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  • मानेसर में मारुति सुजुकी ने शुरू किया ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट, कम कार्बन उत्सर्जन वाले विनिर्माण को मिलेगा बढ़ावा

    मानेसर में मारुति सुजुकी ने शुरू किया ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट, कम कार्बन उत्सर्जन वाले विनिर्माण को मिलेगा बढ़ावा


    नई दिल्ली ।
    मारुति सुजुकी इंडिया ने हरियाणा के मानेसर स्थित अपने विनिर्माण संयंत्र में 300 किलोवाट क्षमता वाले ग्रीन हाइड्रोजन इलेक्ट्रोलाइजर प्लांट का संचालन शुरू कर दिया है। इस परियोजना को स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल और उत्पादन प्रक्रिया से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के तौर पर देखा जा रहा है।

    यह परियोजना पायलट आधार पर संचालित की जाएगी। इसके तहत नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल करके ग्रीन हाइड्रोजन तैयार की जाएगी। तैयार हाइड्रोजन को प्राकृतिक गैस के साथ मिलाकर विनिर्माण गतिविधियों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। इससे उत्पादन प्रक्रिया में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।

    परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू मानेसर संयंत्र में पहले से स्थापित सौर ऊर्जा प्रणाली का बेहतर उपयोग करना है। छुट्टियों या कम उत्पादन वाले दिनों में जब संयंत्र में उपलब्ध सौर ऊर्जा का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाता, तब अतिरिक्त बिजली का उपयोग हाइड्रोजन उत्पादन के लिए किया जाएगा।

    इसके लिए अतिरिक्त सौर ऊर्जा से इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया के जरिए ग्रीन हाइड्रोजन तैयार की जाएगी। उत्पादन के बाद हाइड्रोजन को संग्रहित किया जाएगा और आवश्यकता के अनुसार विनिर्माण कार्यों में इसका उपयोग किया जाएगा। इस व्यवस्था से अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा को उपयोगी ईंधन में बदलने की दिशा में काम किया जाएगा।

    इस परियोजना को भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन तकनीक के व्यापक इस्तेमाल के लिए एक लर्निंग प्लेटफॉर्म के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। इससे हरियाणा और गुजरात में स्थित अन्य विनिर्माण इकाइयों में इस तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाओं को समझने और आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

    यह पहल केंद्र सरकार के राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के अनुरूप है। इसके साथ ही यह उत्पादन गतिविधियों में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल बढ़ाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

    कंपनी के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हिसाशी ताकेउची ने कहा कि कंपनी ने अपने उत्पादों के साथ-साथ विनिर्माण प्रक्रियाओं के लिए भी मल्टी-पाथवे रणनीति अपनाई है। उनके अनुसार, ग्रीन हाइड्रोजन परियोजना के अलावा सौर ऊर्जा, बायोगैस और बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में भी निवेश किया जा रहा है।

    उन्होंने कहा कि भारत तेजी से वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभर रहा है। ऐसे में भविष्य में प्रतिस्पर्धात्मकता का निर्धारण केवल लागत और गुणवत्ता से नहीं होगा, बल्कि कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

    कंपनी के अनुसार, वह कम-कार्बन और ऊर्जा दक्ष विनिर्माण के लिए आवश्यक क्षमताएं अभी से विकसित कर रही है। इसके तहत विनिर्माण परिचालनों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कमी लाने का लक्ष्य तय किया गया है।

    वित्त वर्ष 2030-31 तक विनिर्माण परिचालनों से होने वाले उत्सर्जन को मौजूदा 6.15 लाख टन से घटाकर 2.66 लाख टन तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। ग्रीन हाइड्रोजन परियोजना इसी दिशा में उठाए गए कदमों में शामिल है।

  • बिजली संकट से जूझता एमपी अब सरप्लस राज्य, 32 हजार मेगावॉट क्षमता के बीच ग्रीन एनर्जी पर बड़ा जोर

