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  • 11 हजार की नौकरी, 5 मकान और SUV का मालिक! PNB के 17.29 करोड़ के जाली नोट कांड में संविदा कर्मचारी पर शक

    11 हजार की नौकरी, 5 मकान और SUV का मालिक! PNB के 17.29 करोड़ के जाली नोट कांड में संविदा कर्मचारी पर शक

    सहारनपुर। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के करेंसी चेस्ट से मिले 17.29 करोड़ रुपये के जाली नोटों के मामले में जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, नए सवाल सामने आ रहे हैं। अब बैंक का एक संविदा कर्मचारी जांच एजेंसियों के रडार पर है। महज 11 हजार रुपये मासिक वेतन पर ड्राइवर-लोडर के तौर पर काम करने वाले इस कर्मचारी की संपत्तियों ने जांच अधिकारियों का ध्यान खींचा है।

    जांच में सामने आया है कि कर्मचारी के पास पांच मकान, SUV और अपना ड्राइवर तक है। इसी वजह से उसकी आय और संपत्ति के बीच के अंतर को लेकर एजेंसियां पड़ताल कर रही हैं। इस मामले में करेंसी चेस्ट के निलंबित मैनेजर अमित कुमार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) चंडीगढ़ से गिरफ्तार कर चुकी है।

    मैनेजर का PA बनकर करता था काम?

    सहारनपुर पुलिस और NIA की संयुक्त जांच में पता चला है कि संविदा कर्मचारी का आधिकारिक काम कैश वैन चलाने तथा कैश की लोडिंग-अनलोडिंग तक सीमित था। हालांकि, जांच एजेंसियों के मुताबिक वह करेंसी चेस्ट के भीतर मैनेजर अमित कुमार के पर्सनल असिस्टेंट (PA) की तरह काम करता था।

    बताया जा रहा है कि उसे मुख्य चेस्ट एरिया में बेरोकटोक आने-जाने की सुविधा हासिल थी। यही वजह है कि एजेंसियां अब उसकी भूमिका की बारीकी से जांच कर रही हैं।

    असली नोटों की जगह जाली करेंसी रखने का शक

    जांच का एक प्रमुख बिंदु यह है कि क्या करेंसी चेस्ट में रखे असली नोटों के बंडलों से रकम निकालकर उनकी जगह जाली नोट रखे गए थे। एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि यदि असली रकम चेस्ट से बाहर निकाली गई तो उसे ठिकाने लगाने में संविदा कर्मचारी की कोई भूमिका थी या नहीं।

    फिलहाल जांच एजेंसियां उसके खिलाफ मिले संपत्ति संबंधी इनपुट और करेंसी चेस्ट में उसकी पहुंच के बीच संबंध तलाश रही हैं।

    जाली नोटों का नेटवर्क कितना बड़ा?

    NIA अब इस सवाल का भी जवाब तलाश रही है कि करेंसी चेस्ट में इतनी बड़ी मात्रा में 500 रुपये के उच्च गुणवत्ता वाले जाली नोट आखिर कहां से पहुंचे। जांच एजेंसी इस संभावना को भी देख रही है कि कहीं इस पूरे मामले के पीछे कोई बड़ा सिंडिकेट या विदेशी नेटवर्क तो सक्रिय नहीं था।

    नेपाल सीमा से जुड़े किसी नेटवर्क की संभावित भूमिका को लेकर भी जांच की जा रही है। हालांकि, इस दिशा में जांच अभी जारी है और किसी निष्कर्ष पर पहुंचना बाकी है।

    बैंक शाखाओं और ATM तक तो नहीं पहुंचे नकली नोट?

