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  • सर्वपितृ अमावस्या 2026: पितरों के भोग में जरूर शामिल करें ये 7 चीजें, श्राद्ध की थाली में इन खाद्य पदार्थों का है विशेष महत्व

    सर्वपितृ अमावस्या 2026: पितरों के भोग में जरूर शामिल करें ये 7 चीजें, श्राद्ध की थाली में इन खाद्य पदार्थों का है विशेष महत्व

    नई दिल्ली । पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में इस दिन को विशेष महत्व दिया जाता है। माना जाता है कि सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध और तर्पण करने से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। यह दिन उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है, जो किसी कारण अपने मृत परिजनों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर नहीं कर पाए हों या जिन्हें उनकी मृत्यु की सही तारीख याद न हो। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध किया जा सकता है। इस अवसर पर पितरों को भोजन अर्पित करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भोग की थाली में कुछ विशेष खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं। इनमें खीर, चावल, उड़द दाल से बने व्यंजन, पूड़ी, मौसमी सब्जियां, मौसमी फल और पितरों की पसंद का भोजन प्रमुख हैं।

    श्राद्ध की थाली में सबसे पहले खीर को विशेष स्थान दिया जाता है। मान्यता है कि सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोग में खीर जरूर शामिल करनी चाहिए। इसे पितरों के भोजन का अहम हिस्सा माना जाता है। परंपरा के अनुसार, खीर गाय के दूध से तैयार करने की बात कही जाती है। धार्मिक मान्यता में भैंस के दूध के बजाय गाय के दूध से बनी खीर को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए इस दिन भोग तैयार करते समय खीर बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर विशेष ध्यान दिया जाता है। श्राद्ध की थाली में दूसरा महत्वपूर्ण पदार्थ चावल है। मान्यता है कि पितरों को चावल अर्पित करने से पितृ दोष से राहत मिल सकती है। इसी कारण श्राद्ध के भोजन में चावल को शामिल करना महत्वपूर्ण माना जाता है।

    तीसरे स्थान पर उड़द दाल से बने व्यंजनों को रखा जाता है। श्राद्ध के भोजन में उड़द दाल की कोई डिश शामिल करने की परंपरा बताई जाती है। इसके लिए उड़द की दाल बनाई जा सकती है। इसके अलावा उड़द के पकौड़े, दाल की कचौड़ी और दही बड़े जैसे व्यंजन भी तैयार किए जा सकते हैं। चौथा खाद्य पदार्थ पूड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पूड़ी को पितरों के प्रिय भोजन में शामिल माना जाता है, इसलिए इसे श्राद्ध की थाली में रखने की सलाह दी जाती है। भोग तैयार करते समय इन पारंपरिक व्यंजनों को शामिल करके श्राद्ध की थाली सजाई जाती है। इन खाद्य पदार्थों को पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

    पांचवीं चीज मौसमी सब्जियां हैं। श्राद्ध के भोजन में मौसम के अनुसार उपलब्ध सब्जी शामिल की जा सकती है। इस अवसर पर विशेष रूप से कद्दू की सब्जी बनाने की परंपरा का उल्लेख किया जाता है। इसके बाद छठे स्थान पर मौसमी फलों को रखा जाता है। पितरों को फल अर्पित करने के लिए मौसम में उपलब्ध किसी भी फल को श्राद्ध की थाली में शामिल किया जा सकता है। फल भी भोग का हिस्सा माने जाते हैं। सातवीं चीज पितरों की पसंद का भोजन है। मान्यता के अनुसार, सामान्य रूप से तैयार किए जाने वाले व्यंजनों के साथ उन खाद्य पदार्थों को भी शामिल किया जा सकता है, जो दिवंगत परिजन को पसंद थे। इनमें राजमा, छोले, कढ़ी और रबड़ी जैसे व्यंजन शामिल हो सकते हैं। इस तरह खीर, चावल, उड़द दाल के पकवान, पूड़ी, मौसमी सब्जी, फल और पसंदीदा पकवान मिलाकर भोग की थाली तैयार की जा सकती है।

