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  • आरबीआई की मौद्रिक नीति बैठक पर नजर, रेपो रेट स्थिर रह सकता है; GDP ग्रोथ मजबूत रहने की उम्मीद

    आरबीआई की मौद्रिक नीति बैठक पर नजर, रेपो रेट स्थिर रह सकता है; GDP ग्रोथ मजबूत रहने की उम्मीद


    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक की अगस्त 2026 में होने वाली मौद्रिक नीति समिति की बैठक पर पूरे वित्तीय बाजार की नजर टिकी हुई है। एसबीआई रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के अनुसार इस बार रेपो रेट में किसी बदलाव की संभावना बेहद कम है। रिपोर्ट का मानना है कि खुदरा महंगाई अगले दो तिमाहियों तक पांच प्रतिशत से ऊपर बनी रह सकती है जबकि देश की आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी हुई है। ऐसे में आरबीआई के लिए फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रखना सबसे संतुलित विकल्प माना जा रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर सात प्रतिशत से अधिक रह सकती है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो यह पहले लगाए गए अनुमानों से बेहतर प्रदर्शन होगा और भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाएगा। मजबूत आर्थिक गतिविधियां और स्थिर मांग ऐसे प्रमुख कारण हैं जिनकी वजह से केंद्रीय बैंक फिलहाल नीतिगत दरों में बदलाव करने से बच सकता है।

    एसबीआई रिसर्च ने बताया कि जुलाई के दौरान देश में लगभग 35 अरब डॉलर का पूंजी प्रवाह दर्ज किया गया। इसके परिणामस्वरूप 24 जुलाई तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 12.5 अरब डॉलर बढ़ गया। इसके साथ ही जून के अंत तक तीन महीने की अवधि वाले फॉरवर्ड पोजीशन में 13 अरब डॉलर की कमी आई जिससे विदेशी मुद्रा बाजार पर दबाव कम हुआ और रुपये की स्थिति को भी सहारा मिला।

    हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि वैश्विक परिस्थितियां अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई हैं। कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव पश्चिम एशिया की भू राजनीतिक स्थिति और वैश्विक पूंजी प्रवाह को लेकर बनी अनिश्चितता ऐसे कारक हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि आरबीआई फिलहाल अत्यधिक नरम रुख अपनाने के बजाय सतर्क रणनीति जारी रख सकता है।

    आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति समिति की बैठक तीन से पांच अगस्त तक आयोजित होगी जबकि पांच अगस्त को नीतिगत फैसलों की घोषणा की जाएगी। वित्तीय बाजार और उद्योग जगत इस बैठक से ब्याज दरों के साथ साथ महंगाई आर्थिक वृद्धि और भविष्य की मौद्रिक नीति के संकेतों पर भी नजर रखे हुए हैं।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था अभी भी दबाव में है। कई देशों में आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी हुई है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भी अप्रैल से जून 2026 की तिमाही के दौरान अपेक्षा से अधिक सुस्ती देखने को मिली। इसके बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करती दिखाई दे रही है।

    एसबीआई रिसर्च ने यह भी कहा कि पिछले कुछ महीनों में मानसून की स्थिति में सुधार हुआ है। जुलाई में सामान्य से अधिक वर्षा होने के कारण देश में वर्षा की कमी घटकर केवल 13 प्रतिशत रह गई है। जलाशयों का जलस्तर लगभग सामान्य है और खरीफ फसलों की बुवाई भी पिछले वर्ष की तुलना में मामूली कम रही है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता मांग को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षेत्र को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। इसमें कहा गया है कि तकनीकी क्षेत्र में एआई को लेकर तेजी से बढ़ते निवेश और अत्यधिक उम्मीदों के कारण भविष्य में एआई बबल बनने का खतरा पैदा हो सकता है। कई कंपनियां आवश्यकता से अधिक निवेश कर रही हैं जो आगे चलकर जोखिम का कारण बन सकता है।

    कुल मिलाकर एसबीआई रिसर्च का आकलन है कि मजबूत आर्थिक वृद्धि विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार बेहतर मानसून और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आरबीआई फिलहाल रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगा और मौद्रिक नीति में स्थिरता बनाए रखने को प्राथमिकता देगा।