    NIA और SIT के साथ RBI की संयुक्त ऑडिट टीम भी करेंसी चेस्ट से जुड़े रिकॉर्ड और नकदी के प्रवाह की जांच कर रही है। एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि बरामद जाली नोटों में से कोई हिस्सा पहले ही बैंक की दूसरी शाखाओं, ATM या बाजार में तो नहीं पहुंच गया।

    17.29 करोड़ रुपये की जाली करेंसी की बरामदगी के बाद अब जांच का फोकस सिर्फ करेंसी चेस्ट तक सीमित नहीं है। एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस पूरे नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल हैं और असली रकम तथा जाली नोटों की अदला-बदली किस तरीके से की गई।

  • वैश्विक तनाव और बढ़ते क्रूड दबाव से बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 121 अंक टूटा और निफ्टी 0.34 प्रतिशत नीचे बंद

    वैश्विक तनाव और बढ़ते क्रूड दबाव से बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 121 अंक टूटा और निफ्टी 0.34 प्रतिशत नीचे बंद

    नई दिल्ली ।पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण वैश्विक शेयर बाजारों में कमजोरी का असर शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन प्रमुख सूचकांक शुरुआती गिरावट के बाद निचले स्तर से संभले, लेकिन कारोबार का अंत लाल निशान में हुआ। आईटी, एफएमसीजी और बैंकिंग शेयरों से बाजार को कुछ सहारा मिला, इसके बावजूद सेंसेक्स और निफ्टी में गिरावट दर्ज की गई।

    कारोबार समाप्त होने पर 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 120.83 अंक यानी 0.16 प्रतिशत गिरकर 74,781.76 पर बंद हुआ। निफ्टी 50 भी 79.70 अंक यानी 0.34 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,398.10 पर रहा। दिन के दौरान दोनों सूचकांकों ने निचले स्तर से कुछ सुधार किया, जिससे अंतिम गिरावट शुरुआती दबाव की तुलना में सीमित रही।

    सेंसेक्स पिछले बंद स्तर 74,902.59 के मुकाबले 593.42 अंक यानी 0.79 प्रतिशत नीचे 74,309.16 पर खुला था। कारोबार के दौरान यह एक समय 74,917.15 के उच्च स्तर तक पहुंचा, जबकि दिन के निचले स्तर पर 74,160.16 तक फिसल गया। इस तरह सेंसेक्स ने अपने दिन के निचले स्तर से 621.59 अंक की रिकवरी की।

    निफ्टी भी पिछले बंद स्तर 23,477.80 के मुकाबले 207 अंक यानी 0.88 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,270.30 पर खुला। कारोबार के दौरान यह 23,448.10 के उच्च स्तर तक पहुंचा, जबकि 23,231.40 का निचला स्तर भी देखा गया।

    व्यापक बाजार में निफ्टी मिडकैप और निफ्टी स्मॉलकैप क्रमशः 0.26 प्रतिशत और 0.58 प्रतिशत नीचे रहे। सेक्टरों में निफ्टी रियल्टी और निफ्टी मेटल सबसे ज्यादा कमजोर रहे। रियल्टी इंडेक्स में 2.7 प्रतिशत और मेटल इंडेक्स में 2.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। ऑटो, ऑयल एंड गैस, पीएसयू बैंक और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में भी दबाव रहा।

    इसके विपरीत प्राइवेट बैंक, मीडिया और आईटी सूचकांकों में बढ़त देखने को मिली। निफ्टी 50 में एचडीएफसी बैंक, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, टेक महिंद्रा, एचडीएफसी लाइफ और विप्रो प्रमुख बढ़त वाले शेयर रहे। वहीं हिंडाल्को इंडस्ट्रीज, जेएसडब्ल्यू स्टील, आयशर मोटर्स, टाटा स्टील और ओएनजीसी में सबसे ज्यादा कमजोरी रही।

    बाजार पर दबाव के प्रमुख कारणों में पश्चिम एशिया का तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, बॉन्ड यील्ड में वृद्धि और विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली शामिल रही। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर 110 डॉलर की ओर बढ़ा, जिससे आपूर्ति बाधित होने की चिंता बढ़ी।

    कच्चे तेल की महंगाई ने वैश्विक बॉन्ड यील्ड पर भी दबाव बढ़ाया। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5 प्रतिशत के करीब पहुंचने से इक्विटी वैल्यूएशन पर दबाव बढ़ा और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रुख की आशंकाएं मजबूत हुईं। इस बीच रुपया कमजोर होकर 95.6 प्रति डॉलर पर आ गया।

