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  • फीफा विश्व कप से बाहर होते ही इक्वाडोर में बड़ा फैसला, मेक्सिको से हार के बाद हेड कोच सेबेस्टियन बेकासे ने दिया इस्तीफा

    फीफा विश्व कप से बाहर होते ही इक्वाडोर में बड़ा फैसला, मेक्सिको से हार के बाद हेड कोच सेबेस्टियन बेकासे ने दिया इस्तीफा

    नई दिल्ली । फीफा विश्व कप 2026 में मेक्सिको के हाथों राउंड ऑफ 32 में मिली हार के बाद इक्वाडोर फुटबॉल टीम में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। टीम के मुख्य कोच सेबेस्टियन बेकासे ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि विश्व कप में तय लक्ष्य हासिल नहीं हो सके, इसलिए पद छोड़ना उचित निर्णय है। उनके अनुसार विश्व कप अभियान की समाप्ति के साथ ही उनका अनुबंध भी समाप्त होना था और इसी कारण उन्होंने अपने कार्यकाल का समापन करने का फैसला लिया।

    मेक्सिको के खिलाफ खेले गए नॉकआउट मुकाबले में इक्वाडोर को 2-0 से हार का सामना करना पड़ा। इस हार के साथ टीम का विश्व कप अभियान समाप्त हो गया। मैच के बाद आयोजित प्रेस वार्ता में बेकासे ने कहा कि वह इक्वाडोर फुटबॉल महासंघ और उसके नेतृत्व के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर दिया। उन्होंने खिलाड़ियों, सहयोगी स्टाफ और पूरे देश का धन्यवाद करते हुए कहा कि यह उनके लिए यादगार अनुभव रहा और टीम के साथ बिताया गया समय हमेशा विशेष रहेगा।

    कोच ने स्वीकार किया कि नॉकआउट मुकाबले में मेक्सिको ने हर विभाग में बेहतर प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि उनकी टीम अपने स्वाभाविक खेल का स्तर नहीं दिखा सकी और प्रतिद्वंद्वी जीत का हकदार था। उनके अनुसार विश्व कप जैसे बड़े मंच पर छोटी-छोटी गलतियां भी भारी पड़ती हैं और इस मुकाबले में टीम अपेक्षित प्रदर्शन करने में सफल नहीं रही।

    सेबेस्टियन बेकासे ने अगस्त 2024 में इक्वाडोर की जिम्मेदारी संभाली थी। उस समय टीम दक्षिण अमेरिकी क्वालीफाइंग अभियान में कठिन दौर से गुजर रही थी। उनके नेतृत्व में इक्वाडोर ने शानदार वापसी करते हुए क्वालीफाइंग तालिका में अर्जेंटीना के बाद दूसरा स्थान हासिल किया। टीम ने पूरे अभियान में मजबूत रक्षात्मक प्रदर्शन किया और 18 क्वालीफाइंग मुकाबलों में केवल पांच गोल खाए। इस दौरान उसने कोलंबिया, उरुग्वे और ब्राजील जैसी मजबूत टीमों से बेहतर प्रदर्शन कर अपनी क्षमता का परिचय दिया।

    बेकासे के कार्यकाल का रिकॉर्ड भी संतुलित और प्रभावशाली रहा। उनके नेतृत्व में इक्वाडोर ने 24 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में नौ जीत दर्ज की, 12 मैच ड्रॉ रहे और केवल तीन मुकाबलों में हार मिली। विश्व कप से पहले टीम लगातार 19 मैचों तक अपराजित रही थी, जिससे उससे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीदें काफी बढ़ गई थीं।

    विश्व कप अभियान की शुरुआत हालांकि उम्मीद के अनुरूप नहीं रही। शुरुआती मुकाबले में आइवरी कोस्ट से हार और कुराकाओ के खिलाफ ड्रॉ के बाद टीम की आलोचना हुई। इसके बावजूद इक्वाडोर ने अंतिम ग्रुप मैच में जर्मनी को 2-1 से हराकर शानदार वापसी की और सर्वश्रेष्ठ तीसरे स्थान वाली टीमों में शामिल होकर राउंड ऑफ 32 में जगह बनाई। टीम की इस उपलब्धि पर इक्वाडोर सरकार ने राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा भी की थी।

    हालांकि नॉकआउट चरण में मेक्सिको के खिलाफ हार के साथ अभियान समाप्त हो गया और इसके तुरंत बाद मुख्य कोच ने पद छोड़ने का फैसला लिया। अब इक्वाडोर फुटबॉल महासंघ के सामने नए मुख्य कोच की नियुक्ति और आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए टीम की नई रणनीति तैयार करने की चुनौती होगी।

