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  • ऑरोरा के हिंदू मंदिर को निशाना बनाने की साजिश से बढ़ी चिंता, मंदिरों की सुरक्षा पर उठे सवाल, नेताओं ने दिया एकजुटता का संदेश

    ऑरोरा के हिंदू मंदिर को निशाना बनाने की साजिश से बढ़ी चिंता, मंदिरों की सुरक्षा पर उठे सवाल, नेताओं ने दिया एकजुटता का संदेश


    नई दिल्ली। अमेरिका के इलिनॉय राज्य के ऑरोरा शहर में स्थित एक हिंदू मंदिर पर सामूहिक गोलीबारी की कथित साजिश सामने आने के बाद हिंदू समुदाय में चिंता बढ़ गई है। इस मामले ने धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और नस्लीय तथा धार्मिक नफरत से प्रेरित हिंसा को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। हिंदू स्वयंसेवक संघ-अमेरिका ने घटना पर गंभीर चिंता जताते हुए पूरे देश में मंदिरों और सामुदायिक स्थलों की सुरक्षा बढ़ाने की अपील की है। संगठन ने राजनीतिक नेताओं से भी हिंदुओं और भारतीय-अमेरिकियों के खिलाफ नफरत तथा भेदभाव की स्पष्ट रूप से निंदा करने का आग्रह किया है।
    संगठन के बयान के मुताबिक धार्मिक स्वतंत्रता और बिना किसी डर के पूजा करने का अधिकार अमेरिकी समाज के बुनियादी सिद्धांतों में शामिल है। ऐसे में किसी मंदिर को निशाना बनाने की कथित साजिश केवल हिंदू समुदाय के लिए ही नहीं बल्कि उन सभी लोगों के लिए चिंताजनक है जो धार्मिक स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास करते हैं। संगठन ने हिंदू समुदायों से शांत रहने और एकजुटता बनाए रखने की अपील की है। साथ ही मंदिर प्रबंधन समितियों और परिवारों को स्थानीय पुलिस तथा कानून लागू करने वाली एजेंसियों के संपर्क में रहने और सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करने की सलाह दी है। किसी भी संदिग्ध गतिविधि या धमकी की सूचना तुरंत अधिकारियों को देने पर भी जोर दिया गया है।
    रिपोर्ट के अनुसार शिकागो के पास पैलेटाइन में 19 वर्षीय एक युवक को गिरफ्तार किया गया। उस पर ऑरोरा स्थित श्री वेंकटेश्वर मंदिर में सामूहिक गोलीबारी की योजना बनाने का आरोप है। बताया गया है कि घटना के दौरान उसकी बंदूक जाम हो गई और वह गोली नहीं चला सका। इस तरह कथित हमले की कोशिश नाकाम रही। हालांकि मामले में लगाए गए आरोपों और जांच से जुड़े तथ्यों का अंतिम निर्धारण कानूनी प्रक्रिया के तहत होना है।
    घटना पर अमेरिकी सांसदों ने भी चिंता और आक्रोश जताया। सांसद जेमी रस्किन ने कहा कि मंदिर में सामूहिक गोलीबारी की कथित योजना के खिलाफ लोगों को एकजुट होकर श्वेत वर्चस्ववादी सोच और हिंसा का विरोध करना चाहिए। उन्होंने मंदिरों के साथ-साथ यहूदी प्रार्थना स्थलों चर्चों और मस्जिदों को निशाना बनाने वाली हिंसा की भी निंदा की। सांसद रिच मैककॉर्मिक ने धार्मिक पहचान राजनीतिक विचार या नस्ल के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ हिंसा को गलत बताया।
    कैलिफोर्निया के सांसद रो खन्ना ने भी घटना पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म अहिंसा की शिक्षा देता है और किसी धार्मिक समुदाय को निशाना बनाना अस्वीकार्य है। सांसद अमी बेरा ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि जब कथित साजिश सामने आई तब राजा कृष्णमूर्ति और उनका परिवार मंदिर में पूजा कर रहा था। उन्होंने कहा कि यह घटना हिंदू समुदाय समेत धार्मिक और नस्लीय नफरत का सामना कर रहे अन्य समुदायों के लिए मौजूद खतरे को उजागर करती है। उन्होंने धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के लिए और कदम उठाने की जरूरत बताई।
    सांसद श्री थानेदार ने भी कांग्रेस से हिंदुओं के खिलाफ हमलों का मुकाबला करने की अपील की। वहीं हेली स्टीवंस ने कहा कि धार्मिक स्थलों पर नफरत से प्रेरित हिंसा की घटनाएं रुकनी चाहिए और किसी भी अमेरिकी को अपने धर्म का पालन करते समय सुरक्षा को लेकर डर नहीं होना चाहिए। सांसद प्रमिला जयपाल ने स्थानीय पुलिस की कार्रवाई की सराहना करते हुए दक्षिण एशियाई लोगों के खिलाफ बढ़ती नफरत और नस्लवाद पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन और सार्वजनिक जीवन में सामने आने वाली नफरत समुदायों को मानसिक आघात पहुंचाती है।
    ऑरोरा के मेयर जॉन लाश ने भी घटना के बाद कहा कि शहर की ताकत उसकी विविधता में है। उन्होंने सभी नागरिकों को सुरक्षित रहने और अपने धर्म का पालन करने का अधिकार दिए जाने पर जोर दिया। हिंदू स्वयंसेवक संघ-अमेरिका ने दूसरे धार्मिक और सामुदायिक संगठनों से भी हिंदू समुदाय के साथ खड़े होने की अपील की है। घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि धार्मिक स्थलों को सुरक्षित बनाने और नफरत से प्रेरित हिंसा रोकने के लिए समुदायों तथा प्रशासन के बीच सहयोग किस तरह मजबूत किया जाए।