    पूरे सप्ताह की बात करें तो निफ्टी 50 में 2.1 प्रतिशत की गिरावट रही। मिडकैप 100 और स्मॉलकैप 100 में क्रमशः 0.3 प्रतिशत और 0.6 प्रतिशत की कमजोरी आई। प्राइवेट बैंक इंडेक्स 0.5 प्रतिशत चढ़ा, जबकि रियल्टी क्षेत्र कमजोर रहा।

    बैंक यूनियनों की देशव्यापी हड़ताल से भी बैंकिंग गतिविधियां प्रभावित हुईं। कर्मचारी पांच दिन के कार्य सप्ताह और पीएलआई योजना में बदलाव जैसी मांगों को लेकर हड़ताल पर रहे। इस महीने के अंत में और 26 अक्टूबर से भी हड़ताल प्रस्तावित है।

    प्राइमरी बाजार में एनएसई के आईपीओ का प्राइस बैंड 1,700 से 1,785 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है। इश्यू 17 सितंबर को खुलेगा और इससे करीब 22,662 करोड़ रुपये जुटाने की उम्मीद है। अगले सप्ताह निवेशकों की नजर भारत के अगस्त सीपीआई और डब्ल्यूपीआई आंकड़ों के साथ अमेरिकी फेड के नीतिगत फैसले, रिटेल सेल्स और औद्योगिक उत्पादन पर रहेगी। क्रूड, रुपया और वैश्विक बॉन्ड यील्ड भी बाजार की दिशा के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे।

  • ब्रिक्स देशों के फास्ट पेमेंट सिस्टम और सीबीडीसी को जोड़ने पर चर्चा, सीमा पार भुगतान सस्ता और तेज बनाने की तैयारी

    ब्रिक्स देशों के फास्ट पेमेंट सिस्टम और सीबीडीसी को जोड़ने पर चर्चा, सीमा पार भुगतान सस्ता और तेज बनाने की तैयारी


    नई दिल्ली ।
    ब्रिक्स देशों के बीच सीमा पार भुगतान को अधिक तेज, सस्ता और सुविधाजनक बनाने के लिए फास्ट पेमेंट सिस्टम और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी सीबीडीसी को आपस में जोड़ने की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि इस दिशा में अभी कई विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। यह पहल ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत सितंबर 2026 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है।

    संजय मल्होत्रा ने कहा कि सीमा पार भुगतान ब्रिक्स देशों की साझा प्राथमिकताओं में शामिल है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में लागत, समय और तकनीकी प्रक्रियाओं को कम करने की पर्याप्त गुंजाइश है। इसी उद्देश्य से अलग-अलग देशों के तेज भुगतान नेटवर्क को जोड़ने और डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है।

    सीबीडीसी किसी देश के केंद्रीय बैंक की ओर से जारी डिजिटल मुद्रा होती है। भारत में डिजिटल रुपया इसी दिशा में विकसित की गई व्यवस्था है। यदि अलग-अलग देशों की ऐसी डिजिटल मुद्राओं और तेज भुगतान प्रणालियों के बीच तकनीकी कनेक्टिविटी विकसित होती है, तो भविष्य में सीमा पार लेनदेन को कम समय में पूरा करने की संभावना बढ़ सकती है।

    आरबीआई गवर्नर के अनुसार, अभी यह प्रक्रिया शुरुआती चर्चा के चरण में है और किसी अंतिम व्यवस्था या समयसीमा की घोषणा नहीं हुई है। हालांकि, ब्रिक्स देशों के बीच भुगतान ढांचे को बेहतर बनाने की कोशिश वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में स्थानीय मुद्राओं और डिजिटल भुगतान प्रणालियों की भूमिका बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।

    भारत इस पूरी रणनीति में रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को भी बढ़ावा दे रहा है। आरबीआई ने कई देशों के साथ स्थानीय मुद्रा आधारित व्यापार व्यवस्था विकसित की है। इंडोनेशिया, मालदीव, मॉरीशस और संयुक्त अरब अमीरात के साथ द्विपक्षीय स्थानीय मुद्रा व्यवस्था का उल्लेख करते हुए गवर्नर ने कहा कि ऐसे लेनदेन का दायरा बढ़ाने के लिए और प्रयास किए जाने चाहिए।

