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  • ईरानी स्कूल पर मिसाइल हमले में 168 बच्चों की मौत, अमेरिकी जांच में चौंकाने वाला खुलासा

    ईरानी स्कूल पर मिसाइल हमले में 168 बच्चों की मौत, अमेरिकी जांच में चौंकाने वाला खुलासा



    वॉशिंगटन। ईरान के मीनाब शहर में एक स्कूल पर हुए भीषण मिसाइल हमले को लेकर अमेरिकी सैन्य जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। प्रारंभिक जांच के मुताबिक इस हमले के लिए खुद अमेरिका जिम्मेदार हो सकता है। इस हमले में करीब 175 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 168 मासूम बच्चे शामिल थे। यदि यह आधिकारिक रूप से पुष्टि हो जाती है, तो यह पिछले दो दशकों में अमेरिकी सैन्य अभियानों के दौरान नागरिकों की मौत की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक मानी जाएगी।

    पुराने खुफिया डेटा से हुई चूक

    अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार यह हमला Minab शहर के एक प्राथमिक विद्यालय पर हुआ। जांच में सामने आया कि United States Central Command ने लक्ष्य तय करने के लिए Defense Intelligence Agency (DIA) के पुराने खुफिया डेटा का इस्तेमाल किया था।

    असल में टॉमहॉक मिसाइल का निशाना स्कूल नहीं, बल्कि उसके पास स्थित एक ईरानी सैन्य ठिकाना था। यह स्कूल पहले उसी सैन्य परिसर का हिस्सा था, लेकिन बाद में इसे अलग कर दिया गया था।

    बताया जा रहा है कि Shajareh Taybeh Elementary School 2017 तक सैन्य बेस से जुड़ा हुआ था। इसके बाद वहां दीवार बनाकर परिसर अलग कर दिया गया और वॉच टावर भी हटा दिया गया। स्कूल की इमारत को चमकीले रंगों से रंगा गया था और ऑनलाइन मैप्स में भी इसे स्पष्ट रूप से “स्कूल” के रूप में दर्ज किया गया था।

    यह हमला शनिवार सुबह हुआ, जो ईरान में स्कूल सप्ताह का पहला दिन होता है और उस समय स्कूल में बड़ी संख्या में बच्चे मौजूद थे।

    क्या AI सिस्टम से हुई गलती?

    इस त्रासदी के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह चूक किसी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम की वजह से हुई। ईरान के साथ चल रहे युद्ध में अमेरिकी सेना तकनीक और एआई आधारित टार्गेटिंग सिस्टम पर काफी निर्भर है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिकी सेना वॉर-टेक कंपनी Palantir Technologies के “मेवेन स्मार्ट सिस्टम” का इस्तेमाल करती है। इसमें एआई कंपनी Anthropic के मॉडल “Claude” का उपयोग किया जाता है, जो रियल-टाइम लोकेशन और टार्गेटिंग डेटा प्रदान करता है।

    प्रारंभिक आशंका है कि एआई सिस्टम स्कूल की बदली हुई लोकेशन और उपयोग को अपडेट करने में विफल रहा, जिससे यह घातक गलती हुई।

    अमेरिका का आधिकारिक रुख

    अमेरिका ने नागरिक ठिकानों पर हमला न करने की नीति दोहराते हुए कहा है कि मामले की जांच जारी है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने शुरुआत में दावा किया कि ईरान ने खुद ही स्कूल पर बमबारी की होगी क्योंकि उसके हथियार अक्सर सटीक नहीं होते। हालांकि बाद में उन्होंने कहा कि वह जांच के नतीजों का इंतजार करेंगे और Pentagon की रिपोर्ट को स्वीकार करेंगे।

    इस घटना को लेकर अमेरिकी संसद में भी सवाल उठने लगे हैं।

    45 से अधिक डेमोक्रेटिक सीनेटरों ने रक्षा सचिव Pete Hegseth को पत्र लिखकर जवाब मांगा है। वहीं रिपब्लिकन सीनेटर Kevin Cramer और सीनेटर Tim Kaine ने भी इस घटना की गहन जांच की मांग की है।

    ईरान का तीखा आरोप

    इस हमले के बाद ईरान ने अमेरिका पर युद्ध अपराध का आरोप लगाया है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmaeil Baghaei ने सोशल मीडिया पर हमले का वीडियो साझा करते हुए इसे “जघन्य युद्ध अपराध” बताया।

    वहीं ईरान के विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi ने सामूहिक कब्रों के ड्रोन फुटेज साझा करते हुए कहा कि यह हमला निर्दोष बच्चों की हत्या है और इसे बिना सजा के नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

    यह घटना पहले से ही तनावपूर्ण Iran-Israel संघर्ष के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है और युद्ध में एआई तकनीक के इस्तेमाल पर भी नई बहस शुरू हो गई है।

  • हिमंत सरमा का खुलासा: “राहुल और प्रियंका गांधी की आपसी लड़ाई का शिकार रहा”

    हिमंत सरमा का खुलासा: “राहुल और प्रियंका गांधी की आपसी लड़ाई का शिकार रहा”


    नई दिल्ली। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा पर तीखा हमला बोला है। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के दौरान मीडिया से बातचीत में सरमा ने दावा किया कि भाजपा में शामिल होने से पहले वे राहुल और प्रियंका की अंदरूनी लड़ाई के शिकार रहे।

    सरमा ने कहा, “गांधी परिवार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। हाल के राजनीतिक फैसलों से यह साफ दिखता है कि राहुल गांधी नहीं चाहते कि प्रियंका गांधी केरल में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करें।

    उन्हें असम में भेजा गया, इसका यही मतलब है।”