  • संविधान में सेकुलर व्यवस्था और धार्मिक आजादी, फिर हिजाब पहनने पर स्कूलों में रोक क्यों, अजरबैजान में उठे बड़े सवाल

    संविधान में सेकुलर व्यवस्था और धार्मिक आजादी, फिर हिजाब पहनने पर स्कूलों में रोक क्यों, अजरबैजान में उठे बड़े सवाल


    नई दिल्ली । करीब 96 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले अजरबैजान में स्कूलों के ड्रेस कोड को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सरकार के नए नियम लागू होने के बाद हिजाब पहनकर स्कूल पहुंचने वाली छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश नहीं मिलने की शिकायतें सामने आई हैं। इसके विरोध में छात्राओं ने प्रदर्शन किए और कई जगहों पर दूसरी छात्राओं ने भी उनका समर्थन करते हुए कक्षाओं का बहिष्कार किया। मामला अब केवल स्कूल यूनिफॉर्म तक सीमित नहीं रहा बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता शिक्षा के अधिकार और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की सीमाओं पर बहस शुरू हो गई है। इस घटनाक्रम ने दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा है कि मुस्लिम बहुल देश में धार्मिक पहनावे को लेकर सरकार और विद्यार्थियों के बीच टकराव क्यों पैदा हुआनई दिल्ली ।
    अजरबैजान की आबादी का बड़ा हिस्सा इस्लाम को मानता है और देश में शिया मुसलमान बहुसंख्यक हैं। इसके बावजूद वहां की संवैधानिक व्यवस्था धर्म और राज्य को अलग रखने के सिद्धांत पर आधारित है। संविधान के अनुच्छेद 7 में देश को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बताया गया है जबकि अनुच्छेद 18 धर्म को राज्य से अलग रखने और सरकारी शिक्षा व्यवस्था को धर्मनिरपेक्ष बनाने की बात करता है। दूसरी ओर संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की भी गारंटी देता है। इसी वजह से स्कूलों में हिजाब को लेकर उठे सवाल ने एक नई बहस को जन्म दिया है कि शिक्षा व्यवस्था में समान नियम लागू करने और व्यक्तिगत धार्मिक अधिकारों की रक्षा करने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
    विवाद की प्रमुख वजह 21 सितंबर को अजरबैजान की कैबिनेट की ओर से पारित प्रस्ताव को माना जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार सरकारी सामान्य शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों के लिए निर्धारित वर्दी के नियमों को लागू करने पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के अनुरूप एक समान ड्रेस कोड बनाए रखना बताया गया। आदेश में हिजाब पर सीधे प्रतिबंध लगाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है लेकिन निर्धारित यूनिफॉर्म से अलग अतिरिक्त कपड़ों को लेकर नियम सख्त किए गए। कई स्कूलों में इन नियमों की व्याख्या इस तरह की गई कि हिजाब पहनकर आने वाली छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश नहीं दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि अजरबैजान में आम नागरिकों के हिजाब पहनने पर देशव्यापी प्रतिबंध की बात नहीं कही गई है। विवाद मुख्य रूप से स्कूलों की वर्दी और उसके क्रियान्वयन को लेकर है।
    मामला केवल छात्राओं तक सीमित नहीं रहा। 6 अक्टूबर को शिक्षकों के लिए भी अलग ड्रेस कोड से जुड़े नियम स्वीकृत किए गए। इसके बाद हिजाब पहनने वाली महिला शिक्षकों पर भी सिर ढकने वाला कपड़ा हटाने का दबाव बनाए जाने की खबरें सामने आईं। शिक्षिका जहरा हसनोवा ने कहा कि हिजाब पहनना उनका व्यक्तिगत चुनाव है और इसे जबरन हटाने का दबाव उनके लिए भावनात्मक विषय है। कुछ स्कूलों में छात्राओं को प्रवेश से रोके जाने के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुए। इन घटनाओं के बाद छात्राओं और उनके समर्थकों ने विरोध दर्ज कराया। बाकू और मसल्ली जिले में कुछ विद्यार्थियों ने कक्षाओं का बहिष्कार किया और सड़क पर पढ़ाई करते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि धार्मिक पहनावा शिक्षा हासिल करने में बाधा नहीं बनना चाहिए।
