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  • परिसीमन बिल पर बढ़ी सियासी हलचल, मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच निर्णायक टकराव के आसार

    परिसीमन बिल पर बढ़ी सियासी हलचल, मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच निर्णायक टकराव के आसार

    नई दिल्ली ।संसद के मानसून सत्र में अब राजनीतिक चर्चा का केंद्र संभावित परिसीमन बिल बनता दिखाई दे रहा है। शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर प्रारंभिक बहस के बाद अब लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच नए राजनीतिक समीकरण उभरते नजर आ रहे हैं। माना जा रहा है कि 27 जुलाई से 13 अगस्त तक चलने वाला सत्र इस विषय पर आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    परिसीमन प्रक्रिया का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं और लोकसभा सीटों का पुनर्गठन करना है। प्रस्तावित बदलावों के तहत लोकसभा की कुल सीटों में वृद्धि का रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की संवैधानिक प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि इस विषय पर व्यापक राजनीतिक सहमति अभी तक बनती दिखाई नहीं दे रही है।

    संविधान संशोधन से जुड़े किसी भी विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। इसी कारण सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त समर्थन सुनिश्चित करने की मानी जा रही है। राजनीतिक दलों के बीच लगातार संवाद और समर्थन जुटाने की कोशिशों को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। दूसरी ओर विपक्ष भी साझा रुख अपनाकर अपनी रणनीति तैयार करने में जुटा हुआ है।

    परिसीमन को लेकर सबसे अधिक चिंता दक्षिण भारत के कई राज्यों ने व्यक्त की है। इन राज्यों का तर्क है कि उन्होंने लंबे समय से जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में प्रभावी प्रयास किए हैं। ऐसे में यदि भविष्य में केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया जाता है तो उनका संसदीय प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है। इसी कारण कई क्षेत्रीय दल इस विषय पर विस्तृत चर्चा और संतुलित व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार विभिन्न दलों से संवाद के जरिए व्यापक समर्थन जुटाने का प्रयास कर सकती है। वहीं कुछ क्षेत्रीय दलों ने संकेत दिए हैं कि यदि सभी राज्यों के हितों को संतुलित करने वाला समाधान सामने आता है तो वे अपने रुख पर विचार कर सकते हैं। हालांकि अभी तक किसी व्यापक सहमति की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।

    संसद के मौजूदा सत्र को लेकर राजनीतिक हलकों में कई संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। पहली संभावना यह मानी जा रही है कि यदि पर्याप्त समर्थन सुनिश्चित नहीं होता तो सरकार विधेयक को फिलहाल पेश करने से बच सकती है। दूसरी संभावना यह है कि विधेयक सदन में प्रस्तुत हो, लेकिन पर्याप्त बहुमत नहीं मिलने के कारण पारित न हो सके। तीसरी संभावना यह मानी जा रही है कि आवश्यक समर्थन मिलने की स्थिति में विधेयक आगे बढ़े और संवैधानिक प्रक्रिया अगले चरण में प्रवेश करे।

    भारत में लोकसभा सीटों के परिसीमन का इतिहास कई दशकों पुराना है। पिछले लंबे समय से संसदीय सीटों की संख्या स्थिर बनी हुई है, जबकि इस अवधि में देश की जनसंख्या और जनसांख्यिकीय स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में नए परिसीमन की आवश्यकता पर चर्चा लगातार होती रही है। यदि भविष्य में इस दिशा में कोई संवैधानिक निर्णय लिया जाता है तो उसका प्रभाव देश की चुनावी राजनीति, राज्यों के प्रतिनिधित्व और संसदीय व्यवस्था पर व्यापक रूप से दिखाई दे सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें संसद के मानसून सत्र और आगे बनने वाले राजनीतिक समीकरणों पर टिकी हुई हैं।

  • 'ग्लैमर के पीछे छिपी रही मेरी प्रतिभा', ज़ीनत अमान ने पुरानी कार्यशैली पर उठाए गंभीर सवाल

    'ग्लैमर के पीछे छिपी रही मेरी प्रतिभा', ज़ीनत अमान ने पुरानी कार्यशैली पर उठाए गंभीर सवाल

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा की सदाबहार और दिग्गज अभिनेत्री ज़ीनत अमान ने अपने दशकों पुराने फिल्मी सफर और समकालीन कार्यसंस्कृति को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने अतीत के अनुभवों को साझा करते हुए मनोरंजन जगत में अभिनेत्रियों के प्रति बनी संकीर्ण मानसिकता पर गहरी चिंता व्यक्त की है। ज़ीनत अमान के अनुसार, लंबे समय तक फिल्म उद्योग में उन्हें केवल एक ‘ग्लैमरस आइकन’ के रूप में ही देखा और प्रस्तुत किया गया, जिसके कारण उनकी वास्तविक अभिनय क्षमता, रचनात्मक सोच और बौद्धिक क्षमता को वह स्थान और सम्मान नहीं मिल सका, जिसकी वे हकदार थीं। पर्दे की चमकीली दुनिया ने उनके वास्तविक और गंभीर व्यक्तित्व को दर्शकों के सामने आने ही नहीं दिया।