  • UP: लखनऊ अग्निकांड के बाद कानपुर में चला विशेष अभियान, फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थान सील

    UP: लखनऊ अग्निकांड के बाद कानपुर में चला विशेष अभियान, फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थान सील


    कानपुर।
    उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की राजधानी लखनऊ (Lucknow) में कोचिंग संस्थान (Coaching Institute) से जुड़े हादसे के बाद कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) ने शहर के प्रमुख कोचिंग हब काकादेव में बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू कर दी है. सोमवार को चलाए गए विशेष अभियान (Special Campaign) के दौरान फिजिक्स वाला समेत 22 कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया गया. जांच में इन संस्थानों में भवन और सुरक्षा संबंधी मानकों के उल्लंघन की बात सामने आने पर यह कार्रवाई की गई।

    केडीए अधिकारियों की टीम ने अलग-अलग क्षेत्रों में निरीक्षण कर उन संस्थानों को चिह्नित किया, जहां आवश्यक नियमों का पालन नहीं किया जा रहा था. कार्रवाई के दौरान संस्थानों को खाली कराया गया और बाद में उन्हें सील कर दिया गया।

    प्राधिकरण के अनुसार, अभियान के तहत विभिन्न जोनों में एक साथ कार्रवाई की गई. पहले चरण में 22 संस्थानों को चिह्नित किया गया है, जबकि अन्य कोचिंग संस्थानों की भी जांच की जा रही है. अधिकारियों का कहना है कि मानकों की अनदेखी पाए जाने पर आगे भी इसी तरह की कार्रवाई जारी रहेगी।

    सील किए गए संस्थानों में फिजिक्स वाला, वर्कस्पेस, महेंद्राज और केमिस्ट्री वाले संजीव राठौर जैसे चर्चित नाम शामिल हैं. कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी मौके पर मौजूद रहे। वहीं, इस कार्रवाई के बाद स्थानीय लोगों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल भी उठाए हैं. उनका कहना है कि शहर में लंबे समय से अनेक कोचिंग संस्थान बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतजामों और निर्धारित मानकों के संचालित हो रहे हैं, लेकिन नियमित जांच नहीं की जाती।

    लोगों का आरोप है कि किसी बड़े हादसे के बाद ही विभाग सक्रिय होता है और फिर कुछ समय तक अभियान चलाकर कार्रवाई की जाती है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि समय-समय पर निरीक्षण और नियमों के अनुपालन की समीक्षा होती रहे, तो ऐसी स्थिति पैदा होने से पहले ही कमियों को दूर किया जा सकता है और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

  • राष्ट्रीय कार्यसमिति में शामिल होने के महज 7 दिन बाद ज्योतिप्रिय मलिक का इस्तीफा, TMC के भीतर बढ़ीं राजनीतिक अटकलें

    राष्ट्रीय कार्यसमिति में शामिल होने के महज 7 दिन बाद ज्योतिप्रिय मलिक का इस्तीफा, TMC के भीतर बढ़ीं राजनीतिक अटकलें


    नई दिल्ली ।
    पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय नई हलचल पैदा हो गई जब तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री ज्योतिप्रिय मलिक ने पार्टी के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्हें हाल ही में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति में शामिल किया गया था। राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी मिलने के कुछ ही दिनों बाद संगठनात्मक पदों से दूरी बनाने के उनके फैसले ने राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

    ज्योतिप्रिय मलिक ने अपने इस्तीफे के पीछे स्वास्थ्य संबंधी कारणों को मुख्य वजह बताया है। उन्होंने कहा कि लंबे समय से स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं और चिकित्सकों ने उन्हें सक्रिय राजनीतिक और संगठनात्मक गतिविधियों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में पार्टी संगठन की जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन करना उनके लिए संभव नहीं रह गया है।

    मलिक ने बताया कि वे लंबे समय से मधुमेह की बीमारी से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं के कारण उनकी किडनी भी प्रभावित हुई है, जिसके चलते नियमित चिकित्सा निगरानी और उपचार की आवश्यकता बनी हुई है। इसी कारण उन्होंने संगठनात्मक जिम्मेदारियों से मुक्त होने का निर्णय लिया ताकि स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान दिया जा सके। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका पार्टी से वैचारिक संबंध और निष्ठा पहले की तरह बनी रहेगी।

