Tag: Religion

  • शबाना आजमी बोलीं- मुस्लिम हूं, लेकिन नमाज नहीं पढ़ती, धर्म और नास्तिकता पर जावेद अख्तर से होती है बहस

    शबाना आजमी बोलीं- मुस्लिम हूं, लेकिन नमाज नहीं पढ़ती, धर्म और नास्तिकता पर जावेद अख्तर से होती है बहस

    नई दिल्ली । अभिनेत्री शबाना आजमी ने धर्म, धार्मिक मान्यताओं और नास्तिकता को लेकर अपने विचार साझा किए हैं। उन्होंने कहा कि वह मुस्लिम हैं, लेकिन नमाज नहीं पढ़तीं और धर्म के साथ उनका कोई खास जुड़ाव नहीं है। शबाना ने अपने पति और मशहूर गीतकार-लेखक जावेद अख्तर की नास्तिक सोच पर भी बात की। उनके मुताबिक, दोनों के बीच धर्म और धार्मिक अभिव्यक्ति को लेकर बातचीत होती रहती है।

    शबाना का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति को धर्म का पालन करने या प्रार्थना करने से सुकून मिलता है, तो उसे ऐसा करने की आजादी होनी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म किसी व्यक्ति का निजी मामला है और सरकार को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अपने विचार रखते हुए अभिनेत्री ने परिवार में मिले संस्कारों, बचपन के माहौल और धार्मिक परंपराओं के प्रति अपने नजरिये के बारे में भी बताया।

    शबाना ने एक बातचीत के दौरान अपने बचपन और परिवार में धर्म की भूमिका का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनके पिता और मशहूर शायर कैफी आजमी नास्तिक थे, जबकि उनकी मां शौकत आजमी कुछ धार्मिक परंपराओं का पालन करती थीं। हालांकि, उनकी मां भी इन परंपराओं को लेकर बहुत अधिक गंभीर नहीं रहती थीं। शबाना के अनुसार, उनके घर में धार्मिक रीति-रिवाजों को जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं बनाया गया था।

    यही वजह रही कि बचपन से ही धर्म और भगवान को लेकर उनके मन में कोई विशेष जिज्ञासा नहीं रही। अभिनेत्री ने बताया कि वह कभी-कभी बातचीत के दौरान माशाल्लाह और इंशाल्लाह जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं। उनके लिए ये शब्द उनकी भाषा और बोलचाल का हिस्सा हैं। हालांकि, उनके पति जावेद अख्तर इन शब्दों के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हैं और उनसे पूछते हैं कि वह ऐसा क्यों कहती हैं। शबाना के मुताबिक, वह इन शब्दों को किसी धार्मिक मान्यता के कारण नहीं, बल्कि अपनी भाषा की सहज अभिव्यक्ति के रूप में इस्तेमाल करती हैं।

    जावेद अख्तर की नास्तिक सोच के बारे में बात करते हुए शबाना ने उन्हें कट्टर नास्तिक बताया। उन्होंने कहा कि वह कई बार जावेद से पूछती हैं कि वह अपने धार्मिक विचारों को इतनी मुखरता से क्यों व्यक्त करते हैं। शबाना का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति को धर्म का पालन करने से मानसिक सुकून मिलता है, तो उसे अपनी मान्यताओं के अनुसार जीवन जीने देना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की जरूरत क्यों होनी चाहिए।

    शबाना के अनुसार, इस पर जावेद अख्तर का जवाब होता है कि धार्मिक लोग भी उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं। जावेद का तर्क है कि नास्तिक होने के नाते उन्हें भी बुरा महसूस करने का अधिकार है। इस तरह दोनों के बीच धर्म और नास्तिकता को लेकर अलग-अलग नजरिये सामने आते हैं। शबाना ने बातचीत में इन मतभेदों का उल्लेख करते हुए बताया कि धार्मिक विश्वासों के प्रति सम्मान और अपनी बात रखने की स्वतंत्रता, दोनों महत्वपूर्ण विषय हैं।

    अपने धार्मिक जुड़ाव के बारे में शबाना ने स्पष्ट कहा कि वह मुस्लिम हैं और उन्हें ईद, उर्दू भाषा तथा खान-पान पसंद है। इसके बावजूद वह नमाज नहीं पढ़तीं और धर्म को अपने जीवन का विशेष हिस्सा नहीं मानतीं। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक परंपराओं का पालन नहीं करने का अर्थ यह नहीं है कि वह दूसरों की आस्था को नहीं समझतीं। अभिनेत्री के अनुसार, धर्म हर व्यक्ति का निजी मामला है। यदि किसी को प्रार्थना करने या धार्मिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से खुशी और सुकून मिलता है, तो इसमें उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