    सर्वपितृ अमावस्या पर भोग बनाते समय भोजन की शुद्धता का विशेष ध्यान रखने की बात कही जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोजन में लहसुन और प्याज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इस दिन शुद्ध सात्विक भोजन तैयार करने और श्रद्धापूर्वक उसे पूर्वजों को अर्पित करने पर जोर दिया जाता है। श्राद्ध की परंपरा में भोजन केवल खाद्य पदार्थों का संग्रह नहीं, बल्कि दिवंगत परिजनों के प्रति सम्मान और स्मरण का माध्यम भी माना जाता है। हालांकि, पितृ दोष से राहत और पितरों की कृपा से जुड़ी बातें धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। सर्वपितृ अमावस्या पर परिवार अपनी परंपरा और मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध तथा भोग की विधि अपना सकते हैं।

  • पितृ पक्ष में आज प्रतिपदा श्राद्ध, जानें तर्पण-पिंडदान का शुभ मुहूर्त और विधि

    पितृ पक्ष में आज प्रतिपदा श्राद्ध, जानें तर्पण-पिंडदान का शुभ मुहूर्त और विधि

    नई दिल्ली । पितृपक्ष में तिथिनुसार पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसी तिथि के अनुसार पितृपक्ष में उसका श्राद्ध किया जाता है। वर्ष 2026 में 27 सितंबर को प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। प्रतिपदा श्राद्ध उन पितरों के लिए किया जाता है, जिनका निधन हिंदू पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि को हुआ हो।

    हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर की रात 10 बजकर 18 मिनट से शुरू होकर 27 सितंबर की रात 8 बजकर 58 मिनट तक रहेगी। इसी वजह से प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध 27 सितंबर, रविवार को किया जाएगा। इस दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है।

    पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए कुतुप मुहूर्त को विशेष महत्व दिया जाता है। सामान्य तौर पर 27 सितंबर को कुतुप मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 5 मिनट से 12 बजकर 53 मिनट तक बताया गया है। हालांकि अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और स्थानीय समय के अंतर के कारण मुहूर्त में कुछ बदलाव हो सकता है। इसलिए श्राद्ध कर्म करने वाले लोगों को अपने स्थान के अनुसार पंचांग से समय की पुष्टि करनी चाहिए।

    श्राद्ध कर्म की परंपरा में सबसे पहले दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठने का विधान बताया गया है। इसके बाद पितरों को चावल, जौ, काले तिल, घी और शहद से तैयार किया गया पिंड अर्पित किया जाता है। पिंड अर्पित करने की इस प्रक्रिया को पिंडदान कहा जाता है। इसके बाद कुशा से बनी अंगूठी अनामिका उंगली में धारण कर पितरों को जल अर्पित किया जाता है। इस प्रक्रिया को तर्पण कहा जाता है। तर्पण के बाद पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।

    श्राद्ध कर्म में भोजन और दान की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान-दक्षिणा देने की परंपरा है। इसके अलावा गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों जैसे जीवों को भी भोजन अर्पित किया जाता है। इसे पंचबली या पंचग्रास कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस परंपरा को पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान से जोड़कर देखा जाता है।

    पितरों का श्राद्ध कौन कर सकता है, इसे लेकर भी अलग-अलग पारिवारिक और धार्मिक परंपराएं हैं। सामान्य मान्यता के अनुसार पुत्र, पौत्र या परिवार का कोई पुरुष सदस्य श्राद्ध और तर्पण कर सकता है। हालांकि वर्तमान समय में कई परिवारों में महिलाएं भी पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म करती हैं। श्राद्ध की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

  • पितृपक्ष में नई शुरुआत और खरीदारी को लेकर क्या है मान्यता, जानिए नए कपड़े और जरूरी सामान पर क्या कहते हैं नियम

    पितृपक्ष में नई शुरुआत और खरीदारी को लेकर क्या है मान्यता, जानिए नए कपड़े और जरूरी सामान पर क्या कहते हैं नियम

    नई दिल्ली । सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध के लिए विशेष अवधि माना जाता है। इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितंबर से पूर्णिमा श्राद्ध के साथ शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा। इसे सोलह श्राद्ध या महालय पक्ष भी कहा जाता है। इस दौरान परिवार के लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष के 16 दिनों में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करना महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से तर्पण और पिंडदान करने से पितृ दोष तथा पूर्वजों के ऋण से मुक्ति मिलती है और परिवार को पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    पितृपक्ष के दौरान नई शुरुआत और मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन और जनेऊ संस्कार जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते। इसका कारण यह माना जाता है कि पितृपक्ष का पूरा समय पूर्वजों के स्मरण और उनके लिए किए जाने वाले कर्मकांड को समर्पित रहना चाहिए।

    धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि पूर्वजों की पूजा में विधि और अनुष्ठान का विशेष महत्व होता है। इसलिए इस अवधि में परिवार का ध्यान श्राद्ध कर्म और तर्पण पर केंद्रित रखने की परंपरा है। इसी वजह से उत्सव और मांगलिक आयोजनों को टालने की मान्यता प्रचलित है।

    पितृपक्ष में नई चीजें खरीदने को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं बताई जाती हैं। इस दौरान रोजमर्रा के इस्तेमाल की जरूरी वस्तुएं खरीदने पर सामान्यतः रोक नहीं मानी जाती, लेकिन बड़ी खरीदारी से परहेज करने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नए कपड़े, गहने, वाहन, मकान-जमीन और लोहे से जुड़ी बड़ी वस्तुओं की खरीदारी को इस अवधि में शुभ नहीं माना जाता।

    नए कपड़ों को लेकर भी पूर्ण प्रतिबंध की बात नहीं कही जाती, लेकिन पितृपक्ष में सादे और सात्विक वस्त्र पहनने को उचित माना गया है। श्राद्ध और तर्पण के समय सफेद, हल्के पीले या अन्य हल्के रंग के कपड़े पहनने की परंपरा बताई गई है। इसका उद्देश्य इस अवधि की सादगी और धार्मिक एकाग्रता बनाए रखना माना जाता है।

    पितृपक्ष के दौरान भगवान विष्णु के चातुर्मास से जुड़ी मान्यता भी बताई जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इसी कारण चातुर्मास में भी कई प्रकार के मांगलिक कार्यों से बचने की परंपरा है।

    इसके अलावा पितृपक्ष के दौरान खान-पान और दैनिक व्यवहार को लेकर भी कई मान्यताएं हैं। इस अवधि में सात्विक भोजन करने, मांस, मछली, अंडा, शराब और नशीले पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। कई धार्मिक परंपराओं में लहसुन और प्याज से भी परहेज करने की बात कही गई है। बाल और दाढ़ी न कटाने की मान्यता भी कुछ परंपराओं में प्रचलित है।

    पितृपक्ष में घर का वातावरण शांत और सौहार्दपूर्ण रखने पर जोर दिया जाता है। झगड़े, अपशब्द और गलत व्यवहार से बचने की सलाह दी जाती है। पशु-पक्षियों और जरूरतमंद लोगों के प्रति भी संवेदनशील व्यवहार करने की मान्यता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार इस अवधि में विनम्रता, संयम और श्रद्धा के साथ पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए।

  • रक्षाबंधन 2026 पर नहीं रहेगा भद्रा का साया, जानिए राखी बांधने का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

    रक्षाबंधन 2026 पर नहीं रहेगा भद्रा का साया, जानिए राखी बांधने का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

    नई दिल्ली । रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। सावन मास की पूर्णिमा पर मनाए जाने वाले इस त्योहार में बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधकर उनकी सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करती हैं। वहीं भाई भी बहन की सुरक्षा और हर परिस्थिति में साथ देने का संकल्प लेते हैं। वर्ष 2026 में रक्षाबंधन की तारीख और राखी बांधने के शुभ समय को लेकर लोगों के बीच विशेष उत्सुकता बनी हुई है।

    ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस वर्ष श्रावण पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त 2026 को सुबह 9 बजकर 8 मिनट से शुरू होगी और 28 अगस्त की सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगी। उदयकाल में पूर्णिमा तिथि होने के कारण रक्षाबंधन का त्योहार 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। ऐसे में बहनों को 28 अगस्त को ही भाई की कलाई पर राखी बांधनी चाहिए।

    रक्षाबंधन 2026 की सबसे खास बात यह है कि इस बार राखी बांधने के समय भद्रा का प्रभाव नहीं रहेगा। धार्मिक मान्यताओं में भद्रा काल को शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता है और इसी वजह से रक्षाबंधन पर राखी बांधने के समय भद्रा की स्थिति का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस बार भद्रा 28 अगस्त को सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगी।

    राखी बांधने के लिए इस वर्ष सुबह 5 बजकर 57 मिनट से सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। इस अवधि में बहनें भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांध सकती हैं। इस शुभ मुहूर्त की कुल अवधि 3 घंटे 51 मिनट रहेगी। भद्रा समाप्त होने के कारण इस अवधि में राखी बांधने को लेकर कोई भद्रा बाधा नहीं बताई गई है।

