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  • शादी से लेकर गृह प्रवेश ,तक बिना मुहूर्त के, भी होते हैं शुभ कार्य जानिए अबूझ मुहूर्त के दिन

    शादी से लेकर गृह प्रवेश ,तक बिना मुहूर्त के, भी होते हैं शुभ कार्य जानिए अबूझ मुहूर्त के दिन


    नई दिल्ली । हिंदू परंपराओं में शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त का विशेष महत्व माना जाता है लेकिन कुछ ऐसे विशेष समय भी होते हैं जब किसी पंचांग या ज्योतिषीय गणना की आवश्यकता नहीं होती और इन समयों को अबूझ मुहूर्त कहा जाता है आम धारणा यह है कि यह योग केवल अक्षय तृतीया तक ही सीमित होता है लेकिन वास्तविकता यह है कि साल में कई ऐसे अवसर आते हैं जब बिना मुहूर्त देखे भी शुभ कार्य किए जा सकते हैं

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार साल में लगभग साढ़े तीन दिन ऐसे माने जाते हैं जिन्हें स्वयंसिद्ध या अबूझ मुहूर्त कहा जाता है इन दिनों में ग्रह नक्षत्रों की स्थिति इतनी अनुकूल होती है कि किसी भी शुभ कार्य की सफलता के लिए अलग से मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं होती

    इन विशेष अवसरों में चैत्र नवरात्रि का पहला दिन, अक्षय तृतीया, विजयादशमी और एक आधा अतिरिक्त शुभ योग शामिल होता है इन दिनों को अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है और धार्मिक दृष्टि से इन्हें अत्यधिक महत्व प्राप्त है

    इन अबूझ मुहूर्तों में विवाह जैसे बड़े मांगलिक कार्य विशेष रूप से किए जाते हैं क्योंकि माना जाता है कि इस समय किया गया विवाह स्थायी और सुखद होता है खासकर उन जोड़ों के लिए जिनकी कुंडली का मिलान कठिन होता है उनके लिए यह दिन वरदान के समान माने जाते हैं

    इसके अलावा गृह प्रवेश, नए मकान की नींव रखना, सोना चांदी, वाहन या जमीन की खरीदारी जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी इन दिनों में शुभ माने जाते हैं व्यवसाय शुरू करना भी इस समय अत्यंत लाभकारी माना जाता है क्योंकि यह समय सफलता और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है

    बच्चों से जुड़े संस्कार जैसे अन्नप्राशन, कर्णवेध, नामकरण, विद्यारंभ और मुंडन संस्कार भी इन शुभ दिनों में संपन्न किए जाते हैं धार्मिक मान्यता है कि इस समय किए गए सभी कार्यों का फल कई गुना बढ़कर मिलता है और उन्हें अक्षय पुण्य प्राप्त होता है

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार अबूझ मुहूर्त का अर्थ है ऐसा समय जो स्वयं में पूर्ण रूप से शुभ हो और जिसमें किसी विशेष गणना की आवश्यकता न हो इन दिनों को इतना शुभ माना जाता है कि कोई भी कार्य बिना बाधा के सफल होने की संभावना अधिक रहती है कुल मिलाकर यह मान्यता भारतीय संस्कृति और परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है जहां समय को केवल कैलेंडर नहीं बल्कि शुभ और अशुभ ऊर्जा के आधार पर भी देखा जाता है

  • हिंदू नववर्ष पर नीम-मिश्री खाने की परंपरा क्यों? जानिए वैज्ञानिक और ज्योतिषीय महत्व

    हिंदू नववर्ष पर नीम-मिश्री खाने की परंपरा क्यों? जानिए वैज्ञानिक और ज्योतिषीय महत्व


    नई दिल्ली। भारतीय परंपरा में गुड़ी पड़वा और उगादी के साथ हिंदू नववर्ष की शुरुआत बेहद खास मानी जाती है। इस बार 19 मार्च से नवसंवत्सर की शुरुआत हो रही है। इस दिन सुबह पूजा के बाद नीम की पत्तियां और मिश्री या गुड़ खाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है जिसका गहरा धार्मिक दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व है।

