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  • 15 जून से शुरू होंगे भीमाशंकर के दर्शन, उमड़ने वाली भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने लागू किए नए नियम

    15 जून से शुरू होंगे भीमाशंकर के दर्शन, उमड़ने वाली भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने लागू किए नए नियम

    नई दिल्ली। भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख स्थान रखने वाले महाराष्ट्र के पुणे स्थित प्रसिद्ध भीमाशंकर मंदिर के कपाट आगामी 15 जून 2026 से श्रद्धालुओं के लिए दोबारा खोल दिए जाएंगे। विकास और जीर्णोद्धार कार्यों के चलते पिछले करीब पांच महीनों से इस ऐतिहासिक मंदिर में आम भक्तों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगी हुई थी। मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन ने व्यापक स्तर पर चल रहे निर्माण कार्यों को सुचारू रूप से पूरा करने और सुरक्षा मानकों को पुख्ता करने के उद्देश्य से जनवरी महीने से ही मंदिर को बंद रखने का निर्णय लिया था। अब बुनियादी ढांचे के विकास का पहला चरण पूरा होने के बाद शिव भक्तों का लंबा इंतजार समाप्त होने जा रहा है और मंदिर परिसर एक बार फिर जय भोलेनाथ के जयकारों से गुंजायमान होने के लिए तैयार है।

    इस धार्मिक स्थल को अस्थाई रूप से बंद किए जाने का मुख्य कारण आगामी वर्ष 2027 में नासिक के त्र्यंबकेश्वर तीर्थ में आयोजित होने वाला सिंहस्थ कुंभ मेला है। इस वैश्विक आयोजन के दौरान महाराष्ट्र के सभी प्रमुख और पौराणिक तीर्थस्थलों पर देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि होने की संभावना है। इसी भविष्यगामी भीड़ प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन द्वारा भीमाशंकर मंदिर परिसर में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू करवाए गए थे। इन पांच महीनों की अवधि के दौरान मंदिर के मुख्य मुख्य मार्ग, प्रवेश व निकास द्वारों को चौड़ा करने के साथ-साथ श्रद्धालुओं के ठहरने और विश्राम करने के लिए विशेष बुनियादी सुविधाओं का तेजी से विस्तार किया गया है ताकि कुंभ मेले के समय किसी भी प्रकार की अव्यवस्था या दुर्घटना की स्थिति उत्पन्न न हो।

    प्रशासनिक अधिकारियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार भीमाशंकर मंदिर में दर्शन व्यवस्था को पहले से अधिक सुगम और सुरक्षित बनाने के लिए कई कड़े और नए नियम भी लागू किए जा रहे हैं। अब यहां आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए पूर्व ऑनलाइन पंजीकरण कराना पूरी तरह से अनिवार्य कर दिया गया है। दर्शन के लिए स्लॉट बुक करने की ऑनलाइन प्रक्रिया 5 जून 2026 से मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर लाइव कर दी जाएगी। मंदिर प्रबंधन समिति ने स्पष्ट किया है कि शुरुआती दौर में प्रतिदिन केवल सीमित संख्या में ही पंजीकृत श्रद्धालुओं को गर्भगृह और मुख्य परिसर में प्रवेश की अनुमति दी जाएगी, जिससे कतार प्रबंधन को बेहतर ढंग से संभाला जा सके और वीआईपी व आम भक्तों के बीच संतुलन बना रहे।

    प्रशासन ने देश भर से आने वाले शिव भक्तों से अपील की है कि वे मंदिर के नए नियमों और सुरक्षा दिशा-निर्देशों का पूरी निष्ठा से पालन करें। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग न केवल एक महान धार्मिक केंद्र है, बल्कि यह अपने अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य, घने जंगलों और वन्यजीव अभ्यारण्य के लिए भी दुनिया भर के पर्यटकों और ट्रैकर्स के बीच बेहद लोकप्रिय है। सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित होने के कारण यहां पहुंचने का मार्ग पहाड़ी और घुमावदार है। श्रद्धालुओं की यात्रा को सुगम बनाने के लिए पुणे जंक्शन और कर्जत रेलवे स्टेशन से राज्य परिवहन की विशेष बसों और टैक्सियों की संख्या में भी बढ़ोतरी की जा रही है, जिससे जून के महीने में मानसून की शुरुआत के साथ आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी तरह की परिवहन संबंधी समस्या का सामना न करना पड़े।

  • धर्मांतरण और सरकारी लाभ पर HC की सख्ती, पूछा– कितने लोग ले रहे दोहरा फायदा?