    बिजली संकट से जूझता एमपी अब सरप्लस राज्य, 32 हजार मेगावॉट क्षमता के बीच ग्रीन एनर्जी पर बड़ा जोर

    मध्यप्रदेश: अब बिजली के मामले में सरप्लस राज्य बन चुका है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रदेश में बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी लगातार नए आयाम स्थापित किए जा रहे हैं। सरकार का लक्ष्य प्रदेशवासियों को सस्ती दरों पर पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराना है।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 22 सितंबर को भोपाल में आयोजित नवीकरणीय ऊर्जा एवं ऊर्जा भंडारण की किफायती विद्युत खरीद विषयक कार्यशाला का शुभारंभ किया। कार्यक्रम में उन्होंने दीप प्रज्ज्वलित किया और एसोसिएशन की पुस्तक का विमोचन भी किया।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि मौजूदा समय में बिजली हर क्षेत्र की अनिवार्य जरूरत बन चुकी है। राज्य सरकार बढ़ती खपत को ध्यान में रखते हुए बिजली उत्पादन, वितरण और संधारण की क्षमता पर लगातार काम कर रही है। नई तकनीक के साथ बिजली उत्पादन की नई इकाइयां भी शुरू की गई हैं।

    उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश ने बिजली संकट और लंबे समय तक पावर कट का दौर देखा है, लेकिन अब स्थिति काफी बदल गई है। प्रदेश नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन में लगातार अपनी क्षमता बढ़ा रहा है और अपने ही पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    मुख्यमंत्री के अनुसार, मध्यप्रदेश की बिजली उत्पादन क्षमता राज्य गठन से लेकर वर्ष 2002-03 तक लगभग 5 हजार मेगावॉट थी। वर्तमान में यह क्षमता बढ़कर करीब 32 हजार मेगावॉट हो चुकी है। इसमें लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी ग्रीन एनर्जी की है।

    नीमच-मंदसौर क्षेत्र में 2 हजार मेगावॉट क्षमता की परियोजना का भी उल्लेख किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि इतनी बड़ी परियोजनाओं को सामान्य तौर पर पूरा होने में चार से छह वर्ष तक लग सकते हैं, लेकिन मध्यप्रदेश में इसे करीब दो से ढाई वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

    प्रदेश में पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के साथ सौर, पवन और पंप स्टोरेज के माध्यम से बिजली उत्पादन पर भी जोर दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि अब पानी से ही नहीं, बल्कि पानी के ऊपर भी बिजली उत्पादन की दिशा में काम हो रहा है।

    ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के मुरैना में स्थापित सोलर इलेक्ट्रिसिटी स्टोरेज परियोजना से करीब 2.70 रुपये प्रति यूनिट की दर पर बिजली उपलब्ध होने की बात कही गई। सरकार का कहना है कि ऊर्जा क्षेत्र की योजनाओं को तेज गति से लागू करने के कारण उत्पादन क्षमता में लगातार वृद्धि हुई है।

    मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रदेश में लगभग 42 लाख स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश चौबीसों घंटे अक्षय ऊर्जा उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। बिजली कंपनियों को अपनी क्षमता बढ़ाने के साथ घाटा कम करने पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

    कार्यशाला में ऊर्जा भंडारण और किफायती विद्युत खरीद से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई कि कार्यशाला में होने वाला मंथन बिजली कंपनियों की कार्यप्रणाली और भविष्य की ऊर्जा योजनाओं के लिए उपयोगी साबित होगा।

    ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने वर्चुअल संबोधन में कहा कि कार्यशाला से विद्युत वितरण कंपनियों को अधिक सक्षम और मजबूत बनाने के लिए उपयोगी निष्कर्ष सामने आएंगे। सरकार का जोर बिजली की बढ़ती जरूरत के साथ उत्पादन और वितरण व्यवस्था को मजबूत करने पर है।

