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  • कैबिनेट मंत्रियों का सोशल मीडिया रिपोर्ट कार्ड जारी, डिजिटल एंगेजमेंट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने नंबर-1

    कैबिनेट मंत्रियों का सोशल मीडिया रिपोर्ट कार्ड जारी, डिजिटल एंगेजमेंट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने नंबर-1

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने देश के युवाओं और नई पीढ़ी के साथ अपना संपर्क तथा संचार मजबूत करने के लिए डिजिटल माध्यमों पर जोर देना तेज कर दिया है। इसी रणनीति के तहत केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में सभी मंत्रियों का सोशल मीडिया परफॉर्मेंस रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत किया गया। लगभग साढ़े तीन महीने के कामकाज और डिजिटल गतिविधियों के आधार पर तैयार की गई इस रैंकिंग सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले स्थान पर रहे हैं।

    मंत्रियों का यह विशेष रिपोर्ट कार्ड 1 मई से 15 अगस्त 2026 तक की अवधि के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर किए गए कार्यों के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें मुख्य रूप से इंस्टाग्राम, एक्स, लिंक्डइन और फेसबुक जैसी प्रमुख नेटवर्किंग साइट्स पर मंत्रियों की सक्रियता का गहन विश्लेषण किया गया। रैंकिंग तय करने के लिए दैनिक पोस्ट की संख्या, यूजर्स एंगेजमेंट, लाइक्स और फॉलोअर्स में बढ़ोतरी जैसे महत्वपूर्ण मानकों को आधार बनाया गया।

    रिपोर्ट में केवल सत्ता पक्ष के मंत्रियों का ही नहीं, बल्कि देश के प्रमुख राजनीतिक चेहरों का भी तुलनात्मक अध्ययन किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, नितिन गडकरी और कंगना रनौत जैसे नेताओं ने उच्च रैंकिंग हासिल की। वहीं विपक्षी नेताओं में राहुल गांधी, असदुद्दीन ओवैसी और अरविंद केजरीवाल भी शीर्ष डिजिटल प्रभाव वाले नेताओं में शामिल रहे।

    हाल के समय में राजधानी दिल्ली में हुए छात्र आंदोलनों के बाद सरकार ने अपनी डिजिटल संचार नीति में व्यापक बदलाव किया है। अब पारंपरिक और औपचारिक राजनीतिक बयानों के स्थान पर लघु रील्स, अनौपचारिक संवाद और क्रिएटर फॉर्मेट वाले वीडियो कंटेंट पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य युवाओं की पसंद के अनुसार सरल और प्रभावकारी भाषा में अपनी बात पहुंचाना है।

    इसी कड़ी में विभिन्न मंत्रालयों को नए और लोकप्रिय डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अपनी उपस्थिति बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। डिजिटल आउटरीच कार्यक्रम के तहत विदेश मंत्रालय ने भी हाल ही में स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्म पर अपना आधिकारिक अकाउंट शुरू किया है। इसके अलावा कैबिनेट में यह निर्णय भी लिया गया है कि केंद्रीय मंत्री सीधे संवाद के लिए देश भर के विभिन्न विश्वविद्यालयों का दौरा करेंगे और शिक्षा एवं परीक्षा प्रणाली पर छात्रों से चर्चा करेंगे।

    मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों के विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में मंत्रियों के इस प्रत्यक्ष और डिजिटल संवाद कार्यक्रम को लागू करने की योजना है। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई रणनीति से सरकार और युवा वर्ग के बीच सीधे संवाद का एक पारदर्शी माध्यम स्थापित होगा, जिससे सरकारी योजनाओं और नीतियों की जानकारी युवाओं तक तेजी से पहुंचेगी।

  • ट्रेन स्वच्छता पर नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट उजागर, टॉयलेट की बदबू और रखरखाव में कमियां आईं सामने।

    ट्रेन स्वच्छता पर नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट उजागर, टॉयलेट की बदबू और रखरखाव में कमियां आईं सामने।

