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  • आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों के बीच जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने सरकार की प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों के बीच जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने सरकार की प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    नई दिल्ली ।आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर देश के कई हिस्सों में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच कांग्रेस ने जातिगत जनगणना के मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि सरकार जिस तरीके से जातिगत आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है, उससे सामाजिक न्याय के उद्देश्य को पूरा करना मुश्किल होगा। उन्होंने मौजूदा प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्ति जताते हुए व्यापक और वैज्ञानिक तरीके से जातियों की गणना कराने की मांग की है।

    जयराम रमेश ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध है तो उसे वर्तमान प्रक्रिया में बदलाव करना चाहिए। कांग्रेस का तर्क है कि जनगणना में केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित जानकारी दर्ज करने से देश की अन्य जातियों की वास्तविक सामाजिक और आर्थिक स्थिति का व्यापक आकलन नहीं हो पाएगा।

    कांग्रेस ने विशेष रूप से इस बात पर सवाल उठाया है कि जनगणना के फॉर्म में एससी और एसटी के लिए अलग व्यवस्था है, जबकि अन्य जातियों के लिए उसी तरह का स्पष्ट कॉलम उपलब्ध नहीं कराया गया है। पार्टी का कहना है कि जातिगत जनगणना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसके जरिए देश के विभिन्न सामाजिक समूहों की संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति की वास्तविक तस्वीर सामने आनी चाहिए।

    जयराम रमेश ने कहा कि जातिगत आंकड़ों का सही संग्रह सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, अलग-अलग समुदायों की जनसंख्या, सामाजिक स्थिति और आर्थिक परिस्थितियों का विश्वसनीय आकलन होने पर ही नीतियां अधिक प्रभावी ढंग से तैयार की जा सकती हैं। कांग्रेस इसी आधार पर जातियों की गिनती के लिए अधिक स्पष्ट और वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाने पर जोर दे रही है।

    कांग्रेस महासचिव ने बिहार और तेलंगाना में अपनाई गई व्यवस्थाओं का राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन करने की मांग भी रखी है। उन्होंने सरकार से विशेषज्ञों के साथ चर्चा करने और सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाने की अपील की है, ताकि जातिगत जनगणना की प्रक्रिया को लेकर व्यापक सहमति बनाई जा सके।

    उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस नेतृत्व की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जातिगत जनगणना को लेकर कई बार पत्र लिखे जा चुके हैं। कांग्रेस के मुताबिक, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 20 अगस्त को प्रधानमंत्री को 21 पन्नों का पत्र भेजा था। इससे पहले खरगे ने अप्रैल 2023 और मई 2025 में भी इस मुद्दे पर पत्र लिखे थे। कांग्रेस का दावा है कि इन पत्रों का अब तक जवाब नहीं मिला है।

    कांग्रेस ने जनगणना में जाति संबंधी जानकारी दर्ज करने के लिए अपनाए जा रहे खुले प्रश्न वाले तरीके पर भी सवाल उठाया है। पार्टी का कहना है कि यदि प्रक्रिया स्पष्ट और मानकीकृत नहीं होगी तो आंकड़ों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। कांग्रेस के अनुसार, सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए सटीक आंकड़े बेहद आवश्यक हैं।

    यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब दिल्ली, जयपुर, लखनऊ और पटना समेत कई शहरों में आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। आरक्षण के पक्ष और विरोध में सामने आ रहे अलग-अलग राजनीतिक तथा सामाजिक रुख के बीच जातिगत जनगणना का मुद्दा भी बहस के केंद्र में आ गया है।

    कांग्रेस का कहना है कि जातिगत जनगणना को व्यापक, पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से पूरा किया जाना चाहिए। पार्टी के मुताबिक, इससे सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को समझने और भविष्य की नीतियों को बेहतर आधार देने में मदद मिल सकती है। वहीं, इस मुद्दे पर सरकार की प्रक्रिया और कांग्रेस की आपत्तियों को लेकर राजनीतिक बहस आगे भी जारी रहने के आसार हैं।

  • ‘आरक्षण कोई खैरात नहीं, संवैधानिक अधिकार’, जंतर-मंतर प्रदर्शन पर बोले चिराग पासवान

    ‘आरक्षण कोई खैरात नहीं, संवैधानिक अधिकार’, जंतर-मंतर प्रदर्शन पर बोले चिराग पासवान


    पटना। जंतर-मंतर पर आरक्षण खत्म करने की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शन के बीच केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने आरक्षण को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। पटना एयरपोर्ट से दिल्ली रवाना होने से पहले मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि आरक्षण कोई खैरात नहीं, बल्कि संविधान से मिला अधिकार है। इसे किसी के कहने या मांग करने भर से खत्म नहीं किया जा सकता।

    चिराग पासवान ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य उन सामाजिक वर्गों को आगे लाना है, जिन्हें लंबे समय तक भेदभाव और वंचना का सामना करना पड़ा। उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान में इन वर्गों को चिन्हित कर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने और समान अवसर देने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया।