    पश्चिम बंगाल की राजनीति में ज्योतिप्रिय मलिक का लंबा राजनीतिक अनुभव रहा है। उन्होंने विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर सक्रिय रहने वाले नेताओं में उनकी पहचान रही है। लंबे समय तक विधायक रहने के साथ-साथ उन्होंने राज्य सरकार में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारियां भी संभाली थीं।

    पिछले कुछ वर्षों में उनका नाम उस समय व्यापक चर्चा में आया था जब राशन वितरण से जुड़े कथित घोटाले की जांच के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने लंबा समय हिरासत और न्यायिक प्रक्रिया के बीच बिताया। बाद में उन्हें जमानत मिली और वे सक्रिय राजनीति में लौटे। हालांकि जमानत मिलने के बाद उन्हें सरकार में कोई नई प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी।

    हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें राजनीतिक झटका भी लगा, जब उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र में हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताते हुए राष्ट्रीय कार्यसमिति में स्थान दिया था। यही कारण है कि कार्यसमिति में शामिल होने के कुछ दिनों के भीतर उनका इस्तीफा राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का विषय बन गया है।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मलिक का इस्तीफा फिलहाल स्वास्थ्य कारणों से जुड़ा निर्णय बताया जा रहा है, लेकिन इसका संगठनात्मक और राजनीतिक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। तृणमूल कांग्रेस के लिए यह एक ऐसे नेता का संगठनात्मक स्तर पर पीछे हटना है, जिसने लंबे समय तक पार्टी के विस्तार और चुनावी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई है।

    फिलहाल पार्टी की ओर से इस इस्तीफे को व्यक्तिगत और स्वास्थ्य संबंधी निर्णय के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि ज्योतिप्रिय मलिक संगठनात्मक राजनीति से कितनी दूरी बनाए रखते हैं और भविष्य में उनकी राजनीतिक भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनके इस कदम पर सभी की नजर बनी हुई है।

  • भाजपा से अलग हुए के. अन्नामलाई, गठबंधन राजनीति से नाराजगी बनी वजह; नई राजनीतिक पारी की अटकलें तेज

    भाजपा से अलग हुए के. अन्नामलाई, गठबंधन राजनीति से नाराजगी बनी वजह; नई राजनीतिक पारी की अटकलें तेज

    नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजनीति में शुक्रवार को उस समय बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया जब भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे के. अन्नामलाई ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने उनका इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही पार्टी में अन्नामलाई का कई वर्षों का राजनीतिक सफर समाप्त हो गया है और राज्य की राजनीति में नए समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    भाजपा की ओर से जारी आधिकारिक बयान में बताया गया कि के. अन्नामलाई ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा सौंप दिया था। राष्ट्रीय नेतृत्व ने उनके निर्णय पर विचार करने के बाद उसे स्वीकार कर लिया। पार्टी की ओर से जारी संक्षिप्त बयान में उनके योगदान की सराहना भी की गई है।

    अन्नामलाई का इस्तीफा ऐसे समय में सामने आया है जब उन्होंने हाल ही में नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की थी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए मनाने की कोशिश की थी। हालांकि बातचीत के बावजूद कोई सहमति नहीं बन सकी और अंततः उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया।

    सूत्रों के अनुसार अन्नामलाई आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर सकते हैं, जिसमें वह अपने राजनीतिक भविष्य और आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा करेंगे। उनके अगले कदम को लेकर राजनीतिक हलकों में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि अभी तक उन्होंने किसी नई पार्टी के गठन या किसी अन्य दल में शामिल होने को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया है।

    पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने वर्ष 2020 में अपनी सरकारी सेवा छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। अपनी तेजतर्रार छवि, आक्रामक राजनीतिक शैली और जमीनी सक्रियता के कारण वह बहुत कम समय में तमिलनाडु भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शामिल हो गए। वर्ष 2021 में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिसके बाद उन्होंने संगठन विस्तार और कार्यकर्ता आधार मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया।

    उनके नेतृत्व में भाजपा ने राज्य में अपनी राजनीतिक उपस्थिति बढ़ाने के लिए कई अभियान चलाए। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ने को भी उनकी रणनीति और मेहनत का परिणाम माना गया था। हालांकि सीटों में इसका सीधा लाभ नहीं मिल सका। इसके बावजूद अन्नामलाई को भाजपा के उभरते राष्ट्रीय चेहरों में गिना जाने लगा था।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एआईएडीएमके के साथ गठबंधन को लेकर अन्नामलाई और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद समय के साथ गहराते गए। माना जा रहा है कि वह गठबंधन की रणनीति से पूरी तरह सहमत नहीं थे। उनके समर्थकों का तर्क है कि भाजपा ने स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की दिशा में जो प्रगति की थी, गठबंधन की राजनीति के कारण उसे अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया।