    धर्मांतरण और सरकारी लाभ पर HC की सख्ती, पूछा– कितने लोग ले रहे दोहरा फायदा?


    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    Uttarakhand High Court में धर्मांतरण के बाद सरकारी योजनाओं और आरक्षण के कथित “दोहरी सुविधा” को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। यह याचिका पिथौरागढ़ निवासी दर्शन लाल द्वारा दाखिल की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि कुछ लोग धर्म परिवर्तन के बाद भी पहले से मिल रहे सरकारी लाभों का फायदा उठा रहे हैं।

    सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि ऐसे कितने लोग हैं जिन्होंने धर्म परिवर्तन के बाद भी सरकारी योजनाओं और आरक्षण का लाभ लिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह ऐसे सभी मामलों को चिन्हित कर तीन सप्ताह के भीतर उन्हें पक्षकार बनाए और विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करे।

    याचिका में दावा किया गया है कि इस कथित स्थिति के कारण वास्तविक पात्र लाभार्थियों तक योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। याचिकाकर्ता ने इस पर रोक लगाने की मांग भी अदालत से की है। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की गई है।

    इसी बीच प्रशासनिक स्तर पर भी निगरानी बढ़ाई गई है। रुद्रपुर में जिला प्रशासन ने धर्मांतरण, अवैध नशा, अतिक्रमण और अन्य अवैध गतिविधियों पर कड़ी नजर रखने के निर्देश जारी किए हैं।

  • महिला आरक्षण पर सियासी घमासान: कंगना रनौत का विपक्ष पर हमला, ‘बेटियों के प्रति सोच’ पर उठाए सवाल

    महिला आरक्षण पर सियासी घमासान: कंगना रनौत का विपक्ष पर हमला, ‘बेटियों के प्रति सोच’ पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली। महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर संसद में बहस के बीच सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। भाजपा सांसद कंगना रनौत ने विपक्ष पर तीखा निशाना साधते हुए कहा कि उनके रुख से “बेटियों के प्रति उनकी सोच” उजागर हो रही है।

    कंगना रनौत ने कहा कि विपक्ष परिसीमन को लेकर अनावश्यक बहाने बना रहा है, जबकि इस मुद्दे पर स्थिति पहले ही स्पष्ट की जा चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश देख रहा है कि विपक्ष की मंशा क्या है और वह महिला आरक्षण को लेकर गंभीर नहीं है।

    परिसीमन पर ‘भ्रम फैलाने’ का आरोप

    भाजपा के एक अन्य सांसद तेजस्वी सूर्या ने भी विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि महिला आरक्षण कानून को लेकर जनता को गुमराह किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि परिसीमन के बाद दक्षिणी राज्यों को अधिक सीटों का लाभ मिल सकता है।
    सूर्या ने याद दिलाया कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में सर्वसम्मति से पारित हुआ था और तब सभी दल इस बात पर सहमत थे कि इसे जनगणना और परिसीमन के बाद लागू किया जाएगा। उनके मुताबिक अब विपक्ष इस मुद्दे पर यू-टर्न ले रहा है।

    सत्ता और विपक्ष आमने-सामने

    महिला आरक्षण में संशोधन और परिसीमन आयोग के गठन से जुड़े प्रस्तावों पर एनडीए और विपक्ष के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है।
    जहां सत्तापक्ष का कहना है कि महिलाओं को आरक्षण के लिए लंबे समय से इंतजार करना पड़ा है, वहीं विपक्ष का आरोप है कि सरकार की कार्यप्रणाली देश के संघीय ढांचे को प्रभावित कर सकती है।

    संसद में पेश हुए अहम विधेयक

    लोकसभा में चर्चा के लिए

    ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026’
    ‘परिसीमन विधेयक, 2026’
    ‘संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026’

    पेश किए गए हैं। प्रस्ताव के मुताबिक, 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के बाद 2029 के आम चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू करने की योजना है। इसके तहत लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 तक की जा सकती है।

    संख्याबल की चुनौती

    वर्तमान में लोकसभा में एनडीए के पास 292 सांसद हैं, जबकि विपक्षी दलों के पास 233 सदस्य हैं। संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।

    ऐसे में यह मुद्दा न केवल नीतिगत बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम बन गया है, जिस पर आने वाले दिनों में और तीखी बहस देखने को मिल सकती है।