  • रेपो रेट यथावत रखकर आरबीआई ने दिया स्थिरता का संदेश, विशेषज्ञ बोले- दीर्घकालिक विकास को मिलेगा मजबूत आधार

    रेपो रेट यथावत रखकर आरबीआई ने दिया स्थिरता का संदेश, विशेषज्ञ बोले- दीर्घकालिक विकास को मिलेगा मजबूत आधार

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत रेपो दर को मौजूदा स्तर पर बनाए रखने के निर्णय को अर्थशास्त्रियों और उद्योग जगत ने संतुलित तथा दूरदर्शी कदम बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और घरेलू चुनौतियों के बीच लिया गया यह फैसला वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने के साथ-साथ दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करेगा।

    विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था कई प्रकार की चुनौतियों से गुजर रही है। भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर बढ़ते दबाव का असर विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दिखाई दे रहा है। ऐसे माहौल में ब्याज दरों को स्थिर रखना आरबीआई की सतर्क और संतुलित नीति को दर्शाता है।

    पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अधिकारियों का मानना है कि केंद्रीय बैंक ने विकास और महंगाई के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश की है। उनका कहना है कि वैश्विक स्तर पर जोखिम बढ़ने के बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है और मौजूदा नीति से मध्यम तथा दीर्घकालिक विकास को समर्थन मिलेगा।

    विश्लेषकों का मानना है कि महंगाई अभी आरबीआई के निर्धारित लक्ष्य के आसपास बनी हुई है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए भविष्य में चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति संबंधी व्यवधान और मानसून की स्थिति जैसे कारक आगे चलकर आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके बावजूद मजबूत घरेलू मांग भारतीय अर्थव्यवस्था को सहारा देने का काम कर रही है।

    बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले महीनों में महंगाई अपेक्षा से अधिक बढ़ती है तो वर्ष के अंत तक ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है। हालांकि फिलहाल आरबीआई ने विकास की गति को बनाए रखने और बाजार को स्थिर संदेश देने को प्राथमिकता दी है। इससे उद्योगों और निवेशकों को नीति संबंधी स्पष्टता मिलेगी।

    आरबीआई द्वारा विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने के लिए किए गए उपायों को भी सकारात्मक कदम माना जा रहा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेश, बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा जमा से जुड़े फैसलों से बाजार में तरलता बढ़ने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन उपायों से भारतीय वित्तीय बाजारों की स्थिति और मजबूत हो सकती है तथा विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है।

    इंडियन बैंक के प्रबंधन का कहना है कि वैश्विक संकटों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय मजबूती दिखाई है। ऐसे में ब्याज दरों को स्थिर रखने का निर्णय यह संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक आर्थिक गतिविधियों को गति देने और विकास को समर्थन देने के पक्ष में है। इससे खुदरा, कृषि और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम क्षेत्रों में मांग को बल मिलने की संभावना है।

    आवास क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि स्थिर ब्याज दरों का माहौल घर खरीदने की योजना बना रहे लोगों के लिए राहत लेकर आएगा। इससे होम लोन लेने वाले ग्राहकों का विश्वास बढ़ेगा और आवास बाजार में मांग को मजबूती मिलेगी। साथ ही ऋण वितरण में भी सुधार देखने को मिल सकता है।

    आर्थिक जानकारों के अनुसार आरबीआई का यह निर्णय भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती पर भरोसे को दर्शाता है। वर्तमान परिस्थितियों में स्थिर ब्याज दरें निवेश, उपभोग और आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने का काम करेंगी। आने वाले महीनों में महंगाई, मानसून और वैश्विक बाजारों की दिशा पर नजर रहेगी, लेकिन फिलहाल केंद्रीय बैंक का यह कदम विकास और स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

  • रेपो रेट पर RBI के फैसले के बाद बाजार में बिकवाली, सेंसेक्स 200 अंक टूटा, बैंकिंग शेयर दबाव में

    रेपो रेट पर RBI के फैसले के बाद बाजार में बिकवाली, सेंसेक्स 200 अंक टूटा, बैंकिंग शेयर दबाव में