    स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से कारोबार के लिए किसी तीसरी मुद्रा पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे कुछ मामलों में लेनदेन की लागत घटाने और भुगतान प्रक्रिया को सरल बनाने में मदद मिल सकती है। भारत के लिए यह रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ाने और वैश्विक व्यापार में उसकी भूमिका मजबूत करने का अवसर भी है।

    संजय मल्होत्रा ने भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल पर भी जोर दिया। उन्होंने बैंकों से एआई को केवल जोखिम के तौर पर देखने के बजाय तकनीकी अवसर के रूप में अपनाने की अपील की। बैंकों को अपने एआई मॉडल की सूची तैयार करने और बोर्ड स्तर पर एआई गवर्नेंस से जुड़ी नीतियां लागू करने की सलाह दी गई है।

    वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए उन्होंने पश्चिम एशिया के तनाव और अन्य भू-राजनीतिक घटनाक्रमों को निकट अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संभावित जोखिम बताया। ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति के स्रोतों में विविधता, एथेनॉल मिश्रण, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा और मुक्त व्यापार समझौतों जैसे कदमों को आर्थिक मजबूती के लिए महत्वपूर्ण बताया गया।

    आरबीआई गवर्नर ने भारतीय बैंकिंग प्रणाली की स्थिति को भी मजबूत बताया। उनके मुताबिक बैंकों के पास बेहतर पूंजी आधार, कम गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां और स्वस्थ लाभप्रदता है। ऐसे में वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय बैंकिंग क्षेत्र अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।

    ब्रिक्स के बीच भुगतान प्रणालियों और सीबीडीसी की संभावित कनेक्टिविटी आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था को बदलने वाली पहल बन सकती है। हालांकि अभी यह चर्चा के स्तर पर है, लेकिन इसके आगे बढ़ने पर व्यापार, पर्यटन और अन्य सीमा पार लेनदेन में भुगतान की लागत और समय कम करने के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

  • अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    नई दिल्ली । अमेरिकी डॉलर लंबे समय से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की सबसे प्रभावशाली मुद्रा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कच्चे तेल की खरीद और सीमा पार वित्तीय लेनदेन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में डॉलर की हिस्सेदारी और इसकी मजबूती को लेकर बहस तेज हुई है। केंद्रीय बैंक अपने भंडार में विविधता लाने के साथ सोने और दूसरी मुद्राओं की हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी विचार कर रहे हैं।

    अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी लंबे समय में कम हुई है। इसके बावजूद डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे प्रमुख आरक्षित मुद्रा है। इसलिए मौजूदा बदलाव को डॉलर के तत्काल अंत के तौर पर देखना सही नहीं होगा। विशेषज्ञों के बीच इसे धीरे-धीरे बढ़ती डीडॉलराइजेशन की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

    डॉलर की हालिया कमजोरी ने इस चर्चा को और हवा दी है। अमेरिकी आर्थिक नीतियों, ब्याज दरों, आर्थिक विकास की संभावनाओं और बढ़ते सरकारी कर्ज को लेकर निवेशकों की चिंताओं का असर डॉलर की धारणा पर पड़ा है। अमेरिका का सरकारी कर्ज बढ़ने से भी लंबे समय में उसकी वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

    केंद्रीय बैंकों के रवैये में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। कई देश विदेशी मुद्रा भंडार को केवल एक मुद्रा पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग परिसंपत्तियों में बांटना चाहते हैं। सोने की खरीद इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है। भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक प्रतिबंधों के अनुभव ने भी देशों को अपने विदेशी भंडार की सुरक्षा और विविधता पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित किया है।

    रूस के विदेशी भंडार पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद कई देशों में यह चिंता बढ़ी कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तनाव की स्थिति में विदेशी मुद्रा संपत्तियों पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से कुछ केंद्रीय बैंक डॉलर के साथ सोने और अन्य मुद्राओं को भी रणनीतिक रूप से महत्व दे रहे हैं।

    तेल कारोबार में भी डॉलर की भूमिका को लेकर चर्चा होती रही है। हालांकि यह धारणा सही नहीं है कि सऊदी अरब के साथ अमेरिका का कोई ऐसा बाध्यकारी 50 साल का समझौता था जिसके तहत तेल की बिक्री केवल डॉलर में करना जरूरी था। फिर भी विभिन्न देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिशें वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव का संकेत जरूर देती हैं।