    नीम और मिश्री जीवन का संतुलन

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नववर्ष के पहले दिन नीम और मिश्री का सेवन जीवन के कड़वे और मीठे अनुभवों का प्रतीक है। नीम का कड़वा स्वाद जीवन की चुनौतियों संघर्ष और कठिनाइयों को दर्शाता है वहीं मिश्री की मिठास सुख सफलता और खुशियों का संकेत देती है। यह परंपरा सिखाती है कि जीवन में सुख दुख दोनों का संतुलन जरूरी है और हर परिस्थिति को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

    पौराणिक महत्व

    शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को सृष्टि की रचना की थी। इसी कारण इस दिन को नववर्ष और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान की पूजा अर्चना कर सुख समृद्धि की कामना की जाती है।

    आयुर्वेदिक दृष्टि से भी लाभकारी

    आयुर्वेद के अनुसार मौसम बदलने के समय यानी बसंत से गर्मी में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में नीम की पत्तियों में मौजूद एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल गुण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं। वहीं मिश्री शरीर को ऊर्जा देती है और नीम की कड़वाहट को संतुलित करती है।

    कैसे किया जाता है सेवन

    कई जगहों पर नीम की कोमल पत्तियों को मिश्री गुड़ इमली या कच्चे आम के साथ मिलाकर खाया जाता है। इसे नववर्ष की शुभ शुरुआत और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।

    इस वर्ष कौन होगा राजा और मंत्री?

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जिस दिन नववर्ष शुरू होता है उसी दिन का ग्रह उस वर्ष का राजा माना जाता है। इस बार नववर्ष गुरुवार को पड़ रहा है इसलिए गुरु ग्रह वर्ष के राजा होंगे जबकि मंगल ग्रह को मंत्री माना गया है।इसके अलावा इस वर्ष चंद्र देव सेनापति मेघाधिपति और फलधिपति रहेंगे। गुरु ग्रह नीरसाधिपति धनाधिपति और सस्याधिपति भी होंगे जबकि बुध धान्याधिपति और शनि रसाधिपति माने गए हैं। कुल मिलाकर हिंदू नववर्ष पर नीम मिश्री खाने की परंपरा केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि जीवन दर्शन और स्वास्थ्य से जुड़ा एक गहरा संदेश भी देती है।

  • चैत्र नवरात्रि 2026: जानिए 9 दिनों में किस दिन कौन सा रंग पहनना है शुभ, पूरी लिस्ट यहां देखें

    चैत्र नवरात्रि 2026: जानिए 9 दिनों में किस दिन कौन सा रंग पहनना है शुभ, पूरी लिस्ट यहां देखें


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में नवरात्रि का पर्व बेहद श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च गुरुवार से हो रही है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पावन पर्व में मां दुर्गा के नौ अलग अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। भक्त इन दिनों व्रत रखते हैं पूजा अर्चना करते हैं और मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न धार्मिक नियमों का पालन करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि के नौ दिनों में हर दिन एक विशेष रंग पहनने की परंपरा भी है। माना जाता है कि उस दिन से जुड़े शुभ रंग को पहनने से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    नवरात्रि का पहला दिन सफेद

    नवरात्रि के पहले दिन का रंग सफेद माना जाता है। यह पवित्रता शांति और नई शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है जो पर्वतराज हिमालय की पुत्री मानी जाती हैं।

    दूसरा दिन लाल

    नवरात्रि के दूसरे दिन लाल रंग पहनना शुभ माना जाता है। यह रंग प्रेम शक्ति और उत्साह का प्रतीक है। इस दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है जो तपस्या और भक्ति की देवी मानी जाती हैं।

    तीसरा दिन रॉयल ब्लू
    तीसरे दिन का रंग रॉयल ब्लू होता है। यह दिव्य ऊर्जा स्थिरता और आत्मविश्वास का प्रतीक माना जाता है। इस दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा की जाती है जिनका स्वरूप साहस और वीरता का प्रतीक है।

    चौथा दिन पीला

    नवरात्रि के चौथे दिन पीला रंग पहनना शुभ माना जाता है। यह उत्साह उल्लास और सकारात्मकता का प्रतीक है। इस दिन देवी कुष्मांडा की पूजा की जाती है जिन्हें ब्रह्मांड की सृष्टि करने वाली देवी माना जाता है।

