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  • Vat Savitri Vrat 2026: पूजा में बांस के पंखे का धार्मिक महत्व जानिए

    Vat Savitri Vrat 2026: पूजा में बांस के पंखे का धार्मिक महत्व जानिए


    नई दिल्ली। ज्येष्ठ अमावस्या के दिन मनाया जाने वाला वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती हैं। इस पूजा में कई प्रकार की सामग्री का उपयोग किया जाता है, लेकिन बांस से बना पारंपरिक हाथ पंखा, जिसे कई जगह ‘बेना’ कहा जाता है, विशेष महत्व रखता है।

    सत्यवान-सावित्री कथा से जुड़ा है संबंध
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब सावित्री अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लाने के लिए यमराज के पीछे-पीछे जा रही थीं, तब ज्येष्ठ महीने की भीषण गर्मी में सत्यवान का शरीर निढाल हो गया था। कथा के अनुसार, सावित्री ने बांस के हाथ पंखे से उन्हें हवा देकर राहत पहुंचाई थी। तभी से वट सावित्री व्रत में बांस के पंखे का उपयोग परंपरा का हिस्सा बन गया।

    पूजा में क्यों खरीदे जाते हैं दो पंखे?
    मान्यता है कि वट सावित्री व्रत के दौरान महिलाएं दो बांस के पंखे खरीदती हैं। पूजा के बाद इन पंखों को दान किया जाता है। धार्मिक विश्वास है कि इससे अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि और परिवार में खुशहाली बनी रहती है। पूजा के दौरान पंखे को सेवा, समर्पण और पति-पत्नी के अटूट प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है।

    पंखा दान को माना गया है महादान
    शास्त्रों में ज्येष्ठ माह की तपती गर्मी में पंखा दान करना बेहद पुण्यकारी बताया गया है। विशेष रूप से बांस का पंखा दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है और जरूरतमंदों को राहत मिलती है। इसी वजह से वट सावित्री व्रत की पूजा के बाद महिलाएं पंखा दान करने की परंपरा निभाती हैं।

    बांस को माना जाता है वंश वृद्धि का प्रतीक
    हिंदू धर्म में बांस को शुभ और वंश वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसलिए बांस से बने पंखे का उपयोग केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि परिवार की खुशहाली, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा से भी जुड़ा माना जाता है।

  • आज का धार्मिक योग: 11 मई को भगवान शिव की आराधना का खास महत्व

    आज का धार्मिक योग: 11 मई को भगवान शिव की आराधना का खास महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है और इस दिन शिव आराधना का विशेष महत्व होता है। 11 मई, सोमवार को ऐसा ही एक अत्यंत शुभ और पावन संयोग बन रहा है, जिसे धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद फलदायी बताया जा रहा है। इस दिन श्रद्धालुओं द्वारा की जाने वाली शिव पूजा जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाली मानी जा रही है।

    मान्यता है कि भगवान शिव अत्यंत भोले और शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं। सोमवार के दिन यदि सच्चे मन से उनकी आराधना की जाए तो सभी प्रकार के दुख, रोग और बाधाओं का नाश होता है। 11 मई का यह विशेष दिन भक्तों के लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण इसलिए माना जा रहा है क्योंकि इस दिन ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति भी शिव भक्ति के अनुकूल मानी जा रही है, जिससे पूजा का फल कई गुना बढ़ सकता है।

    शिव मंदिरों में इस दिन सुबह से ही भक्तों की भीड़ उमड़ने की संभावना है। लोग जलाभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, भस्म और पुष्प अर्पित कर भगवान शिव को प्रसन्न करने का प्रयास करेंगे। “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप इस दिन विशेष रूप से लाभकारी बताया जा रहा है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, उनके जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। साथ ही विवाह, नौकरी, व्यापार और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं में भी राहत मिलने के योग बनते हैं।

    ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, सोमवार और शिव आराधना का यह संयोग मानसिक शांति और आत्मिक बल को बढ़ाने वाला होता है। यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो लंबे समय से किसी परेशानी या बाधा से जूझ रहे हैं।

    भक्तों को सलाह दी जाती है कि वे इस दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और शिवलिंग पर जल, दूध एवं पंचामृत अर्पित करें। इसके बाद ध्यान और मंत्र जाप के माध्यम से भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करें।

    कुल मिलाकर 11 मई का यह सोमवार धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ अवसर लेकर आ रहा है, जो भक्तों के जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार करने वाला माना जा रहा है।