    भारत के लिए डॉलर में कमजोरी के कुछ फायदे हो सकते हैं। भारत कच्चे तेल समेत कई जरूरी वस्तुओं का बड़ा आयातक है। यदि डॉलर कमजोर रहता है और अंतरराष्ट्रीय कीमतें अनुकूल बनी रहती हैं, तो आयात की लागत पर राहत मिल सकती है। विदेशी मशीनरी और कुछ अन्य आयातित वस्तुएं भी अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती हैं। डॉलर में लिए गए विदेशी कर्ज की रुपये में लागत पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।

    भारत के लिए एक अन्य अवसर रुपये में अंतरराष्ट्रीय कारोबार बढ़ाने का है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार भुगतान की व्यवस्था मजबूत होने से भारत डॉलर पर निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकता है। इससे रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ावा मिलने की संभावना भी बनती है।

    हालांकि कमजोर डॉलर का नुकसान भी हो सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी, दवा, कपड़ा और अन्य निर्यात क्षेत्रों की कंपनियां विदेशों से बड़ी मात्रा में डॉलर कमाती हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति मजबूत होने पर उनकी डॉलर आय को रुपये में बदलने पर कम रकम मिल सकती है, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी मुद्रा संरचना में बदलाव का प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा डॉलर में अचानक और तेज गिरावट वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ा सकती है, जिसका असर भारतीय शेयर बाजार और निवेश प्रवाह पर भी पड़ सकता है।

    फिलहाल डॉलर की वैश्विक ताकत खत्म होने की बात कहना जल्दबाजी होगी। वास्तविक बदलाव यह है कि दुनिया धीरे-धीरे अपने विदेशी भंडार और भुगतान व्यवस्था में विविधता बढ़ा रही है। डॉलर के साथ सोना और दूसरी मुद्राएं भी जगह बना रही हैं। भारत के लिए यह बदलाव आयात लागत और रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल के अवसर खोल सकता है, लेकिन निर्यात और वित्तीय बाजारों के लिए नई चुनौतियां भी पैदा कर सकता है।

  • तेल बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच रुपया मजबूत, अगले सप्ताह वैश्विक घटनाक्रम और डॉलर की चाल से मिलेंगे अहम संकेत

    तेल बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच रुपया मजबूत, अगले सप्ताह वैश्विक घटनाक्रम और डॉलर की चाल से मिलेंगे अहम संकेत

    नई दिल्ली । कमोडिटी बाजार के लिए आने वाला सप्ताह काफी अहम माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की चाल और पश्चिम एशिया की भू राजनीतिक स्थिति बाजार की दिशा पर सीधा असर डाल सकती है। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रम पर निवेशकों की नजर रहेगी, क्योंकि इस क्षेत्र में किसी भी बदलाव का असर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है।

    पिछले सप्ताह वैश्विक तेल बाजार में काफी अस्थिरता देखने को मिली। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड 1.29 प्रतिशत बढ़कर 83.55 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। हालांकि, यह स्तर पिछले सप्ताह के 90.12 डॉलर प्रति बैरल के बंद भाव से अभी भी नीचे है। इसी तरह अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई सितंबर डिलीवरी वाला क्रूड 78.18 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि पिछले सप्ताह इसका स्तर 84.67 डॉलर प्रति बैरल था।

    तेल बाजार में इस उतार चढ़ाव की प्रमुख वजह होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी परिस्थितियां रही हैं। यह जलमार्ग दुनिया के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां जहाजरानी को लेकर किसी संभावित समझौते की उम्मीद से बाजार में आपूर्ति सामान्य होने की संभावना बनी है। अगर जलमार्ग के संचालन को लेकर स्थायी समाधान सामने आता है तो तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    सप्ताह की शुरुआत में डब्ल्यूटीआई क्रूड में तेज गिरावट देखी गई थी। इसके पीछे अमेरिका की ओर से ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई को रोकने और कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के संकेतों को प्रमुख कारण माना गया। बाद में जलमार्ग संचालन से जुड़ी सकारात्मक खबरों के कारण कच्चे तेल में कुछ सुधार आया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगले सप्ताह तेल बाजार में दोनों दिशाओं में तेज गतिविधि देखने को मिल सकती है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने को लेकर औपचारिक समझौता होता है तो आपूर्ति संबंधी चिंताएं कम हो सकती हैं और कच्चे तेल की कीमतों में और नरमी आ सकती है। इसके विपरीत क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर भू राजनीतिक जोखिम प्रीमियम वापस आ सकता है, जिससे तेल कीमतों में दोबारा तेजी देखने को मिल सकती है।