    ‘आज भी भेदभाव की घटनाएं सामने आती हैं’

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि समाज में आज भी भेदभाव की घटनाएं सामने आती हैं। ऐसे में आरक्षण की जरूरत और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने आरक्षण खत्म करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों की चिंताओं को भी सुने जाने की बात कही।

    चिराग ने कहा कि लोकतंत्र में किसी भी समस्या का समाधान बातचीत और संवाद के जरिए निकाला जा सकता है। प्रदर्शनकारियों के साथ बैठकर चर्चा होनी चाहिए, ताकि आरक्षण की जरूरत और इसके पीछे के उद्देश्य को लेकर बातचीत हो सके।

    ‘प्रदर्शनकारियों की बात सुनी जानी चाहिए’

    रामदास अठावले के बयान से जुड़े सवाल पर भी चिराग पासवान ने कहा कि प्रदर्शन करने वालों की बात सुनी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में संवाद बेहद जरूरी है और बातचीत के जरिए ही विवादों का समाधान निकाला जा सकता है।

    बिहार की आर्थिक स्थिति पर तेजस्वी को घेरा

    चिराग पासवान ने बिहार की आर्थिक स्थिति को लेकर तेजस्वी यादव के बयान पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि विधानसभा सत्र के दौरान विपक्ष को आंकड़ों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए थी। विपक्ष की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार पर आरोप लगाना नहीं है, बल्कि राज्य को आगे बढ़ाने में सरकार के साथ मिलकर भूमिका निभाना भी है।

    उन्होंने कहा कि बिहार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए सरकार राजस्व बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। आने वाले समय में निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा करने पर भी जोर दिया जाएगा।

    ‘डबल इंजन सरकार से बिहार को फायदा’

    चिराग पासवान ने केंद्र और राज्य में एक ही गठबंधन की सरकार को बिहार के विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार के मिलकर काम करने से राज्य को फायदा होगा। सरकार का लक्ष्य विकास को गति देने के साथ निवेश बढ़ाना और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार करना है।

  • इंडिगो वेबसाइट डाउन: टिकट बुकिंग और वेब चेक-इन प्रभावित, एक सप्ताह में दूसरी बार डिजिटल सेवाओं में आई परेशानी

    इंडिगो वेबसाइट डाउन: टिकट बुकिंग और वेब चेक-इन प्रभावित, एक सप्ताह में दूसरी बार डिजिटल सेवाओं में आई परेशानी

    नई दिल्ली । देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो की वेबसाइट और कुछ ऑनलाइन सेवाओं में शुक्रवार को एक बार फिर तकनीकी समस्या सामने आई। वेबसाइट के काम नहीं करने के कारण यात्रियों को टिकट बुक करने, वेब चेक-इन पूरा करने और अन्य डिजिटल सुविधाओं का इस्तेमाल करने में परेशानी हुई। कुछ यात्रियों ने मोबाइल एप में लॉगिन से जुड़ी समस्या की भी जानकारी दी। खास बात यह है कि एक सप्ताह के भीतर दूसरी बार एयरलाइन की ऑनलाइन सेवाएं प्रभावित हुई हैं।

    तकनीकी गड़बड़ी के दौरान कई यात्रियों के लिए बुकिंग प्रक्रिया पूरी करना मुश्किल रहा। कुछ लोगों को फ्लाइट टिकट बुक करते समय परेशानी हुई, जबकि कुछ यात्रियों ने वेब चेक-इन नहीं हो पाने की शिकायत की। इसके अलावा भुगतान प्रक्रिया पूरी होने के बाद पेमेंट कन्फर्मेशन नहीं मिलने की समस्या भी सामने आई। यात्रा के करीब पहुंच चुके यात्रियों के लिए ऑनलाइन चेक-इन में बाधा विशेष चिंता का विषय बनी।

    इंडिगो ने अपनी सेवा व्यवस्था में आ रही तकनीकी परेशानी को स्वीकार करते हुए बताया कि ऑनलाइन सेवाओं में रुक-रुककर व्यवधान आ रहा है। एयरलाइन की तकनीकी टीमें समस्या को दूर करने में जुटी हैं। कंपनी ने यात्रियों को सलाह दी कि जिन लोगों को तत्काल यात्रा संबंधी सहायता की जरूरत है, वे ग्राहक सहायता केंद्र से संपर्क करें।

    एयरलाइन ने उन यात्रियों को कुछ समय बाद दोबारा डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल करने की सलाह दी, जिनकी यात्रा तत्काल नहीं है। यात्रियों से कहा गया कि वे वेबसाइट या मोबाइल एप पर बाद में फिर से प्रयास करें। इस दौरान सोशल मीडिया पर कई उपयोगकर्ताओं ने ऑनलाइन सेवाओं में आ रही दिक्कतों को लेकर अपनी शिकायतें दर्ज कराईं।