    पाँचवाँ दिन हरा

    पाँचवें दिन का रंग हरा होता है जो उर्वरता विकास और समृद्धि का प्रतीक है। इस दिन देवी स्कंदमाता की पूजा की जाती है जो भगवान कार्तिकेय की माता हैं।

    छठवाँ दिन ग्रे

    छठे दिन स्लेटी यानी ग्रे रंग पहनना शुभ माना जाता है। यह संतुलन शक्ति और धैर्य का प्रतीक है। इस दिन देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है जिन्हें शक्ति और साहस की देवी माना जाता है।

    सातवाँ दिन नारंगी

    सातवें दिन का रंग नारंगी है जो ऊर्जा उत्साह और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। इस दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है जो दुर्गा का उग्र रूप मानी जाती हैं और बुराई का नाश करती हैं।

    आठवाँ दिन पीकॉक ग्रीन

    आठवें दिन का रंग पीकॉक ग्रीन यानी मोर हरा होता है। यह सुंदरता शालीनता और सकारात्मकता का प्रतीक है। इस दिन देवी महागौरी की पूजा की जाती है जिन्हें पवित्रता और शांति की देवी माना जाता है।

    नौवाँ दिन गुलाबी

    नवरात्रि के अंतिम दिन गुलाबी रंग पहनना शुभ माना जाता है। यह प्रेम करुणा और सद्भाव का प्रतीक है। इस दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है जो भक्तों को ज्ञान सिद्धि और सफलता का आशीर्वाद देती हैं। इस प्रकार नवरात्रि के नौ दिनों में निर्धारित रंग पहनकर मां दुर्गा की पूजा करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति सकारात्मक ऊर्जा और देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

  • पूजा सामग्री का पुनः उपयोग: शास्त्र क्या कहते हैं, जानें नियम और अपवाद

    पूजा सामग्री का पुनः उपयोग: शास्त्र क्या कहते हैं, जानें नियम और अपवाद


    नई दिल्ली । पूजा-पाठ के दौरान अक्सर घरों में यह सवाल उठता है कि क्या भगवान को अर्पित की गई सामग्री को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। कई लोग फूल माला अक्षत या जल को फिर से पूजा में उपयोग कर लेते हैं। लेकिन हिंदू शास्त्र इस विषय में स्पष्ट नियम बताते हैं। पूजा की शुद्धता और पवित्रता को बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और इसी वजह से पूजा सामग्री के पुनः उपयोग को लेकर कुछ दिशानिर्देश तय किए गए हैं।

    शास्त्रों में पूजा में अर्पित सामग्री को निर्माल्य कहा गया है। इसका अर्थ है वह सामग्री जो एक बार भगवान को अर्पित की जा चुकी हो। नियम के अनुसार जो फूल माला या अक्षत भगवान को अर्पित कर दिए जाते हैं वे उनके प्रसाद का हिस्सा बन जाते हैं। इन्हें दोबारा धोकर या साफ करके पूजा में इस्तेमाल करना अशुद्ध माना जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से पूजा का पूरा फल प्राप्त नहीं होता और भगवान को अर्पण का महत्व भी कम हो जाता है।

    जल और दीपक के संबंध में भी शास्त्र स्पष्ट हैं। पूजा में इस्तेमाल होने वाला जल हमेशा ताजा होना चाहिए। अगर कलश में रखा जल किसी कारण अशुद्ध स्पर्श में आ जाए तो उसे फिर से पूजा में उपयोग नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार तांबे या पीतल के बर्तनों को हर पूजा के बाद शुद्ध मिट्टी या नींबू से धोकर ही इस्तेमाल करना चाहिए। दीपक जलाते समय पुराने दीये की जली हुई बत्ती और बचा हुआ तेल हटा देना चाहिए। इससे पूजा की पवित्रता और नियमों का पालन सुनिश्चित होता है।

    हालांकि कुछ अपवाद भी हैं। गंगाजल को कभी बासी नहीं माना जाता इसलिए इसे बार-बार उपयोग किया जा सकता है। तुलसी के पत्तों को भी विशेष परिस्थितियों में धोकर दोबारा अर्पित किया जा सकता है। इसी तरह भगवान की मूर्ति शालिग्राम घंटी शंख मंत्र जाप की माला और पूजा के धातु के पात्रों को धोकर पुनः इस्तेमाल किया जा सकता है।