    विरोध के बीच प्रशासन ने भी सख्त रुख अपनाया। अजरबैजान के गृह मंत्रालय ने 12 अक्टूबर को बताया कि स्कूल यूनिफॉर्म से जुड़े नियमों को लागू करने के दौरान 37 लोगों को गिरफ्तार किया गया। अधिकारियों का आरोप है कि कुछ लोगों ने शिक्षा कर्मचारियों के साथ टकराव किया और स्कूलों तथा यातायात के सामान्य संचालन में बाधा पहुंचाई। वहीं विरोध करने वालों का कहना है कि हिजाब पहनने वाली छात्राओं को कक्षाओं से बाहर रखना उनके शिक्षा के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल है। ऐसे में विवाद के दोनों पक्षों को समझना जरूरी है। एक ओर सरकार समान ड्रेस कोड और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा की व्यवस्था बनाए रखने की बात करती है तो दूसरी ओर छात्राएं अपने धार्मिक विश्वास के अनुरूप कपड़े पहनने की स्वतंत्रता की मांग कर रही हैं।
    अजरबैजान में स्कूलों में हिजाब को लेकर विवाद पहली बार नहीं उठा है। दिसंबर 2010 में भी स्कूल यूनिफॉर्म के नियमों के आधार पर हिजाब पर रोक लगाने की कोशिश के बाद विरोध प्रदर्शन हुए थे। उस समय भी धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के बीच टकराव सामने आया था। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ क्या होना चाहिए और स्कूलों में उसकी व्याख्या किस तरह की जाए। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार नियमों को किस तरह लागू करती है और क्या ऐसा रास्ता निकलता है जिसमें शिक्षा व्यवस्था के अनुशासन के साथ छात्राओं के संवैधानिक अधिकारों का भी सम्मान हो सके।
  • परिवार के विरोध के बावजूद जैन दीक्षा लेना चाहती है 20 साल की युवती हाई कोर्ट ने कहा फैसला लेने के लिए स्वतंत्र

    परिवार के विरोध के बावजूद जैन दीक्षा लेना चाहती है 20 साल की युवती हाई कोर्ट ने कहा फैसला लेने के लिए स्वतंत्र


    इंदौर । मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने 20 वर्षीय युवती के जैन दीक्षा लेने के फैसले को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। युवती सांसारिक जीवन छोड़कर जैन साध्वी के रूप में दीक्षा लेना चाहती है लेकिन उसके परिवार के लोग उसके इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बालिग व्यक्ति अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। उसे अपनी पसंद के धर्म का पालन करने और धार्मिक जीवन अपनाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

    मामला इंदौर से जुड़ा है जहां युवती ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी सुरक्षा की मांग की थी। युवती ने बताया कि वह श्वेतांबर जैन धर्म से प्रभावित है और लंबे समय से धार्मिक जीवन अपनाने की इच्छा रखती है। उसका उद्देश्य सांसारिक जीवन से अलग होकर जैन साध्वी के रूप में दीक्षा लेना है। हालांकि उसके माता पिता और अन्य रिश्तेदार इस निर्णय से सहमत नहीं हैं।

    युवती को आशंका थी कि परिवार के सामाजिक प्रभाव के कारण उसके फैसले में बाधा डाली जा सकती है। इसी आशंका को लेकर उसने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और अपनी स्वतंत्रता तथा सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