    यह समस्या उस तकनीकी व्यवधान के कुछ ही दिन बाद सामने आई है, जिसका असर इंडिगो की मुख्य आरक्षण व्यवस्था पर पड़ा था। आरक्षण प्रणाली एयरलाइन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि टिकट बुकिंग और यात्रियों से जुड़ी कई ऑनलाइन प्रक्रियाएं इसी व्यवस्था पर निर्भर करती हैं। सिस्टम में तकनीकी बाधा आने पर एक साथ बड़ी संख्या में यात्रियों की सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

    इंडिगो की तकनीकी टीमें अपने तकनीकी सहयोगी के साथ मिलकर समस्या को प्राथमिकता के आधार पर ठीक करने में लगी हुई हैं। एयरलाइन की डिजिटल सेवाओं पर यात्रियों की निर्भरता काफी अधिक है। टिकट खरीदने से लेकर बुकिंग प्रबंधन और वेब चेक-इन तक कई प्रक्रियाएं अब ऑनलाइन पूरी की जाती हैं। ऐसे में डिजिटल सिस्टम में व्यवधान होने पर यात्रियों को वैकल्पिक सहायता की जरूरत पड़ती है।

    इंडिगो घरेलू विमानन बाजार में सबसे बड़ी हिस्सेदारी वाली एयरलाइन है। जुलाई में घरेलू बाजार में कंपनी की हिस्सेदारी करीब 67 प्रतिशत बताई गई थी। एयरलाइन का नेटवर्क देश के कई शहरों में फैला हुआ है और बड़ी संख्या में यात्री रोजाना उसकी उड़ानों से यात्रा करते हैं। इसलिए डिजिटल सिस्टम में आने वाली तकनीकी समस्या का प्रभाव व्यापक हो सकता है।

    लगातार दूसरी बार ऑनलाइन सेवाओं में रुकावट सामने आने से एयरलाइन की डिजिटल व्यवस्था की स्थिरता भी चर्चा में आ गई है। हालांकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार कंपनी ने समस्या को ठीक करने के लिए तकनीकी स्तर पर काम शुरू कर दिया है। यात्रियों के लिए फिलहाल सलाह यही है कि तत्काल सहायता की आवश्यकता होने पर ग्राहक सहायता केंद्र से संपर्क करें और अन्य यात्री कुछ समय बाद वेबसाइट या मोबाइल एप के माध्यम से अपनी प्रक्रिया दोबारा पूरी करने का प्रयास करें।

  • मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण मामले की हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी, अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा, हजारों अभ्यर्थियों की नजर

    मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण मामले की हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी, अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा, हजारों अभ्यर्थियों की नजर

    मध्य प्रदेश: में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC आरक्षण से जुड़े लंबे समय से लंबित मामले में हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई है। अदालत ने मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब इस प्रकरण में न्यायालय के अंतिम निर्णय का इंतजार किया जा रहा है। फैसले का असर OBC वर्ग के अभ्यर्थियों और आरक्षण से जुड़े विभिन्न मामलों पर पड़ने की संभावना है।

    यह मामला वर्ष 2019 से न्यायिक प्रक्रिया में लंबित बताया जा रहा है। करीब सात साल से चल रहे इस प्रकरण के कारण OBC वर्ग के अभ्यर्थियों के बीच लगातार असमंजस की स्थिति बनी हुई है। सुनवाई पूरी होने के बाद अब सभी पक्षों की निगाहें अदालत के निर्णय पर टिकी हैं।

    मामले की सुनवाई के दौरान OBC आरक्षण से संबंधित पक्षों ने अपनी दलीलें और तर्क न्यायालय के सामने रखे। OBC महासभा की ओर से भी इस प्रकरण को सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्ग के हितों से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला बताया गया है। संगठन का कहना है कि लंबे समय से लंबित रहने के कारण बड़ी संख्या में अभ्यर्थी प्रभावित हो रहे हैं।

    OBC महासभा के संस्थापक अध्यक्ष विजय कुमार ने कहा कि जबलपुर हाई कोर्ट में लंबित प्रकरण पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा है। उनके अनुसार, OBC वर्ग से जुड़े पक्षकारों और अधिवक्ताओं ने मामले में अपनी बात रखी है। अब न्यायालय के निर्णय का इंतजार है।

    मामले से जुड़े पक्ष की ओर से दावा किया गया है कि लगभग 80 से 90 हजार OBC वर्ग के बच्चे और अभ्यर्थी इस प्रकरण से प्रभावित हैं। लंबे समय से आरक्षण व्यवस्था को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने के कारण उनकी शैक्षणिक और रोजगार संबंधी संभावनाओं पर भी अनिश्चितता बनी हुई है।

    आरक्षण का मुद्दा मध्य प्रदेश में लंबे समय से राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक चर्चा का विषय रहा है। OBC वर्ग के लिए आरक्षण से संबंधित विभिन्न नियुक्तियों और शैक्षणिक अवसरों में स्थिति स्पष्ट होने को लेकर अभ्यर्थियों की नजर न्यायालय के निर्णय पर रहती है। ऐसे में फैसला सुरक्षित होने के बाद उम्मीद की जा रही है कि आगे की स्थिति न्यायिक निर्णय से स्पष्ट होगी।

