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  • दुनिया के लिए नजीर बना ताइवान… आरक्षण ने बदली संसद की तस्वीर…. 42% सीटों पर महिलाएं काबिज

    दुनिया के लिए नजीर बना ताइवान… आरक्षण ने बदली संसद की तस्वीर…. 42% सीटों पर महिलाएं काबिज


    ली युआन।
    भारत (India) में संसद से लेकर विधानसभाओं तक महिलाओं के उचित प्रतिनिधित्व के लिए चल रही सियासत के बीच ताइवान (Taiwan) दुनियाभर के लिए नजीर बनकर सामने आया है। जिस ताइवान (Taiwan) को दुनिया अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर चिप (State-art Semiconductor Chip) के सबसे बड़े निर्माता के नजरिये से देखती है, उसी 2.3 करोड़ की आबादी वाले द्वीप ने लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी के लिए और लैंगिक भेदभाव खत्म करने के लिए दुनिया का सबसे लंबा अभियान चलाया है।

    करीब 80 साल पहले शुरू की गई आरक्षण व्यवस्था का नतीजा यह निकला कि आज ताइवान की संसद में 42% सीटों पर महिलाएं काबिज हैं। यह पूरे एशिया में सबसे अधिक है और यूरोपीय देशों के बराबर है। यही नहीं, ताइवान 2016 में त्साइ इंग-वेन के रूप में अपनी पहली महिला राष्ट्रपति चुन चुका है और दो बार महिलाओं को उप-राष्ट्रपति भी बना चुका है। इस उपाय ने ऐसा रास्ता तैयार किया कि आज बड़ी संख्या में महिलाएं सामान्य चुनावी मुकाबलों में भी अपनी जगह बना रही हैं।

    खास बात यह है कि ताइवान ने 2008 में एकल-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में लैंगिक कोटा समाप्त कर दिया। इसके बाद भी संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ता रहा। ताइवान का यह प्रयोग साबित करता है कि जब महिलाओं को कानूनी सुरक्षा (कोटा) के जरिए शुरुआती मंच दिया जाता है, तो समय के साथ वे अपनी काबिलियत के दम पर उस बैसाखी को बेअसर कर देती हैं और बराबरी के मैदान में अपनी योग्यता का परचम लहराती हैं।


    1946 से बदलाव की नींव, 5-10% आरक्षण से शुरू हुआ सफर

    ताइवान ने महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए आरक्षित सीटों और चुनावी कोटा का इस्तेमाल दूसरे कई देशों से पहले शुरू किया था। जरूरत पड़ने पर समय-समय पर इसमें बदलाव भी करता रहा।

    चीन गणराज्य ने 1946 के संविधान में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की थीं। 1949 में जब नेशनलिस्ट सरकार ताइवान स्थानांतरित हुई, तो तानाशाही दौर के बावजूद स्थानीय चुनावों में 5 से 10% कोटा लागू रखा गया।


    2002 का क्रांतिकारी नियम :

    यदि किसी जिला परिषद सीट से 4 या उससे अधिक सदस्य चुने जाते हैं, तो कम से कम 1 सीट महिला उम्मीदवार को मिलेगी। इससे राजनीतिक दलों में महिला उम्मीदवारों को टिकट देने की होड़ मच गई। ताइवान की 113 सदस्यीय संसद में 47 महिलाएं हैं। वर्ष 1992 के आसपास संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी थी। इसके बाद इसमें लगातार वृद्धि हुई।


    जीत के लिए आरक्षित सीटों की जरूरत खत्म

    नेशनल ताइवान यूनिवर्सिटी की प्रो. चांग-लिंग हुआंग कहती हैं, लोग तर्क देते हैं कि चुनाव का मकसद केवल सबसे बेहतर और सबसे सक्षम व्यक्ति को चुनना होना चाहिए। ताइवान का अनुभव बताता है कि लैंगिक आरक्षण ही वह माध्यम है, जो किसी समाज को वास्तव में सबसे बेहतर और सबसे सक्षम लोगों को चुनने का मौका देता है। 2002 में 31 जिलों में कोटे का इस्तेमाल करना पड़ा था, वहीं 2022 में केवल 4 जिलों में ही इसकी जरूरत पड़ी, यानी महिलाएं आसानी से पुरुषों को हरा रही हैं।

  • राहुल गांधी ने उठाए एमपी में 27% ओबीसी आरक्षण, हॉस्टलों की बदहाली और बालाघाट के आदिवासी परिवारों के गंभीर मुद्दे

    राहुल गांधी ने उठाए एमपी में 27% ओबीसी आरक्षण, हॉस्टलों की बदहाली और बालाघाट के आदिवासी परिवारों के गंभीर मुद्दे

    नई दिल्ली ।लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक ऑडियो संदेश के जरिए पिछले एक महीने के दौरान अपने दौरों, मुलाकातों और उठाए गए मुद्दों का जिक्र किया। उन्होंने मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग से लेकर छात्रों की समस्याओं और बालाघाट के आदिवासी परिवारों की परेशानियों पर अपनी बात रखी। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव प्रक्रिया, संस्थाओं की जवाबदेही और निष्पक्ष परीक्षाओं से जुड़े सवाल भी उठाए।