    उन्होंने आगे आरोप लगाया कि कांग्रेस में राहुल गांधी अपने करीबी नेताओं और गुट के जरिए सत्ता बनाए रखना चाहते हैं, जबकि प्रियंका उस गुट का हिस्सा नहीं हैं। सरमा ने बताया, “मैं 22 साल तक कांग्रेस में रहा हूं, मुझे अंदर की पूरी जानकारी है। यही वजह है कि प्रियंका को केरल की बजाय असम में जिम्मेदारी दी गई।”

    हिमंत सरमा बीजेपी में शामिल होने के बाद से लगातार कांग्रेस और गांधी परिवार पर हमलावर रहे हैं। उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। सियासी जानकार अब इस सवाल पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या वाकई राहुल और प्रियंका के बीच अंदरूनी मतभेद हैं, या यह विपक्ष की रणनीति का हिस्सा है। फिलहाल कांग्रेस की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

  • बड़ा खुलासा… मप्र के गांवों में मिल रहा पानी लोगों के इस्तेमाल के लायक नहीं

    बड़ा खुलासा… मप्र के गांवों में मिल रहा पानी लोगों के इस्तेमाल के लायक नहीं


    भोपाल।
    इंदौर के भागीरथपुरा (Bhagirathpura, Indore) में काल बने पीने के पानी ने अब तक 20 लोगों की जिंदगियां लील ली हैं और जो इससे बच गए, उनका अस्पताल में इलाज जारी है। सरकार कटघरे में है तो विपक्ष भी इस मुद्दे पर हावी है। इस बीच मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के गांवों (Villages) में पीने के पानी (Drinking water) पर आई एक रिपोर्ट आपको भी हैरान कर देगी। केंद्र सरकार के ‘जल जीवन मिशन’ (‘Jal Jeevan Mission’) की एक नई रिपोर्ट से पता चला है कि राज्य के ग्रामीण इलाकों में एक-तिहाई से अधिक पीने का पानी इंसानों के इस्तेमाल के लायक नहीं है, जिससे लाखों लोग अनदेखे लेकिन जानलेवा खतरों की चपेट में हैं।


    रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े

    4 जनवरी 2026 को जारी ‘फंक्शनैलिटी असेसमेंट रिपोर्ट’ (कार्यक्षमता मूल्यांकन रिपोर्ट) के अनुसार मध्य प्रदेश में पानी के केवल 63.3% नमूने ही गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरे, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 76% है। इसका मतलब है कि राज्य के ग्रामीण इलाकों में 36.7% पानी के नमूने असुरक्षित पाए गए हैं। इनमें हानिकारक बैक्टीरिया (कीटाणु) या रासायनिक मिलावट पाई गई है। ये नमूने सितंबर-अक्टूबर 2024 के दौरान मध्य प्रदेश के 15,000 से अधिक ग्रामीण घरों से इकट्ठा किए गए थे।

    यह स्थिति उन जगहों पर और भी अधिक चिंताजनक है जो सुरक्षा और इलाज के लिए बनी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी अस्पतालों में पानी के केवल 12% नमूने ही सूक्ष्मजीवविज्ञानी (microbiological) सुरक्षा जांच में पास हो पाए, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 83.1% है। इसका मतलब है कि मध्य प्रदेश के लगभग 88% अस्पतालों में मरीजों को असुरक्षित पानी दिया जा रहा है। स्कूलों में 26.7% नमूने माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्ट में फेल हो गए, जिससे बच्चे हर दिन दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।


    इन जिलों की हालत सबसे खराब

    अनूपपुर और डिंडोरी जैसे आदिवासी बहुल जिलों में स्थिति सबसे खराब है, जहां एक भी पानी का नमूना सुरक्षित नहीं पाया गया। बालाघाट, बैतुल और छिंदवाड़ा में 50% से अधिक पानी के नमूने दूषित मिले हैं। मध्य प्रदेश में केवल 31.5% घरों में नल के कनेक्शन हैं, जो कि 70.9% के राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है। जहां पाइपलाइन बिछी भी है, वहां व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है; राज्य के 99.1% गांवों में पाइप से जलापूर्ति की व्यवस्था तो है, लेकिन केवल 76.6% घरों में ही चालू हालत में नल लगे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि हर चौथे घर में या तो नल खराब है या पानी ही नहीं आता।


    नल से पानी आने का मतलब सुरक्षित पानी होना नहीं….

    इससे भी बदतर बात यह है कि नल से पानी आने का मतलब सुरक्षित पानी होना नहीं है। इंदौर जिला, जिसे आधिकारिक तौर पर 100% नल कनेक्शन वाला घोषित किया गया है, वहां भी केवल 33% घरों को ही सुरक्षित पीने का पानी मिल रहा है। पूरे राज्य में 33% पानी के नमूने गुणवत्ता जांच में फेल हो गए, जो इस बात की पुष्टि करता है कि संकट केवल पानी की पहुंच का नहीं, बल्कि ‘जहरीली सप्लाई’ का है। केंद्र सरकार ने इस स्थिति को “सिस्टम की ओर से पैदा की गई आपदा” करार दिया है और चेतावनी दी है कि यदि पानी की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ, तो इस साल फंड (बजट) में कटौती की जा सकती है।

    यह चेतावनी एक बड़ी त्रासदी के बाद आई है। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 20 लोगों की मौत हो गई। 429 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जिनमें से 16 आईसीयू (ICU) में हैं और तीन वेंटिलेटर पर हैं। अब मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने औपचारिक रूप से इस संकट को ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी’ (सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल) घोषित कर दिया है। अपने आदेश में अदालत ने कहा कि “अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में साफ पीने का पानी पाने का अधिकार भी शामिल है” और वर्तमान स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के दायरे में आती है।