    OBC महासभा ने न्यायालय से जल्द फैसला सुनाए जाने की अपील की है। संगठन का कहना है कि मामले के लंबे समय से लंबित रहने के कारण अभ्यर्थियों को अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। फैसला आने के बाद आरक्षण से संबंधित कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर स्थिति साफ हो सकेगी।

    फिलहाल हाई कोर्ट ने सुनवाई पूरी करने के बाद निर्णय सुरक्षित रखा है। अदालत कब तक फैसला सुनाएगी, इसकी निश्चित तारीख की जानकारी सामने नहीं आई है। अंतिम निर्णय आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि OBC आरक्षण से जुड़े लंबित विवाद पर न्यायालय का रुख क्या रहता है और उसका अभ्यर्थियों पर किस प्रकार प्रभाव पड़ेगा।

    करीब सात वर्षों से चल रहे इस मामले में सुनवाई पूरी होना अपने आप में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। अब OBC वर्ग के अभ्यर्थियों, संगठनों और संबंधित पक्षों की निगाहें हाई कोर्ट के फैसले पर केंद्रित हैं। निर्णय आने के बाद ही आरक्षण व्यवस्था से जुड़े आगे के कदम और प्रभावित अभ्यर्थियों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

  • तमिलनाडु विधानसभा में सीएम विजय ने परिसीमन के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया, 543 लोकसभा सीटें बनाए रखने और महिला आरक्षण की मांग

    तमिलनाडु विधानसभा में सीएम विजय ने परिसीमन के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया, 543 लोकसभा सीटें बनाए रखने और महिला आरक्षण की मांग

    नई दिल्ली ।तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने बुधवार को विधानसभा में परिसीमन के मुद्दे पर प्रस्ताव पेश करते हुए लोकसभा सीटों की मौजूदा संख्या और राज्यों के बीच सीटों के वर्तमान अनुपात को बनाए रखने की मांग की। प्रस्ताव में केंद्र से लोकसभा की कुल 543 सीटों को बरकरार रखने और इनके आधार पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की अपील की गई है।

    मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया के कारण राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव की आशंका को देखते हुए मौजूदा सीट व्यवस्था को बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने प्रस्ताव के माध्यम से केंद्र से मांग की कि लोकसभा की 543 सीटों की वर्तमान संख्या को स्थायी रूप से बरकरार रखा जाए और राज्यों के बीच सीटों का मौजूदा अनुपात भी सुरक्षित रखा जाए।

    विजय ने महिला आरक्षण को लेकर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने में अब और देरी नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार महिला आरक्षण को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ने पर इसके लागू होने में अतिरिक्त समय लग सकता है। इसलिए मौजूदा 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ही 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाना चाहिए।

    मुख्यमंत्री ने महिला आरक्षण को किसी प्रकार की रियायत मानने के बजाय संवैधानिक अधिकार बताया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए आरक्षण को जल्द लागू किया जाना आवश्यक है। विजय ने तमिलनाडु में महिलाओं की चुनावी भागीदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य में पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं ने मतदान किया है।

    विधानसभा में पेश प्रस्ताव का एक प्रमुख हिस्सा परिसीमन के संभावित प्रभावों से जुड़ा है। तमिलनाडु की ओर से यह मांग रखी गई है कि राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का वर्तमान अनुपात प्रभावित नहीं होना चाहिए। प्रस्ताव में कहा गया है कि 543 सीटों की मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखते हुए ही भविष्य में प्रतिनिधित्व से जुड़े बदलावों पर विचार किया जाना चाहिए।

    विजय की इस मांग के बीच विपक्षी दल ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेता ईपीएस ने परिसीमन के मुद्दे पर अलग रुख रखा। उन्होंने कहा कि परिसीमन में अपने आप में कुछ गलत नहीं है, लेकिन तमिलनाडु का लोकसभा में मौजूदा 7.18 प्रतिशत हिस्सा किसी भी स्थिति में कम नहीं होना चाहिए।

    इस तरह विधानसभा में परिसीमन को लेकर राज्य के प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण दोनों मुद्दे एक साथ सामने आए। मुख्यमंत्री विजय के प्रस्ताव में मौजूदा 543 लोकसभा सीटों को बनाए रखने, राज्यों के बीच वर्तमान सीट अनुपात को सुरक्षित रखने और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को जल्द लागू करने की मांग शामिल है।

    विजय ने विशेष रूप से 2029 के लोकसभा चुनाव को महिला आरक्षण लागू करने की समयसीमा के रूप में सामने रखा। उनका तर्क है कि यदि महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ जोड़कर आगे बढ़ाया गया तो इसके प्रभावी होने में देरी हो सकती है। इसलिए मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ही इसे लागू किया जाना चाहिए।

    प्रस्ताव के जरिए तमिलनाडु सरकार ने केंद्र के सामने परिसीमन को लेकर अपनी राजनीतिक और संवैधानिक चिंताएं रखी हैं। अब इस मुद्दे पर केंद्र और अन्य राज्यों के रुख के साथ आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। साथ ही महिला आरक्षण को 2029 के चुनाव से लागू करने की मांग राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व और चुनावी व्यवस्था से जुड़े विमर्श को भी प्रभावित कर सकती है।