    राहुल गांधी ने इंदौर में आयोजित छात्रों के कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां युवाओं के साथ शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई विषयों पर चर्चा हुई। छात्रों ने सत्य निकेतन की घटना, शिक्षा बजट में कटौती, छात्रावासों की कमी और परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दे सामने रखे। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को पढ़ाई के दौरान जरूरी सुविधाएं मिलनी चाहिए और परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

    अपने संदेश में राहुल गांधी ने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी आरोप लगाए। उनका कहना था कि इनके नेतृत्व में एक खास विचारधारा से जुड़े लोगों का संस्थानों पर प्रभाव बढ़ रहा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि व्यवस्था को सवाल पूछने वाले छात्रों के बजाय अंधसमर्थक चाहिए। ये टिप्पणियां राहुल गांधी के राजनीतिक आरोपों और शिक्षा व्यवस्था को लेकर उनकी चिंताओं का हिस्सा थीं।

    राहुल गांधी ने महाराष्ट्र के नासिक में आदिवासी छात्रों से हुई मुलाकात का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि छात्रावासों की खराब स्थिति और वहां लागू कड़े नियमों को लेकर उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखा था। उनके अनुसार, इसके बाद छात्रावास में रहने के लिए निर्धारित आयु सीमा से संबंधित नियम वापस ले लिया गया। उन्होंने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षा में कथित गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों के प्रति समर्थन भी जताया।

    मध्य प्रदेश के संदर्भ में राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को लिखे पत्र का उल्लेख किया। उन्होंने राज्य में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को पूरी तरह लागू करने की मांग की। यह मुद्दा प्रदेश में आरक्षण व्यवस्था और उससे जुड़े कानूनी तथा प्रशासनिक फैसलों के बीच महत्वपूर्ण बना हुआ है। राहुल गांधी ने अपने संदेश में इस मांग को प्रमुखता से उठाया और राज्य सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की अपील की।

    उन्होंने बालाघाट के दौरे के दौरान आदिवासी परिवारों से हुई मुलाकात को भी याद किया। राहुल गांधी ने उन परिवारों की पीड़ा का जिक्र किया, जिन्होंने कुपोषण और गंभीर बीमारियों के कारण अपने छोटे बच्चों को खो दिया था। उन्होंने कहा कि कुछ दुख इतने गहरे होते हैं कि उन्हें शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल हो जाता है। उनके मुताबिक, इस दौरे का उद्देश्य पीड़ित परिवारों की बातें सुनना और उनके दुख में सहभागी बनना था।

    राहुल गांधी ने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे उठाते हुए दिल्ली की बेला एस्टेट झुग्गी बस्ती का उदाहरण दिया। उन्होंने दावा किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद वहां 729 लोगों में से 728 लोगों का मतदान का अधिकार छिन गया। उन्होंने निष्पक्ष परीक्षाओं की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई का भी उल्लेख किया। राहुल गांधी ने इन घटनाओं को लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान से जुड़े सवालों के रूप में पेश किया तथा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा देने की मांग की।

    अपने ऑडियो संदेश में राहुल गांधी ने 30 सितंबर को नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, बैठक में आम नागरिकों के मतदान के अधिकार की रक्षा पर चर्चा हुई। इसके अलावा उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली में दिशा समिति की बैठक और विकास कार्यों की समीक्षा, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम से मुलाकात तथा दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर राजघाट जाकर श्रद्धांजलि देने की जानकारी भी साझा की।

  • एमपी में 27% ओबीसी आरक्षण पर घमासान, विवेक तन्खा ने सरकार से मांगे ठोस आंकड़े, राकेश सिंह ने कांग्रेस को घेरा

    एमपी में 27% ओबीसी आरक्षण पर घमासान, विवेक तन्खा ने सरकार से मांगे ठोस आंकड़े, राकेश सिंह ने कांग्रेस को घेरा


    मध्य प्रदेश। में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हालिया रुख के बाद कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने राज्य सरकार से आरक्षण के समर्थन में ठोस आंकड़े जुटाकर सुप्रीम कोर्ट में पेश करने की मांग की है। वहीं, प्रदेश सरकार के मंत्री राकेश सिंह ने इस विवाद के लिए कांग्रेस की तत्कालीन सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

    जबलपुर पहुंचे विवेक तन्खा ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था। इसके बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो गया, लेकिन कानून का बचाव करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की बनी रही। तन्खा के मुताबिक, वर्तमान सरकार को अदालत में इस व्यवस्था के समर्थन में पर्याप्त तथ्य और आंकड़े प्रस्तुत करने चाहिए थे।

    तन्खा ने हाईकोर्ट की कार्यवाही का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार की ओर से पर्याप्त और ठोस आंकड़े पेश नहीं किए जाने के कारण आरक्षण के पक्ष को मजबूती से रखने में कठिनाई हुई। उनका मानना है कि यदि अदालत के सामने समय रहते जरूरी आंकड़े रखे जाते, तो मामले की स्थिति अलग हो सकती थी। हालांकि, यह उनका आकलन है और अदालत के निर्णय का अंतिम आधार संबंधित कानूनी तथ्यों तथा न्यायिक निष्कर्षों पर निर्भर करता है।