    इसी आधार पर उन्होंने कहा कि सरकार को लोगों के व्यक्तिगत धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। शबाना के बयान में अपनी धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत जीवनशैली के बीच अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने अपने और जावेद अख्तर के विचारों का उल्लेख करते हुए बताया कि धार्मिक आस्था रखने और नास्तिक होने वाले लोगों, दोनों की भावनाओं को समझना जरूरी है। उनके विचारों का मुख्य आधार यह है कि व्यक्ति को अपनी मान्यताओं के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और दूसरों की पसंद का भी सम्मान किया जाना चाहिए।

  • शर्मिला टैगोर की टिप्पणी पर मुकेश खन्ना की प्रतिक्रिया, वंदे मातरम को लेकर धार्मिक स्वीकार्यता के तर्क पर जताई असहमति

    शर्मिला टैगोर की टिप्पणी पर मुकेश खन्ना की प्रतिक्रिया, वंदे मातरम को लेकर धार्मिक स्वीकार्यता के तर्क पर जताई असहमति

    नई दिल्ली ।वंदे मातरम को लेकर जारी बहस के बीच अभिनेता मुकेश खन्ना ने अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कई सवाल उठाए हैं। खन्ना ने कहा कि दूसरे धर्मों से जुड़ी चिंताओं के आधार पर वंदे मातरम को देखने का नजरिया प्रभावित नहीं होना चाहिए। उन्होंने इस मुद्दे को धर्म, आस्था और राष्ट्र सम्मान से जोड़ते हुए अपनी स्पष्ट राय रखी।

    शर्मिला टैगोर ने वंदे मातरम को लेकर अपनी बात रखते हुए कहा था कि कुछ अन्य धर्मों के लोगों के लिए इसके धार्मिक संदर्भों को स्वीकार करना कठिन हो सकता है। इसी टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए मुकेश खन्ना ने कहा कि वह उनकी व्यक्तिगत समझ या दृष्टिकोण हो सकता है, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आता कि दूसरे धर्मों की चिंताओं को इस गीत के संदर्भ में प्रमुखता क्यों दी जानी चाहिए।

    खन्ना ने शर्मिला टैगोर की पारिवारिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया। उन्होंने उनके पटौदी परिवार में विवाह और इस्लामी पहचान से जुड़े संदर्भों को सामने रखते हुए सवाल किया कि लंबे समय तक भारतीय और बंगाली सांस्कृतिक परिवेश में रहने के बाद अब वंदे मातरम को लेकर दूसरे धर्मों की स्वीकार्यता का मुद्दा क्यों उठाया जा रहा है।

    उन्होंने शर्मिला टैगोर के बंगाली परिवेश का भी जिक्र किया। खन्ना के अनुसार वह बंगाल में पली-बढ़ी हैं, जहां धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने उनके बंगाली सिनेमा से जुड़े करियर का उल्लेख करते हुए पूछा कि वंदे मातरम के संदर्भ में धार्मिक स्वीकार्यता को लेकर यह चिंता अब क्यों सामने आ रही है।

    मुकेश खन्ना ने अपनी धार्मिक समझ बताते हुए कहा कि हिंदू परंपरा में ईश्वर को निराकार माना जाता है और अलग-अलग देवी-देवताओं के माध्यम से उसी परम सत्ता की आराधना की जाती है। उन्होंने हनुमान, शिव, राम और कृष्ण जैसे आराध्य रूपों का उदाहरण देते हुए अपनी बात रखी।

    उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोगों की धार्मिक मान्यता उन्हें केवल अपने ईश्वर के सामने झुकने की अनुमति देती है। खन्ना ने इस दृष्टिकोण को वंदे मातरम को लेकर उठने वाली आपत्तियों से जोड़कर अपनी असहमति जाहिर की।

    हालांकि, मुकेश खन्ना ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से सिर झुकाने या किसी विशेष तरीके से सम्मान व्यक्त करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार भारत माता के सामने सिर झुकाना उनकी अपनी आस्था और राष्ट्र के प्रति सम्मान का तरीका है, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति पर ऐसा करने के लिए दबाव नहीं होना चाहिए।