    कुछ सामग्री को दोबारा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि भगवान शिव को अर्पित बेलपत्र को भी बशर्ते खंडित या दागदार न हो दोबारा अर्पित किया जा सकता है। लेकिन फूल माला भोग चंदन कुमकुम धूप-दीप नारियल अक्षत या दीपक में बचा तेल दोबारा पूजा में नहीं इस्तेमाल करना चाहिए। पूजा सामग्री का सम्मान करना ही धार्मिक नियमों का पालन माना जाता है और इससे श्रद्धालु को आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    इस प्रकार पूजा सामग्री के पुनः उपयोग में शास्त्र के नियमों और अपवादों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। इससे पूजा की पवित्रता भगवान को अर्पण की श्रद्धा और धार्मिक परंपराओं की महत्ता बनी रहती है। श्रद्धालु इस नियम का पालन करके पूजा के दौरान आध्यात्मिक लाभ और मानसिक संतोष प्राप्त कर सकते हैं।

  • उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में फाग उत्सव:महिलाओं और युवतियों ने फूलों-गुलाल से खेली होली

    उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में फाग उत्सव:महिलाओं और युवतियों ने फूलों-गुलाल से खेली होली

    उज्जैन। उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में होली के दूसरे दिन फाग उत्सव बड़े भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं और युवतियों ने भजन-कीर्तन के बीच फूलों और गुलाल से होली खेली। भगवान श्रीकृष्ण-बलराम की शिक्षा स्थली पर श्रद्धालुओं ने नाचते-गाते हुए उत्सव का आनंद लिया।

    आश्रम परिसर में भजन-कीर्तन की मधुर धुनें गूंजती रहीं। “रंग मत डाले रे कान्हा”, “जुल्म कर डारयो सितम कर डारयो” और “आज ब्रज में होली रे रसिया” जैसे भजनों पर महिलाएं झूमती और नाचती नजर आईं। भक्ति संगीत के बीच पूरा आश्रम परिसर उत्सवमय हो गया और श्रद्धालु भगवान की भक्ति में सराबोर दिखाई दिए।

    उज्जैन को महाकाल की नगरी और भक्ति भाव की नगरी कहा जाता है। यहां अनेक प्राचीन मंदिर और धार्मिक परंपराएं हैं, जिनमें होली का पर्व भी विशेष तरीके से मनाया जाता है। सांदीपनि आश्रम में आयोजित यह फाग उत्सव इन्हीं प्राचीन परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    कीर्ति व्यास ने बताया कि होली का पर्व रंगपंचमी तक पांच दिनों तक मनाया जाता है। इसी परंपरा के तहत दूज के दिन भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के साथ फूलों और गुलाल से होली खेली जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि इस अवसर पर देश-विदेश से श्रद्धालु भी आश्रम पहुंचते हैं और भजन-कीर्तन के बीच फाग उत्सव का आनंद लेते हैं।

    कमला देवी व्यास ने आगे कहा कि सांदीपनि आश्रम में हर साल फाग उत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। श्रद्धालु भक्ति के रंग में रंगकर इस आयोजन में शामिल होते हैं। यह उत्सव प्रतिवर्ष बड़े आनंद और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

  • उज्जैन में चंद्र ग्रहण के कारण मंदिरों के पट बंद, श्रद्धालु करेंगे बाहर से पूजा; महाकाल मंदिर में रहेगी विशेष व्यवस्था!

    उज्जैन में चंद्र ग्रहण के कारण मंदिरों के पट बंद, श्रद्धालु करेंगे बाहर से पूजा; महाकाल मंदिर में रहेगी विशेष व्यवस्था!

