लगे। अमेरिका ने भारत के ऊपर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया। ट्रंप और उनकी टीम की तरफ से लगातार भारत के खिलाफ बयानबाजी की जाने लगी। भारत ने भी अपनी स्थिति को साफ किया और ट्रंप या अमेरिका के आगे किसी भी तरीके से झुकने से इनकार कर दिया।

    दरअसल, कश्मीर और पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय स्थिति पर भारत की स्थिति दशकों से साफ रही है कि भारत इसमें किसी भी तीसरे देश का दखल नहीं चाहता है। शिमला समझौते के तहत पाकिस्तान भी इस पर राजी है, लेकिन पाकिस्तान हमेशा से ही इस मुद्दे में तीसरे देश को शामिल करने के लिए तैयार रहता है। ऐसे में अगर पीएम मोदी नोबेल के लिए ट्रंप को समर्थन देते तो यह भारत की साख के लिए सही नहीं होता और न ही भारत के स्टैंड के मुताबिक होता।