  • महिलाओं को 33% आरक्षण… आज संसद में पेश होंगे 3 बिल… सत्तापक्ष के पास LS में 67 और RS में 21 सीट कम

    महिलाओं को 33% आरक्षण… आज संसद में पेश होंगे 3 बिल… सत्तापक्ष के पास LS में 67 और RS में 21 सीट कम


    नई दिल्ली।
    संसद (Parliament) में आज एकसाथ तीन-तीन विधेयक पेश किए जाने वाले हैं। सरकार का लक्ष्य है कि 2029 के लोकसभा चुनावों (Lok Sabha elections) से पहले महिलाओं के लिए 33% आरक्षण और परिसीमन की प्रक्रिया को अमली जामा पहना दिया जाए। लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को मूर्त रूप देने के लिए आज से संसद का विशेष सत्र रखा गया है। इसमें लोकसभा में सदस्यों की मौजूदा संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने के लिए बिल लाया जाएगा। इसके साथ ही, सरकार परिसीमन आयोग के गठन के लिए भी एक विधेयक तथा इन्हीं से संबंधित केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन विधेयक), 2026 लाने की तैयारी में है।

    ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (‘Women’s Empowerment Act’) के तहत महिलाओं को मिलने वाला कोटा परिसीमन और जनगणना से जुड़ा है। केंद्र सरकार 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करने और महिला आरक्षण लागू करने की योजना बना रही है।


    सरकार कैसे पास कराएगी विधेयक? जानें नंबर गेम

    परिसीमन विधेयक को छोड़कर, अन्य दो विधेयक संविधान संशोधन विधेयक हैं। इन्हें पारित करने के लिए संसद में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। विपक्ष का वॉकआउट बहुमत के आंकड़े को कम कर सकता है। लोकसभा दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 360 है। सत्ताधारी NDA के पास 293 सदस्य हैं। यानी उसे अभी भी 67 अतिरिक्त वोटों की जरूरत है। राज्यसभा में बहुमत के लिए जादुई आंकड़ा 163 है। NDA की वर्तमान ताकत 142 के आसपास है, जो उसे बहुमत के आंकड़े से 21 सीट दूर रखती है।

    विपक्ष का कहना है कि वे महिला आरक्षण के समर्थक हैं, लेकिन सरकार द्वारा इसे परिसीमन और 2029 के चुनावों से जोड़ने के कारण वे इन विधेयकों का विरोध करने को मजबूर हैं।


    क्षेत्रीय संतुलन का डर

    विपक्ष का तर्क है कि 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण केवल NDA को लाभ पहुंचाएगा। इसके अलावा, यह दक्षिण भारतीय राज्यों की संसदीय शक्ति को कम कर सकता है और उन्हें हाशिए पर धकेल सकता है।


    राहुल गांधी का आरोप

    कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया (X) पर आरोप लगाया कि सरकार की योजना 2029 के लिए सीटों का अपनी सुविधानुसार सीमाओं में बदलाव करने की है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक संवैधानिक सुरक्षा उपायों को हटाकर पूरी शक्ति सरकार द्वारा नियुक्त आयोग को देता है।


    लोकसभा की सीटों में भारी वृद्धि

    प्रस्तावित विधेयकों के तहत परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 815 तक हो सकती है। केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के लिए यह संख्या 35 हो सकती है। वर्तमान में राज्यों से 530 और केंद्र शासित प्रदेशों से 20 सदस्य चुनकर आते हैं।


    क्षेत्रीय दलों का बदलता रुख

    BJD और BRS जैसे दल अक्सर मुद्दों के आधार पर सरकार का समर्थन करते रहे हैं> उन्होंने परिसीमन के मुद्दे पर अपना रुख कड़ा कर लिया है। इससे सरकार की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।


    सरकार का भरोसा- सब साथ हैं

    तमाम विरोधों के बावजूद सरकार का दावा है कि उनके पास पर्याप्त आंकड़े हैं। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि कोई भी दल सिद्धांत रूप में महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर रहा है और इस भावना के साथ सभी एक साथ हैं।

  • महिलाओं को संसद-विधानसभाओं में तत्काल 33% आरक्षण देने की मांग… SC में आज होगी सुनवाई

    महिलाओं को संसद-विधानसभाओं में तत्काल 33% आरक्षण देने की मांग… SC में आज होगी सुनवाई