    ई दिल्ली । भारतीय रेलवे की सफाई व्यवस्था, डिब्बों के रखरखाव और बायो-टॉयलेट प्रबंधन पर नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक अर्थात कैग की नवीनतम रिपोर्ट में गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। संसद में प्रस्तुत की गई इस रिपोर्ट के अनुसार, ट्रेन यात्रा के दौरान मिलने वाली ऑन-बोर्ड स्वच्छता सेवाओं से लगभग पचास प्रतिशत यात्री असंतुष्ट हैं। लंबी दूरी का सफर तय करने वाले यात्रियों को टॉयलेट में जलभराव, बदबू और सफाई कर्मियों की अनुपस्थिति जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

    रिपोर्ट में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि रेलवे द्वारा प्रतिवर्ष स्वच्छता और रखरखाव के लिए पर्याप्त बजटीय आवंटन किया जाता है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन और वित्तीय अनुशासन में कई खामियां देखी गई हैं। ऑडिट टीम को रेलवे प्रशासन द्वारा ऐसा कोई स्पष्ट और पारदर्शी लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं कराया जा सका, जिससे यह सटीक जानकारी मिल सके कि आवंटित बजट का कितना हिस्सा वास्तव में सफाई कार्यों पर व्यय किया गया।

    वित्तीय प्रक्रियाओं और ठेकेदारों के नियमन को लेकर भी रिपोर्ट में लापरवाही की बात कही गई है। नियमों का उल्लंघन करने वाले ठेकेदारों पर लगाए गए जुर्माने या राशि कटौती का कोई केंद्रीय डेटाबेस या पारदर्शी रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया जा सका। हालांकि रेलवे प्रशासन ने ठेकेदारों पर दंडात्मक कार्रवाई का दावा किया, किंतु ऑडिट प्रक्रिया के दौरान इस संबंध में कोई ठोस साक्ष्य या वित्तीय विवरण जमा नहीं कराए जा सके।

    सर्वेक्षण के आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि चालीस प्रतिशत से अधिक रेल यात्रियों ने ट्रेनों के टॉयलेट में बदबू और पानी के भराव की समस्या पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। इसके अतिरिक्त, पचास प्रतिशत से अधिक यात्रियों ने ऑन-बोर्ड हाउसकीपिंग सेवाओं के सुचारू रूप से कार्य न करने की शिकायत की है। ट्रेन डिब्बों की अत्याधुनिक और स्वचालित धुलाई के लिए स्वीकृत परियोजनाओं की गति भी अत्यंत धीमी पाई गई है।

    कैग की इस रिपोर्ट में झांसी और ग्वालियर जैसे प्रमुख रेल मंडलों का भी संदर्भ देखने को मिलता है, जहां ऑटोमेटिक कोच वाशिंग प्लांट स्थापित करने के लिए बजट स्वीकृत होने के पश्चात भी परियोजनाएं लंबित पाई गईं। मध्य प्रदेश सहित देश भर के रेल यात्रियों की सुविधाओं और स्वास्थ्य सुरक्षा को देखते हुए यह रिपोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कैग ने रेल मंत्रालय को वित्तीय पारदर्शिता और जमीनी क्रियान्वयन को सुदृढ़ करने के निर्देश दिए हैं।

    विमानन और रेल सेवाओं के तुलनात्मक अध्ययन में यात्रियों की मूल सुविधाओं का ध्यान रखना सर्वोपरि माना गया है। कैग की इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि रेलवे प्रशासन ठेकेदारों की जवाबदेही तय करने, ऑन-बोर्ड सफाई कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और बायो-टॉयलेट के नियमित रख-रखाव के लिए नई कार्ययोजना लागू करेगा ताकि यात्रा के अनुभव में सुधार किया जा सके।

  • आज संसद में पेश होगी जस्टिस वर्मा ‘कैश कांड’ की रिपोर्ट, मानसून सत्र के सिर्फ 3 दिन बाकी

    आज संसद में पेश होगी जस्टिस वर्मा ‘कैश कांड’ की रिपोर्ट, मानसून सत्र के सिर्फ 3 दिन बाकी


    नई दिल्ली। संसद के मॉनसून सत्र के अब सिर्फ तीन दिन शेष हैं, लेकिन सदन में जारी गतिरोध खत्म होता नजर नहीं आ रहा है। राम मंदिर के कथित चढ़ावे की चोरी और 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर छात्रों पर हुए लाठीचार्ज समेत कई मुद्दों को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है। विपक्ष की ओर से गृह मंत्री अमित शाह के जवाब की मांग भी की जा रही है।