    खन्ना ने वंदे मातरम के गायन को लेकर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि किसी व्यक्ति का इसे नहीं गाना अलग बात है, लेकिन पूरे गीत के गायन पर ही आपत्ति जताना उनकी समझ से बाहर है। उन्होंने इस बहस को राजनीतिक दृष्टिकोण से भी जोड़ते हुए शर्मिला टैगोर की मंशा पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि कुछ लोग मुस्लिम समुदाय के समर्थन को ध्यान में रखकर अपनी स्थिति रखते हैं।

    वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना से लंबे समय से जुड़ा रहा है। इसी कारण इसके धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। मुकेश खन्ना की टिप्पणी ने इस पुराने मुद्दे को एक बार फिर मनोरंजन जगत के चर्चित चेहरों के बीच सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है।

  • फरहान-जोया की परवरिश पर जावेद अख्तर का बड़ा खुलासा! बोले बच्चों को किसी धर्म से नहीं जोड़ा

    फरहान-जोया की परवरिश पर जावेद अख्तर का बड़ा खुलासा! बोले बच्चों को किसी धर्म से नहीं जोड़ा


    नई दिल्ली । मशहूर लेखक और गीतकार जावेद अख्तर अपनी बेबाक राय और स्पष्ट विचारों के लिए जाने जाते हैं। धर्म को लेकर भी वह कई बार खुलकर अपनी बात रख चुके हैं। अब उन्होंने अपने बच्चों फरहान अख्तर और जोया अख्तर की परवरिश से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा साझा किया है। जावेद अख्तर ने बताया कि उन्होंने बचपन से ही अपने दोनों बच्चों को किसी धार्मिक पहचान से नहीं जोड़ा। उनके मुताबिक बच्चों को यह तय करने की आजादी दी गई कि बड़े होने पर वे धर्म और आस्था को किस तरह देखते हैं।

    जावेद अख्तर ने एक बातचीत में बताया कि यह किस्सा उस समय का है जब फरहान अख्तर करीब 7 या 8 साल के थे। एक दिन वह स्कूल से घर लौटे और अपने पिता से एक ऐसा सवाल पूछ बैठे जिसने जावेद को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। फरहान ने उनसे पूछा कि क्या हम मुस्लिम हैं। यह सवाल इसलिए भी स्वाभाविक था क्योंकि बच्चे अपने आसपास के लोगों और समाज से धर्म और समुदाय को लेकर बातें सुनते हुए बड़े होते हैं। लेकिन जावेद ने बेटे को किसी धार्मिक पहचान में बांधने के बजाय उसे एक अलग नजरिया समझाया।

    जावेद अख्तर के मुताबिक उन्होंने फरहान से कहा कि इंसान जिस शहर या समुदाय में पैदा होता है उससे उसकी असली पहचान तय नहीं होती। कोई व्यक्ति मुंबई पुणे आगरा अहमदाबाद लंदन या न्यूयॉर्क में पैदा हो सकता है लेकिन जन्म की जगह उसके व्यक्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण पहचान नहीं हो सकती। उनके लिए सबसे अहम बात यह है कि इंसान बड़ा होकर कैसा व्यक्ति बनता है और उसके व्यवहार में किस तरह की इंसानियत दिखाई देती है।

    जावेद ने बताया कि फरहान और जोया को उन्होंने किसी धर्म से जोड़कर नहीं पाला। उनके दोनों बच्चे बड़े होते हुए खुद धर्म और समाज के बारे में समझने लगे लेकिन माता पिता की तरफ से उन पर किसी खास धार्मिक पहचान को अपनाने का दबाव नहीं था। जावेद के अनुसार उनके बच्चे किसी धार्मिक पहचान के बजाय अपनी सोच और अपने फैसलों के साथ बड़े हुए।

    फरहान और जोया जावेद अख्तर और उनकी पहली पत्नी हनी ईरानी के बच्चे हैं। बाद में जावेद ने अभिनेत्री शबाना आजमी से शादी की। फरहान और जोया दोनों ने मनोरंजन जगत में अपनी अलग पहचान बनाई है। फरहान अभिनेता निर्देशक निर्माता और लेखक के तौर पर सफल रहे हैं जबकि जोया अख्तर ने निर्देशन और लेखन के क्षेत्र में अपनी खास जगह बनाई है।