  • भारत की बिजली मांग एक दशक में दोगुनी, पीक डिमांड 270.8 गीगावाट पहुंची; स्थापित क्षमता बढ़कर 552 गीगावाट हुई

    भारत की बिजली मांग एक दशक में दोगुनी, पीक डिमांड 270.8 गीगावाट पहुंची; स्थापित क्षमता बढ़कर 552 गीगावाट हुई

    नई दिल्ली । भारत के बिजली क्षेत्र में पिछले एक दशक के दौरान तेजी से विस्तार हुआ है। बढ़ती आर्थिक गतिविधियों, औद्योगिक विस्तार, शहरीकरण और घरेलू स्तर पर बिजली की बढ़ती खपत के बीच देश की अधिकतम बिजली मांग करीब दोगुनी हो गई है। सरकार के अनुसार, इस बढ़ती जरूरत को पूरा करने के लिए बिजली उत्पादन क्षमता के साथ-साथ ट्रांसमिशन नेटवर्क और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी बड़े स्तर पर विस्तार किया गया है।

    वर्ष 2013-14 में भारत की अधिकतम बिजली मांग 135.9 गीगावाट थी। यह मांग 21 मई 2026 को बढ़कर 270.8 गीगावाट के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। सरकार के मुताबिक, बिजली मांग में यह वृद्धि देश में बढ़ती आर्थिक गतिविधियों, शहरीकरण, उद्योगों के विस्तार और घरों में बिजली के लगातार बढ़ते उपयोग से जुड़ी है।

    बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए देश की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। मार्च 2014 में भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 249 गीगावाट थी। जुलाई 2026 तक यह बढ़कर 552 गीगावाट हो गई। इस दौरान जोड़ी गई क्षमता ने मौजूदा बिजली जरूरतों को पूरा करने के साथ भविष्य की मांग के लिए बिजली व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दिया है।

    उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ बिजली के पारेषण ढांचे का भी विस्तार किया गया। अप्रैल 2014 में देश के ट्रांसमिशन नेटवर्क की लंबाई 2,91,336 सर्किट किलोमीटर थी। जुलाई 2026 तक यह बढ़कर 5,10,594 सर्किट किलोमीटर हो गई। नेटवर्क के विस्तार से राष्ट्रीय ग्रिड को अधिक एकीकृत बनाने और अलग-अलग क्षेत्रों के बीच बिजली के प्रवाह को सुगम करने में मदद मिली है। इससे बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता बढ़ाने में भी योगदान मिला है।

    भारत ने पारंपरिक बिजली ढांचे के विस्तार के साथ स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया है। अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी की रिन्यूएबल एनर्जी स्टैटिस्टिक्स 2026 रिपोर्ट के अनुसार, स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में भारत चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है।

    31 मार्च 2026 तक भारत की कुल गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित बिजली क्षमता 283.46 गीगावाट थी। इसमें 274.68 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा और 8.78 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता शामिल थी। वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने 55.3 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता जोड़ी। यह अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक इजाफा बताया गया है और पिछले वित्त वर्ष की तुलना में लगभग दोगुना है।

    ऊर्जा क्षेत्र में भारत ने जलवायु लक्ष्यों के संदर्भ में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। जून 2025 में देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इस तरह भारत ने पेरिस समझौते के तहत वर्ष 2030 के लिए निर्धारित इस लक्ष्य को तय समय सीमा से पांच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया।

  • भारत ने सौर ऊर्जा विस्तार में अमेरिका को छोड़ा पीछे, दुनिया का दूसरा सबसे तेज़ी से बढ़ता बाजार बना

    भारत ने सौर ऊर्जा विस्तार में अमेरिका को छोड़ा पीछे, दुनिया का दूसरा सबसे तेज़ी से बढ़ता बाजार बना