    हालांकि, रक्षाबंधन के दिन राहुकाल का भी ध्यान रखना जरूरी होगा। 28 अगस्त को राहुकाल सुबह 10 बजकर 46 मिनट से दोपहर 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगा। इसलिए शुभ कार्य करने वाले परिवार इस अवधि में राखी बांधने से बच सकते हैं। राखी बांधने की योजना बनाते समय शुभ मुहूर्त और राहुकाल दोनों को ध्यान में रखना बेहतर रहेगा।

    रक्षाबंधन की पूजा के लिए राखी की थाली को भी विधि-विधान से तैयार किया जाता है। थाली में राखी के साथ रोली, अक्षत यानी चावल, दीपक और मिठाई रखी जाती है। सबसे पहले भाई को आसन पर बैठाकर उनके मस्तक पर रोली से तिलक लगाया जाता है और अक्षत अर्पित किए जाते हैं।

    इसके बाद भाई की आरती उतारकर उनकी दाईं कलाई पर राखी बांधी जाती है। राखी बांधने के बाद भाई को मिठाई खिलाई जाती है। बहन अपने भाई की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करती है। भाई भी बहन को उपहार देकर उसके प्रति अपने स्नेह और जिम्मेदारी का भाव प्रकट करता है।

    इस तरह वर्ष 2026 में रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त को मनाया जाएगा। सुबह 5 बजकर 57 मिनट से 9 बजकर 48 मिनट तक राखी बांधने का शुभ समय रहेगा और इस दौरान भद्रा का प्रभाव नहीं होगा। परिवार शुभ मुहूर्त को ध्यान में रखकर भाई-बहन के इस खास पर्व को विधि-विधान और उल्लास के साथ मना सकते हैं।

  • पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    नई दिल्ली। सनातन धर्म और हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पूजा-पाठ के दौरान देवी-देवताओं को नैवेद्य यानी भोग अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार बिना भोग लगाए कोई भी पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती है। ईश्वर को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार मिठाई, खीर और विभिन्न प्रकार के ताजे फलों का अर्पण करते हैं। हालांकि, पूजा में फलों के चुनाव और उन्हें अर्पित करने के सही तरीकों को लेकर अक्सर श्रद्धालुओं के मन में संशय रहता है। विशेषकर बीज वाले फलों को भगवान के समक्ष चढ़ाने के नियमों को लेकर धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान किया गया है।

    धार्मिक विद्वानों और शास्त्रों के अनुसार पूजा-पाठ में फलों का अर्पण अत्यंत सात्विक और उत्तम माना जाता है। मौसम के अनुसार उपलब्ध ताजे फलों का भोग लगाने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। जहां तक बीज वाले फलों का प्रश्न है, तो ऐसे फलों को भगवान को अर्पित किया जा सकता है, परंतु इसके लिए एक निश्चित विधि का पालन करना आवश्यक है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति स्वयं भोजन ग्रहण करते समय या बच्चों को फल देते समय बीज अलग करता है, उसी प्रकार पूर्ण श्रद्धा और भाव के साथ भगवान को भी बीज निकालकर ही फल अर्पित करने चाहिए।

    भोग लगाने की विधि में शुद्धता और भाव का सबसे अधिक महत्व होता है। बड़े या अधिक बीज वाले फल जैसे आम, तरबूज या अन्य मौसमी फलों का भोग लगाते समय पहले उन्हें अच्छी तरह स्वच्छ जल से धोना चाहिए। इसके बाद पूजा के समय ही उन्हें काटकर उनके बीजों को अलग कर देना चाहिए। पहले से काटकर रखे गए बासी या दूषित फलों को पूजा में चढ़ाना वर्जित माना गया है। इसके अलावा, भगवान विष्णु या उनके अवतारों को भोग अर्पित करते समय उसमें तुलसी का पत्ता रखना अत्यंत शुभ और अनिवार्य माना जाता है।

    पूजा-पाठ में नैवेद्य अर्पित करते समय भक्त के मन का भाव पूरी तरह से निष्काम और अहंकार रहित होना चाहिए। शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि भोग केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति समर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। इसलिए सही नियमों का पालन करते हुए, स्वच्छता और मर्यादा के साथ अर्पित किया गया साधारण सा भोग भी भगवान सहर्ष स्वीकार करते हैं और साधक पर अपनी कृपा बरसाते हैं।