    आरक्षण की सीमा को लेकर विवेक तन्खा ने सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी मामले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सामान्य परिस्थितियों में कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित की थी। इस सीमा से आगे जाने के लिए असाधारण परिस्थितियों को प्रमाणित करना आवश्यक है। इसके लिए राज्य सरकार को पिछड़ेपन और संबंधित परिस्थितियों के समर्थन में प्रामाणिक मात्रात्मक आंकड़े अदालत के सामने रखने होते हैं।

    तन्खा ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया के तहत अभी भी राज्य सरकार के पास अपना पक्ष रखने का रास्ता है। यदि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है, तो उसे पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार, आरक्षण से जुड़े मामले में आंकड़ों और कानूनी आधार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सरकार को उपलब्ध प्रशासनिक जानकारी और संबंधित तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सरकारी अध्यादेश या कानून का बचाव करने की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि कानूनी प्रक्रिया में हस्तक्षेप या सहयोग कर सकते हैं, लेकिन सरकार के पास उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों और प्रशासनिक रिकॉर्ड को अदालत में पेश करने का दायित्व सरकार का ही है।

    दूसरी ओर, मंत्री राकेश सिंह ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि वर्ष 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पर्याप्त तैयारी के बिना ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का कदम उठाया था। उनके अनुसार, संबंधित विधेयक में तकनीकी और कानूनी कमियां थीं, जिनके कारण मामला विवादों में उलझा। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने ओबीसी वर्ग के हितों के नाम पर ऐसा निर्णय लिया, जिसका कानूनी आधार पर्याप्त मजबूत नहीं था।

    राकेश सिंह ने कहा कि वर्तमान भाजपा सरकार ओबीसी सहित सभी वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने भरोसा जताया कि सरकार कानूनी मंचों पर अपना पक्ष रखेगी और ऐसा समाधान तलाशने का प्रयास करेगी, जिससे किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो।इस पूरे विवाद में अब राज्य सरकार की कानूनी रणनीति और सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने वाले तथ्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। एक ओर विवेक तन्खा ने आंकड़ों के आधार पर मजबूत पैरवी की जरूरत बताई है, वहीं भाजपा ने आरक्षण से जुड़ी मौजूदा कानूनी स्थिति के लिए कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

  • मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण पर कानूनी रणनीति बनाने दिल्ली पहुंचे मुख्यमंत्री मोहन यादव, उमंग सिंघार ने विशेष सत्र बुलाने की मांग की

    मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण पर कानूनी रणनीति बनाने दिल्ली पहुंचे मुख्यमंत्री मोहन यादव, उमंग सिंघार ने विशेष सत्र बुलाने की मांग की

    मध्य प्रदेश। में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के मामले में राज्य सरकार हाईकोर्ट के फैसले के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर रही है। इसी सिलसिले में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंगलवार को नई दिल्ली में भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से मुलाकात की। इस बैठक में प्रदेश के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह भी मौजूद रहे। चर्चा का मुख्य विषय ओबीसी आरक्षण से जुड़े हाईकोर्ट के निर्णय के कानूनी पहलू और आगे की कार्रवाई की रणनीति रहा।

    मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बैठक के बाद बताया कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और प्रदेश के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह के साथ ओबीसी आरक्षण के मामले पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। उन्होंने कहा कि चर्चा में उच्च न्यायालय के फैसले से संबंधित कानूनी पहलुओं के साथ आगामी कानूनी कार्रवाई की रणनीति पर भी बात हुई। सरकार इस मामले में आगे क्या कदम उठाएगी, इसे लेकर अब कानूनी प्रक्रिया पर नजर बनी हुई है।

    इस बीच, मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मुख्यमंत्री के दिल्ली दौरे को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सॉलिसिटर जनरल से बातचीत कर हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगवाना चाहते हैं, लेकिन इस उद्देश्य से दिल्ली जाने की जरूरत पर उन्होंने सवाल किया। सिंघार के मुताबिक, राज्य सरकार के पास विधानसभा के माध्यम से भी इस विषय पर कदम उठाने का विकल्प है। उन्होंने मुख्यमंत्री से पूछा कि जब विधानसभा मौजूद है, तो ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर विशेष सत्र क्यों नहीं बुलाया जा रहा है।

    उमंग सिंघार ने कहा कि कांग्रेस विधानसभा का विशेष सत्र बुलाए जाने के पक्ष में है और इसके लिए तैयार है। उन्होंने राज्य सरकार से ओबीसी आरक्षण के संबंध में अध्यादेश जारी करने तथा कानून पारित कराने की मांग की। सिंघार ने सवाल उठाया कि सरकार ऐसा करने से क्यों बच रही है और बार-बार मामले को अदालत के निर्णय पर क्यों छोड़ रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ओबीसी वर्ग को फिर से झूठे सपने दिखा रहे हैं।

    नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि यदि सरकार की नीयत स्पष्ट है, तो उसे तत्काल विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर ओबीसी आरक्षण की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उनके बयान के अनुसार, विधानसभा में इस विषय पर चर्चा और जरूरी कदम उठाने से सरकार की स्थिति सामने आ सकती है। हालांकि, विशेष सत्र बुलाने या अध्यादेश जारी करने को लेकर सरकार की ओर से किसी नए फैसले की जानकारी खबर में नहीं दी गई है।