  • प्रमोशन में आरक्षण पर नई बहस, सरकार के डेटा को कोर्ट में चुनौती दे सकता है सामान्‍य वर्ग

    प्रमोशन में आरक्षण पर नई बहस, सरकार के डेटा को कोर्ट में चुनौती दे सकता है सामान्‍य वर्ग

    जबलपुर। मध्य प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण का मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। फिलहाल हाईकोर्ट की विशेष खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले की स्थिति साफ होने के बाद ही आगे सुनवाई होगी। अदालत ने सरकार और सभी पक्षों को शीर्ष अदालत में शीघ्र सुनवाई का आग्रह करने की सलाह दी है।

    हालांकि न्यायिक प्रक्रिया फिलहाल रुकी हुई है, लेकिन दोनों पक्ष अपनी कानूनी तैयारियों में जुटे हैं। जानकारी के अनुसार, अगली सुनवाई में सरकार द्वारा प्रस्तुत क्वांटिफिएबल डेटा सबसे बड़ा विवाद का विषय बन सकता है।

    सरकार के आंकड़ों पर उठेंगे सवाल
    सामान्य वर्ग की ओर से अदालत में यह तर्क रखा जाएगा कि कई सरकारी विभागों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) का प्रतिनिधित्व पहले से पर्याप्त है। ऐसे में पदोन्नति में आरक्षण जारी रखने का आधार क्या है, इस पर सरकार से जवाब मांगा जाएगा। सूत्रों के मुताबिक, सामान्य वर्ग विभिन्न विभागों के आंकड़ों के जरिए यह साबित करने की तैयारी में है कि जहां पर्याप्त प्रतिनिधित्व मौजूद है, वहां भी आरक्षण का लाभ जारी रखा गया।

    X और Y फैक्टर पर रहेगा फोकस
    मामले में सबसे अहम मुद्दा सरकार द्वारा तय किए गए X और Y फैक्टर हैं, जिनके आधार पर प्रमोशन में आरक्षण का प्रतिशत निर्धारित किया गया है।

    SC वर्ग के लिए: कुल पद × (16 × X) ÷ 100
    ST वर्ग के लिए: कुल पद × (20 × Y) ÷ 100

    यदि X या Y का मान 1 रखा जाता है तो पूरा आरक्षण लागू होता है, जबकि कम मान होने पर आरक्षण का प्रतिशत भी घट जाता है। सामान्य वर्ग का आरोप है कि कई विभागों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व होने के बावजूद X और Y का मान कम नहीं किया गया, जिससे आरक्षण का प्रतिशत अधिक बना रहा।

    प्रक्रिया पर भी उठेंगे सवाल
    याचिकाकर्ताओं का कहना है कि X और Y तय करने के लिए कोई स्पष्ट और समान मानक नहीं अपनाया गया। समान परिस्थितियों वाले विभागों में अलग-अलग मान निर्धारित किए गए, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।

    प्रशासनिक दक्षता भी बनेगी मुद्दा

    अगली सुनवाई में प्रशासनिक दक्षता का मुद्दा भी प्रमुख रहेगा। सामान्य वर्ग का पक्ष है कि केवल एसीआर (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) के आधार पर दक्षता का आकलन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। उनका तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद-335 के अनुरूप कार्यक्षमता का व्यापक मूल्यांकन होना चाहिए।

    पांच साल तक एक ही फॉर्मूले पर आपत्ति

    सरकार द्वारा X और Y फैक्टर को पांच वर्ष तक लागू रखने के प्रावधान पर भी सवाल उठाए जाएंगे। सामान्य वर्ग का कहना है कि प्रतिनिधित्व की स्थिति समय के साथ बदलती रहती है, इसलिए पुराने आंकड़ों के आधार पर लंबे समय तक एक ही व्यवस्था लागू रखना उचित नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजर
    फिलहाल पूरे मामले की दिशा सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर निर्भर है। हाईकोर्ट ने भी संकेत दिया है कि शीर्ष अदालत की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी। हालांकि, माना जा रहा है कि अगली सुनवाई में सरकार के डेटा, X-Y फैक्टर और प्रशासनिक दक्षता जैसे मुद्दों पर विस्तृत और अहम बहस देखने को मिल सकती है, जिसका असर हजारों सरकारी कर्मचारियों पर पड़ सकता है।

  • आरक्षण पर वायरल बयान को शिल्पा शेट्टी ने बताया पूरी तरह फर्जी, लोगों से अफवाहों से बचने की अपील

    आरक्षण पर वायरल बयान को शिल्पा शेट्टी ने बताया पूरी तरह फर्जी, लोगों से अफवाहों से बचने की अपील

