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  • 40 घंटे तक थमी रही दिल की धड़कन, आधुनिक इलाज और डॉक्टरों की कोशिशों ने मरीज को दी नई जिंदगी

    40 घंटे तक थमी रही दिल की धड़कन, आधुनिक इलाज और डॉक्टरों की कोशिशों ने मरीज को दी नई जिंदगी

    नई दिल्ली । पूर्वी चीन में सामने आया एक दुर्लभ चिकित्सा मामला आधुनिक मेडिकल साइंस की क्षमताओं और समय पर मिले उपचार के महत्व को रेखांकित करता है। लगभग 40 वर्षीय एक व्यक्ति, जिसे सीने में जकड़न और सांस लेने में कठिनाई की शिकायत थी, अस्पताल पहुंचने के कुछ ही समय बाद अचानक गंभीर स्थिति में चला गया। इलाज के दौरान उसका दिल और सांस दोनों एक साथ बंद हो गए। सामान्य परिस्थितियों में ऐसी स्थिति को अत्यंत गंभीर माना जाता है और लंबे समय तक हृदय की धड़कन बंद रहने पर बचने की संभावना बहुत कम रह जाती है। इसके बावजूद चिकित्सकों ने लगातार प्रयास जारी रखे और अंततः मरीज को सुरक्षित जीवन वापस दिलाने में सफलता हासिल की।

    अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने प्रारंभिक जांच के साथ ही मरीज का उपचार शुरू किया, लेकिन कुछ ही देर में उसकी हालत तेजी से बिगड़ गई। चिकित्सकों ने कार्डियक अरेस्ट के बाद हृदय को दोबारा सक्रिय करने के लिए आवश्यक सभी मानक प्रक्रियाएं अपनाईं। कई बार इलेक्ट्रिक शॉक देने सहित अन्य आपातकालीन उपाय किए गए, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिला। इसके बाद विशेषज्ञों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्नत लाइफ सपोर्ट तकनीकों का सहारा लेने का निर्णय लिया।

    मरीज को ऐसी मशीन से जोड़ा गया जिसने अस्थायी रूप से उसके दिल और फेफड़ों का कार्य संभाल लिया। यह प्रणाली शरीर से रक्त निकालकर उसमें ऑक्सीजन मिलाती है और फिर उसे वापस शरीर में पहुंचाती है, जिससे आवश्यक अंगों तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति बनी रहती है। इसके साथ एक अन्य सहायक उपकरण का उपयोग भी किया गया, जिससे हृदय पर दबाव कम रखने और रक्त संचार को स्थिर बनाए रखने में सहायता मिली। इन आधुनिक तकनीकों के कारण मरीज के शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को लगातार ऑक्सीजन मिलती रही।

    करीब 40 घंटे तक मरीज का शरीर पूरी तरह इन लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। इस दौरान डॉक्टरों की टीम लगातार उसकी स्थिति पर नजर रखती रही और आवश्यक चिकित्सकीय बदलाव करती रही। लंबे समय तक हृदय की सामान्य धड़कन वापस न आने के बावजूद इलाज जारी रखा गया। आखिरकार लगभग दो दिन बाद मरीज के हृदय ने स्वयं दोबारा काम करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसकी धड़कन सामान्य होने लगी और शरीर ने उपचार के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया।

    आगे की जांच में चिकित्सकों ने पाया कि मरीज गंभीर मायोकार्डाइटिस यानी हृदय की मांसपेशियों में सूजन से पीड़ित था। यह बीमारी कई मामलों में तेजी से हृदय की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है और समय पर उपचार न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह के मामलों में शीघ्र पहचान, लगातार निगरानी और उन्नत चिकित्सा सुविधाएं मरीज की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