    नई दिल्ली ।
    घरेलू शेयर बाजार में शुक्रवार को उतार-चढ़ाव भरा कारोबार देखने को मिला। कारोबार की शुरुआत सकारात्मक माहौल में हुई और प्रमुख सूचकांकों ने बढ़त के साथ शुरुआत की, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति संबंधी घोषणा के बाद बाजार का रुख बदल गया। रेपो रेट को यथावत रखने के फैसले और आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान में कमी के संकेतों ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया, जिसके चलते बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ गया।

    कारोबार के शुरुआती चरण में निवेशकों का रुझान सकारात्मक था और सेंसेक्स के अधिकांश शेयर बढ़त के साथ कारोबार कर रहे थे। सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाओं और ऑटोमोबाइल क्षेत्र के कुछ प्रमुख शेयरों में अच्छी खरीदारी देखने को मिली। हालांकि, जैसे ही RBI की नीति से जुड़े प्रमुख संकेत सामने आए, बाजार ने अपनी शुरुआती बढ़त खो दी और प्रमुख सूचकांक लाल निशान में पहुंच गए।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों की प्रतिक्रिया केवल रेपो रेट को स्थिर रखने तक सीमित नहीं रही, बल्कि केंद्रीय बैंक द्वारा आर्थिक वृद्धि के अनुमान को कम करने और महंगाई के अनुमान को बढ़ाने का असर भी बाजार पर दिखाई दिया। इससे निवेशकों के बीच आगामी आर्थिक गतिविधियों और कॉर्पोरेट आय को लेकर सतर्कता बढ़ी, जिसका सीधा असर शेयरों की खरीदारी पर पड़ा।

    बीएसई सेंसेक्स कारोबार के दौरान 200 अंकों से अधिक फिसल गया और बाद में भी गिरावट के साथ कारोबार करता रहा। वहीं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी दबाव में दिखाई दिया। बैंकिंग क्षेत्र के शेयरों में सबसे अधिक असर देखने को मिला, क्योंकि शुरुआती तेजी के बाद इनमें मुनाफावसूली बढ़ गई। निवेशकों को उम्मीद थी कि केंद्रीय बैंक की ओर से नीतिगत दरों में किसी प्रकार की राहत मिल सकती है, लेकिन ऐसा नहीं होने से बैंकिंग शेयरों की रफ्तार थम गई।

    दूसरी ओर, तकनीकी और आईटी क्षेत्र के कुछ शेयरों ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। टेक महिंद्रा, इन्फोसिस और टीसीएस जैसे शेयरों में निवेशकों की रुचि बनी रही। इसके अलावा कुछ निजी वित्तीय और ऑटोमोबाइल कंपनियों के शेयरों ने भी शुरुआती सत्र में मजबूती दिखाई। हालांकि व्यापक बाजार में दबाव बढ़ने के कारण इन शेयरों की तेजी भी सीमित रही।

    गिरावट वाले शेयरों में धातु, ऊर्जा और कुछ बैंकिंग कंपनियों के शेयर प्रमुख रहे। टाटा स्टील, पावरग्रिड, एचडीएफसी बैंक, रिलायंस इंडस्ट्रीज और एनटीपीसी जैसे प्रमुख शेयरों में कमजोरी दर्ज की गई। इन शेयरों में बिकवाली का असर सूचकांकों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।

    इस बीच विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपया अपेक्षाकृत स्थिर रहा। डॉलर के मुकाबले रुपये में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव नहीं देखा गया और यह लगभग पिछले कारोबारी सत्र के स्तर के आसपास कारोबार करता रहा। इससे संकेत मिला कि मुद्रा बाजार ने केंद्रीय बैंक की घोषणा पर सीमित प्रतिक्रिया दी।

    विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर महंगाई, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक बाजारों से मिलने वाले संकेतों पर बनी रहेगी। यदि आर्थिक आंकड़े उम्मीद से बेहतर रहते हैं तो बाजार में फिर से खरीदारी लौट सकती है। फिलहाल RBI के ताजा संकेतों ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है, जिसके कारण बाजार में अल्पकालिक दबाव देखने को मिल रहा है।