    हाईकोर्ट के फैसले के बाद सरकार की अगली कानूनी कार्रवाई को लेकर भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है। मुख्यमंत्री की सॉलिसिटर जनरल से मुलाकात के दौरान कानूनी पहलुओं और आगे की रणनीति पर चर्चा हुई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की तारीख या इस संबंध में किसी औपचारिक निर्णय की घोषणा नहीं की गई है। ऐसे में यह स्पष्ट होना बाकी है कि राज्य सरकार इस मामले को आगे किस कानूनी प्रक्रिया के तहत ले जाएगी।

    ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत किए जाने का मामला अब राज्य सरकार की अगली कार्रवाई और विपक्ष की मांगों के बीच केंद्र में है। यदि सरकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाती है, तो उसे आरक्षण बढ़ाने के समर्थन में अपना कानूनी आधार प्रस्तुत करना होगा। फिलहाल, मुख्यमंत्री की कानूनी सलाह-मशविरा संबंधी पहल और उमंग सिंघार की विशेष सत्र बुलाने की मांग इस मुद्दे पर सामने आए प्रमुख घटनाक्रम हैं।

  • कमलनाथ ने भाजपा पर ओबीसी का 27% आरक्षण खत्म करने का आरोप लगाया, सुप्रीम कोर्ट जाने और विधानसभा में नया कानून लाने की मांग

    कमलनाथ ने भाजपा पर ओबीसी का 27% आरक्षण खत्म करने का आरोप लगाया, सुप्रीम कोर्ट जाने और विधानसभा में नया कानून लाने की मांग

    मध्य प्रदेश । में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के मामले में हाई कोर्ट के फैसले के बाद पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भाजपा पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2019 में उनकी सरकार की ओर से दिया गया 27 प्रतिशत आरक्षण भाजपा सरकारों के कार्यकाल में समाप्त हो गया। कमलनाथ ने कहा कि आरक्षण की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन वर्ष 2020 से प्रदेश की सत्ता में रही भाजपा सरकारों ने इस मामले में अदालत के सामने ओबीसी वर्ग का पक्ष प्रभावी ढंग से नहीं रखा।

    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शुक्रवार को ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग से जुड़ी याचिकाएं खारिज कर दीं। साथ ही, जिन 13 प्रतिशत पदों पर नियुक्तियां रोककर रखी गई थीं, उन पर तीन महीने के भीतर नियुक्तियां करने के निर्देश दिए। इस फैसले के बाद कांग्रेस की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई। कमलनाथ ने फैसले के संदर्भ में भाजपा सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी सरकार ने ओबीसी वर्ग के हित में आरक्षण का प्रावधान किया था, लेकिन बाद की सरकारों ने इसे सुरक्षित रखने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए।

    कमलनाथ ने कहा कि वर्ष 2019 में उनकी सरकार ने मध्य प्रदेश विधानसभा में कानून पारित कर ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया था। उनके मुताबिक, यह फैसला संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए लिया गया था। उन्होंने भाजपा नेताओं के उन बयानों पर भी आपत्ति जताई, जिनमें कांग्रेस सरकार पर जल्दबाजी में आरक्षण लागू करने का आरोप लगाया जा रहा है। कमलनाथ ने ऐसे बयानों को भ्रामक बताते हुए कहा कि इससे अदालत के आदेश की गलत व्याख्या होने की स्थिति बनती है।

    पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि वर्ष 2020 से प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं और पिछले छह वर्षों के दौरान ओबीसी की वास्तविक जनसंख्या से जुड़े सही आंकड़े अदालत के सामने नहीं रखे गए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह न्यायालय में इस मामले को मजबूती से प्रस्तुत करे। कमलनाथ के अनुसार, भाजपा नेताओं के बयानों से यह सवाल उठता है कि वर्ष 2019 में आरक्षण लागू होने के बाद उसके संरक्षण के लिए सरकार ने क्या प्रयास किए।

    कमलनाथ ने कहा कि यदि भाजपा नेताओं के दावों को सही मान लिया जाए, तो यह सवाल खड़ा होता है कि पिछले छह वर्षों में अदालत के समक्ष ओबीसी वर्ग का पक्ष रखने के लिए क्या कदम उठाए गए। उन्होंने भाजपा पर आरक्षण के मुद्दे पर जिम्मेदारी निभाने में विफल रहने का आरोप लगाया। हालांकि, अदालत में ओबीसी आरक्षण से संबंधित पक्ष रखने और आंकड़े प्रस्तुत करने को लेकर कमलनाथ ने जो आरोप लगाए, वे उनके राजनीतिक बयान का हिस्सा हैं।

    कमलनाथ ने प्रदेश सरकार से मांग की कि वह ओबीसी वर्ग के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए तत्काल सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करे। उन्होंने यह भी कहा कि विधानसभा में नया कानून पारित करके 27 प्रतिशत आरक्षण बहाल किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, आरक्षण को सुरक्षित रखने के लिए सरकार को न्यायिक और विधायी स्तर पर कदम उठाने चाहिए। हाई कोर्ट के फैसले के बाद कमलनाथ की यह मांग मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच सामने आई है।

  • OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के लिए सरकार ने मांगा दो साल का समय

    OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के लिए सरकार ने मांगा दो साल का समय

    नई दिल्ली । अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC क्रीमी लेयर से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के लिए केंद्र सरकार ने दो साल का समय मांगा है। सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि फैसले को लागू करने की प्रक्रिया इस तरह तय की जानी चाहिए, जिससे पहले से चल रही और पुरानी भर्ती प्रक्रियाओं पर अचानक असर न पड़े। अदालत ने केंद्र की इस मांग पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है।

    सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को OBC क्रीमी लेयर से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। अदालत ने स्पष्ट किया था कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम यानी PSU या निजी क्षेत्र में कार्यरत माता या पिता के वेतन अथवा आय को अकेले ही इस आधार के रूप में नहीं माना जा सकता कि संबंधित परिवार OBC क्रीमी लेयर के दायरे में आता है। अदालत ने क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए माता-पिता के पद और उनकी श्रेणी की स्थिति के साथ आय या संपत्ति से जुड़े निर्धारित मानकों को भी ध्यान में रखने की बात कही थी।

    इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सरकार का पक्ष रखा। केंद्र ने आग्रह किया कि फैसले को भविष्य में प्रभावी तरीके से लागू करने की अनुमति दी जाए। सरकार का कहना था कि अदालत द्वारा तय किए गए कानूनी सिद्धांत को लागू करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर पर्याप्त तैयारी की जरूरत होगी।

    सरकार ने दो साल की अवधि इसलिए मांगी है ताकि नई व्यवस्था लागू करते समय पहले से शुरू हो चुकी भर्ती प्रक्रियाओं में अनिश्चितता पैदा न हो। केंद्र के अनुसार, इस अवधि में अलग-अलग परिस्थितियों से जुड़े मामलों को व्यवस्थित करने, प्रतिस्पर्धी उम्मीदवारों के अधिकारों में संतुलन बनाने और प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक बदलाव करने का अवसर मिलेगा।

    सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़े मामलों पर अलग-अलग उच्च न्यायालयों में विचार किया गया है। केंद्र की ओर से बताया गया कि विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों को सुप्रीम कोर्ट या किसी एक उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के लिए भी याचिका दायर की गई है। इससे जुड़े मामलों में एकरूपता बनाए रखने की कोशिश की जा रही है।

    सुप्रीम कोर्ट के मूल फैसले का केंद्र सरकार ने विरोध नहीं किया है। सरकार की मांग मुख्य रूप से फैसले को लागू करने की समयसीमा से जुड़ी है। केंद्र का कहना है कि दो साल का समय मिलने से व्यवस्था में अचानक बदलाव के कारण पैदा होने वाली प्रशासनिक कठिनाइयों को कम किया जा सकेगा।

    11 मार्च के फैसले में अदालत ने OBC क्रीमी लेयर की पहचान से जुड़े मानकों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। अदालत के अनुसार, केवल माता-पिता की आय को देखकर निर्णय नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके पद और सेवा की स्थिति को भी निर्धारित नियमों के साथ देखा जाना जरूरी है। इस व्यवस्था का संबंध उन उम्मीदवारों की पात्रता से है जो OBC आरक्षण का लाभ लेना चाहते हैं।

    अब केंद्र की ओर से मांगी गई दो साल की मोहलत पर आगे की सुनवाई में स्थिति स्पष्ट होगी। इस मामले का असर OBC क्रीमी लेयर की पात्रता और भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े प्रशासनिक नियमों पर पड़ सकता है।

  • मराठा आरक्षण की मांग पर जरांगे मुंबई रवाना, पुलिस की अनुमति नहीं; फडणवीस ने गणेशोत्सव में बाधा न डालने की अपील की

    मराठा आरक्षण की मांग पर जरांगे मुंबई रवाना, पुलिस की अनुमति नहीं; फडणवीस ने गणेशोत्सव में बाधा न डालने की अपील की

    नई दिल्ली ।महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे मनोज जरांगे मुंबई के लिए रवाना हो गए हैं। मुंबई पुलिस की ओर से आजाद मैदान में प्रस्तावित आंदोलन की अनुमति नहीं दिए जाने के बावजूद उन्होंने जालना जिले के अंतरवाली सराटी से मुंबई की ओर कूच किया। जरांगे के 19 सितंबर को मुंबई पहुंचने की संभावना है। उनका यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब राज्य में गणेशोत्सव चल रहा है और मुंबई में बड़ी संख्या में लोग धार्मिक आयोजनों में शामिल हो रहे हैं।

    जरांगे पिछले कई दिनों से मराठा आरक्षण की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं। मुंबई पहुंचने के लिए उन्हें करीब 400 किलोमीटर का सफर तय करना है। शुरुआती योजना में बड़ी संख्या में समर्थकों के साथ मुंबई जाने की बात थी, लेकिन पुलिस की अनुमति नहीं मिलने के बाद उन्होंने अपने साथ सीमित संख्या में लोगों को लेकर आगे बढ़ने का फैसला किया। रास्ते में मराठा समुदाय के लोग उनसे जुड़ रहे हैं। उनके काफिले के बीड के पाटोदा, अहिल्यानगर के श्रीगोंदा, पुणे के हडपसर और रायगढ़ के खोपोली से होते हुए मुंबई पहुंचने की योजना है।