    मामले की सुनवाई जस्टिस संदीप एन भट्ट की एकल पीठ ने की। कोर्ट ने युवती के माता पिता की भावनाओं को भी समझा और उनके दुख तथा चिंता के प्रति सहानुभूति जताई। हालांकि न्यायालय ने यह भी साफ किया कि युवती बालिग है और अपने जीवन की दिशा तय करने का उसे अधिकार है।

    कोर्ट ने कहा कि किसी बालिग नागरिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी धर्म या जीवन पद्धति को अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसी तरह यदि कोई बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से धार्मिक जीवन अपनाना चाहता है तो उसके इस अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए। न्यायालय ने युवती के मौलिक अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण माना।

    हाई कोर्ट ने युवती को अपनी सुरक्षा के लिए संबंधित थाना प्रभारी के समक्ष आवेदन देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि आवेदन मिलने के बाद पुलिस को उसकी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे। इस आदेश के जरिए न्यायालय ने युवती के दीक्षा लेने के व्यक्तिगत फैसले पर सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय उसकी स्वतंत्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

    मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें एक बालिग युवती की व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल सामने आया है। परिवार की भावनाओं का सम्मान करते हुए भी कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वयस्क व्यक्ति को अपने जीवन और आस्था से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता हासिल है। अब युवती अपनी इच्छा के अनुसार आगे की धार्मिक प्रक्रिया अपना सकती है और पुलिस उसकी सुरक्षा को लेकर आवश्यक कदम उठाएगी।

  • डेनमार्क में अजान पर बैन की तैयारी! सरकार बोली- ऐसा न लगे कि इस्लामाबाद में हैं

    डेनमार्क में अजान पर बैन की तैयारी! सरकार बोली- ऐसा न लगे कि इस्लामाबाद में हैं


    नई दिल्ली । यूरोप में प्रवासन और धार्मिक पहचान को लेकर जारी बहस के बीच डेनमार्क ने एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। देश की सरकार मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर दी जाने वाली अजान पर कानूनी प्रतिबंध लगाने की संभावना की समीक्षा कर रही है। सरकार का कहना है कि यह फैसला देश की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक वातावरण को बनाए रखने के उद्देश्य से लिया जा रहा है। हालांकि अभी यह केवल प्रस्ताव के स्तर पर है और इसे अंतिम मंजूरी नहीं मिली है।

    डेनमार्क के इमिग्रेशन मंत्री मोर्टेन बोडस्कोव ने कहा कि सरकार यह जांच कर रही है कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान के प्रावधानों के तहत अजान पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि डेनमार्क की छतों के ऊपर लाउडस्पीकर से अजान की आवाज नहीं सुनाई देनी चाहिए और लोगों को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि वे किसी दूसरे देश के धार्मिक माहौल में हैं। उनके इस बयान ने पूरे यूरोप में नई बहस छेड़ दी है।

    सरकार का तर्क है कि सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक उद्घोषणाओं को नियंत्रित करना देश की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए जरूरी हो सकता है। वहीं दूसरी ओर इस प्रस्ताव के विरोध में यह दलील दी जा रही है कि डेनमार्क का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और सार्वजनिक रूप से धार्मिक गतिविधियां करने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में किसी विशेष धार्मिक परंपरा पर रोक लगाने का फैसला कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है।

    डेनमार्क में लगभग 2.7 लाख मुस्लिम आबादी रहती है और पूरे देश में करीब 100 मस्जिदें हैं। हाल के वर्षों में यूरोप के कई देशों में प्रवासन हिजाब धार्मिक पहचान और सार्वजनिक धार्मिक गतिविधियों को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज हुई है। कई देशों ने पहले भी धार्मिक प्रतीकों और सार्वजनिक आयोजनों को लेकर नए नियम लागू किए हैं।

    सरकार फिलहाल कानूनी विशेषज्ञों की राय ले रही है ताकि यह तय किया जा सके कि प्रस्ताव संविधान और मानवाधिकार संबंधी कानूनों के अनुरूप है या नहीं। यदि कानूनी समीक्षा सकारात्मक रहती है तो सरकार संसद में नया विधेयक ला सकती है। हालांकि इसके लिए राजनीतिक सहमति और संसदीय मंजूरी भी जरूरी होगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा केवल अजान तक सीमित नहीं है बल्कि यूरोप में राष्ट्रीय पहचान धार्मिक स्वतंत्रता और प्रवासन नीति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले दिनों में डेनमार्क सरकार की कानूनी समीक्षा और राजनीतिक निर्णय पर पूरे यूरोप की नजर रहेगी क्योंकि इसका असर अन्य देशों की नीतियों पर भी पड़ सकता है।