    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने सोशल मीडिया पर उनके नाम से वायरल हो रहे आरक्षण संबंधी कथित बयान का स्पष्ट रूप से खंडन किया है। अभिनेत्री ने कहा कि उनके नाम से प्रसारित किया जा रहा संदेश पूरी तरह मनगढ़ंत और भ्रामक है। उन्होंने लोगों से अपील की कि बिना सत्यापन के ऐसी किसी भी पोस्ट पर विश्वास न करें और अफवाहों को आगे बढ़ाने से बचें।

    हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेजी से साझा की जा रही थी, जिसमें दावा किया गया कि शिल्पा शेट्टी ने देश की आरक्षण व्यवस्था को लेकर विवादित टिप्पणी की है। पोस्ट में उनके नाम से ऐसे कथन प्रसारित किए गए, जिनमें जाति आधारित आरक्षण को समाप्त करने का समर्थन करने का दावा किया गया। यह पोस्ट वायरल होने के बाद कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चर्चा का विषय बन गई।

    मामले ने तूल पकड़ने के बाद शिल्पा शेट्टी ने स्वयं सामने आकर स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आरक्षण से जुड़े फर्जी बयानों को उनके नाम से जोड़कर प्रसारित किया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने इस पूरे दावे को पूरी तरह झूठा, मनगढ़ंत और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए कहा कि इसका उनकी वास्तविक सोच या किसी भी आधिकारिक बयान से कोई संबंध नहीं है।

    अभिनेत्री ने अपने संदेश में लोगों से विशेष रूप से आग्रह किया कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रही अपुष्ट और भ्रामक जानकारियों के झांसे में न आएं। उन्होंने कहा कि किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति के नाम से साझा किए जा रहे बयान को सच मानने से पहले उसकी पुष्टि करना जरूरी है। उनका कहना था कि गलत जानकारी न केवल भ्रम पैदा करती है, बल्कि संबंधित व्यक्ति की छवि को भी प्रभावित कर सकती है।

    वायरल पोस्ट में यह दावा किया गया था कि शिल्पा शेट्टी ने आरक्षण व्यवस्था को लेकर अपनी राय व्यक्त करते हुए उसे समाप्त किए जाने का समर्थन किया है। हालांकि अभिनेत्री ने साफ शब्दों में कहा कि उन्होंने ऐसा कोई बयान कभी नहीं दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर प्रसारित किया जा रहा संदेश पूरी तरह फर्जी है और उसे जानबूझकर उनके नाम से जोड़ा गया है।

    सोशल मीडिया पर फर्जी पोस्ट और गलत जानकारी फैलाने की घटनाएं पिछले कुछ समय में लगातार बढ़ी हैं। कई बार सार्वजनिक हस्तियों के नाम और तस्वीरों का इस्तेमाल कर ऐसे संदेश प्रसारित किए जाते हैं, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति को सामने आकर सफाई देनी पड़ती है ताकि गलत जानकारी को रोका जा सके और लोगों के बीच सही तथ्य पहुंच सकें।

    शिल्पा शेट्टी के इस स्पष्टीकरण के बाद यह साफ हो गया है कि उनके नाम से प्रसारित किया गया कथित आरक्षण संबंधी बयान वास्तविक नहीं है। उन्होंने लोगों से जिम्मेदारी के साथ सोशल मीडिया का उपयोग करने और किसी भी विवादित दावे को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करने की अपील की है। उनका यह संदेश डिजिटल माध्यमों पर फैलने वाली भ्रामक सूचनाओं के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

    वर्क फ्रंट की बात करें तो शिल्पा शेट्टी हाल ही में कन्नड़ फिल्म ‘केडी: द डेविल’ में नजर आई थीं। इसके अलावा उन्होंने हाल ही में एक कुकिंग रियलिटी शो की मेजबानी भी की, जिसका प्रसारण समाप्त हो चुका है। अभिनय और टेलीविजन के साथ-साथ वह सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहती हैं और समय-समय पर अपने प्रशंसकों से सीधे संवाद करती हैं।

  • आरक्षण नीति पर डिजिटल मंचों पर छिड़ी नई बहस के बीच सोशल मीडिया अभियान तेजी से युवा आबादी को कर रहा आकर्षित

    आरक्षण नीति पर डिजिटल मंचों पर छिड़ी नई बहस के बीच सोशल मीडिया अभियान तेजी से युवा आबादी को कर रहा आकर्षित

    नई दिल्ली । परीक्षा प्रणालियों में सुधार की मांगों के बाद अब युवाओं ने देश की मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को लेकर सोशल मीडिया मंचों पर एक नया व्यापक अभियान छेड़ दिया है। डिजिटल माध्यमों से शुरू हुई इस पहल को महज दो दिनों के भीतर लाखों की संख्या में युवाओं का समर्थन मिला है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बने विशेष पेज ने बहुत ही कम समय में रिकॉर्ड फॉलोअर्स जुटाकर इस विषय को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। इस डिजिटल गोलबंदी को केवल ऑनलाइन तक सीमित न रखते हुए आयोजकों ने अब इसे राजधानी के जंतर-मंतर पर प्रत्यक्ष प्रदर्शन में बदलने की तैयारी शुरू कर दी है।