    जावेद अख्तर अपने बच्चों की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि फरहान और जोया ने अपनी सफलता के लिए किसी तरह का समझौता नहीं किया। उनके मुताबिक दोनों ने नाम शोहरत और पैसा हासिल करने के लिए ऐसा काम नहीं किया जिससे उनकी गरिमा प्रभावित हो। उन्होंने अपने दम पर अपनी पहचान बनाई और अपने करियर में लगातार आगे बढ़े।

    जावेद अख्तर का यह किस्सा सिर्फ फरहान के बचपन से जुड़ी एक याद नहीं बल्कि बच्चों की परवरिश को लेकर उनकी सोच को भी सामने रखता है। उन्होंने धार्मिक पहचान को बच्चों पर थोपने के बजाय उन्हें खुद सवाल पूछने समझने और अपनी सोच विकसित करने की आजादी दी। फरहान का बचपन में पूछा गया छोटा सा सवाल और पिता का जवाब आज भी जावेद अख्तर की विचारधारा की एक खास झलक देता है।

  • चीन में धर्म की भी 'जासूसी'! अस्पताल से स्कूल तक आस्था पर निगरानी, मांगी जा रही जानकारी

    चीन में धर्म की भी 'जासूसी'! अस्पताल से स्कूल तक आस्था पर निगरानी, मांगी जा रही जानकारी


    नई दिल्ली। चीन में धार्मिक मान्यताओं पर सरकारी निगरानी का दायरा बढ़ने का दावा किया जा रहा है। चेंगदू के एक सरकारी अस्पताल में स्थायी कर्मचारियों के अलावा कॉन्ट्रैक्ट और अस्थायी कर्मचारियों से भी उनकी धार्मिक आस्था की जानकारी मांगे जाने की बात सामने आई है। कर्मचारियों से पूछा गया कि वे किसी धर्म को मानते हैं या नहीं। यहां तक कि किसी धर्म को न मानने वालों की जानकारी भी दर्ज करने की बात कही गई है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल ने इसे कर्मचारियों की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा एक बड़ा सर्वे बताया और इसे वैचारिक, जातीय एवं धार्मिक मामलों की नियमित जांच से जोड़ा गया। इस प्रक्रिया में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी शामिल बताए गए हैं। चीन में पार्टी सदस्यों के लिए धार्मिक आस्था रखने पर प्रतिबंध होने की बात कही जाती है। ऐसे में किसी कर्मचारी के खुद को धार्मिक बताने पर उसे अपनी पार्टी शाखा को इसकी जानकारी देने के लिए कहा गया।

    स्कूलों में छात्रों और परिवारों की भी जानकारी

    धार्मिक पहचान की कथित निगरानी केवल सरकारी अस्पतालों तक सीमित नहीं बताई जा रही। रिपोर्ट में सिचुआन के एक विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कर्मचारी के हवाले से कहा गया है कि शिक्षण संस्थानों में छात्रों के साथ-साथ उनके परिवारों की धार्मिक पृष्ठभूमि की जानकारी भी जुटाई जा रही है और इसे उच्च अधिकारियों तक भेजा जाता है।

    चेंगदू शिक्षा विभाग से जुड़े एक कर्मचारी के मुताबिक, बच्चों के स्कूल में दाखिले से पहले उनके परिवारों की नियमित पृष्ठभूमि जांच होती है। इसमें परिवार की धार्मिक पहचान से जुड़ी जानकारी भी शामिल होने का दावा किया गया है। यानी कथित तौर पर निगरानी सिर्फ व्यक्ति की धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके परिवार की पृष्ठभूमि तक भी पहुंच रही है।

    ‘सिनिसाइजेशन ऑफ रिलिजन’ के तहत बढ़ा नियंत्रण

    चीन में धार्मिक गतिविधियों पर कम्युनिस्ट पार्टी का नियंत्रण पहले से ही सख्त रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में धार्मिक मामलों पर पार्टी की निगरानी और मजबूत करने पर जोर दिया गया है। चीन की ‘सिनिसाइजेशन ऑफ रिलिजन’ नीति के तहत धार्मिक संगठनों और उनकी गतिविधियों को चीनी राजनीतिक एवं सांस्कृतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप ढालने की कोशिश की जाती है।