    नई दिल्ली ।भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए वैश्विक सौर ऊर्जा बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। वर्ष 2025 के दौरान रिकॉर्ड स्तर पर नई सौर क्षमता स्थापित करने के बाद भारत अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का दूसरा सबसे तेजी से बढ़ने वाला सोलर एनर्जी मार्केट बन गया है। यह उपलब्धि देश की ऊर्जा सुरक्षा, हरित विकास और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 में देश की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता केवल 3 गीगावाट थी, जो 30 जून 2026 तक बढ़कर 162.15 गीगावाट पहुंच गई है। पिछले एक दशक में हुई यह तेज वृद्धि दर्शाती है कि भारत ने सौर ऊर्जा क्षेत्र में योजनाबद्ध निवेश, नीतिगत सुधार और तकनीकी विस्तार के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2025 में अकेले 37 गीगावाट नई क्षमता जोड़ने के कारण भारत ने वार्षिक क्षमता वृद्धि के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया।

    सौर ऊर्जा क्षेत्र की इस सफलता के पीछे बिजली उत्पादन की लागत में आई बड़ी कमी भी अहम कारण रही है। प्रतिस्पर्धी ई-रिवर्स ऑक्शन प्रणाली लागू होने के बाद डेवलपर्स के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जिससे सौर बिजली की दरों में लगातार गिरावट दर्ज की गई। वर्ष 2010 में जहां सौर बिजली की कीमत लगभग 18 रुपये प्रति यूनिट थी, वहीं समय के साथ यह घटकर 2.44 रुपये प्रति यूनिट के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गई। इससे उद्योगों, राज्यों और उपभोक्ताओं के लिए सौर ऊर्जा अधिक किफायती विकल्प बन गई।

    कम लागत का लाभ वैश्विक स्तर पर भी दिखाई दिया है। वर्ष 2025 में भारत में यूटिलिटी स्तर के सोलर फोटोवोल्टिक संयंत्रों से बिजली उत्पादन की लेवलाइज्ड कॉस्ट ऑफ इलेक्ट्रिसिटी 35 डॉलर प्रति मेगावाट रही, जबकि वैश्विक औसत 44 डॉलर प्रति मेगावाट था। इससे भारत दुनिया के सबसे कम लागत वाले सौर ऊर्जा बाजारों में अपनी मजबूत पहचान बनाने में सफल रहा है।

    हाल ही में मंजूर की गई प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना से भी सौर ऊर्जा क्षेत्र को नई गति मिलने की उम्मीद है। इस योजना के तहत ऊर्जा भंडारण प्रणाली के साथ 5,000 मेगावाट क्षमता वाले फ्लोटिंग सोलर फोटोवोल्टिक प्रोजेक्ट विकसित किए जाएंगे। इसके साथ कम से कम 10,000 मेगावाट घंटे की ऊर्जा भंडारण क्षमता तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे बिजली की अधिक मांग के समय राज्यों को बेहतर सहायता मिल सकेगी। जलाशयों और औद्योगिक तालाबों का उपयोग होने से भूमि पर अतिरिक्त दबाव भी कम होगा और बिजली ग्रिड की विश्वसनीयता में सुधार आएगा।

    देश में बड़े सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापित क्षमता 118.79 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। राजस्थान का भादला सोलर पार्क, कर्नाटक का पावगाडा सोलर पार्क और मध्य प्रदेश का रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर पार्क देश की प्रमुख परियोजनाओं में शामिल हैं। इसके अतिरिक्त रूफटॉप सोलर सिस्टम से 27.88 गीगावाट क्षमता प्राप्त हो रही है, जबकि हाइब्रिड और ऑफ-ग्रिड परियोजनाएं भी ऊर्जा आपूर्ति को मजबूत बना रही हैं।

    भारत की कुल गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता अब 283.46 गीगावाट तक पहुंच चुकी है, जिसमें 274.68 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त हो रही है। देश ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता विकसित करने और वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। सौर ऊर्जा क्षेत्र में लगातार हो रही प्रगति इन राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में भारत की बढ़ती क्षमता, तकनीकी दक्षता और वैश्विक नेतृत्व की मजबूत तस्वीर प्रस्तुत करती है।