    हाल के महीनों में चेन्नई और कोयंबटूर सहित कई शहरों में अन्नामलाई के समर्थन में पोस्टर लगाए गए थे, जिनमें उन्हें भविष्य के बड़े नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इससे उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई थीं। विधानसभा चुनाव में सक्रिय भूमिका न निभाने के बाद से ही उनके अगले कदम को लेकर अटकलों का दौर जारी था।

    के. अन्नामलाई का इस्तीफा केवल एक नेता के पार्टी छोड़ने की घटना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे तमिलनाडु में भाजपा की भविष्य की रणनीति और संगठनात्मक दिशा से जोड़कर भी देखा जा रहा है। अब सभी की नजरें उनकी प्रस्तावित प्रेस कॉन्फ्रेंस और आने वाले राजनीतिक फैसलों पर टिकी हैं, जो राज्य की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दे सकते हैं।

  • LS में AAP को लग सकता है बड़ा झटका…. मजीठिया का दावा- इस्तीफा देने को तैयार 2 MP

    LS में AAP को लग सकता है बड़ा झटका…. मजीठिया का दावा- इस्तीफा देने को तैयार 2 MP


    चंडीगढ़।
    आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party- AAP) के लिए पंजाब में सियासी संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। राज्यसभा (Rajya Sabha) में अपने सांसदों की बड़ी बगावत का सामना कर रही पार्टी को अब निचले सदन (लोकसभा) में भी बड़े झटके का सामना करना पड़ सकता है। शिरोमणि अकाली दल (Shiromani Akali Dal- SAD) के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने एक सनसनीखेज दावा करते हुए कहा है कि पंजाब से AAP के 2 लोकसभा सांसद भी पार्टी से इस्तीफा देने की तैयारी में हैं।

    बिक्रम सिंह मजीठिया ने दावा किया है कि आम आदमी पार्टी में मची भगदड़ केवल उच्च सदन (राज्यसभा) तक सीमित नहीं रहने वाली है। उनके अनुसार, पंजाब में AAP सरकार की कार्यप्रणाली, नेतृत्व की अनदेखी और अंदरूनी कलह से नाराज होकर अब लोकसभा के 2 सांसद भी जल्द ही इस्तीफा दे सकते हैं।

    2024 के लोकसभा चुनावों में पंजाब से आम आदमी पार्टी के केवल 3 सांसद ही जीतकर संसद पहुंचे थे। ये सांसद गुरमीत सिंह मीत हेयर, मलविंदर सिंह कंग और राज कुमार चब्बेवाल हैं। अगर मजीठिया का यह दावा सच साबित होता है और 2 सांसद इस्तीफा दे देते हैं, तो यह लोकसभा में आम आदमी पार्टी के लगभग सफाए के बराबर होगा।

    मजीठिया ने एक पोस्ट में लिखा, ‘एक और दिन, एक और विदाई की तैयारी… सूत्रों के मुताबिक, आम आदमी पार्टी के 2 लोकसभा सांसद जल्द ही पार्टी छोड़कर जा सकते हैं। ‘बार-बार सफर करने वालों’ की यह सूची बस बढ़ती ही जा रही है।’


    राज्यसभा में लगा करारा झटका

    अकाली दल के नेता का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पंजाब AAP इतिहास के अपने सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। हाल ही में पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने एक साथ बगावत कर दी है। प्रमुख बागी नेता: इनमें पार्टी के मुख्य रणनीतिकार रहे राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल और पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह जैसे बड़े चेहरे शामिल हैं, जिन्होंने भाजपा (BJP) का दामन थाम लिया है।


    पंजाब की भगवंत मान सरकार पर मंडराता खतरा?