    आंदोलन को देखते हुए प्रशासन ने यात्रा मार्ग पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पुलिस ने अधिकारियों, होमगार्ड और रैपिड सिटी पुलिस की टुकड़ियों समेत 648 जवानों की तैनाती की है। प्रशासन की चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि जरांगे के साथ रास्ते में बड़ी संख्या में समर्थक जुड़ सकते हैं और उनका मुंबई पहुंचना गणेशोत्सव के दौरान भीड़ तथा यातायात व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

    मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि गणेशोत्सव के दौरान आम लोगों और श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने आंदोलन के समय को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि त्योहार के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित नहीं होनी चाहिए। फडणवीस के अनुसार सरकार ने जरांगे की 13 में से 12 मांगों को स्वीकार कर उन पर कार्रवाई की है, जबकि बची हुई मांग से जुड़ी कानूनी अड़चनें भी उन्हें बताई गई हैं।

    दूसरी ओर, जरांगे ने मुंबई जाने के अपने फैसले का बचाव किया है। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की सुनवाई का हवाला देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने के अधिकार को रोका नहीं जा सकता। हाईकोर्ट ने 11 सितंबर की सुनवाई में भी लोकतंत्र और शांतिपूर्ण आंदोलन के अधिकार को लेकर टिप्पणी की थी।

    जरांगे ने सरकार पर गंभीर आरोप भी लगाए हैं और दावा किया है कि उन्हें नुकसान पहुंचाने की साजिश की जा रही है। ये आरोप उनके और सरकार के बीच बढ़ते तनाव के बीच सामने आए हैं। वहीं उनकी पत्नी सुमित्रा ने कहा कि सरकार की ओर से समय पर निर्णय नहीं लिए जाने के कारण उन्हें मुंबई जाने का फैसला करना पड़ा। उन्होंने फडणवीस की पत्नी अमृता फडणवीस से भी अपने पति से जरांगे की आरक्षण संबंधी मांग पर बात करने की अपील की।

    मराठा आरक्षण को लेकर जरांगे का आंदोलन पहले भी मुंबई तक पहुंच चुका है। अगस्त 2025 में उन्होंने आजाद मैदान में बड़ा आंदोलन किया था, जिसके बाद सरकार द्वारा उनकी कई मांगें स्वीकार किए जाने के बाद आंदोलन समाप्त हुआ था। अब एक बार फिर मुंबई की ओर उनके कूच से मराठा आरक्षण का मुद्दा राज्य में केंद्र में आ गया है।

  • जाति जनगणना पर कांग्रेस के सामने नई चुनौती, सिद्धारमैया ने कर्नाटक में 75% आरक्षण लागू करने की मांग उठाई

    जाति जनगणना पर कांग्रेस के सामने नई चुनौती, सिद्धारमैया ने कर्नाटक में 75% आरक्षण लागू करने की मांग उठाई


    नई दिल्ली ।
    कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य के जातिगत सर्वे के निष्कर्ष लागू करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने दलितों, पिछड़े समुदायों और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने की बात कही है। उनकी इस मांग ने कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।

    कांग्रेस देशभर में जातिगत जनगणना के मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साध रही है। पार्टी का तर्क है कि प्रतिनिधित्व, आरक्षण और संसाधनों के बंटवारे से जुड़े फैसलों के लिए अलग-अलग समुदायों की वास्तविक संख्या का पता होना जरूरी है।

    लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस के सामने एक अलग ही सवाल खड़ा हो गया है। राज्य में जातिगत सर्वे पहले ही हो चुका है और उसकी नई रिपोर्ट नवंबर 2025 से तैयार है। ऐसे में सिद्धारमैया अब अपनी ही पार्टी की सरकार पर इस रिपोर्ट को लागू करने का दबाव बना रहे हैं।

    बेंगलुरु में 6 सितंबर को कर्नाटक स्टेट बैकवर्ड कास्ट्स फेडरेशन के सिल्वर जुबली कार्यक्रम में सिद्धारमैया ने जातिगत सर्वे लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि अगर सभी को सामाजिक न्याय देना है तो कम से कम 75 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए।

    सिद्धारमैया का कहना है कि आरक्षण अलग-अलग समुदायों की आबादी के अनुपात में होना चाहिए। उन्होंने केवल सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की बात नहीं की। उनका तर्क है कि सामाजिक और राजनीतिक समानता के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में भी प्रतिनिधित्व जाति और आबादी के अनुरूप होना चाहिए।

    कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना को सामाजिक न्याय और समानुपातिक प्रतिनिधित्व से जोड़ रही है। पार्टी का कहना है कि विश्वसनीय जातिगत आंकड़ों के बिना सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व से जुड़े दावे अनुमानों पर आधारित रहेंगे। लेकिन कर्नाटक में स्थिति अलग है। यहां कांग्रेस सरकार के पास पहले से ही जातिगत सर्वे की रिपोर्ट मौजूद है।