    लगातार इलाज और निगरानी के बाद मरीज की स्थिति में सुधार होता गया। लगभग तीन सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद उसे स्वस्थ अवस्था में छुट्टी दे दी गई। चिकित्सकों का मानना है कि आधुनिक तकनीक, विशेषज्ञों की त्वरित निर्णय क्षमता और समय पर मिले उपचार ने इस चुनौतीपूर्ण मामले को सफल परिणाम तक पहुंचाया। यह घटना बताती है कि गंभीर कार्डियक अरेस्ट जैसी स्थिति में भी उचित चिकित्सा सुविधाएं, आधुनिक उपकरण और निरंतर चिकित्सकीय प्रयास कई बार असंभव लगने वाली परिस्थितियों को भी सकारात्मक परिणाम में बदल सकते हैं। ऐसी घटनाएं स्वास्थ्य सेवाओं में तकनीकी प्रगति और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था के महत्व को भी स्पष्ट रूप से सामने लाती हैं।

  • 5 घंटे तक ‘मृत’ घोषित शख्स अचानक जिंदा, अस्पताल में हुआ चौंकाने वाला चमत्कार

    5 घंटे तक ‘मृत’ घोषित शख्स अचानक जिंदा, अस्पताल में हुआ चौंकाने वाला चमत्कार


    नई दिल्ली। रूस के साइबेरिया क्षेत्र(Siberia Region)के याकुतिया (Yakutia) में एक ऐसा हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जिसे डॉक्टर “मेडिकल चमत्कार” मान रहे हैं। एक व्यक्ति, जो कड़ाके की ठंड में करीब 5 घंटे तक बिना सांस और बिना धड़कन के पड़ा रहा, उसे डॉक्टरों ने क्लिनिकली मृत घोषित कर दिया था। लेकिन बाद में “ग्रेजुअल थॉइंग” तकनीक की मदद से उसे दोबारा जीवन मिल गया।

    -20°C ठंड में बेसुध पड़ा मिला शख्स
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, व्यक्ति शराब के नशे में बाहर गिर पड़ा था। उस समय तापमान लगभग -20 डिग्री सेल्सियस (-4°F) था। राहगीरों ने जब उसे देखा तो वह पूरी तरह बेहोश था और शरीर में कोई हरकत नहीं थी। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों को न पल्स मिली, न सांस और न ही ECG में कोई हार्टबीट।

    डॉक्टरों ने नहीं छोड़ी उम्मीद
    मिरनी अस्पताल के डॉक्टरों ने तुरंत उसे “ग्रेजुअल रीवॉर्मिंग” (धीरे-धीरे गर्म करने की प्रक्रिया) पर रखा।
    डॉक्टरों ने करीब 4 घंटे तक उसके शरीर का तापमान धीरे-धीरे बढ़ाया—25°C से 34°C तक।
    यदि शरीर को अचानक गर्म किया जाता, तो दिल और नसों के फटने का खतरा था। इसलिए बेहद सावधानी से इलाज किया गया।

    फिर लौटी धड़कन
    जब शरीर का तापमान 34°C के करीब पहुंचा, तो डॉक्टरों ने CPR और जीवन रक्षक दवाएं दीं।
    करीब 25 मिनट बाद मॉनिटर पर हल्की हार्टबीट दिखाई दी-और यहीं से उसकी वापसी शुरू हो गई।

    ठंड बनी ‘रक्षक’, नहीं तो मौत तय थी
    डॉक्टरों के अनुसार, यह मामला इसलिए खास है क्योंकि अत्यधिक ठंड ने शरीर को “प्रिजर्वेशन मोड” में डाल दिया था। इस स्थिति में शरीर की ऑक्सीजन जरूरत बहुत कम हो जाती है, जिससे अंग लंबे समय तक सुरक्षित रह सकते हैं।

    5 दिन में अस्पताल से चला गया घर
    सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि 24 घंटे कोमा में रहने के बाद वह व्यक्ति पूरी तरह होश में आया।
    सिर्फ 5 दिन बाद वह बिना किसी गंभीर दिमागी या अंग क्षति के अपने पैरों पर चलकर अस्पताल से बाहर चला गया।