    नई दिल्ली।
    देशभर में जहां एक ओर महिलाओं को संसद और विधानसभा (Parliament and Legislative Assemblies) में 33% आरक्षण (33% Women Reservation ) देने के मुद्दे को लेकर सियासत तेज हो गई है। वहीं दूसरी ओर अब इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में अहम सुनवाई होने जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) आज यानी सोमवार 13 अप्रैल को इस मामले पर सुनवाई करेगा। यह याचिका कांग्रेस नेता जया ठाकुर (Jaya Thakur) ने दाखिल की है। इसमें मांग की गई है कि महिलाओं को आरक्षण देने वाला कानून नारी शक्ति वंदन अधिनियम तुरंत लागू किया जाए और इसे जनगणना व परिसीमन से न जोड़ा जाए।

    फिलहाल इस कानून में यह प्रावधान है कि महिलाओं को 33% आरक्षण तभी मिलेगा, जब अगली जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। लेकिन याचिका में कहा गया है कि यह शर्त जरूरी नहीं है, क्योंकि सीटों की संख्या पहले से तय है और देश की लगभग आधी आबादी होने के बावजूद महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है।


    जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच करेगी सुनवाई

    इस मामले की सुनवाई जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच करेगी। इससे पहले 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कानून के इस प्रावधान को रद्द करना बहुत मुश्किल होगा। यह सुनवाई इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि 16 अप्रैल से संसद का विशेष सत्र शुरू होने वाला है, जिसमें महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए संशोधन बिल लाया जा सकता है।


    पीएम मोदी ने सभी नेताओं से की है अपील

    बता दें कि इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को पत्र लिखकर इस कानून को सर्वसम्मति से पास करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि देश को विकसित बनाने के लिए महिलाओं की ज्यादा भागीदारी जरूरी है। हालांकि, कांग्रेस ने इस विशेष सत्र का विरोध किया है। पार्टी का कहना है कि यह कदम चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन हो सकता है, क्योंकि इस समय तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। साथ ही कांग्रेस ने मांग की है कि पहले परिसीमन पर सभी दलों की बैठक होनी चाहिए, उसके बाद ही महिला आरक्षण पर आगे बढ़ना चाहिए।

  • केन्द्र की नई पहल, संसद से लेकर विधानसभाओं में महिलाओं को जल्द 33% आरक्षण देने की तैयारी

    केन्द्र की नई पहल, संसद से लेकर विधानसभाओं में महिलाओं को जल्द 33% आरक्षण देने की तैयारी


    नई दिल्ली।
    संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण (33 Percent Reservation Women) देने को लेकर केंद्र सरकार (Central Government) नई पहल की तैयारी में है। लंबे समय से चर्चा में रहे महिला आरक्षण के मुद्दे पर सरकार अब ऐसा रास्ता तलाश रही है, जिससे इसका लाभ वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले ही लागू किया जा सके। इसके लिए कानून में संशोधन किया जा सकता है।

    वर्ष 2023 में संसद द्वारा पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (‘Women’s Empowerment Act’) के तहत महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। लेकिन इस कानून के अनुसार आरक्षण तभी लागू होना था जब अगली जनगणना पूरी हो जाए और उसके बाद नई परिसीमन प्रक्रिया लागू की जाए। चूंकि जनगणना और परिसीमन दोनों प्रक्रियाओं में काफी समय लग सकता है, इसलिए आशंका जताई जा रही थी कि महिलाओं को आरक्षण का वास्तविक लाभ मिलने में कई वर्ष लग सकते हैं।


    अनौपचारिक बातचीत शुरू

    सूत्रों का कहना है कि इस विषय पर विपक्षी दलों के साथ अनौपचारिक बातचीत भी शुरू कर दी गई है। सरकार का प्रयास है कि संसद में आवश्यक समर्थन जुटाकर महिला आरक्षण को जल्द लागू करने का रास्ता साफ किया जाए। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि इस मुद्दे पर व्यापक सहमति बनती है, तो मौजूदा संसद सत्र में ही संविधान संशोधन विधेयक लाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।


    वरिष्ठजनों को रेल किराये में छूट दें, संसद में मांग

    संसदीय समिति ने एक बार फिर वरिष्ठ नागरिकों को रेल किराये में छूट देने की पुरजोर वकालत की है। समिति ने रेलवे के पहले से सभी यात्रियों को छूट देने से होने वाले घाटे के तर्क को दरकिनार करते हुए कहा कि उक्त मद की धनराशि को रेलवे विज्ञापन अथवा अन्य तरीके से पूरा कर सकता है।