  • योगिनी एकादशी व्रत की तारीख और शुभ मुहूर्त घोषित: दो दिन तिथि होने से गृहस्थ और वैष्णव संप्रदाय के लिए अलग-अलग नियम, दशमी से ही शुरू हो जाएंगे कड़े नियम

    योगिनी एकादशी व्रत की तारीख और शुभ मुहूर्त घोषित: दो दिन तिथि होने से गृहस्थ और वैष्णव संप्रदाय के लिए अलग-अलग नियम, दशमी से ही शुरू हो जाएंगे कड़े नियम


    नई दिल्ली ।
    हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है, जिसमें आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को ‘योगिनी एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक ग्रंथों और पद्मपुराण के अनुसार, इस व्रत को विधि-विधान के साथ करने से व्रती को 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस व्रत को सच्चे मन से रखने पर व्यक्ति के समस्त संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। इस वर्ष एकादशी तिथि दो दिनों में विभाजित होने के कारण आम जनमानस में व्रत की सही तारीख को लेकर काफी असमंजस की स्थिति बनी हुई थी, जिसे पंचांग की गणनाओं के आधार पर स्पष्ट कर दिया गया है।

    द्रिक पंचांग के विश्लेषण के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण एकादशी तिथि की शुरुआत 10 जुलाई, शुक्रवार को सुबह 8 बजकर 16 मिनट पर होने जा रही है। इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 11 जुलाई, शनिवार को सुबह 5 बजकर 22 मिनट पर होगा। इस बार विशेष स्थिति यह बन रही है कि दोनों ही दिन एकादशी तिथि सूर्योदय के समय पूर्ण रूप से व्याप्त नहीं है। शनिवार 11 जुलाई को सुबह 5 बजकर 22 मिनट के बाद ही द्वादशी तिथि का प्रारंभ हो जाएगा, जिससे ज्योतिषीय गणना के अनुसार 11 जुलाई को एकादशी तिथि का क्षय माना गया है। शास्त्रों में वर्णित नियमों के अनुसार, जब दोनों दिन सूर्यकाल में एकादशी तिथि व्याप्त न हो, तब पहले दिन ही व्रत रखना श्रेयस्कर होता है।

    इस पंचांगीय नियम के आधार पर सभी गृहस्थ लोगों के लिए 10 जुलाई को ही योगिनी एकादशी का व्रत रखना पूरी तरह से मान्य और शास्त्रसम्मत होगा। दूसरी ओर, वैष्णव संप्रदाय से जुड़े श्रद्धालु और संत समाज के लोग अगले दिन यानी 11 जुलाई को इस एकादशी का व्रत अनुष्ठान कर सकते हैं। तिथि के इस विभाजन के कारण दोनों ही पक्षों के लिए व्रत के पारण का समय भी अलग-अलग निर्धारित किया गया है, जिसका कड़ाई से पालन करना व्रत की पूर्णता के लिए आवश्यक माना जाता है।

    जो श्रद्धालु 10 जुलाई, शुक्रवार को योगिनी एकादशी का उपवास रखेंगे, वे अगले दिन 11 जुलाई को अपने व्रत का पारण करेंगे। गृहस्थों के लिए 11 जुलाई को पारण का शुभ समय दोपहर 1 बजकर 50 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 36 मिनट तक निर्धारित किया गया है। इसके विपरीत, जो वैष्णव जन 11 जुलाई, शनिवार को एकादशी का व्रत रखेंगे, उनके लिए पारण की समय अवधि अगले दिन यानी 12 जुलाई की सुबह 5 बजकर 32 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 18 मिनट तक रहेगी। व्रत खोलने के इस नियत समय का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत का पालन करने वाले श्रद्धालुओं को दशमी तिथि से ही कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। इसके तहत दशमी तिथि यानी 9 जुलाई की शाम से ही केवल सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और भोजन में लहसुन, प्याज, बैंगन, मूंग तथा मसूर की दाल जैसी वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए। व्रत के मुख्य दिन बाल, नाखून काटना और बाल धोना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। व्रतियों को इस दिन अन्न का पूरी तरह त्याग कर केवल फलाहार करना चाहिए और पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की आराधना में समय बिताना चाहिए।