    इस पूरे अभियान का मुख्य उद्देश्य मौजूदा जातिगत आरक्षण प्रणाली के स्थान पर पूर्णतः योग्यता और आर्थिक स्थिति पर आधारित चयन प्रक्रिया को लागू कराना है। अभियान से जुड़े प्रतिनिधियों का तर्क है कि प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों में निष्पक्ष अवसरों के लिए पारदर्शी नीतियां आवश्यक हैं। इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए एक समर्पित डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वेबसाइट तैयार की गई है, जिसके माध्यम से युवाओं को संगठित किया जा रहा है। अलग-अलग राज्यों से जुड़ रहे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र इस मंच पर खुलकर अपनी प्रतिक्रियाएं और अनुभव साझा कर रहे हैं।

    दूसरी ओर, इस ऑनलाइन पहल के सामने आते ही सोशल मीडिया पर नीति के पक्षधर समूहों की ओर से भी तीखी प्रतिक्रियाएं दर्ज की जा रही हैं। आरक्षण व्यवस्था का समर्थन करने वाले वर्गों का कहना है कि जब तक समाज से सामाजिक विषमताएं पूरी तरह समाप्त नहीं हो जातीं, तब तक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए यह संवैधानिक ढांचा अनिवार्य है। इसके जवाब में कई नए पेज और ऑनलाइन समूह भी सक्रिय हो गए हैं जो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के सामाजिक महत्व को रेखांकित कर रहे हैं। इस प्रकार डिजिटल स्पेस में दोनों पक्षों के बीच विचारों का तीखा आदान-प्रदान देखने को मिल रहा है।

    युवाओं के इस तेजी से बढ़ते रुख को देखते हुए सामाजिक और नीतिगत विश्लेषक इसे नए दौर का डिजिटल जनआंदोलन मान रहे हैं। अभियान के आयोजक अब इस ऑनलाइन समर्थन को एक संगठित ढांचा देने के लिए ऑनलाइन सदस्यता और देशव्यापी नेटवर्किंग पर बल दे रहे हैं। आने वाले समय में यदि यह अभियान दिल्ली की सड़कों तक पहुंचता है, तो यह प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों के लिए एक नई चुनौती पेश कर सकता है। फिलहाल, डिजिटल मंचों पर यह विषय शीर्ष रुझानों में बना हुआ है और युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है।

  • मानसून सत्र से पहले रामदास अठावले का बड़ा दावा, बोले- एनडीए के पास दो-तिहाई बहुमत, महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक होंगे पारित

    मानसून सत्र से पहले रामदास अठावले का बड़ा दावा, बोले- एनडीए के पास दो-तिहाई बहुमत, महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक होंगे पारित


    नई दिल्ली ।
    संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने महत्वपूर्ण विधेयकों को लेकर अपना आत्मविश्वास जाहिर किया है। केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) के प्रमुख रामदास अठावले ने दावा किया है कि अब एनडीए के पास संसद में दो-तिहाई बहुमत है, जिसके आधार पर महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने का रास्ता पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो गया है।

    अठावले ने कहा कि पिछले संसदीय सत्र में इन विधेयकों को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका था, जिसके कारण वे पारित नहीं हो पाए। उनके अनुसार उस समय विपक्षी दलों ने एकजुट होकर संविधान संशोधन प्रस्तावों का विरोध किया था। अब राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव आया है और सरकार को पहले की तुलना में अधिक समर्थन मिलने की संभावना है।

    उन्होंने विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को संसद के दोनों सदनों से पारित कराया जा सकता है। उनका कहना है कि सरकार इन महत्वपूर्ण प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है और गठबंधन के सहयोगी दल भी इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभाएंगे।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि संसद में मौजूदा संख्या बल के आधार पर एनडीए पहले से अधिक मजबूत स्थिति में है। उन्होंने दावा किया कि कुछ दलों और सांसदों के समर्थन से गठबंधन का आंकड़ा दो-तिहाई बहुमत तक पहुंच गया है। इसी आधार पर उन्होंने उम्मीद जताई कि संविधान संशोधन से जुड़े लंबित विधेयकों को इस बार आवश्यक समर्थन प्राप्त होगा।

    अठावले ने यह भी कहा कि महिला आरक्षण लागू होने से वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और उन्हें संवैधानिक रूप से निर्धारित प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। उनके अनुसार यह कदम लोकतांत्रिक व्यवस्था को और अधिक समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।

    परिसीमन के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि समय-समय पर जनसंख्या और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाना आवश्यक होता है। उनका कहना था कि परिसीमन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का नियमित हिस्सा है और लंबे अंतराल के बाद इसे लागू करना आवश्यक माना जाता है ताकि प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित और प्रभावी बन सके।

    उन्होंने विपक्षी दलों से भी अपील की कि राष्ट्रीय महत्व के इन विधेयकों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर देखा जाए। उनके अनुसार महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने और निर्वाचन व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने जैसे विषय व्यापक जनहित से जुड़े हैं, इसलिए इन पर सकारात्मक सहयोग मिलना चाहिए।