     उज्जैनउज्जैन में मंगलवार को चंद्र ग्रहण के चलते शहर के कई प्रमुख मंदिरों के पट बंद कर दिए गए। सुबह 6:47 बजे शुरू हुए सूतक काल के दौरान महाकालेश्वर मंदिर के अलावा अन्य मंदिरों में दर्शन वर्जित रहे। सूतक शाम 6:47 बजे तक रहेगा, जिसके बाद मंदिरों में शुद्धिकरण और संध्या आरती के बाद दर्शन फिर से शुरू होंगे।

    महाकाल मंदिर के पट खुले रहने के बावजूद गर्भगृह में पुजारियों ने मंत्रोच्चार किया। श्रद्धालु मंदिर परिसर के बाहर से ही भगवान के दर्शन कर रहे थे। इस दौरान मंदिर में केवल मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठान चल रहे थे। शहर के अन्य प्रमुख मंदिर जैसे सांदीपनि आश्रम, मंगलनाथ मंदिर, अंगारेश्वर मंदिर और गोपाल मंदिर में सुबह 5 बजे तक नियमित पूजा हुई, उसके बाद सूतक लगते ही पट बंद कर दिए गए।

    सूतक के दौरान भक्तों ने मंदिर के बाहर ही भगवान के दर्शन किए। मंगलनाथ मंदिर में भी पट बंद रहने के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। अंगारेश्वर, गोपाल, चिंताहरण हनुमान और सिद्धेश्वर मंदिर सहित हजारों मंदिरों में दर्शन रोक दिए गए थे। मंदिर प्रशासन ने कहा कि शाम को सूतक समाप्त होने के बाद सभी मंदिरों की सफाई और शुद्धिकरण के बाद भगवान का स्नान, श्रृंगार और संध्या आरती की जाएगी।

    ज्योतिषाचारियों के अनुसार सूतक काल में पूजा, भोग और मूर्ति के स्पर्श वर्जित होते हैं। यही कारण है कि अधिकांश मंदिरों में यह व्यवस्था लागू की गई। हालांकि महाकाल मंदिर में भक्त दर्शन कर सकते हैं, लेकिन गर्भगृह में पुजारियों ने ही मंत्रोच्चार और अनुष्ठान जारी रखा।

    सूतक से पहले होली का उत्सव भी मंदिरों में पारंपरिक रूप से मनाया गया। भक्तों ने भगवान श्रीकृष्ण के साथ हर्बल गुलाल और फूलों से होली खेली। इसके बाद विधि-विधान से मंदिरों के पट बंद कर दिए गए और दर्शन वर्जित कर दिए गए।

    मंदिर प्रशासन ने भक्तों से अपील की कि वे सूतक के दौरान मंदिर परिसर में प्रवेश न करें और बाहर से ही पूजा करें। संध्या में पट खुलने के बाद सभी मंदिरों में धार्मिक गतिविधियां सामान्य रूप से शुरू हो जाएंगी।

    इस तरह, चंद्र ग्रहण के दौरान उज्जैन के मंदिरों में श्रद्धालुओं की सुरक्षा और धार्मिक परंपरा दोनों का ध्यान रखा गया। भक्तों ने मंदिरों के बाहर भी पूजा कर अपनी आस्था व्यक्त की। सूतक समाप्ति के बाद मंदिरों में संपूर्ण शुद्धिकरण और भव्य संध्या आरती के साथ दर्शन शुरू होंगे, जिससे शहर में धार्मिक माहौल पूरी तरह लौट आएगा।

  • उज्जैन में पंच-परमेश्वर का भव्य नगर प्रवेश: संतों ने 200 साल पुरानी परंपरा के तहत होली उत्सव की तैयारियां शुरू कीं

    उज्जैन में पंच-परमेश्वर का भव्य नगर प्रवेश: संतों ने 200 साल पुरानी परंपरा के तहत होली उत्सव की तैयारियां शुरू कीं



    नई दिल्ली। उज्जैन की पवित्र नगरी में होली के अवसर पर शुक्रवार को श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा में पंच-परमेश्वर का भव्य नगर प्रवेश हुआ। करीब 10 साल बाद आयोजित इस पेशवाई में देशभर से आए संतों का ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के बीच जोरदार स्वागत किया गया। यह आयोजन 200 वर्षों से निरंतर निभाई जा रही परंपरा का हिस्सा है और इसे वर्ष 2028 में होने वाले सिंहस्थ मेले की तैयारियों से जोड़ा गया है।

    देशभर के प्रमुख अखाड़ों के पंच-परमेश्वर संतों के रूप में उज्जैन पहुंचे। भ्रमणशील मंडल के महंत दुर्गादास, महंत अद्वैतानंद, महंत राम नौमी दास, सचिव हंस मुनि, महंत कोठारी सत्यानंद, मुकामी राम मुनि और मुकामी देवी दास सहित निर्वाण संतों ने अखाड़े में प्रवेश किया। महंत सत्यानंद ने बताया कि आने वाले दिनों में और अधिक संत उज्जैन पहुंचेंगे, जो शहर और मेले की व्यवस्थाओं की जानकारी लेंगे।