    इस बीच बुधवार को संसद में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच कमेटी की रिपोर्ट पेश की जाएगी। दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास में मार्च 2025 में आग लगने के बाद स्टोर रूम से कथित तौर पर जली हुई नकदी मिलने के मामले में यह जांच शुरू हुई थी। घटना के बाद जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की मांग तेज हो गई थी।

    लोकसभा और राज्यसभा में रखी जाएगी रिपोर्ट
    जस्टिस वर्मा के खिलाफ मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की गई थी। कमेटी ने जांच के दौरान दस्तावेज और मौखिक साक्ष्य जुटाए हैं। अब इसकी रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा और राज्यसभा के पटल पर रखी जाएगी। रिपोर्ट सामने आने के बाद संसद में इस मामले को लेकर चर्चा होने की संभावना है। खास तौर पर यह सवाल अहम होगा कि जस्टिस वर्मा के इस्तीफा देने के बावजूद क्या उनके खिलाफ पद से हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।

    इस्तीफा दे चुके हैं जस्टिस वर्मा
    कैश बरामदगी के समय जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश थे। विवाद सामने आने के बाद उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया था। उनके खिलाफ 200 से ज्यादा सांसदों ने महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की मांग की थी। जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, राष्ट्रपति ने अभी तक उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है। ऐसे में जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद उनके मामले को लेकर संसद में आगे की कार्रवाई पर भी चर्चा हो सकती है।

    अमित शाह आज दे सकते हैं जवाब
    छात्र आंदोलन के मुद्दे पर भी बुधवार को संसद में सरकार का पक्ष सामने आने की संभावना है। गृह मंत्री अमित शाह सदन में जवाब दे सकते हैं। सरकार का कहना है कि वह छात्रों से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और गृह मंत्री जवाब देने को भी तैयार हैं। वहीं सरकार ने विपक्ष पर चर्चा से बचने का आरोप लगाया है। दूसरी ओर विपक्ष लगातार जंतर-मंतर पर छात्रों पर हुए लाठीचार्ज को लेकर सरकार से जवाब मांग रहा है।

    FCRA बिल पर भी नजर
    संसद में आज के घटनाक्रम के अलावा अगले दिन की कार्यवाही भी महत्वपूर्ण रहने वाली है। सरकार गुरुवार को FCRA बिल पेश कर सकती है। कांग्रेस और TMC इस बिल को वापस लेने की मांग कर रही हैं। सरकार बिल पेश करने के बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज सकती है। ऐसे में मॉनसून सत्र के बचे तीन दिन सरकार और विपक्ष के बीच टकराव के लिहाज से बेहद अहम माने जा रहे हैं।

  • तपती रातें बन रहीं गंभीर स्वास्थ्य संकट…. हर व्यक्ति सालाना गंवा रहा 93 घंटे की नींद

    तपती रातें बन रहीं गंभीर स्वास्थ्य संकट…. हर व्यक्ति सालाना गंवा रहा 93 घंटे की नींद

    नई दिल्ली। दिन के बढ़ते तापमान (Rising Temperatures) के साथ अब रातों की गर्मी (Heat) भी गंभीर स्वास्थ्य संकट (Health crisis) बनती जा रही है। क्लाइमेट सेंट्रल (Climate Central) की नई वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, गर्म और उमस भरी रातों के कारण देश के कई हिस्सों में लोग हर साल दर्जनों घंटे की नींद गंवा रहे हैं। दक्षिण भारत इस समस्या का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल मौसम का विषय नहीं रह गया, बल्कि यह लोगों की नींद, स्वास्थ्य और कार्यक्षमता को प्रभावित कर रहा है।

    रिपोर्ट के मुताबिक पुडुचेरी के लोग वर्षभर में औसतन 92 घंटे की नींद खो रहे हैं। आंध्र प्रदेश में 88.6 घंटे और केरल में 88.3 घंटे की नींद का नुकसान दर्ज किया गया है। तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना में भी स्थिति चिंताजनक है, जहां लगातार बढ़ती रात्रिकालीन गर्मी लोगों को पर्याप्त आराम नहीं करने दे रही। तमिलनाडु में हर व्यक्ति की लगभग 7.9 घंटे और कर्नाटक में 7.8 घंटे की अतिरिक्त नींद केवल बदलती जलवायु के कारण कम हो रही है।