  • निर्जला एकादशी 2026: व्यापार में उन्नति और मानसिक शांति के लिए इस बार बेहद खास हैं ये ज्योतिषीय उपाय

    निर्जला एकादशी 2026: व्यापार में उन्नति और मानसिक शांति के लिए इस बार बेहद खास हैं ये ज्योतिषीय उपाय

    नई दिल्ली। सनातन परंपरा में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को बेहद खास और पवित्र माना गया है। इस वर्ष निर्जला एकादशी का महापर्व 25 जून 2026 को मनाया जाएगा, जिसे लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। धार्मिक दृष्टिकोण से यह केवल एक पारंपरिक उपवास नहीं है, बल्कि व्यक्ति को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सकारात्मक दिशा में ले जाने का एक बड़ा माध्यम है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए पूरी निष्ठा से व्रत का पालन करते हैं, उन्हें साल भर की सभी चौबीस एकादशियों के समान ही पुण्यफल प्राप्त होता है। ज्योतिषीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्रत व्यक्ति को आंतरिक शांति प्रदान करने के साथ-साथ उसकी मानसिक क्षमताओं का विकास करने में भी सहायक सिद्ध होता है।

    इस पावन पर्व का संबंध महाभारत काल की एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक कथा से जुड़ा हुआ है। पांडव भाइयों में भीमसेन अपनी अत्यधिक भूख के कारण हर महीने आने वाली एकादशियों का नियमित व्रत रखने में असमर्थ थे। अपनी इस विवशता को लेकर जब वे महर्षि वेदव्यास जी के पास पहुंचे, तब व्यास जी ने उन्हें एक सरल किंतु बेहद कठिन मार्ग सुझाया। उन्होंने भीम को समझाया कि यदि वे ज्येष्ठ मास की इस मुख्य एकादशी पर बिना पानी पिए पूर्ण निष्ठा के साथ निर्जल उपवास रखें, तो उन्हें वर्ष भर की समस्त एकादशियों का लाभ एक साथ मिल जाएगा। भीम ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए इस कठिन व्रत को पूरा किया, जिसके बाद से ही सनातन समाज में इसे भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाने लगा।

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार निर्जला एकादशी का सीधा संबंध ब्रह्मांड में चंद्रमा की ऊर्जा से माना गया है। इस दिन किया जाने वाला मानसिक और शारीरिक संयम व्यक्ति के चित्त को स्थिर रखता है और उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत करता है। यह विशेष तिथि भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति के तत्वों को अत्यधिक बल प्रदान करती है, जिसके कारण यह दिन केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं रहता बल्कि कुंडली में ग्रहों के संतुलन को ठीक करने में भी बड़ी भूमिका निभाता है। यही वजह है कि करियर और व्यापार में लंबे समय से गतिरोध का सामना कर रहे जातकों के लिए इस दिन कुछ विशेष उपायों को आजमाना बेहद फलदायी माना जाता है।

    इस शुभ अवसर पर व्यापारिक और आर्थिक बाधाओं को दूर करने के लिए पीपल के वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु का स्मरण करने का विधान है। सुबह या शाम के समय पीपल के पेड़ के पास जाकर ‘ओम् नमो नारायणाय’ मंत्र का जाप करने से कुंडली में गुरु ग्रह मजबूत होता है, जिससे पारिवारिक सुख में वृद्धि होती है और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा घर के मुख्य द्वार और पूजा स्थल पर हल्दी व केसर मिश्रित गंगाजल का छिड़काव करने से राहु और केतु के अशुभ प्रभाव शांत होते हैं और घरेलू कलह का नाश होता है। आर्थिक समृद्धि के लिए भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के चरणों में ग्यारह पीली कौड़ियां रखकर उन पर हल्दी का तिलक लगाने और पूजा के बाद उन्हें तिजोरी में सुरक्षित रखने की सलाह दी जाती है, जिससे अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण रहता है।