  • यूसीसी पर अमित शाह का बड़ा बयान, बोले- वनवासियों की परंपराओं से नहीं होगी छेड़छाड़, धर्मांतरण पर भी दी सख्त चेतावनी

    यूसीसी पर अमित शाह का बड़ा बयान, बोले- वनवासियों की परंपराओं से नहीं होगी छेड़छाड़, धर्मांतरण पर भी दी सख्त चेतावनी

    नई दिल्ली ।यूनिफॉर्म सिविल कोड और जनजातीय समाज को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बड़ा बयान देते हुए वनवासी समाज को आश्वस्त करने की कोशिश की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर जो आशंकाएं फैलाई जा रही हैं, उनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है और जनजातीय समुदाय की परंपराओं, अधिकारों तथा सांस्कृतिक पहचान पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ेगा। उनके इस बयान के बाद यूसीसी को लेकर चल रही बहस को नया आयाम मिल गया है।

    एक बड़े जनजातीय सांस्कृतिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि समाज में एक भ्रम फैलाया जा रहा है कि यूसीसी लागू होने के बाद जनजातीय समुदाय अपनी संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली से वंचित हो जाएगा। उन्होंने इस धारणा को पूरी तरह गलत बताते हुए कहा कि वनवासी समाज के अधिकारों और परंपराओं की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है और किसी भी स्थिति में उनके सांस्कृतिक मूल्यों के साथ हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

    उन्होंने कहा कि जहां-जहां यूसीसी लागू किया गया है, वहां जनजातीय समाज को विशेष प्रावधानों के तहत अलग रखा गया है। उनके अनुसार इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्थानीय परंपराएं, सामाजिक ढांचे और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित बनी रहे। उन्होंने वनवासी समाज से अपील करते हुए कहा कि उन्हें किसी भी प्रकार की आशंका या भ्रम में आने की आवश्यकता नहीं है।

    इस दौरान गृह मंत्री ने धर्मांतरण के विषय पर भी स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपने धर्म और परंपरा के अनुसार सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार है। लेकिन लालच, दबाव या किसी अन्य माध्यम से धर्म परिवर्तन कराना स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने लोगों से अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल पहचान की रक्षा करने का संदेश भी दिया।

    अपने संबोधन के दौरान उन्होंने भारतीय परंपराओं और धार्मिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए वनवासी समाज और सनातन संस्कृति के ऐतिहासिक संबंधों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता में जनजातीय समाज की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है और सामाजिक एकता की भावना को मजबूत करने में उनका योगदान विशेष रहा है।

    इसके अलावा उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों में विकास और बदलाव को लेकर भी कई बातें रखीं। उन्होंने कहा कि अब दूरस्थ और वन क्षेत्रों में विकास के नए अवसर पैदा हो रहे हैं और सरकार इन क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के जरिए जनजातीय समाज को आगे बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

    यूसीसी और जनजातीय अधिकारों को लेकर दिया गया यह बयान राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले समय में यह विषय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना रह सकता है, क्योंकि इससे कानून, संस्कृति और सामाजिक संरचना जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए हैं।

  • श्रद्धा और आस्था के साथ बरेली में मनाया गया वट सावित्री पर्व, सुहागिन महिलाओं ने की पूजा-अर्चना

    श्रद्धा और आस्था के साथ बरेली में मनाया गया वट सावित्री पर्व, सुहागिन महिलाओं ने की पूजा-अर्चना




    बरेली । बरेली में शनिवार को वट सावित्री व्रत पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। सुहागिन महिलाओं ने अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए व्रत रखा और पारंपरिक विधि-विधान से वट वृक्ष की पूजा की। सुबह से ही शहर के मंदिरों और बरगद के पेड़ों के पास महिलाओं की भीड़ देखने को मिली।

    शहर के अलखनाथ मंदिर, त्रिवटीनाथ मंदिर, धोपेश्वरनाथ मंदिर और तपेश्वरनाथ मंदिर सहित कई धार्मिक स्थलों पर महिलाओं ने वट वृक्ष की पूजा की। इसके अलावा बन्नूवाल नगर, मॉडल टाउन और अन्य कॉलोनियों में भी सामूहिक रूप से वट सावित्री पूजन किया गया। 16 श्रृंगार में सजी महिलाओं ने वट वृक्ष की परिक्रमा कर परंपराओं का पालन किया और अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली की कामना की।