    बड़े शहरों में भी गर्म रातों का दिख रहा प्रभाव

    बड़े शहरों में भी गर्म रातों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। चेन्नई इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां एक व्यक्ति सालाना औसतन 93 घंटे तक कम सो पा रहा है। मुंबई में यह आंकड़ा 84 घंटे, कोलकाता में 80 घंटे और दिल्ली में 66 घंटे है। बंगलूरू में जलवायु परिवर्तन के कारण अतिरिक्त नींद की कमी सबसे अधिक दर्ज की गई है, जबकि हैदराबाद, अहमदाबाद और पुणे में भी इसका उल्लेखनीय प्रभाव सामने आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और कंक्रीट के फैलाव ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।

    नींद की कमी से हो सकती है गंभीर बीमारियां
    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि वयस्कों के लिए प्रतिदिन 7 से 9 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद आवश्यक है। जब रात का तापमान अधिक रहता है तो शरीर दिनभर की गर्मी से उबर नहीं पाता और गहरी नींद लेने में कठिनाई होती है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहने पर उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह, मोटापा, मानसिक तनाव, अवसाद, याददाश्त में कमी तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। पर्याप्त नींद नहीं मिलने से कार्यक्षमता और निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है।


    पांच दशकों में तेजी से बढ़ा खतरा

    रिपोर्ट में भारत सहित दुनिया के 1,338 शहरों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के अनुसार 1970 के दशक की तुलना में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली नींद की कमी लगभग दोगुनी हो चुकी है। वर्ष 2020 से 2025 के बीच दुनिया भर में प्रत्येक व्यक्ति ने औसतन 56 घंटे की नींद गर्म रातों के कारण खोई, जिसमें 10 प्रतिशत से अधिक कमी का संबंध सीधे जलवायु परिवर्तन से पाया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवाश्म ईंधनों के बढ़ते उपयोग और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन ने तापमान में लगातार वृद्धि की है। यदि उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर होगी।

  • Report: दुनिया की 99% आबादी ले रही है प्रदूषित हवा में सांस…. WHO ने चेताया

    Report: दुनिया की 99% आबादी ले रही है प्रदूषित हवा में सांस…. WHO ने चेताया


    न्यूयार्क।
    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) (World Health Organization – WHO) की वर्ल्ड हेल्थ स्टेटिस्टिक्स 2026 रिपोर्ट (World Health Statistics 2026 Report) हैरान करने वाली है। इसके मुताबिक, दुनिया की 99 प्रतिशत आबादी अब भी सुरक्षित सीमा से अधिक प्रदूषित हवा में सांस ले रही है। वर्ष 2021 में 66 लाख मौतें घरेलू और बाहरी वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं।

    भारत जैसे देशों के लिए यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बनी हुई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत समेत दुनिया के कई देशों के लिए वर्ष 2030 तक हर व्यक्ति को बेहतर और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं (यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज) उपलब्ध कराने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की रफ्तार पिछले कुछ वर्षों में काफी धीमी पड़ गई है।


    रिपोर्ट में किया गया क्या दावा?

    रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015 से 2023 के बीच दुनिया का यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) सर्विस कवरेज इंडेक्स केवल 68 से बढ़कर 71 तक पहुंचा। यह 2000 से 2015 के मुकाबले करीब एक-तिहाई गति से हुई प्रगति है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो 2030 तक यह सूचकांक केवल 74 तक ही पहुंच पाएगा, जिससे सभी लोगों तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का वैश्विक लक्ष्य अधूरा रह सकता है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र, जिसमें भारत भी शामिल है, ने स्वास्थ्य सेवाओं के कवरेज में अन्य क्षेत्रों की तुलना में बेहतर सुधार दर्ज किया है। 2015 के बाद इस क्षेत्र के यूएचसी इंडेक्स में 7 अंकों की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन 2030 का लक्ष्य हासिल करने के लिए यह गति भी पर्याप्त नहीं मानी जा रही।