    विदित हो कि वरिष्ठ नागरिक सहित अन्य रेल किराये में छूट से रेलवे को सालाना 2,000 करोड़ से अधिक राजस्व का नुकसान होता है। रेलवे संबंधी स्थायी समिति मंगलवार को संसद में पेश अपनी आठवीं रिपोर्ट में भारतीय रेलवे के सामाजिक दायित्व और वित्तीय अनुशासन के बीच तालमेल बिठाने की सलाह दी है। सांसद डा. सीएम रमेश की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए रियायत को फिर से शुरू किया जाता है, तो रेलवे पर सालाना लगभग 2,000 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा।

    समिति ने मंत्रालय को सुझाव दिया है कि इसे केवल स्लीपर और थर्ड एसी (एसी-3) जैसी श्रेणियों तक सीमित रखकर इस बोझ को कम किया जा सकता है, ताकि जरूरतमंद बुजुर्गों को लाभ मिले और रेलवे की आर्थिक स्थिति भी न बिगड़े। वरिष्ठ नागरिक को रियायत देना केवल एक वित्तीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक सामाजिक कर्तव्य है। इसलिए मंत्रालय को मानवीय आधार पर रियायतें बहाल करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

  • दिल्ली पुलिस भर्ती में पूर्व अग्निवीरों के लिए बड़ा तोहफा, 20% आरक्षण और आयु में छूट लागू

    दिल्ली पुलिस भर्ती में पूर्व अग्निवीरों के लिए बड़ा तोहफा, 20% आरक्षण और आयु में छूट लागू


    नई दिल्‍ली । दिल्ली पुलिस में भर्ती के नियमों में अहम बदलाव कर दिया गया है। दिल्ली के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने दिल्ली पुलिस (नियुक्ति एवं भर्ती) नियम, 1980 में संशोधन को मंजूरी दे दी है। इस बदलाव के तहत अब पूर्व अग्निवीरों के लिए पुरुष कांस्टेबल (एग्जीक्यूटिव) पदों पर भर्ती में विशेष प्रावधान लागू होंगे।
    20% आरक्षण और आयु में छूट
    नए संशोधन के अनुसार, पुरुष कांस्टेबल के पदों में 20 प्रतिशत आरक्षण पूर्व अग्निवीरों के लिए रखा गया है। इसके अलावा, उन्हें फिजिकल एफिशिएंसी टेस्ट (PET) से छूट और सामान्य आयु सीमा में 3 वर्ष की राहत दी जाएगी। विशेष रूप से, अग्निवीर योजना के पहले बैच से जुड़े उम्मीदवारों को अधिकतम 5 वर्ष तक की आयु छूट मिलेगी।

    भर्ती के अवसर और पदों की संख्या
    दिल्ली पुलिस में वर्तमान में पुरुष कांस्टेबल (एग्जीक्यूटिव) के 42,451 स्वीकृत पद हैं। इन पदों पर सामान्य भर्ती की प्रक्रिया के तहत उम्र सीमा 18 से 25 वर्ष निर्धारित है। नए संशोधन के बाद बड़ी संख्या में पूर्व अग्निवीर इस भर्ती के लिए पात्र हो सकेंगे और कानून व्यवस्था में अपना करियर बना सकेंगे।

    अग्निवीर योजना का मकसद
    अग्निवीर योजना की शुरुआत 2022 में की गई थी, जिसका उद्देश्य युवाओं को सशस्त्र बलों में सेवा का अवसर प्रदान करना है। चार साल की सैन्य सेवा और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद अब पूर्व अग्निवीरों को कानून और सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में रोजगार के बेहतर अवसर मिलेंगे।

  • 'अब जाति नहीं मेरिट जरूरी', जनरल कैटेगरी के आरक्षण पर SC का बड़ा फैसला; किस पर पड़ेगा असर?

    'अब जाति नहीं मेरिट जरूरी', जनरल कैटेगरी के आरक्षण पर SC का बड़ा फैसला; किस पर पड़ेगा असर?


    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण से जुड़ा एक अहम फैसला सुनाया है, जिसका सीधा असर सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया और जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों पर पड़ता है। कोर्ट ने साफ किया है कि जनरल या ओपन कैटेगरी किसी जाति के लिए नहीं, बल्कि मेरिट के लिए होती है।

    अगर कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार बिना किसी छूट के जनरल कट-ऑफ से ज्यादा नंबर लाता है, तो उसे जनरल कैटेगरी की सीट पर ही माना जाएगा।

    सुप्रीम कोर्ट ने क्या साफ किया?