  • ज्येष्ठ मास 2026 में 60 दिन का दुर्लभ संयोग ,दोगुना पुण्य और आस्था का महासंगम

    ज्येष्ठ मास 2026 में 60 दिन का दुर्लभ संयोग ,दोगुना पुण्य और आस्था का महासंगम


    नई दिल्ली। इस वर्ष ज्येष्ठ मास का विशेष संयोग देखने को मिल रहा है। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास लगभग 60 दिन का होगा। ऐसा दुर्लभ योग कई वर्षों बाद बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय अत्यंत पुण्यदायी माना जा रहा है। इस बार अधिकमास के कारण ज्येष्ठ मास का महत्व और अधिक बढ़ गया है। भक्तजन इस अवधि को भगवान विष्णु और भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त करने का उत्तम अवसर मान रहे हैं।

    ज्येष्ठ मास की शुरुआत 2 मई 2026 से हो रही है और यह 29 जून 2026 तक चलेगा। इस दौरान 17 मई से 15 जून तक अधिकमास रहेगा। अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस अवधि में किए गए धार्मिक कार्यों का फल कई गुना अधिक माना जाता है। इसलिए इसे दोगुना पुण्य देने वाला महीना कहा जा रहा है।

    इस महीने में मंगलवार का विशेष महत्व होता है जिसे बड़ा मंगल या बुढ़वा मंगल कहा जाता है। इस बार ज्येष्ठ मास लंबे होने के कारण बड़े मंगल की संख्या बढ़कर आठ हो जाएगी। भक्त इस दिन हनुमान जी की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं। मान्यता है कि इससे संकट दूर होते हैं और जीवन में सुख शांति आती है।

    ज्येष्ठ मास में दान पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। इस दौरान गर्मी चरम पर होती है इसलिए जल सेवा को सबसे बड़ा पुण्य कार्य माना जाता है। लोग राहगीरों को पानी पिलाते हैं। प्याऊ लगवाते हैं। पशु पक्षियों के लिए दाना और पानी की व्यवस्था करते हैं। इससे सकारात्मक ऊर्जा और पुण्य प्राप्त होता है।

    इस मास में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष विधान है। तिल अन्न और सत्तू का दान अत्यंत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख समृद्धि बढ़ती है। साथ ही इस महीने में सात्विक भोजन करने की सलाह दी जाती है।

    भक्तजन इस पूरे महीने नियम संयम का पालन करते हैं। दिन में एक बार भोजन करना और सरल जीवन जीना पुण्यकारी माना जाता है। मंगलवार के दिन हनुमान मंदिरों में विशेष भंडारे और पूजा आयोजन किए जाते हैं। बूंदी के लड्डू का भोग लगाया जाता है।

    ज्येष्ठ मास में सूर्य की तीव्र गर्मी रहती है इसलिए दोपहर के समय बाहर निकलने से बचना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो सूती वस्त्र पहनकर शरीर को ढककर निकलना चाहिए। इससे स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

    इस प्रकार यह ज्येष्ठ मास धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अधिकमास के कारण इसका प्रभाव और भी बढ़ गया है। भक्तजन इसे जीवन में पुण्य अर्जित करने का श्रेष्ठ अवसर मान रहे हैं।

    यह अवधि भक्तों के लिए विशेष साधना और सेवा का समय मानी जाती है। इस दौरान किए गए छोटे से छोटे पुण्य कार्य का भी बड़ा फल मिलता है। इसलिए लोग इस मास को आध्यात्मिक उन्नति का सुनहरा अवसर मानते हैं और श्रद्धा के साथ इसका पालन करते हैं।

  • हिंदू नववर्ष 2026: ब्रह्म मुहूर्त में करें ये शुभ कार्य, पूरे साल मिलेगा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद

    हिंदू नववर्ष 2026: ब्रह्म मुहूर्त में करें ये शुभ कार्य, पूरे साल मिलेगा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में नववर्ष का विशेष महत्व माना गया है जो चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से आरंभ होता है। वर्ष 2026 में यह पावन अवसर 19 मार्च को पड़ रहा है इसी दिन से विक्रम संवत 2083 की शुरुआत होगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नववर्ष का पहला दिन पूरे साल की दिशा तय करता है इसलिए इस दिन विशेष रूप से ब्रह्म मुहूर्त में किए गए कार्य अत्यंत फलदायी माने जाते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस शुभ समय में किया गया हर सकारात्मक प्रयास पूरे वर्ष जीवन में खुशियां सफलता और समृद्धि लेकर आता है।

    ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार नववर्ष के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस समय वातावरण शुद्ध और ऊर्जा से भरपूर होता है जो मन और शरीर को सकारात्मकता से भर देता है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करना और स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। इसके बाद घर के मंदिर में दीपक जलाकर विधिपूर्वक पूजा अर्चना करें। विशेष रूप से भगवान विष्णु मां दुर्गा और भगवान गणेश की पूजा करने का विधान बताया गया है। ऐसा करने से घर में सुख शांति बनी रहती है और पूरे वर्ष ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।

    नववर्ष के पहले दिन घर की साफ सफाई का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि स्वच्छ और सुसज्जित घर में देवी देवताओं का वास होता है। इस दिन घर के मुख्य द्वार को सजाना चाहिए रंगोली बनानी चाहिए और आम के पत्तों या फूलों से तोरण लगाना चाहिए। यह न केवल घर की सुंदरता बढ़ाता है बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करता है और नकारात्मकता को दूर करता है।

    इसके साथ ही दान पुण्य का भी इस दिन विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंदों को भोजन वस्त्र या अन्य आवश्यक चीजें दान करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। दान करने से न केवल पुण्य की प्राप्ति होती है बल्कि यह हमारे भीतर करुणा और सेवा की भावना को भी जागृत करता है। ऐसा करने से जीवन में समृद्धि और संतोष का भाव बना रहता है।

    हिंदू नववर्ष को नई शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन व्यक्ति को अपने जीवन के लिए सकारात्मक संकल्प लेना चाहिए। जैसे नियमित पूजा करना अच्छे कर्म करना दूसरों की सहायता करना और जीवन को सकारात्मक दृष्टिकोण से जीने का प्रण लेना। कई लोग इस शुभ अवसर पर नया व्यवसाय नई योजना या किसी महत्वपूर्ण कार्य की शुरुआत भी करते हैं क्योंकि इसे अत्यंत शुभ समय माना गया है।

    अंतत ब्रह्म मुहूर्त में किया गया हर शुभ कार्य व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। यदि इस पावन दिन को श्रद्धा भक्ति और सकारात्मकता के साथ मनाया जाए तो पूरे वर्ष जीवन में खुशहाली सफलता और मानसिक शांति बनी रहती है।

  • मासिक शिवरात्रि आज: भोलेनाथ की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

    मासिक शिवरात्रि आज: भोलेनाथ की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में हर माह आने वाली मासिक शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। चैत्र माह की मासिक शिवरात्रि आज 17 मार्च को मनाई जा रही है। यह दिन भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और अभिषेक करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मासिक शिवरात्रि के दिन श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया व्रत विशेष फलदायी होता है। कहा जाता है कि इस दिन भोलेनाथ अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। विशेष रूप से जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं, दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है और अविवाहित लोगों को योग्य जीवनसाथी मिलने की भी मान्यता है।

    शुभ मुहूर्त और पूजा का समय

    वैदिक पंचांग के अनुसार चतुर्दशी तिथि का आरंभ 17 मार्च सुबह 9:23 बजे से हुआ है, जो 18 मार्च सुबह 8:25 बजे तक रहेगी। शिव पूजा के लिए निशिता काल का विशेष महत्व होता है। इस दिन निशिता काल रात 12:05 बजे से 12:53 बजे तक रहेगा। इस समय की गई पूजा को अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

    जलाभिषेक का महत्व

    ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि अर्पित कर अभिषेक करने से ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही रुद्राष्टकम या अन्य शिव स्तोत्रों का पाठ करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।मासिक शिवरात्रि का यह पावन अवसर भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का उत्तम समय माना जाता है।

  • शीतला अष्टमी 2026: कब है बासोड़ा पूजा? जानिए तारीख, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

    शीतला अष्टमी 2026: कब है बासोड़ा पूजा? जानिए तारीख, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी का पर्व विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन शीतला माता की पूजा-अर्चना कर परिवार के स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। शीतला अष्टमी को कई जगहों पर बासोड़ा या बासोड़ा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत हर वर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस दिन माता शीतला को ठंडे या बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता।

    वर्ष 2026 में शीतला अष्टमी का पर्व 11 मार्च बुधवार को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र कृष्ण अष्टमी तिथि की शुरुआत 11 मार्च को रात 1 बजकर 54 मिनट से हो रही है और यह तिथि 12 मार्च को सुबह 4 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर शीतला अष्टमी का व्रत 11 मार्च को रखा जाएगा। इस दिन श्रद्धालुओं को पूजा के लिए लगभग 12 घंटे का शुभ समय प्राप्त होगा।