    विद्यार्थियों के लिए भी यह दिन एकाग्रता बढ़ाने का एक उत्तम अवसर लेकर आता है। जो छात्र पढ़ाई में ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते, वे अपनी अध्ययन सामग्री पर हल्दी का छोटा तिलक लगाकर विष्णु सहस्त्रनाम का श्रवण कर सकते हैं, जिससे उनकी स्मरण शक्ति मजबूत होती है। सामाजिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से इस दिन स्वयं निर्जल रहकर बेजुबान पक्षियों के लिए स्वच्छ जल पात्र की व्यवस्था करना सूर्य और गुरु ग्रह को शुभ फल देने के लिए प्रेरित करता है। इसके साथ ही कार्यस्थल पर शंखध्वनि करने से वातावरण शुद्ध होता है और व्यापारिक निर्णय लेने की क्षमता में स्पष्टता आती है। इस दिन परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर कम से कम आधा घंटा विष्णु कथा का पाठ करने से आपसी मतभेद दूर होते हैं। व्रत की पूर्णता के लिए केवल भूखा-प्यासा रहना ही काफी नहीं है, बल्कि इस दिन क्रोध, असत्य और किसी के अपमान की भावना का पूरी तरह त्याग कर मन को शुद्ध रखना अनिवार्य माना गया है।

  • नए साल 2026 में गुरु प्रदोष व्रतइन उपायों से महादेव होंगे प्रसन्न मिलेगी सुख-समृद्धि

    नए साल 2026 में गुरु प्रदोष व्रतइन उपायों से महादेव होंगे प्रसन्न मिलेगी सुख-समृद्धि


    नई दिल्ली । साल 2026 का आगमन धार्मिक दृष्टि से विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वैदिक पंचांग के अनुसार 1 जनवरी को गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत रखा जाएगा। इस दिन का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है क्योंकि यह व्रत गुरु प्रदोष व्रत के रूप में मनाया जाएगा। गुरु प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है और इस दिन श्रद्धा और आस्था के साथ पूजा-पाठ करने से जीवन में सुख समृद्धि और खुशहाली आती है।

    गुरु प्रदोष व्रत और महादेव की कृपा

    गुरुवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है क्योंकि गुरु ग्रह का प्रभाव इस दिन अधिक रहता है। गुरु ग्रह ज्ञान शिक्षा समृद्धि और अच्छे भाग्य का कारक माना जाता है। इस दिन किए गए पूजा और उपायों से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं। खासकर नौकरी व्यापार धन-संपत्ति से जुड़ी परेशानियां दूर हो सकती हैं और महादेव की कृपा से आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकता है।

    ज्योतिषीय उपायों से मिल सकती है राहत

    गुरु प्रदोष व्रत के दिन कुछ खास ज्योतिषीय उपाय करने से जीवन में स्थिरता और समृद्धि का आशीर्वाद मिल सकता है। यहां कुछ विशेष उपाय दिए जा रहे हैं जो इस दिन किए जाने से महादेव की कृपा प्राप्त हो सकती है भगवान शिव की पूजाइस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा करें। शिवलिंग पर जल दूध शहद बेलपत्र और आंतरिक शुद्धता से अर्पित करें। इस दिन महादेव का स्मरण करने से जीवन में आ रही परेशानियों का समाधान हो सकता है।

    धन का संकलनइस दिन विशेष रूप से अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए श्री लक्ष्मी यंत्र की पूजा करें। देवी लक्ष्मी की कृपा से धन-संपत्ति में वृद्धि हो सकती है। गुरुवार का व्रतइस दिन उपवासी रहकर केवल फलाहार करें और मानसिक शांति के लिए गुरु के मंत्र का जाप करें। इससे मानसिक शांति और संतुलन मिलेगा। शिव चालीसा का पाठइस दिन शिव चालीसा का पाठ करें और साथ ही ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें। यह उपाय मानसिक और शारीरिक संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकता है भक्तिपूर्वक दर्शनइस दिन भगवान शिव के मंदिर में जाकर दर्शन करें और वहां दीप जलाकर पूजा अर्चना करें। इस दिन किए गए धार्मिक कर्मों का बहुत फल मिलता है।

    व्यापारिक उन्नति के लिएअगर आप व्यापार में वृद्धि चाहते हैं तो इस दिन विशेष रूप से भगवान शिव से व्यापार में समृद्धि की प्रार्थना करें और पुराने उधारी या ऋण से छुटकारा पाने के लिए प्रयास करें। नए साल की शुरुआत गुरु प्रदोष व्रत से हो रही है जो विशेष रूप से धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस दिन किए गए उपायों और पूजा से जीवन में सुख समृद्धि और सफलता प्राप्त हो सकती है। महादेव की कृपा से नौकरी व्यापार और धन-संपत्ति में वृद्धि हो सकती है और साल भर शांति और खुशहाली बनी रह सकती है।