  • बांग्लादेश में राम प्रतिमा को लेकर विवाद: धमकियों के बाद मंदिर समिति ने रोका निर्माण कार्य

    बांग्लादेश में राम प्रतिमा को लेकर विवाद: धमकियों के बाद मंदिर समिति ने रोका निर्माण कार्य


    नई दिल्ली-] बांग्लादेश । बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय से जुड़े एक धार्मिक स्थल पर भगवान राम की प्रतिमा के निर्माण को लेकर विवाद सामने आया है। रंगपुर संभाग के पलाशबाड़ी क्षेत्र में एक मंदिर परिसर में बन रही प्रतिमा को लेकर बढ़ते विरोध और कथित धमकियों के बाद मंदिर समिति ने निर्माण कार्य अस्थायी रूप से रोकने का फैसला किया है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और साम्प्रदायिक सौहार्द को लेकर बहस को तेज कर दिया है।

    मंदिर समिति के अनुसार, प्रतिमा निर्माण को लेकर कुछ कट्टरपंथी तत्वों की ओर से विरोध दर्ज कराया गया था। स्थिति तब अधिक संवेदनशील हो गई जब एक स्थानीय उपदेशक द्वारा कथित रूप से सार्वजनिक मंच से निर्माणाधीन प्रतिमा को हटाने और उसे ध्वस्त करने संबंधी बयान दिए गए। इन बयानों के बाद क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका जताई जाने लगी और स्थानीय लोगों के बीच चिंता का माहौल बन गया।

    स्थिति को देखते हुए मंदिर प्रबंधन ने विवाद को और बढ़ने से रोकने तथा सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के उद्देश्य से निर्माण कार्य रोकने का निर्णय लिया। समिति के एक सदस्य ने कहा कि यह फैसला किसी दबाव में नहीं बल्कि शांति और सामाजिक सद्भाव को प्राथमिकता देते हुए लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य में यदि परिस्थितियां अनुकूल होती हैं और स्थानीय समुदायों के बीच सहमति बनती है तो निर्माण कार्य फिर से शुरू करने पर विचार किया जा सकता है।

    मंदिर समिति ने अपने बयान में कहा कि समाज और देश के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए फिलहाल प्रतिमा निर्माण को स्थगित किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में किसी भी निर्णय से पहले स्थानीय नागरिकों, धार्मिक नेताओं और संबंधित पक्षों से सुझाव लिए जाएंगे ताकि किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो।

    रिपोर्टों के अनुसार, विवाद के दौरान कुछ भड़काऊ बयान भी सामने आए, जिनसे क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका पैदा हुई। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां हालात पर नजर बनाए हुए हैं। हालांकि किसी बड़े हिंसक टकराव की सूचना नहीं मिली है, लेकिन संवेदनशीलता को देखते हुए एहतियाती कदम उठाए जा रहे हैं।

    बांग्लादेश में हाल के वर्षों में अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े कई मुद्दे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने हैं। मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता और सभी समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि धार्मिक स्थलों और आस्था से जुड़े मामलों को संवाद और कानून के दायरे में रहकर सुलझाया जाना चाहिए।

    विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में प्रशासन की त्वरित और निष्पक्ष भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि समय रहते संवाद स्थापित किया जाए और कानून व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए तो किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ने से रोका जा सकता है। फिलहाल पलाशबाड़ी में स्थिति शांत बताई जा रही है, लेकिन प्रतिमा निर्माण को लेकर आगे क्या फैसला होगा, इस पर स्थानीय लोगों और धार्मिक समुदायों की नजर बनी हुई है।

  • भोपाल में कंपनी के नियम पर हंगामा, धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबंध से विवाद गहराया, FIR की मांग

    भोपाल में कंपनी के नियम पर हंगामा, धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबंध से विवाद गहराया, FIR की मांग


    भोपाल । मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक निजी कंपनी द्वारा कर्मचारियों के धार्मिक प्रतीकों पर कथित प्रतिबंध लगाने के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। एमपी नगर स्थित परमाली वालेस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को लेकर हिंदू उत्सव समिति ने विरोध जताते हुए प्रशासन से FIR दर्ज करने की मांग की है।