    उल्लेखनीय है कि पिछले संसदीय सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन प्रस्ताव अपेक्षित समर्थन नहीं जुटा सके थे। इसके बाद से इन विधेयकों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं लगातार जारी हैं। अब मानसून सत्र से पहले केंद्रीय मंत्री के इस दावे ने राजनीतिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है।

    आगामी संसद सत्र में सरकार की रणनीति, विपक्ष का रुख और सदन में संख्या बल की वास्तविक स्थिति पर सभी की नजरें रहेंगी। यदि सरकार आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल रहती है तो महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर संसद में निर्णायक प्रगति देखने को मिल सकती है।

  • 15 जून से शुरू होंगे भीमाशंकर के दर्शन, उमड़ने वाली भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने लागू किए नए नियम

    15 जून से शुरू होंगे भीमाशंकर के दर्शन, उमड़ने वाली भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने लागू किए नए नियम

    नई दिल्ली। भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख स्थान रखने वाले महाराष्ट्र के पुणे स्थित प्रसिद्ध भीमाशंकर मंदिर के कपाट आगामी 15 जून 2026 से श्रद्धालुओं के लिए दोबारा खोल दिए जाएंगे। विकास और जीर्णोद्धार कार्यों के चलते पिछले करीब पांच महीनों से इस ऐतिहासिक मंदिर में आम भक्तों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगी हुई थी। मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन ने व्यापक स्तर पर चल रहे निर्माण कार्यों को सुचारू रूप से पूरा करने और सुरक्षा मानकों को पुख्ता करने के उद्देश्य से जनवरी महीने से ही मंदिर को बंद रखने का निर्णय लिया था। अब बुनियादी ढांचे के विकास का पहला चरण पूरा होने के बाद शिव भक्तों का लंबा इंतजार समाप्त होने जा रहा है और मंदिर परिसर एक बार फिर जय भोलेनाथ के जयकारों से गुंजायमान होने के लिए तैयार है।

    इस धार्मिक स्थल को अस्थाई रूप से बंद किए जाने का मुख्य कारण आगामी वर्ष 2027 में नासिक के त्र्यंबकेश्वर तीर्थ में आयोजित होने वाला सिंहस्थ कुंभ मेला है। इस वैश्विक आयोजन के दौरान महाराष्ट्र के सभी प्रमुख और पौराणिक तीर्थस्थलों पर देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि होने की संभावना है। इसी भविष्यगामी भीड़ प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन द्वारा भीमाशंकर मंदिर परिसर में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू करवाए गए थे। इन पांच महीनों की अवधि के दौरान मंदिर के मुख्य मुख्य मार्ग, प्रवेश व निकास द्वारों को चौड़ा करने के साथ-साथ श्रद्धालुओं के ठहरने और विश्राम करने के लिए विशेष बुनियादी सुविधाओं का तेजी से विस्तार किया गया है ताकि कुंभ मेले के समय किसी भी प्रकार की अव्यवस्था या दुर्घटना की स्थिति उत्पन्न न हो।

    प्रशासनिक अधिकारियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार भीमाशंकर मंदिर में दर्शन व्यवस्था को पहले से अधिक सुगम और सुरक्षित बनाने के लिए कई कड़े और नए नियम भी लागू किए जा रहे हैं। अब यहां आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए पूर्व ऑनलाइन पंजीकरण कराना पूरी तरह से अनिवार्य कर दिया गया है। दर्शन के लिए स्लॉट बुक करने की ऑनलाइन प्रक्रिया 5 जून 2026 से मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर लाइव कर दी जाएगी। मंदिर प्रबंधन समिति ने स्पष्ट किया है कि शुरुआती दौर में प्रतिदिन केवल सीमित संख्या में ही पंजीकृत श्रद्धालुओं को गर्भगृह और मुख्य परिसर में प्रवेश की अनुमति दी जाएगी, जिससे कतार प्रबंधन को बेहतर ढंग से संभाला जा सके और वीआईपी व आम भक्तों के बीच संतुलन बना रहे।

    प्रशासन ने देश भर से आने वाले शिव भक्तों से अपील की है कि वे मंदिर के नए नियमों और सुरक्षा दिशा-निर्देशों का पूरी निष्ठा से पालन करें। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग न केवल एक महान धार्मिक केंद्र है, बल्कि यह अपने अलौकिक प्राकृतिक सौंदर्य, घने जंगलों और वन्यजीव अभ्यारण्य के लिए भी दुनिया भर के पर्यटकों और ट्रैकर्स के बीच बेहद लोकप्रिय है। सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित होने के कारण यहां पहुंचने का मार्ग पहाड़ी और घुमावदार है। श्रद्धालुओं की यात्रा को सुगम बनाने के लिए पुणे जंक्शन और कर्जत रेलवे स्टेशन से राज्य परिवहन की विशेष बसों और टैक्सियों की संख्या में भी बढ़ोतरी की जा रही है, जिससे जून के महीने में मानसून की शुरुआत के साथ आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी तरह की परिवहन संबंधी समस्या का सामना न करना पड़े।