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ओपन या जनरल कैटेगरी सभी के लिए खुली होती है, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग का हो। अगर SC, OBC, MBC या EWS का उम्मीदवार बिना किसी रियायत के जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों से बेहतर प्रदर्शन करता है तो उसे जनरल लिस्ट में शामिल किया जाएगा, न कि उसकी आरक्षित कैटेगरी में बांधा जाएगा।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि कई बार भर्ती में देखा गया है कि आरक्षित वर्ग का कट-ऑफ जनरल से ज्यादा चला जाता है। ऐसी स्थिति में अगर आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार जनरल कट-ऑफ पार कर लेता है, तो उसे बाहर करना गलत है।

    ‘जनरल कैटेगरी किसी की निजी नहीं’

    कोर्ट ने दोहराया कि जनरल, ओपन या अनरिजर्व्ड शब्द का मतलब है- सभी के लिए खुला। यह किसी खास जाति, वर्ग या लिंग के लिए आरक्षित नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलोंइंद्रा साहनी केस और सौरव यादव केस का हवाला देते हुए कहा, “ओपन कैटेगरी में आने की एक ही शर्त है- मेरिट। यह नहीं देखा जाएगा कि उम्मीदवार किस वर्ग से है।”

    ‘डबल फायदा’ वाला तर्क खारिज

    कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी कि ऐसे उम्मीदवारों को शामिल करने से उन्हें ‘डबल फायदा’ मिलेगा। साफ कहा गया कि अगर कोई रियायत नहीं ली गई है, तो यह कोई अतिरिक्त लाभ नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फॉर्म में अपनी जाति लिख देना अपने आप में आरक्षित सीट पाने का अधिकार नहीं देता, बल्कि सिर्फ यह बताता है कि उम्मीदवार आरक्षित सूची में भी दावेदार हो सकता है।

    क्या था मामला?

    यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट की भर्ती से जुड़ा था। अगस्त 2022 में हाईकोर्ट ने 2756 पदों (जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II) के लिए भर्ती निकाली थी। लिखित परीक्षा के बाद मई 2023 में जब नतीजे आए तो SC, OBC, MBC और EWS का कट-ऑफ जनरल से ज्यादा निकल गया। कुछ आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों ने जनरल कट-ऑफ पार किया, लेकिन अपनी कैटेगरी का कट-ऑफ न होने के कारण उन्हें अगले राउंड से बाहर कर दिया गया।

    हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

    इन उम्मीदवारों ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने कहा कि पहले जनरल लिस्ट सिर्फ मेरिट के आधार पर बननी चाहिए और जो उसमें आ जाएं उन्हें अलग से आरक्षित लिस्ट में नहीं रखा जा सकता। अब दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी फैसले को सही ठहराते हुए राजस्थान हाईकोर्ट प्रशासन की अपील खारिज कर दी।

    इस फैसले का मतलब क्या है?

    जनरल कैटेगरी किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि मेरिट की कैटेगरी है
    आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार अगर बिना छूट जनरल कट-ऑफ पार करता है, तो वह जनरल सीट पर ही जाएगा
    इससे जनरल उम्मीदवारों के अधिकार नहीं छिने, बल्कि मेरिट का नियम मजबूत हुआ है

  • मध्य प्रदेश में पदोन्नति और ओबीसी आरक्षण विवाद कर्मचारियों और भर्तियों पर गहरा असर

    मध्य प्रदेश में पदोन्नति और ओबीसी आरक्षण विवाद कर्मचारियों और भर्तियों पर गहरा असर



    भोपाल ।
    मध्य प्रदेश में पदोन्नति और ओबीसी आरक्षण जैसे मुद्दे लंबे समय से विवादों में घिरे हुए हैं। इन मुद्दों को लेकर न केवल सरकारी कर्मचारियों का भविष्य अंधकारमय हो गया हैबल्कि राज्य में सरकारी नौकरी और भर्ती प्रक्रियाएं भी प्रभावित हो रही हैं। विशेष रूप सेराज्य सरकार की ओर से समय-समय पर किए गए प्रयासों के बावजूद इन मुद्दों का समाधान नहीं हो सका है। यह स्थिति राज्य के कर्मचारियों के लिए बेहद कठिन और निराशाजनक बन गई है।