    अपने दौर की सबसे चर्चित अभिनेत्रियां होने के बावजूद ज़ीनत अमान को इस बात का मलाल है कि समाज और फिल्मकारों ने उनके किरदारों के आधार पर ही उनकी एक अपरिवर्तनीय छवि गढ़ दी थी। उन्होंने बताया कि जब लोग उनसे व्यक्तिगत जीवन में मिलते थे, तो उनके संतुलित और वैचारिक स्वभाव को देखकर चकित रह जाते थे, क्योंकि वह उनकी फिल्मी छवि से बिल्कुल उलट था। उनका मानना है कि व्यावसायिक सफलता की अंधी दौड़ में तत्कालीन फिल्मकारों ने उनके लुक्स और स्क्रीन प्रेजेंस का तो भरपूर लाभ उठाया, लेकिन एक कलाकार के रूप में उनकी गहराई को समझने या उसे पर्दे पर उभारने का प्रयास बहुत कम किया गया।

    उस दौर की कार्यशैली पर सीधा प्रहार करते हुए दिग्गज अभिनेत्री ने कहा कि तब फिल्म निर्माण की पूरी प्रक्रिया पुरुष प्रधान मानसिकता से संचालित होती थी। सेट पर और स्क्रिप्टिंग के स्तर पर महिलाओं की राय या उनके रचनात्मक सुझावों को कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती थी। अभिनेत्रियों से केवल यह अपेक्षा की जाती थी कि वे अपनी आकर्षक उपस्थिति, नृत्य और गानों के माध्यम से फिल्म के व्यावसायिक पक्ष को मजबूत करें। किसी दृश्य की प्रासंगिकता या किरदार के मनोवैज्ञानिक विकास में उनकी भागीदारी को हमेशा सीमित रखा जाता था, जो एक रचनात्मक कलाकार के रूप में उनके लिए काफी निराशाजनक था।

    पोशाक और प्रस्तुतीकरण के मुद्दों पर खुलकर बात करते हुए ज़ीनत अमान ने साझा किया कि व्यावसायिक आवश्यकताओं के नाम पर अक्सर उन पर अधिक बोल्ड और आकर्षक परिधान पहनने का दबाव बनाया जाता था। जबकि व्यक्तिगत स्तर पर वे बेहद सादगीपूर्ण और संतुलित जीवनशैली पसंद करती थीं। उस दौर में किसी भी महिला कलाकार की योग्यता का पैमाना उसकी अभिनय क्षमता से ज्यादा उसकी बाहरी सुंदरता और स्क्रीन अपील को माना जाता था, जिसने कई बेहतरीन प्रतिभाओं को एक खास दायरे में समेट कर रख दिया।

    हालांकि, उन्होंने वर्तमान सिनेमाई परिदृश्य में आ रहे बदलावों की सराहना भी की है। उनका मानना है कि आज की अभिनेत्रियों के पास बेहतर अवसर हैं, कहानियां अधिक सशक्त हैं और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। इसके बावजूद, वे इस बात से पूरी तरह इनकार नहीं करतीं कि आज भी महिलाओं को उनकी बाहरी बनावट और शारीरिक सुंदरता के तराजू पर तौलने की प्रवृत्ति मनोरंजन उद्योग में आंशिक रूप से जीवित है, जिसे पूरी तरह बदलने के लिए अभी और समय और वैचारिक परिपक्वता की आवश्यकता है।

    ज़ीनत अमान ने अपने इस विचार के जरिए फिल्म जगत और दर्शकों दोनों के सामने एक गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया है। उनका स्पष्ट मानना है कि किसी भी कलाकार की वास्तविक पहचान और उसका मूल्यांकन उसके काम, अनुभव, समर्पण और रचनात्मक योगदान के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल इस बात पर कि वह पर्दे पर कितना ग्लैमरस दिखता है। ग्लैमर केवल इस पेशे का एक छोटा सा हिस्सा है, न कि किसी कलाकार के संपूर्ण अस्तित्व की परिभाषा।

    अपने समय में आधुनिकता, अदम्य आत्मविश्वास और लीक से हटकर किरदार निभाने के लिए जानी जाने वाली ज़ीनत अमान का यह आत्मनिरीक्षण नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए भी एक मार्गदर्शक की तरह है। उनका यह बयान केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक व्यवस्था पर एक गंभीर टिप्पणी है जो कलाकारों को केवल एक स्टीरियोटाइप या ढांचे में बंद कर देखना पसंद करती है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि भविष्य का सिनेमा कलाकारों की बौद्धिक और रचनात्मक क्षमता को अधिक महत्व देगा।