    मामला तब सामने आया जब आरोप लगाया गया कि कंपनी ने एक नोटिस जारी कर कर्मचारियों को तिलक, अंगूठी, कड़ा, बाली, मंगलसूत्र और बिंदी जैसे धार्मिक प्रतीक पहनकर आने से मना किया है। इस निर्णय को लेकर कर्मचारियों और विभिन्न संगठनों में नाराजगी देखने को मिल रही है।

    हिंदू उत्सव समिति के अध्यक्ष चन्द्रशेखर तिवारी ने इस आदेश को धार्मिक आस्था और परंपराओं पर सीधा आघात बताया है। उन्होंने कहा कि इस तरह का प्रतिबंध किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा और यह कर्मचारियों की धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है। समिति ने इस मामले में कंपनी के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग करते हुए प्रशासन को ज्ञापन सौंपा है।

    इसके साथ ही संगठन ने कंपनी के उत्पादों के बहिष्कार की भी अपील की है, जिससे विवाद और अधिक बढ़ गया है। स्थानीय स्तर पर इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है और कई लोग इसे धार्मिक भावनाओं से जोड़कर देख रहे हैं।

    वहीं दूसरी ओर कंपनी प्रबंधन का कहना है कि यह सर्कुलर उत्पादन प्रक्रिया और गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़ा हुआ है। उनका तर्क है कि कर्मचारियों द्वारा पहने जाने वाले आभूषण या धातु सामग्री के कारण प्रोडक्ट रिजेक्ट होने की संभावना रहती है, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है।

    परमाली वालेस प्राइवेट लिमिटेड एक पुरानी कंपनी है जो लकड़ी और रेशे आधारित सांचों के निर्माण के क्षेत्र में काम करती है। कंपनी की स्थापना वर्ष 1961 में हुई थी और यह एक गैर-सूचीबद्ध निजी इकाई के रूप में कार्यरत है।

    इस पूरे विवाद ने अब प्रशासन और सामाजिक संगठनों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। जहां एक तरफ इसे औद्योगिक नियमों से जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर विरोध किया जा रहा है।

    फिलहाल प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है और मामले की जांच की संभावना जताई जा रही है। यह विवाद आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है, क्योंकि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं।

  • सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की सुनवाई तेज, आस्था और समानता के बीच संतुलन को लेकर ऐतिहासिक निर्णय की संभावना

    सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की सुनवाई तेज, आस्था और समानता के बीच संतुलन को लेकर ऐतिहासिक निर्णय की संभावना

    नई दिल्ली:   केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े संवेदनशील और लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई एक बार फिर तेज हो गई है। नौ जजों की संविधान पीठ इस मामले में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर विस्तार से विचार कर रही है। यह मामला अब केवल एक धार्मिक परंपरा का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह आस्था, परंपरा और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन की एक व्यापक संवैधानिक बहस का रूप ले चुका है।

    सुनवाई के दौरान पीठ ने यह संकेत दिया कि धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं को केवल कानूनी दृष्टिकोण से देखना आसान नहीं होता, क्योंकि इनमें करोड़ों लोगों की भावनाएं और विश्वास जुड़े होते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी सामाजिक सुधार की प्रक्रिया में धार्मिक संरचनाओं की मूल भावना को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन टिप्पणियों से मामले की गंभीरता और जटिलता और अधिक स्पष्ट हो गई है।

    यह पूरा विवाद वर्ष 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इससे पहले 1991 में केरल उच्च न्यायालय ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को उचित माना था। 2018 के फैसले के बाद देशभर में इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं और इसके खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं, जिन पर अब विस्तार से सुनवाई जारी है।

    मंदिर के प्रबंधन से जुड़े पक्ष का कहना है कि यह परंपरा भगवान अयप्पा के ब्रह्मचारी स्वरूप की मान्यता पर आधारित है और सदियों से इसका पालन होता आ रहा है। उनके अनुसार यह मामला केवल प्रशासनिक व्यवस्था या सार्वजनिक अधिकारों का नहीं, बल्कि एक गहरी धार्मिक आस्था और परंपरा का हिस्सा है, जिसे सामाजिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।

    सुनवाई के दौरान विभिन्न पक्षों ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दिया और कहा कि धार्मिक प्रथाओं के मूल स्वरूप में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि किसी भी प्रकार का लिंग आधारित प्रतिबंध समानता के अधिकार और मौलिक अधिकारों की भावना के खिलाफ है, इसलिए इसे संवैधानिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