    यही वजह है कि सिद्धारमैया की मांग कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है। अगर जातिगत आंकड़े सामने आने के बाद आरक्षण और प्रतिनिधित्व में बदलाव की मांग उठती है, तो राज्य में मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

    कर्नाटक में जातिगत सर्वे की शुरुआत सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री रहते उनके पिछले कार्यकाल में हुई थी। 2015 में एच. कंठराज के नेतृत्व में यह सर्वे कराया गया और 2017 तक पूरा हो गया था। हालांकि, इसकी रिपोर्ट कभी राजनीतिक रूप से लागू नहीं हो सकी। राज्य के प्रभावशाली लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों की ओर से आपत्तियां सामने आई थीं।

    इसके बाद जेडीएस-कांग्रेस और बीजेपी की सरकारों ने भी इसे बड़े नीतिगत फैसले के आधार के तौर पर आगे बढ़ाने से परहेज किया। 2023 में सिद्धारमैया के दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आया। 2025 में उनकी सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार करने की दिशा में कदम बढ़ाया, लेकिन इसके साथ आंकड़ों की विश्वसनीयता और उनकी पुरानापन को लेकर सवाल भी उठे।

    इसके बाद सिद्धारमैया ने नए सिरे से जातिगत सर्वे का आदेश दिया। नई कवायद का उद्देश्य ज्यादा मौजूदा आंकड़े तैयार करना और व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने के तौर पर भी देखा गया।

    मई में मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद सिद्धारमैया ने चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की है। इसके बावजूद जातिगत जनगणना और समानुपातिक आरक्षण का मुद्दा उठाकर उन्होंने कर्नाटक की मौजूदा कांग्रेस सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली सरकार के लिए सिद्धारमैया की मांग को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। ऐसा करने पर कांग्रेस पर यह सवाल उठ सकता है कि वह बीजेपी के खिलाफ जातिगत न्याय की बात तो करती है, लेकिन अपने शासन वाले राज्य में उसी सिद्धांत को लागू करने से पीछे क्यों हट रही है।

    दूसरी ओर, सर्वे के निष्कर्ष लागू करने की अपनी राजनीतिक कीमत भी हो सकती है। कर्नाटक में कई प्रभावशाली समुदाय आरक्षण, प्रतिनिधित्व और राज्य के संसाधनों को लेकर अलग-अलग दावे रखते हैं। ऐसे में जातिगत आंकड़ों के आधार पर बदलाव करने से कुछ समुदायों को फायदा और कुछ को नुकसान हो सकता है।

    कांग्रेस 2027 की जनगणना में जातियों की गणना को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार सवाल उठा रही है। पार्टी ने ओबीसी की संख्या दर्ज किए जाने को लेकर भी केंद्र पर निशाना साधा है और जनगणना के प्रश्नपत्र में ओबीसी श्रेणी को कथित तौर पर शामिल नहीं किए जाने को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं।

    2027 की जनगणना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य जातियों की भी राष्ट्रीय स्तर पर गणना की जाएगी। आजादी के बाद यह पहली बार होगा जब इस तरह जातियों की गणना राष्ट्रीय स्तर पर की जाएगी। लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस के सामने 2027 तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है। राज्य में पहले ही जातिगत सर्वे हो चुका है और नई रिपोर्ट भी तैयार है। यही स्थिति कांग्रेस के लिए असली परीक्षा बन गई है।

  • आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों के बीच जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने सरकार की प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों के बीच जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने सरकार की प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    नई दिल्ली ।आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर देश के कई हिस्सों में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच कांग्रेस ने जातिगत जनगणना के मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि सरकार जिस तरीके से जातिगत आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है, उससे सामाजिक न्याय के उद्देश्य को पूरा करना मुश्किल होगा। उन्होंने मौजूदा प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्ति जताते हुए व्यापक और वैज्ञानिक तरीके से जातियों की गणना कराने की मांग की है।

    जयराम रमेश ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध है तो उसे वर्तमान प्रक्रिया में बदलाव करना चाहिए। कांग्रेस का तर्क है कि जनगणना में केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित जानकारी दर्ज करने से देश की अन्य जातियों की वास्तविक सामाजिक और आर्थिक स्थिति का व्यापक आकलन नहीं हो पाएगा।

    कांग्रेस ने विशेष रूप से इस बात पर सवाल उठाया है कि जनगणना के फॉर्म में एससी और एसटी के लिए अलग व्यवस्था है, जबकि अन्य जातियों के लिए उसी तरह का स्पष्ट कॉलम उपलब्ध नहीं कराया गया है। पार्टी का कहना है कि जातिगत जनगणना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसके जरिए देश के विभिन्न सामाजिक समूहों की संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति की वास्तविक तस्वीर सामने आनी चाहिए।

    जयराम रमेश ने कहा कि जातिगत आंकड़ों का सही संग्रह सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, अलग-अलग समुदायों की जनसंख्या, सामाजिक स्थिति और आर्थिक परिस्थितियों का विश्वसनीय आकलन होने पर ही नीतियां अधिक प्रभावी ढंग से तैयार की जा सकती हैं। कांग्रेस इसी आधार पर जातियों की गिनती के लिए अधिक स्पष्ट और वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाने पर जोर दे रही है।