  • 16,086 मेगावाट क्षमता और रिकॉर्ड बिजली उत्पादन के साथ पवन ऊर्जा में गुजरात सबसे आगे, केंद्र ने जारी किए आंकड़े

    16,086 मेगावाट क्षमता और रिकॉर्ड बिजली उत्पादन के साथ पवन ऊर्जा में गुजरात सबसे आगे, केंद्र ने जारी किए आंकड़े

    नई दिल्ली। देश में नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में गुजरात ने एक नई उपलब्धि हासिल की है। केंद्र सरकार के अनुसार राज्य ने पवन ऊर्जा के क्षेत्र में स्थापित क्षमता और बिजली उत्पादन, दोनों मामलों में देशभर में पहला स्थान प्राप्त किया है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 30 जून 2026 तक गुजरात में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता 16,086 मेगावाट तक पहुंच गई है, जो देश के सभी राज्यों में सबसे अधिक है। इस उपलब्धि ने गुजरात को स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी राज्य के रूप में और अधिक मजबूत पहचान दिलाई है।

    सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान गुजरात ने पवन ऊर्जा से 33,706 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया। यह देश के कुल पवन ऊर्जा उत्पादन का लगभग एक तिहाई हिस्सा है। भारत की कुल पवन ऊर्जा स्थापित क्षमता इसी अवधि में 57,443 मेगावाट तक पहुंच चुकी है, जबकि पूरे देश में पवन ऊर्जा से 106 अरब यूनिट बिजली का उत्पादन दर्ज किया गया। इसमें गुजरात का योगदान सबसे अधिक रहा, जिससे राज्य की ऊर्जा क्षमता और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उसकी मजबूत स्थिति स्पष्ट होती है।

    केंद्र सरकार का कहना है कि वर्ष 2030 तक देश की कुल बिजली आवश्यकता का 50 प्रतिशत हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसी दिशा में गुजरात ने पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और रूफटॉप सोलर परियोजनाओं के विस्तार के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रगति की है। राज्य में विकसित बुनियादी ढांचा, निवेशकों के लिए अनुकूल वातावरण और प्रभावी नीतियों के कारण स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं का तेजी से विस्तार हुआ है।

    सरकार ने बताया कि नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की गई हैं। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर योजना के तहत नई ट्रांसमिशन लाइनें और सबस्टेशन विकसित किए गए हैं, जिससे स्वच्छ ऊर्जा को बिजली ग्रिड तक पहुंचाने की क्षमता में वृद्धि हुई है। इसके अलावा इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम शुल्क में दी गई राहत से निजी निवेश को बढ़ावा मिला है और नई परियोजनाओं की लागत कम करने में मदद मिली है।

    पवन ऊर्जा क्षेत्र को और मजबूत बनाने के लिए ‘नेशनल रिपावरिंग एंड लाइफ एक्सटेंशन पॉलिसी फॉर विंड पावर प्रोजेक्ट्स-2023’ लागू की गई है। इसके साथ ही ऑफशोर विंड एनर्जी लीज रूल्स-2023 और ऑफशोर पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग जैसी योजनाओं ने समुद्री क्षेत्रों में पवन ऊर्जा विकास के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। इन पहलों का लाभ गुजरात सहित कई राज्यों को मिल रहा है, हालांकि इस क्षेत्र में सबसे तेज प्रगति गुजरात ने दर्ज की है।

    केंद्र सरकार के अनुसार गुजरात ने देश में सबसे पहले पवन ऊर्जा नीति लागू करने वाले राज्यों में शामिल होकर इस क्षेत्र के विकास की मजबूत नींव रखी थी। समय के साथ राज्य ने आधुनिक तकनीक, बेहतर ग्रिड प्रबंधन और निवेश समर्थक नीतियों के माध्यम से अपनी क्षमता में लगातार विस्तार किया। परिणामस्वरूप राज्य में पवन ऊर्जा उत्पादन लगातार बढ़ा है और ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिली है।