    नगर प्रवेश के दौरान संतों ने सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार और देशभर में सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण का संदेश दिया। पेशवाई में शामिल साधु-संत और महंत पारंपरिक पोशाक और धार्मिक वाद्ययंत्रों के साथ नगर में यात्रा करते हुए दर्शकों का मन मोहते नजर आए। शहरवासियों ने अपने उत्साह और श्रद्धा के साथ संतों का स्वागत किया।

    उज्जैन में 4 मार्च को पंच-परमेश्वर और अन्य साधु-संतों के लिए होली उत्सव का आयोजन किया जाएगा। यह आयोजन सुबह 9 बजे से दोपहर 1 बजे तक चलेगा, जिसमें सभी संत पारंपरिक ढंग से हर्बल गुलाल और फूलों से होली खेलेंगे। इस दौरान भक्तजन भी मंदिर परिसर में उपस्थित रहकर होली का आनंद लेंगे।

    पंच-परमेश्वर परंपरा के अनुसार, अखाड़ों के सदस्य उन स्थलों का दौरा करते हैं, जहां कुंभ मेला आयोजित होने वाला होता है। उज्जैन में 2028 में सिंहस्थ मेला आयोजित होने के मद्देनजर संत आठ दिन तक यहां रहेंगे और साधु-संतों के लिए की जाने वाली व्यवस्थाओं का जायजा लेंगे। उज्जैन का कार्य पूर्ण होने के बाद वे नासिक रवाना होंगे, जहां भी कुंभ मेला आयोजित होगा।

    इस भव्य नगर प्रवेश से उज्जैन की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को और मजबूती मिली है। शहरवासियों में संतों के आगमन और होली उत्सव को लेकर उत्साह साफ देखा जा सकता है। पंच-परमेश्वर का यह नगर प्रवेश ना सिर्फ धार्मिक उत्सव है, बल्कि आने वाले सिंहस्थ मेले के सफल आयोजन की रूपरेखा तैयार करने का भी अवसर है।

    उज्जैन में पंच-परमेश्वर का भव्य स्वागत और होली उत्सव इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति और धार्मिक परंपराएं आज भी देशभर में जीवित हैं। संतों के मार्गदर्शन में आगामी मेले की तैयारियों से श्रद्धालु और नगरवासी समान रूप से लाभान्वित होंगे।

  • मकर संक्रांति  2026: मकर संक्रांति के दिन इन रंगों के कपड़े पहनना होता है शुभ यहां जानें कैसे

    मकर संक्रांति 2026: मकर संक्रांति के दिन इन रंगों के कपड़े पहनना होता है शुभ यहां जानें कैसे


    नई दिल्ली । मकर संक्रांति एक ऐसा त्योहार है जो न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में विशेष श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक है और इसका महत्व बहुत गहरा है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य की गति और उनके मकर राशि में प्रवेश के साथ नई ऊर्जा का संचार होता है और पुराने को छोड़कर नए का स्वागत किया जाता है। इस दिन का आध्यात्मिक और भौतिक रूप से बड़ा महत्व है और यह जीवन में शुभ परिवर्तन और समृद्धि का संकेत माना जाता है।इसके साथ ही मकर संक्रांति के दिन एक और परंपरा है जो विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है और वह है इस दिन विशेष रंगों के कपड़े पहनने की मान्यता। माना जाता है कि सूर्य देव से जुड़े उज्ज्वल और ऊर्जावान रंग पहनने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और व्यक्ति का भाग्य और सौभाग्य में वृद्धि होती है। आइए जानते हैं कि इस दिन कौन से रंग शुभ माने जाते हैं और क्यों।

    पीला रंग सूर्य देव का प्रिय रंग

    मकर संक्रांति के दिन पीला रंग पहनने की परंपरा है। पीला रंग सूर्य देव का प्रिय रंग माना जाता है और यह ज्ञान समृद्धि और सकारात्मकता का प्रतीक है। इस दिन पीला रंग पहनने से घर में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। पीला रंग ऊर्जा और उत्साह को बढ़ावा देता है और इसे शुभ और सौभाग्यवर्धक माना जाता है। इसलिए मकर संक्रांति के दिन पीला रंग पहनकर हम सूर्य देव को सम्मान देते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करते हैं।