    स्वास्थ्य खर्च से 1.6 अरब लोग गरीबी की चपेट में

    रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की करीब एक-चौथाई आबादी इलाज पर अपनी जेब से खर्च करने के कारण आर्थिक बोझ झेल रही है। वर्ष 2022 तक लगभग 1.6 अरब लोग स्वास्थ्य खर्च की वजह से गरीबी में जी रहे थे या गरीबी की ओर धकेले गए।

    कई देशों में खसरे के संक्रमण का खतरा
    डब्ल्यूएचओ ने बच्चों के नियमित टीकाकरण की रफ्तार को लेकर भी चेतावनी दी है। कई प्रमुख टीकों का कवरेज अभी भी 90 प्रतिशत के वैश्विक लक्ष्य से नीचे है। खासकर खसरे (मीजल्स) की दूसरी डोज का कवरेज 2024 में केवल 76 प्रतिशत रहा, जिससे कई देशों में संक्रमण फैलने का खतरा बना हुआ है।

    सरकारों को स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ाना होगा निवेश
    डब्ल्यूएचओ का कहना है कि अगर 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करना है तो सरकारों को स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ाना होगा। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना होगा, टीकाकरण का दायरा बढ़ाना होगा और लोगों का इलाज पर होने वाला निजी खर्च कम करना होगा।

  • भारत की रिपोर्ट से लीक हो गई US-इंडोनेशिया की सीक्रेट एयरस्पेस डील, बवाल के बाद हटना पड़ा पीछे

    भारत की रिपोर्ट से लीक हो गई US-इंडोनेशिया की सीक्रेट एयरस्पेस डील, बवाल के बाद हटना पड़ा पीछे

    वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में ईरान के साथ जंग रहे युद्ध के बीच अमेरिका साउथ ईस्ट एशिया में स्थित एक मुस्लिम देश संग मिलकर बड़ा खेल करने की तैयारी में था। हालांकि एक भारतीय रिपोर्ट ने इस प्लान पर पानी फेर दिया है। बीते दिनों अमेरिका और दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया के बीच एक सीक्रेट समझौते की तैयारी चल रही थी, लेकिन अब इंडियन मीडिया की एक रिपोर्ट से हुए खुलासे के बाद हड़कंप मच गया है।

    दरअसल अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच 13 अप्रैल को एक डिफेंस डील साइन होनी थी। हालांकि डील साइन होने से ठीक पहले 12 अप्रैल को एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि अमेरिका इंडोनेशिया के एयरस्पेस में अपने सैन्य विमानों को पूरी इजाजत देने की योजना बना रहा है। इस लीक के बाद इंडोनेशिया में भारी हंगामा हुआ और आखिरकार इस प्रावधन को फाइनल डील से बाहर कर दिया गया है।
    रिपोर्ट में हुआ खुलासा

    इस डील की पूरी जानकारी रिपोर्ट ‘संडे गार्जियन’ में प्रकाशित हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच कई महीने से इस गुप्त योजना पर काम कर रही थी। फरवरी में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच वाइट हाउस में हुई बैठक में भी इस पर चर्चा हुई थी। इसे 13 अप्रैल को अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री शाफ्री जमसोएद्दीन की बैठक में औपचारिक रूप से शामिल किया जाना था, लेकिन विवाद के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका।

    डील में क्या था?

    इस प्रस्तावित डील के तहत अमेरिकी सैन्य विमानों को इंडोनेशिया के एयरस्पेस में बिना किसी रोक-टोक के उड़ान भरने की इजाजत मिल जाती। आधिकारिक तौर पर इसे इमरजेंसी और संकट के समय इस्तेमाल के लिए बताया गया, लेकिन इसका असली मकसद इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में निगरानी बढ़ाना था, खासकर उस समय जब ईरान ने होर्मुज पर दबाव बढ़ा दिया है और ग्लोबल ऑयल सप्लाई प्रभावित हो रही है। ऐसे में अमेरिका मलक्का स्ट्रेट पर पकड़ मजबूत करना चाहता था, जो दुनिया का सबसे व्यस्त तेल व्यापार मार्ग है और जहां से करीब 30 प्रतिशत समुद्री तेल और 40 प्रतिशत वैश्विक व्यापार गुजरता है।
    इंडोनेशिया ही क्यों?