    पदोन्नति का मुद्दा

    मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के लिए पदोन्नति एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों मेंपदोन्नति से संबंधित मामलों ने अदालतों का रुख किया है और इन विवादों के कारण राज्य सरकार को कई बार अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ा है। नए पदोन्नति नियमों को लागू किया गया थालेकिन ओबीसी आरक्षण के मामले में कानूनी अड़चनें सामने आ गईंजिससे यह मामला फिर से अदालतों में चला गया। इसके परिणामस्वरूपराज्य के 80 हजार से अधिक सरकारी कर्मचारी बिना पदोन्नति के ही सेवानिवृत्त हो गए। इस स्थिति ने कर्मचारियों के बीच असंतोष और निराशा को बढ़ावा दिया है।

    ओबीसी आरक्षण का मुद्दा

    ओबीसी आरक्षण भी एक बड़ा विवादित मुद्दा बन चुका है। मध्य प्रदेश में ओबीसी समुदाय के लिए 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। यह कदम 2019 के लोकसभा चुनावों में राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया था। हालांकिइस फैसले के बाद भी ओबीसी को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका हैक्योंकि मामला कोर्ट में विचाराधीन है। कोर्ट में लंबित होने के कारण राज्य में कई पदों पर भर्ती प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। इससे न केवल ओबीसी समुदायबल्कि सामान्य वर्ग और अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के कर्मचारियों के लिए भी असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

    भर्तियों पर प्रभाव

    पदोन्नति और आरक्षण के विवादों के चलते सरकारी भर्तियों पर भी गहरा असर पड़ा है। कई पदों पर भर्ती प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है और उम्मीदवारों को इसका नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप राज्य में सरकारी सेवा में रिक्तियों की संख्या में वृद्धि हो गई हैलेकिन भर्ती प्रक्रिया की अड़चनों के कारण इन रिक्तियों को भरा नहीं जा सका है।

    राजनीतिक और प्रशासनिक पहल

    मध्य प्रदेश की कमल नाथ सरकार ने 2019 में ओबीसी के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाने का कदम उठाया थालेकिन कोर्ट में मामला लंबित होने के कारण इसका कोई ठोस प्रभाव नहीं पड़ा। राज्य सरकार ने यह दावा किया था कि यह कदम ओबीसी समुदाय के लिए विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैलेकिन कोर्ट के फैसले से पहले यह योजना लागू नहीं हो पाई। इसके अलावापदोन्नति के नए नियमों को लेकर भी प्रशासनिक स्तर पर निरंतर प्रयास किए गएलेकिन कानूनी अड़चनों के कारण यह मामला अब भी उलझा हुआ है।

    भविष्य की दिशा

    पदोन्नति और आरक्षण जैसे मुद्दों का समाधान करना राज्य सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण हो गया है। राज्य सरकार को इन मुद्दों पर उच्च न्यायालय में लंबित मामलों को जल्द सुलझाने के लिए रणनीति बनानी होगी। साथ हीकर्मचारियों और बेरोजगार युवाओं को यह विश्वास दिलाना होगा कि सरकार उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुलझाने के लिए कदम उठा रही है।राज्य सरकार को इन मुद्दों का हल निकालने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्तिकानूनी विशेषज्ञता और प्रशासनिक दक्षता का संयोजन करना होगा।

    अगर ये विवाद जल्द नहीं सुलझेतो कर्मचारियों में असंतोष और बेरोजगार युवाओं में निराशा का माहौल बन सकता हैजो राज्य की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है आखिरकारयह स्थिति मध्य प्रदेश के विकास की गति को प्रभावित कर रही है और राज्य सरकार को इन जटिल मुद्दों का समाधान शीघ्रता से करना होगाताकि राज्य में एक स्थिर और समृद्ध प्रशासनिक माहौल बन सके।

  • आईएएस संतोष वर्मा के बयान पर बवाल तेज 65 ब्राह्मण संगठन 14 दिसंबर को मुख्यमंत्री आवास घेराव करेंगे

    आईएएस संतोष वर्मा के बयान पर बवाल तेज 65 ब्राह्मण संगठन 14 दिसंबर को मुख्यमंत्री आवास घेराव करेंगे