    नारंगी केसरिया रंग ऊर्जा और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक

    नारंगी रंग जिसे केसरिया रंग भी कहा जाता है इस दिन एक और शुभ रंग है। नारंगी रंग ऊर्जा उत्साह और आध्यात्मिक शक्ति का संकेत देता है। यह रंग हमें जीवन में नयापन शक्ति और आत्मविश्वास का अहसास कराता है। मकर संक्रांति के दिन नारंगी रंग पहनने से न केवल हमारे भीतर ऊर्जा का संचार होता है बल्कि यह हमें मानसिक शांति और स्थिरता भी प्रदान करता है। इसके अलावा नारंगी रंग सूर्य के ऊर्जा से जुड़ा होता है और यही कारण है कि यह इस दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

    लाल रंग शक्ति और साहस का प्रतीक

    लाल रंग जो शक्ति और साहस का प्रतीक माना जाता है मकर संक्रांति पर पहनने के लिए एक और शुभ रंग है। यह रंग जीवन में उत्साह और नकारात्मकता से लड़ने की शक्ति को बढ़ाता है। लाल रंग पहनने से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है और यह उसे किसी भी विपरीत परिस्थिति से निपटने के लिए मानसिक और शारीरिक ताकत देता है। मकर संक्रांति के दिन लाल रंग पहनकर हम अपनी आंतरिक शक्ति को जागृत कर सकते हैं और जीवन में सफलता की ओर बढ़ सकते हैं।

    सुनहरा रंग वैभव और सफलता का प्रतीक

    सुनहरा रंग जो सूर्य देव के साथ जुड़ा हुआ है वैभव सफलता और तेज का प्रतीक है। मकर संक्रांति के दिन सुनहरा रंग पहनना शुभ माना जाता है क्योंकि यह न केवल सूर्य के उज्ज्वल प्रकाश से जुड़ा है बल्कि यह व्यक्ति को समृद्धि और सफलता की दिशा में प्रेरित करता है। सुनहरा रंग पहनने से व्यक्ति के जीवन में खुशहाली और सफलता आती है। इसके अलावा यह रंग किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत के लिए आदर्श माना जाता है।

    किन रंगों से बचें

    जहां मकर संक्रांति पर कुछ रंगों को पहनना शुभ माना जाता है वहीं कुछ रंगों से बचने की भी सलाह दी जाती है। काला और गहरा नीला रंग इस दिन पहनने से परहेज किया जाता है क्योंकि इन्हें नकारात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है। इन रंगों का पहनना व्यक्ति की ऊर्जा को कमजोर कर सकता है और यह शुभता में कमी ला सकता है। इसलिए इस दिन काले और गहरे नीले रंग के कपड़े पहनने से बचना चाहिए।

    मकर संक्रांति के दिन की अन्य परंपराएं

    मकर संक्रांति का त्योहार सिर्फ रंगों से जुड़ा नहीं है बल्कि इस दिन के साथ कई धार्मिक और सामाजिक परंपराएं जुड़ी हुई हैं। इस दिन सूर्य देव को अर्घ्य देकर दान-पुण्य और स्नान करने से सुख-समृद्धि स्वास्थ्य और सफलता की प्राप्ति होती है। मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ के लड्डू भी बांटे जाते हैं जो एकता और मित्रता का प्रतीक होते हैं।मकर संक्रांति एक ऐसा पर्व है जो सूर्य देव के प्रति आस्था और विश्वास का प्रतीक है। इस दिन विशेष रंगों के कपड़े पहनकर हम अपनी जीवन शक्ति को सकारात्मक दिशा में मोड़ सकते हैं और सूर्य देव की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। पीला नारंगी लाल और सुनहरा रंग पहनने से न केवल शुभता और समृद्धि मिलती है बल्कि यह ऊर्जा और उत्साह से भी भर देता है। तो इस मकर संक्रांति इन रंगों के कपड़े पहनें और सूर्य देव से शुभ आशीर्वाद प्राप्त करें!