    सरकार का मानना है कि गुजरात का यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणादायक साबित हो सकता है। स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने, कार्बन उत्सर्जन कम करने और टिकाऊ विकास को गति देने की दिशा में राज्य की यह उपलब्धि देश के ऊर्जा परिवर्तन अभियान को नई मजबूती प्रदान करेगी। आने वाले वर्षों में पवन और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विस्तार से भारत के हरित ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने में भी महत्वपूर्ण सहायता मिलने की उम्मीद जताई गई है।

  • अदाणी पावर और एईएसएल में निवेश के लिए बुलिश संकेत, क्षमता विस्तार और मजबूत पीपीए की वजह

    अदाणी पावर और एईएसएल में निवेश के लिए बुलिश संकेत, क्षमता विस्तार और मजबूत पीपीए की वजह

    अहमदाबाद । ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने अदाणी ग्रुप की तीन प्रमुख कंपनियों – अदाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड, अदाणी पावर लिमिटेड और अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड – पर बुलिश रुख अपनाया है। जेफरीज का कहना है कि इन कंपनियों में क्षमता में तेज विस्तार, मजबूत क्रियान्वयन और बढ़ती मांग की वजह से निवेश के लिए आकर्षक अवसर मौजूद हैं।

    अदाणी ग्रीन एनर्जी को जेफरीज ने “बाय” रेटिंग के साथ 1,435 रुपये का टारगेट प्राइस दिया है। ब्रोकरेज फर्म के अनुसार कंपनी वित्त वर्ष 2026 में 19.3 गीगावाट रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता से वित्त वर्ष 2030 तक 50 गीगावाट तक पहुंचने का लक्ष्य रखती है। इसमें 5 गीगावाट की पंप स्टोरेज परियोजना और बैटरी स्टोरेज सिस्टम में 10 गीगावाट से अधिक की वृद्धि शामिल है। गुजरात के खावड़ा में 30 गीगावाट रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता का निर्माण चल रहा है, जो ग्रोथ का प्रमुख ड्राइवर है।

    अदाणी पावर पर जेफरीज ने अपनी “बाय” रेटिंग बनाए रखते हुए 255 रुपये का टारगेट प्राइस निर्धारित किया है। कंपनी वित्त वर्ष 2032 तक अपनी क्षमता 42 गीगावॉट तक बढ़ाने की योजना रखती है। इसके अलावा दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौतों (PPA) की मजबूत पाइपलाइन से आय में सुधार की संभावना है। वर्तमान में आगामी क्षमता का लगभग 56 प्रतिशत पीपीए पहले से ही सुनिश्चित किया जा चुका है।

    अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड (एईएसएल) के लिए जेफरीज ने 1,665 रुपये के टारगेट प्राइस के साथ “बाय” रेटिंग बरकरार रखी है। एईएसएल भारत की एकमात्र सूचीबद्ध प्योर प्ले ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी है। कंपनी वर्तमान में 718 अरब रुपये के ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स क्रियान्वित कर रही है और स्मार्ट मीटरिंग व्यवसाय तेजी से बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2026 तक 11 मिलियन से अधिक मीटर स्थापित किए जा चुके हैं।

    जेफरीज का अनुमान है कि मध्यम अवधि में एबिटा और कर के बाद मुनाफे में मजबूत दोहरे अंकों की वृद्धि होगी। यह क्रियान्वयन की गति, डेटा सेंटर, वाणिज्यिक और औद्योगिक ऊर्जा समाधानों में बढ़ते अवसरों और स्मार्ट मीटरिंग के व्यापक विस्तार से प्रेरित होगी।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अदाणी ग्रुप की ये कंपनियां भारत में बढ़ती ऊर्जा मांग और ट्रांसमिशन इन्फ्रास्ट्रक्चर में तेजी से बढ़ते निवेश का लाभ उठा रही हैं। निवेशकों के लिए यह संकेत है कि ग्रुप की लंबी अवधि की रणनीति और क्षमता विस्तार योजनाएं उनके पोर्टफोलियो के लिए आकर्षक साबित हो सकती हैं।