    यह मामला केवल सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसी सुनवाई के दौरान धार्मिक स्थलों में महिलाओं की भूमिका, विभिन्न समुदायों की परंपराएं और धार्मिक संस्थाओं में लैंगिक समानता जैसे व्यापक मुद्दों पर भी विचार किया जा रहा है। इसमें विभिन्न धार्मिक परंपराओं से जुड़े संवेदनशील प्रश्न भी शामिल हैं, जिससे यह मामला और अधिक व्यापक बन गया है।

    माना जा रहा है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का आने वाला निर्णय न केवल धार्मिक परंपराओं की व्याख्या को प्रभावित करेगा, बल्कि देश में आस्था, समानता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की दिशा भी तय कर सकता है।

  • टेक्सास में 90 फीट ‘अभय हनुमान’ प्रतिमा पर विवाद: धार्मिक स्वतंत्रता बनाम अभिव्यक्ति की आज़ादी की बहस तेज

    टेक्सास में 90 फीट ‘अभय हनुमान’ प्रतिमा पर विवाद: धार्मिक स्वतंत्रता बनाम अभिव्यक्ति की आज़ादी की बहस तेज


    नई दिल्ली। अमेरिका के टेक्सास राज्य के शुगर लैंड शहर में स्थापित 90 फीट ऊंची अभय हनुमान प्रतिमा को लेकर विवाद गहरा गया है। पंचलोहा से निर्मित यह भव्य प्रतिमा उत्तर अमेरिका की सबसे ऊंची हनुमान प्रतिमाओं में से एक मानी जा रही है। अगस्त 2024 में विस्तृत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ इसका लोकार्पण किया गया था। निजी भूमि पर स्थापित यह प्रतिमा स्थानीय हिंदू समुदाय के लिए आस्था शक्ति और शांति का प्रतीक बन चुकी है लेकिन हाल के दिनों में इसे लेकर सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई है।

    विवाद की शुरुआत तब हुई जब टेक्सास स्थित एक रिपब्लिकन कार्यकर्ता कार्लोस टुर्सियोस ने सोशल मीडिया पर प्रतिमा को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी साझा की। पोस्ट में नस्लीय और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया और यह आरोप लगाया गया कि प्रवासी समुदाय अमेरिका में “धीरे-धीरे कब्जा” कर रहा है। उनके कुछ समर्थकों ने भी आपत्तिजनक और आप्रवासी-विरोधी नारे लगाए जिससे मामला और तूल पकड़ गया।

    इस बयान के बाद भारतीय-अमेरिकी समुदाय और कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उनका कहना है कि प्रतिमा निजी संपत्ति पर स्थापित है और अमेरिकी संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत आती है। समुदाय के प्रतिनिधियों का तर्क है कि किसी भी धार्मिक प्रतीक को नस्लीय या सांस्कृतिक आधार पर निशाना बनाना न केवल असंवेदनशील है बल्कि असंवैधानिक भावना को भी बढ़ावा देता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका की बहुसांस्कृतिक पहचान में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का सम्मान मूलभूत सिद्धांत है।

    यह पहली बार नहीं है जब इस मंदिर परिसर की प्रतिमा विवाद में आई हो। इससे पहले भी कुछ समूहों ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया था। उस समय भी स्थानीय प्रशासन और सामुदायिक नेताओं ने संयम और संवाद की अपील की थी। हालांकि इस बार सोशल मीडिया की तीव्रता ने विवाद को राष्ट्रीय बहस का रूप दे दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा केवल एक प्रतिमा तक सीमित नहीं है बल्कि अमेरिका में धार्मिक विविधता आप्रवासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे व्यापक विषयों से जुड़ा हुआ है। एक पक्ष इसे धार्मिक और नस्लीय असहिष्णुता का उदाहरण मान रहा है तो दूसरा पक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में देख रहा है। संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है लेकिन यह अधिकार घृणा या हिंसा को बढ़ावा देने का औचित्य नहीं बन सकता।

    फिलहाल शुगर लैंड की अभय हनुमान प्रतिमा आस्था के साथ-साथ सामाजिक विमर्श का केंद्र बन चुकी है। यह विवाद इस बात की याद दिलाता है कि बहुसांस्कृतिक समाजों में संवाद संवेदनशीलता और पारस्परिक सम्मान कितने आवश्यक हैं। अमेरिका जैसे विविधतापूर्ण देश में धार्मिक प्रतीकों को लेकर उठने वाले प्रश्न केवल स्थानीय नहीं रहते बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर पहचान अधिकार और सहअस्तित्व की बहस को जन्म देते हैं।

  • सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर फिर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से करेगी विचार

    सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर फिर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से करेगी विचार


    नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट एक बार फिर केरल स्थित भगवान अयप्पा के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े बहुचर्चित मामले पर सुनवाई शुरू करने जा रही है। सितंबर 2018 के ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ दायर कई समीक्षा और पुनर्विचार याचिकाओं पर अब नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से सुनवाई करेगी। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता समानता के अधिकार और परंपराओं की संवैधानिक वैधता जैसे अहम सवालों से जुड़ा हुआ है।

    बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार नौ जजों की पीठ धार्मिक अधिकारों और स्वतंत्रता से जुड़े सात महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों की जांच करेगी। इन सवालों के आधार पर यह तय किया जाएगा कि क्या सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए या परंपरागत प्रतिबंध को बरकरार रखा जाए।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने सोमवार को सभी पक्षों को 14 मार्च तक अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने सुनवाई की विस्तृत समय-सारिणी भी तय कर दी है। कोर्ट के अनुसार नौ न्यायाधीशों की पीठ 7 अप्रैल को सुबह 10:30 बजे से कार्यवाही शुरू करेगी। पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं को 7 से 9 अप्रैल तक सुना जाएगा जबकि पुनर्विचार के विरोधियों को 14 से 16 अप्रैल तक अपनी दलीलें रखने का अवसर मिलेगा। 21 अप्रैल को प्रतिवाद सुना जाएगा और 22 अप्रैल तक एमिकस क्यूरी द्वारा अंतिम और समापन दलीलें पेश की जाएंगी।

    गौरतलब है कि सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। उस फैसले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ बहुमत में थे जबकि पीठ की एकमात्र महिला न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने असहमति जताई थी। उन्होंने अपने मत में कहा था कि धार्मिक परंपराओं में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए।

    2018 के फैसले के बाद केरल में व्यापक विरोध-प्रदर्शन हुए थे और दर्जनों पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई थीं। नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मामले को बड़ी पीठ के समक्ष विचारार्थ रखने का निर्णय लिया था लेकिन अंतिम निर्णय नहीं दिया गया था।

    अब नौ जजों की संविधान पीठ इस जटिल संवैधानिक विवाद पर व्यापक सुनवाई कर कानूनी प्रश्नों का निर्धारण करेगी। देशभर की निगाहें इस सुनवाई पर टिकी हैं क्योंकि इसका असर न केवल सबरीमाला मंदिर की परंपराओं पर पड़ेगा बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता से जुड़े अन्य मामलों पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

  • इंदौर में कॉल सेंटर कर्मचारी पर धर्म परिवर्तन का दबाव, युवती ने बीच सड़क जूतों से की पिटाई

    इंदौर में कॉल सेंटर कर्मचारी पर धर्म परिवर्तन का दबाव, युवती ने बीच सड़क जूतों से की पिटाई


    इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर में एक कॉल सेंटर में कार्यरत युवती पर लगातार धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोपी युवक का नाम अब्दुल कलाम है, जो कॉल सेंटर में एमओ मैनेजमेंट ऑफिसर के पद पर कार्यरत था। युवती ने अपनी शिकायत में कहा कि आरोपी काम के दौरान उसे बार-बार धर्म परिवर्तन करने के लिए मानसिक रूप से प्रताड़ित करता था। इस दबाव से परेशान होकर युवती ने कॉल सेंटर की नौकरी छोड़ दी, लेकिन आरोपी का पीछा तब भी नहीं रुका।

    युवती ने बताया कि कंपनी के दो माह के नोटिस पीरियड के दौरान, जब वह रोजाना काम पर जा रही थी, तब भी आरोपी उसे रास्ते में रोककर परेशान करता रहा। लगातार उत्पीड़न से तंग आकर एक दिन युवती का गुस्सा फूट पड़ा। रास्ते में ही उसने आरोपी की जूतों से पिटाई कर दी। इसके बाद, पीड़िता ने पूरे मामले की शिकायत लसूड़िया थाना पुलिस में दर्ज कराई।

    पुलिस ने युवती की शिकायत के आधार पर आरोपी के खिलाफ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत केस दर्ज किया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि आरोपी से पूछताछ की जा रही है और मामले की जांच जारी है। यह घटना एक बार फिर कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ी गंभीर सवालों को उजागर करती है। क्या हमारे कार्यस्थलों पर महिलाओं को सुरक्षित महसूस होता है क्या हम उनके धार्मिक विश्वासों और स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं? इन सवालों का जवाब अब समाज और जिम्मेदार अधिकारियों को देना होगा ।