    शीतला अष्टमी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 36 मिनट से प्रारंभ होकर शाम 6 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। वहीं इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 58 मिनट से 5 बजकर 47 मिनट तक रहेगा जिसे स्नान और ध्यान के लिए उत्तम समय माना जाता है। हालांकि इस दिन अभिजीत मुहूर्त नहीं है। वहीं राहुकाल दोपहर 12 बजकर 31 मिनट से 2 बजे तक रहेगा इसलिए इस समय में पूजा या शुभ कार्य करने से बचना चाहिए।

    इस वर्ष शीतला अष्टमी पर वज्र योग सिद्धि योग और ज्येष्ठा नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है। वज्र योग सुबह से लेकर 9 बजकर 12 मिनट तक रहेगा जिसके बाद सिद्धि योग प्रारंभ होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार वज्र योग को अधिक शुभ नहीं माना जाता इसलिए शीतला माता की पूजा सिद्धि योग में करना अधिक फलदायी माना जाता है। इस योग में की गई पूजा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    शीतला अष्टमी का पर्व स्वास्थ्य और रोगों से सुरक्षा से जुड़ा हुआ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से चेचक जैसे संक्रामक रोगों से रक्षा होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। शीतला माता को ठंडा भोजन प्रिय माना जाता है इसलिए इस दिन घर में नया भोजन नहीं बनाया जाता।

    परंपरा के अनुसार शीतला सप्तमी यानी  एक दिन पहले भोजन बनाकर रखा जाता है और अगले दिन वही ठंडा भोजन माता शीतला को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार के लोग भी उसी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से माता शीतला प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को स्वास्थ्य सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

  • Aamlaki Ekadashi 2026: नवविवाहित महिलाओं के लिए क्यों खास है आमलकी एकादशी? जानें महत्व और लाभ

    Aamlaki Ekadashi 2026: नवविवाहित महिलाओं के लिए क्यों खास है आमलकी एकादशी? जानें महत्व और लाभ


    नई दिल्ली । आमलकी एकादशी हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी जिसे रंगभरी एकादशी भी कहते हैं का अपना एक अलग ही आकर्षण है. यह दिन न केवल भगवान विष्णु को समर्पित है, बल्कि नवविवाहित महिलाओं के लिए यह सौभाग्य और खुशहाल वैवाहिक जीवन का द्वार खोलने वाला माना जाता है.

    आमलकी एकादशी शुभ मुहूर्त 2026

    पंचांग के अनुसार, इस वर्ष आमलकी एकादशी की तिथि और समय कुछ इस प्रकार है.

    नवविवाहित महिलाओं के लिए क्यों है खास?
    मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर पहली बार काशी आए थे. इसलिए इसे रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है. नवविवाहित महिलाओं के लिए यह काफी व्रत खास माना जाता है.जो महिलाएं शादी के बाद शुरुआती सालों में यह व्रत करती हैं, उन्हें माता पार्वती और भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है, जिससे वैवाहिक जीवन में प्रेम बना रहता है. आमलकी एकादशी का व्रत रखने से घर में सुख-शांति आती है और संतान प्राप्ति की राह आसान होती है. स्वास्थ्य का वरदान: आमलकी का अर्थ है आंवला. आयुर्वेद और धर्म दोनों में आंवले को अमृत माना गया है. इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा करने से महिलाओं को आरोग्य और शारीरिक शक्ति मिलती है.

    इस दिन क्या करें?

    आमलकी एकादशी पर कुछ विशेष कार्यों को करने से व्रत का फल दोगुना हो जाता है. आंवले के पेड़ की पूजा: इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भगवान विष्णु की पूजा करें. पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें और परिक्रमा करें.आंवले का दान और सेवन: इस दिन आंवले का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है. साथ ही, प्रसाद के रूप में आंवले का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम है.

    रंग और गुलाल: चूंकि इसे रंगभरी एकादशी भी कहते हैं, इसलिए भगवान विष्णु और शिव-पार्वती को गुलाल अर्पित करें.पौराणिक महत्व: शास्त्रों के अनुसार, आंवले का वृक्ष भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है क्योंकि इसकी उत्पत्ति विष्णु जी के आंसुओं से हुई थी. इसलिए इस दिन आंवले की पूजा सीधे श्रीहरि की पूजा मानी जाती है.