  • पीएम सूर्य घर योजना को मिली रफ्तार: देश में 25 लाख से ज्यादा रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित

    पीएम सूर्य घर योजना को मिली रफ्तार: देश में 25 लाख से ज्यादा रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित

    नई दिल्ली । देश में स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना तेजी से आगे बढ़ रही है। सरकार ने मंगलवार को संसद में जानकारी देते हुए बताया कि इस योजना के तहत 5 मार्च 2026 तक देशभर में 25 लाख से अधिक घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाए जा चुके हैं। इस तरह यह योजना देश में सौर ऊर्जा के विस्तार और हरित ऊर्जा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बनती जा रही है।

    राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय ऊर्जा और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपद येसो नाइक ने बताया कि राष्ट्रीय पोर्टल पर अब तक 63,26,125 आवेदन प्राप्त हुए हैं। इनमें से 25,02,217 घरों में सफलतापूर्वक रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित किए जा चुके हैं। इससे साफ है कि लोग इस योजना के प्रति तेजी से रुचि दिखा रहे हैं और अपने घरों में सौर ऊर्जा अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं।

    सरकार के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में इस योजना के तहत अब तक 14,585.29 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। वहीं वित्त वर्ष 2024-25 में इस योजना पर 7,822.92 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। इससे स्पष्ट है कि सरकार इस योजना के विस्तार पर लगातार निवेश बढ़ा रही है ताकि अधिक से अधिक घरों तक सौर ऊर्जा पहुंचाई जा सके।

    दरअसल प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना को वर्ष 2024 में शुरू किया गया था। यह एक डिमांड-ड्रिवन योजना है यानी इसमें वही उपभोक्ता शामिल होते हैं जो स्वयं आवेदन करते हैं। देश के ऐसे सभी घरेलू उपभोक्ता जिनके पास स्थानीय बिजली वितरण कंपनी यानी डिस्कॉम से जुड़ा बिजली कनेक्शन है वे राष्ट्रीय पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर अपने घर की छत पर सोलर सिस्टम लगवा सकते हैं। इस योजना का मुख्य उद्देश्य लोगों को सस्ती और स्वच्छ बिजली उपलब्ध कराना है साथ ही पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम करना भी है।

    सरकार का अनुमान है कि यदि देश में एक करोड़ घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित हो जाते हैं तो इससे लगभग 1000 अरब यूनिट नवीकरणीय बिजली का उत्पादन संभव हो सकेगा। इतना ही नहीं इन सोलर सिस्टम का औसत जीवनकाल करीब 25 साल माना जाता है और इस अवधि में लगभग 720 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों को भी मजबूती मिलेगी।

    सरकार ने यह भी बताया कि वर्ष 2025 के अंत तक इस योजना के क्रियान्वयन में गुजरात महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश केरल और राजस्थान जैसे राज्य सबसे आगे रहे हैं। इन राज्यों में बड़ी संख्या में लोगों ने अपने घरों की छतों पर सोलर पैनल लगवाए हैं।

    एक अन्य सवाल के जवाब में मंत्री ने बताया कि 31 दिसंबर 2025 तक देश में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता बढ़कर 266.78 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। इसमें 258 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा शामिल है जिसमें सौर पवन जैव ऊर्जा और जल विद्युत जैसी ऊर्जा शामिल हैं। इसके अलावा 8.78 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता भी देश के ऊर्जा उत्पादन में योगदान दे रही है।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को भी लागू किया जा रहा है। इस मिशन का उद्देश्य भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन उपयोग और निर्यात के क्षेत्र में वैश्विक केंद्र बनाना है।