    बिक्रम सिंह मजीठिया और अन्य विपक्षी दल इस स्थिति का पूरा राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। मजीठिया ने इस भगदड़ को AAP सरकार के पतन की शुरुआत बताया है। हाल ही में मजीठिया ने कहा है कि सांसदों के बाद अब बड़ी संख्या में AAP के विधायक भी पार्टी छोड़ने की कतार में हैं, जो जल्द ही भाजपा या अन्य दलों में शामिल हो सकते हैं।


    फ्लोर टेस्ट की मांग

    अकाली दल ने दावा किया है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार जल्द ही अल्पमत में आ सकती है। इसके मद्देनजर उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत मान से विधानसभा में ‘फ्लोर टेस्ट’ (बहुमत परीक्षण) कर अपना बहुमत साबित करने की मांग की है। विपक्ष का आरोप है कि ‘बदलाव’ का नारा देकर सत्ता में आई AAP की सरकार अब भ्रष्टाचार, लचर कानून-व्यवस्था और गुटबाजी का शिकार हो चुकी है, जिसके चलते उनके अपने ही संस्थापक सदस्य और नेता “डूबते जहाज” से कूद रहे हैं।

    मुख्यमंत्री भगवंत मान और आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इस बगावत को सिरे से खारिज करते हुए बागी नेताओं को ‘गद्दार’ करार दिया है। उनका कहना है कि जो लोग छोड़कर गए हैं उनका अपना कोई जनाधार नहीं था और पंजाब सरकार को विधायकों का पूर्ण समर्थन प्राप्त है। हालांकि, 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले यह राजनीतिक अस्थिरता आम आदमी पार्टी के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। यदि लोकसभा सांसदों के इस्तीफे की खबर हकीकत में बदलती है, तो यह पार्टी के लिए मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक रूप से एक बहुत बड़ा नुकसान साबित होगा।

  • Assam: प्रद्युत बोरदोलोई ने इस्तीफे की बताई वजह, बोले- कांग्रेस में अकेलापन और अपमानित महसूस किया

    Assam: प्रद्युत बोरदोलोई ने इस्तीफे की बताई वजह, बोले- कांग्रेस में अकेलापन और अपमानित महसूस किया


    नई दिल्ली। असम से कांग्रेस के सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने मंगलवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय उनके लिए बेहद कठिन था, लेकिन पार्टी के भीतर लगातार अपमान और नेतृत्व से सहानुभूति न मिलने के कारण उन्हें यह कदम उठाना पड़ा।

    बोरदोलोई ने स्पष्ट किया कि असम कांग्रेस में कई लोग उनसे संपर्क करने के बावजूद बार-बार अपमानजनक व्यवहार कर रहे थे, और इस स्थिति ने उनके लिए पार्टी में अकेलापन बढ़ा दिया। उन्होंने कहा, “मैंने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक को छोड़ दिया है और इसके लिए खुश नहीं हूं, लेकिन हालात ने मुझे यह निर्णय लेने पर मजबूर किया।”

    इस्तीफा और पार्टी के भीतर मतभेद

    प्रद्युत बोरदोलोई ने यह भी बताया कि वे जीवनभर कांग्रेस से जुड़े रहे, लेकिन हाल ही में उनकी स्थिति इतनी कठिन हो गई थी कि इस्तीफा देना अनिवार्य हो गया। उनका इस्तीफा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) अध्यक्ष को सौंप दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषक इसे असम कांग्रेस में आंतरिक मतभेद और नेताओं के बीच बढ़ते तनाव का संकेत मान रहे हैं।

    सीएम सरमा की प्रतिक्रिया

    असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि फिलहाल उनका सांसद प्रद्युत बोरदोलोई से कोई संपर्क नहीं है, लेकिन भविष्य में बातचीत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। राजधानी में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि यदि बोरदोलोई ने केंद्रीय गृह मंत्री से संपर्क किया होता, तो उन्हें इसकी जानकारी जरूर होती। फिलहाल ऐसा प्रतीत नहीं होता कि उन्होंने किसी भाजपा नेता से बात की हो।

    विधानसभा चुनाव 2026 की तैयारियां

    असम विधानसभा की कुल 126 सीटों में से बहुमत पाने के लिए 64 सीटें आवश्यक हैं। चुनाव अधिसूचना 16 मार्च को जारी की गई, जबकि नामांकन की अंतिम तारीख 23 मार्च है। नामांकन पत्रों की जांच 24 मार्च को होगी और नाम वापसी की आखिरी तारीख 26 मार्च निर्धारित की गई है। मतदान 9 अप्रैल को होगा और नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे।

    पिछला चुनाव परिणाम

    2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने असम की 126 सीटों में से 60 सीटें जीती थीं। कांग्रेस के खाते में 29 सीटें आईं जबकि एआईयूडीएफ ने 16 सीटें हासिल कीं। असम गढ़ परिषद को नौ, यूपीपीएल को छह, बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट को चार, माकपा को एक और सिबसागर सीट पर निर्दलीय उम्मीदार अखिल गोगोई ने जीत दर्ज की थी।