    आमलकी एकादशी के लाभ

    पापों से मुक्ति: अनजाने में हुई गलतियों और पापों के प्रभाव को कम करने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है.मोक्ष की प्राप्ति: एकादशी का व्रत करने वाले साधक को आखिर में वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती हैआर्थिक उन्नति: शुक्रवार के दिन एकादशी पड़ने से लक्ष्मी-नारायण योग बनता है, जो धन और ऐश्वर्य में वृद्धि करता है. 

  • Amavasya 2026: जानें साल 2026 में अमावस्या की सभी 13 तिथियां, मौनी और सोमवती अमावस्या सहित

    Amavasya 2026: जानें साल 2026 में अमावस्या की सभी 13 तिथियां, मौनी और सोमवती अमावस्या सहित


    नई दिल्ली/हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष 12 या कभी-कभी 13 अमावस्याएं होती हैं। अमावस्या वह तिथि है जब चंद्रमा पूरी तरह लुप्त हो जाता है और कृष्ण पक्ष समाप्त हो जाता है। साल 2026 में कुल 13 अमावस्या पड़ने वाली हैं। इनमें मौनी अमावस्या और सोमवती अमावस्या विशेष महत्व रखती हैं। आइए जानते हैं 2026 में आने वाली सभी अमावस्याओं की तिथियां और उनके महत्व के बारे में।

    साल 2026 की पहली अमावस्या – मौनी अमावस्या

    साल की पहली अमावस्या माघ मास में पड़ रही है, जिसे मौनी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन ऋषि मनु का जन्म हुआ था और इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। मौनी अमावस्या पर व्रत रखने, दान देने और पितरों का तर्पण करना विशेष रूप से लाभकारी होता है। साथ ही भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा करने का भी खास महत्व है। मौनी अमावस्या पर मौन व्रत रखने की परंपरा प्रचलित है। इस साल मौनी अमावस्या 18 जनवरी 2026 को पड़ रही है।

    सोमवती अमावस्या 2026
    जब अमावस्या का दिन सोमवार को पड़ता है, उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। साल 2026 में दो बार सोमवती अमावस्या है। पहली सोमवती अमावस्या 15 जून 2026 को और दूसरी 9 नवंबर 2026 को है। इस दिन व्रत और विशेष पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि और पितृ दोष से मुक्ति का लाभ माना जाता है।

    शनिश्चरी अमावस्या 2026
    शनिवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को शनिश्चरी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन शनिदेव की विशेष पूजा का विधान होता है। साल 2026 में शनिश्चरी अमावस्या दो बार पड़ रही है – 16 मई और 10 अक्टूबर 2026। इस दिन शनिदेव की पूजा और रुद्राभिषेक करने से कष्टों और बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

    अमावस्या का धार्मिक महत्व

    अमावस्या की रात चंद्रमा पूरी तरह गायब हो जाता है और इसे काली रात कहा जाता है। इस दिन किया गया दान, व्रत और पितरों के लिए तर्पण अत्यंत लाभकारी माना जाता है। कई बार अमावस्या तिथि दो दिन तक चलती है – पहला दिन स्नान-दान के लिए शुभ होता है और दूसरा दिन तर्पण, व्रत और पूजा-अर्चना के लिए।

    साल 2026 की सभी अमावस्या तिथियां:

    मौनी अमावस्या: 18 जनवरी 2026 अग्रहायण अमावस्या: 16 फरवरी 2026 फाल्गुन अमावस्या: 18 मार्च 2026 चैत्र अमावस्या: 16 अप्रैल 2026 वैशाख अमावस्या: 16 मई 2026 शनिश्चरी ज्येष्ठ अमावस्या: 15 जून 2026 सोमवती  आषाढ़ अमावस्या: 15 जुलाई 2026 श्रावण अमावस्या: 13 अगस्त 2026 भाद्रपद अमावस्या: 12 सितंबर 2026 आश्विन अमावस्या: 10 अक्टूबर 2026 शनिश्चरी
    कार्तिक अमावस्या: 9 नवंबर 2026 सोमवती मार्गशीर्ष अमावस्या: 8 दिसंबर 2026 पौष अमावस्या: 6 जनवरी 2027

    विशेष सलाह:

    अमावस्या पर व्रत रखने, पितरों का तर्पण करने और दान देने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। मौनी और सोमवती अमावस्या का धार्मिक महत्व अधिक माना जाता है।साल 2026 में अमावस्या के दिन धार्मिक अनुष्ठान और पूजा के माध्यम से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।