    नई दिल्ली ।मध्यप्रदेश में आईएएस संतोष वर्मा द्वारा आरक्षण और ब्राह्मण समाज को लेकर की गई विवादास्पद टिप्पणी के बाद प्रदेशभर में बवाल मच गया है। 23 नवंबर को भोपाल के अंबेडकर मैदान में अजाक्स के प्रांतीय अधिवेशन के दौरान संतोष वर्मा ने कहा था कि एक परिवार में एक व्यक्ति को आरक्षण तब तक देना चाहिए जब तक मेरे बेटे को कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान नहीं देता या उससे संबंध नहीं बनता।
    यह बयान फैलते ही प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं। अब यह विवाद इतना बढ़ चुका है कि राज्य के 65 से अधिक ब्राह्मण संगठन एकजुट हो गए हैं और उन्होंने संतोष वर्मा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए 14 दिसंबर को मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने का ऐलान किया है।

    क्या था संतोष वर्मा का विवादास्पद बयान

    संतोष वर्मा ने अपने बयान में यह दावा किया था कि एक परिवार के एक सदस्य को आरक्षण तब तक मिलना चाहिए जब तक किसी ब्राह्मण परिवार का बेटा किसी ब्राह्मण परिवार की बेटी से शादी नहीं करता। यह बयान तुरंत ही विवाद का कारण बन गया और प्रदेश भर में विरोध की लहर उठने लगी। सोशल मीडिया पर उनके इस बयान को लेकर जमकर आलोचना की गई और कई राजनीतिक नेताओं और सामाजिक संगठनों ने इस पर नाराजगी जताई।

    ब्राह्मण समाज का आक्रोश

    संतोष वर्मा के बयान ने मध्यप्रदेश के ब्राह्मण समाज में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है। प्रदेशभर के 65 से अधिक ब्राह्मण संगठनों ने उनका विरोध करना शुरू कर दिया है। इन संगठनों का कहना है कि संतोष वर्मा का बयान सामाजिक समरसता को नुकसान पहुँचाने वाला है और इससे ब्राह्मण समाज की प्रतिष्ठा पर बुरा असर पड़ा है। संगठनों ने इस बयान को जातिवाद और समाज में विभाजन की भावना को बढ़ावा देने वाला करार दिया है।

    ब्राह्मण संगठनों का कहना है कि जब तक संतोष वर्मा के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं होती तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। सोमवार के बाद इन संगठनों ने आंदोलन की नई रणनीति तय करने की बात कही है। वहीं संतोष वर्मा का एक और बयान सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा कितने संतोष वर्मा को मारोगे कितने को जलाओगे अब हर घर से एक संतोष वर्मा निकलेगा। इस बयान ने और भी आग में घी डालने का काम किया और ब्राह्मण संगठनों के विरोध को और तेज कर दिया।

    सरकार का रुख

    संतोष वर्मा के बयान को लेकर सरकार भी हरकत में आ गई है। 26 नवंबर को उन्हें नोटिस जारी किया गया जिसमें कहा गया कि उनका बयान सामाजिक समरसता को ठेस पहुँचाने वाला है और यह अखिल भारतीय सेवा नियम 1969 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में आता है। नोटिस में वर्मा से 7 दिनों के भीतर जवाब माँगा गया था। हालांकि इसके बावजूद संतोष वर्मा के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है जिससे आंदोलन और बढ़ गया है।

    14 दिसंबर को मुख्यमंत्री आवास घेराव

    अब तक के घटनाक्रम को देखते हुए प्रदेश के 65 ब्राह्मण संगठनों ने संयुक्त रूप से 14 दिसंबर को मुख्यमंत्री आवास घेराव करने का ऐलान किया है। इन संगठनों का कहना है कि इस घेराव के जरिए वे संतोष वर्मा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करेंगे और प्रदेश सरकार को यह संदेश देंगे कि ब्राह्मण समाज को अपमानित करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। राजधानी भोपाल में होने वाला यह प्रदर्शन बड़े पैमाने पर होने की संभावना है और प्रशासन ने इस पर नजर रखना शुरू कर दिया है। पुलिस और प्रशासन सुरक्षा के मद्देनज़र अलर्ट मोड पर हैं।

    आईएएस संतोष वर्मा के बयान ने मध्यप्रदेश में विवाद को जन्म दिया है और अब यह केवल एक बयान का मुद्दा नहीं बल्कि समाज में जातिवाद और सामाजिक समरसता पर गहरा सवाल उठाने वाला बन चुका है। ब्राह्मण संगठनों का आक्रोश और मुख्यमंत्री आवास के घेराव की योजना से यह साफ है कि इस मुद्दे पर प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक बड़ा संघर्ष खड़ा हो सकता है। सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन गई है क्योंकि उन्हें इस विवाद को शांत करने के लिए संतोष वर्मा पर सख्त कार्रवाई करनी होगी।