    इंडोनेशिया की भौगोलिक स्थिति इस रणनीति के केंद्र में है, क्योंकि वह मलक्का के पास स्थित है।

    अमेरिका के लिए यह डील इंडो-पैसिफिक में चीन पर नजर रखने के लिए अहम साबित हो सकती थी, क्योंकि फिलहाल उसे उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के सैन्य ठिकानों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो दूरी के लिहाज से कम प्रभावी हैं।
    क्यों हटना पड़ा पीछे?

    हालांकि जैसे ही यह रिपोर्ट सामने आई, इंडोनेशिया में इसका तीखा विरोध शुरू हो गया। जकार्ता में सांसदों ने इस तरह के किसी भी समझौते की वैधता पर सवाल उठाए। संसद के डिप्टी चेयर सुकामता ने साफ कहा कि किसी भी विदेशी सैन्य सहयोग के लिए संसद से सलाह लेना जरूरी है और बिना कानूनी आधार के एयरस्पेस देना संभव नहीं है।

    इस विरोध के बाद प्रबोवो सरकार दबाव में आ गई। इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने तुरंत सफाई देते हुए कहा कि अमेरिकी विमानों को ओवरफ्लाइट एक्सेस देने का प्रस्ताव फाइनल डील का हिस्सा नहीं है। मंत्रालय ने कहा कि यह सिर्फ “लेटर ऑफ इंटेंट” के स्तर पर चर्चा में था और अभी न तो अंतिम है और न ही बाध्यकारी। साथ ही यह भी कहा गया कि किसी भी समझौते में इंडोनेशिया की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहेंगे। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब यह डील फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है।
  • Report: भारत में 40% युवाओं को नहीं मिल पाती नौकरी… 1.1 करोड़ स्तानक हैं बेरोजगार

    Report: भारत में 40% युवाओं को नहीं मिल पाती नौकरी… 1.1 करोड़ स्तानक हैं बेरोजगार


    नई दिल्ली ।
    देश (India) में 20 से 29 साल के 6.3 करोड़ स्नातकों में से 1.1 करोड़ बेरोजगार (Graduate Unemployment) हैं। चिंता की बात यह है कि बेरोजगार के रूप में पंजीकरण कराने के एक वर्ष के भीतर सिर्फ सात फीसदी स्नातकों को स्थायी वेतन वाली नौकरी (Job) मिल पाती है। हाल के वर्षों में स्नातकों की बढ़ती संख्या के कारण यह समस्या और बढ़ गई है।

    अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय (Azim Premji University) की ओर से जारी रिपोर्ट ‘भारत में कामकाज की स्थिति-2026’ के मुताबिक, देश में युवाओं (15-29 वर्ष) की उच्च शिक्षा तक पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालांकि, रोजगार से जुड़ी चुनौतियां अब भी कायम हैं। स्नातकों में बेरोजगारी दर उच्च बनी हुई है। 15 से 25 वर्ष के स्नातकों में बेरोजगारी दर करीब 40 फीसदी और 25 से 29 वर्ष की आयु वर्ग में 20 फीसदी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्नातक युवाओं को आय के मामले में लाभ मिलता है और उनकी शुरुआती कमाई गैर-स्नातकों के मुकाबले लगभग दोगुनी होती है। इसके बावजूद 2011 के बाद युवा पुरुष स्नातकों के वेतन में वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ी है। रिपोर्ट की मुख्य लेखिका प्रोफेसर रोजा अब्राहम ने कहा, यह अध्ययन शिक्षा से रोजगार तक युवाओं की यात्रा और उसमें आए बदलावों को दर्शाता है।


    पुरुषों की नामांकन दर में गिरावट

    पिछले चार दशक में उच्च शिक्षा में नामांकन दर 28 फीसदी तक पहुंच गई है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी खासतौर पर बढ़ी है। हालांकि, पुरुषों के नामांकन में गिरावट आई है। यह 2017 के 38 फीसदी से घटकर 2024 के अंत तक 34 फीसदी रह गई है। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि पुरुष परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए कमाने के मौके तलाशने लगते हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों का दायरा भी बढ़ा है। प्रति लाख युवाओं पर कॉलेज की संख्या 2010 के 29 से बढ़कर 2021 में 45 पहुंच गईं, जिसमें निजी संस्थानों की बड़ी भूमिका रही है।