    कांग्रेस महासचिव ने बिहार और तेलंगाना में अपनाई गई व्यवस्थाओं का राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन करने की मांग भी रखी है। उन्होंने सरकार से विशेषज्ञों के साथ चर्चा करने और सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाने की अपील की है, ताकि जातिगत जनगणना की प्रक्रिया को लेकर व्यापक सहमति बनाई जा सके।

    उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस नेतृत्व की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जातिगत जनगणना को लेकर कई बार पत्र लिखे जा चुके हैं। कांग्रेस के मुताबिक, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 20 अगस्त को प्रधानमंत्री को 21 पन्नों का पत्र भेजा था। इससे पहले खरगे ने अप्रैल 2023 और मई 2025 में भी इस मुद्दे पर पत्र लिखे थे। कांग्रेस का दावा है कि इन पत्रों का अब तक जवाब नहीं मिला है।

    कांग्रेस ने जनगणना में जाति संबंधी जानकारी दर्ज करने के लिए अपनाए जा रहे खुले प्रश्न वाले तरीके पर भी सवाल उठाया है। पार्टी का कहना है कि यदि प्रक्रिया स्पष्ट और मानकीकृत नहीं होगी तो आंकड़ों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। कांग्रेस के अनुसार, सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए सटीक आंकड़े बेहद आवश्यक हैं।

    यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब दिल्ली, जयपुर, लखनऊ और पटना समेत कई शहरों में आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। आरक्षण के पक्ष और विरोध में सामने आ रहे अलग-अलग राजनीतिक तथा सामाजिक रुख के बीच जातिगत जनगणना का मुद्दा भी बहस के केंद्र में आ गया है।

    कांग्रेस का कहना है कि जातिगत जनगणना को व्यापक, पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से पूरा किया जाना चाहिए। पार्टी के मुताबिक, इससे सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को समझने और भविष्य की नीतियों को बेहतर आधार देने में मदद मिल सकती है। वहीं, इस मुद्दे पर सरकार की प्रक्रिया और कांग्रेस की आपत्तियों को लेकर राजनीतिक बहस आगे भी जारी रहने के आसार हैं।

  • ‘आरक्षण कोई खैरात नहीं, संवैधानिक अधिकार’, जंतर-मंतर प्रदर्शन पर बोले चिराग पासवान

    ‘आरक्षण कोई खैरात नहीं, संवैधानिक अधिकार’, जंतर-मंतर प्रदर्शन पर बोले चिराग पासवान


    पटना। जंतर-मंतर पर आरक्षण खत्म करने की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शन के बीच केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने आरक्षण को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। पटना एयरपोर्ट से दिल्ली रवाना होने से पहले मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि आरक्षण कोई खैरात नहीं, बल्कि संविधान से मिला अधिकार है। इसे किसी के कहने या मांग करने भर से खत्म नहीं किया जा सकता।

    चिराग पासवान ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य उन सामाजिक वर्गों को आगे लाना है, जिन्हें लंबे समय तक भेदभाव और वंचना का सामना करना पड़ा। उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान में इन वर्गों को चिन्हित कर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने और समान अवसर देने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया।

    ‘आज भी भेदभाव की घटनाएं सामने आती हैं’

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि समाज में आज भी भेदभाव की घटनाएं सामने आती हैं। ऐसे में आरक्षण की जरूरत और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने आरक्षण खत्म करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों की चिंताओं को भी सुने जाने की बात कही।

    चिराग ने कहा कि लोकतंत्र में किसी भी समस्या का समाधान बातचीत और संवाद के जरिए निकाला जा सकता है। प्रदर्शनकारियों के साथ बैठकर चर्चा होनी चाहिए, ताकि आरक्षण की जरूरत और इसके पीछे के उद्देश्य को लेकर बातचीत हो सके।

    ‘प्रदर्शनकारियों की बात सुनी जानी चाहिए’

    रामदास अठावले के बयान से जुड़े सवाल पर भी चिराग पासवान ने कहा कि प्रदर्शन करने वालों की बात सुनी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में संवाद बेहद जरूरी है और बातचीत के जरिए ही विवादों का समाधान निकाला जा सकता है।

    बिहार की आर्थिक स्थिति पर तेजस्वी को घेरा

    चिराग पासवान ने बिहार की आर्थिक स्थिति को लेकर तेजस्वी यादव के बयान पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि विधानसभा सत्र के दौरान विपक्ष को आंकड़ों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए थी। विपक्ष की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार पर आरोप लगाना नहीं है, बल्कि राज्य को आगे बढ़ाने में सरकार के साथ मिलकर भूमिका निभाना भी है।

    उन्होंने कहा कि बिहार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए सरकार राजस्व बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। आने वाले समय में निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा करने पर भी जोर दिया जाएगा।

    ‘डबल इंजन सरकार से बिहार को फायदा’

    चिराग पासवान ने केंद्र और राज्य में एक ही गठबंधन की सरकार को बिहार के विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार के मिलकर काम करने से राज्य को फायदा होगा। सरकार का लक्ष्य विकास को गति देने के साथ निवेश बढ़ाना और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार करना है।