    गरीब परिवारों की उच्च शिक्षा में बढ़ी भागीदारी

    रिपोर्ट के मुताबिक, उच्च शिक्षा में गरीब परिवारों की भागीदारी बढ़ी है, जो 2007 के आठ फीसदी से बढ़कर 2017 में 15 फीसदी हो गई है। लेकिन, आर्थिक बाधाएं अब भी बनी हुई हैं। महंगे पेशेवर पाठ्यक्रमों मसलन इंजीनियरिंग और मेडिकल में अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग के छात्र-छात्राओं की भागीदारी अधिक है। युवा तेजी से कृषि से हटकर सेवा और विनिर्माण क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2010 के बाद औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) की संख्या में करीब 300 फीसदी की वृद्धि हुई है। साथ ही, निजी संस्थानों में गुणवत्ता को लेकर चिंताएं भी सामने आई हैं।

  • गौकाष्ठ और उपलों से होलिका दहन: कलेक्टर देंगे तीन दिन में रिपोर्ट, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा

    गौकाष्ठ और उपलों से होलिका दहन: कलेक्टर देंगे तीन दिन में रिपोर्ट, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा


    भोपाल। प्रदेश में इस वर्ष होली के अवसर पर होलिका दहन में लकड़ी की जगह गौकाष्ठ और उपलों का उपयोग करने का आदेश जारी किया गया है। सरकार ने सभी कलेक्टरों और संभागायुक्तों को निर्देश दिए हैं कि वे यह सुनिश्चित करें कि गोबर आधारित होलिका दहन को प्रोत्साहित किया जाए और इसके बारे में रिपोर्ट सरकार को सौंपें।

    सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने निर्देश दिए हैं कि हर जिले में होलिका दहन कार्यक्रमों का सत्यापन और पंजीयन किया जाएगा। कलेक्टरों को आदेश दिया गया है कि वे तीन दिनों के भीतर संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों से जानकारी लेकर इसकी रिपोर्ट राज्य शासन को भेजें। इसके साथ ही यदि कोई संस्था या व्यक्ति इस दिशा में विशेष प्रयास करता है तो उसे प्रोत्साहित भी किया जाएगा।

    इस निर्णय के पीछे मुख्य उद्देश्य है लकड़ी की खपत कम करना और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना। साथ ही सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे प्राकृतिक रंगों से होली मनाएं और जल संरक्षण का ध्यान रखें।

    कलेक्टरों को दिए गए निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि सार्वजनिक होलिका दहन कार्यक्रमों का नि:शुल्क पंजीयन सुनिश्चित किया जाए। इसका पंजीयन जिला मुख्यालय, पंचायत, नगरीय निकाय और अन्य स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से होगा। इसके अलावा आयोजनों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा और नगरीय निकाय एवं पंचायतों को सक्रिय रूप से शामिल किया जाएगा। आयोजकों से आवश्यक जानकारी जैसे पहचान पत्र और संपर्क विवरण भी ली जाएगी।

    आगामी दिनों में जिलेवार सम्मान समारोह भी आयोजित किए जाएंगे, जिनमें पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाली संस्थाओं और पदाधिकारियों को सम्मानित किया जाएगा। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि भविष्य में यदि इन संस्थाओं को किसी अन्य प्रकार का प्रोत्साहन या सहयोग दिया जाता है तो इसकी जानकारी अलग से साझा की जाएगी।

    इस पहल से न केवल होलिका दहन के दौरान पर्यावरणीय नुकसान कम होगा, बल्कि सामाजिक जागरूकता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की दिशा में भी एक सकारात्मक संदेश जाएगा। कलेक्टर और अधिकारियों की यह रिपोर्टिंग व्यवस्था सुनिश्चित करेगी कि राज्य में होली का पर्व सुरक्षित, पर्यावरण अनुकूल और सामाजिक सद्भाव के साथ मनाया जाए।