    घरेलू बाजार में मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर कच्चे तेल की कीमत सप्ताह के दौरान करीब 7,100 रुपये प्रति बैरल तक गिर गई थी। बाद में इसमें सुधार हुआ और भाव लगभग 7,400 रुपये के आसपास बंद हुआ। तकनीकी विश्लेषकों के मुताबिक 7,500 से 7,550 रुपये का स्तर निकट अवधि में प्रमुख प्रतिरोध बना हुआ है, जबकि 7,380 से 7,300 रुपये का दायरा अहम समर्थन क्षेत्र माना जा रहा है।

    यदि एमसीएक्स क्रूड इस समर्थन क्षेत्र से नीचे जाता है तो कीमत 7,250 रुपये तक फिसल सकती है। इसके बाद 7,100 से 7,000 रुपये के बीच मजबूत समर्थन मिलने की संभावना है। दूसरी ओर, 7,500 से 7,550 रुपये के ऊपर टिकने पर बाजार में तेजी का रुख मजबूत हो सकता है।

    इधर भारतीय रुपया भी पिछले सप्ताह अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई दिया। डॉलर के मुकाबले यूएसडी/आईएनआर करीब 95.2 रुपये पर बंद हुआ, जबकि सप्ताह के दौरान यह लगभग 94.9 रुपये के निचले स्तर तक पहुंचा। तकनीकी संकेत फिलहाल रुपए के पक्ष में नजर आ रहे हैं। यदि विनिमय दर 94.9 रुपये से नीचे बनी रहती है तो रुपया 94.7 से 94.5 रुपये तक मजबूत हो सकता है।

    वहीं 95.2 से 95.4 रुपये का स्तर डॉलर के लिए महत्वपूर्ण प्रतिरोध क्षेत्र माना जा रहा है। इसके ऊपर जाने पर यूएसडी/आईएनआर 95.5 से 95.7 रुपये तक पहुंच सकता है और रुपए पर दबाव बढ़ सकता है। तकनीकी संकेतकों में आरएसआई के ऊंचे स्तरों से नीचे आने और एमएसीडी में डॉलर की तेजी की रफ्तार घटने के संकेत मिल रहे हैं।

    अगले सप्ताह बाजार की दिशा केवल तकनीकी स्तरों से तय नहीं होगी। अमेरिकी डॉलर की चाल, विदेशी निवेशकों का प्रवाह, कच्चे तेल की कीमतें और पश्चिम एशिया की भू राजनीतिक स्थिति प्रमुख कारक रहेंगे। वैश्विक परिस्थितियां स्थिर रहने पर रुपए को मजबूती और तेल कीमतों में नरमी मिल सकती है, जबकि तनाव बढ़ने पर कमोडिटी बाजार में फिर से अस्थिरता बढ़ने की संभावना रहेगी।

  • फेड के ब्याज दर फैसले के बाद अमेरिकी बाजार में भारी गिरावट, वैश्विक दबाव के बीच भारतीय शेयर बाजार ने दिखाई मजबूती

    फेड के ब्याज दर फैसले के बाद अमेरिकी बाजार में भारी गिरावट, वैश्विक दबाव के बीच भारतीय शेयर बाजार ने दिखाई मजबूती

    नई दिल्ली । अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति के फैसले के बाद वैश्विक वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करने के फैसले से अमेरिकी निवेशकों की उम्मीदों को झटका लगा, जिसके चलते अमेरिकी शेयर बाजार में तेज बिकवाली दर्ज की गई। दूसरी ओर, वैश्विक दबाव के बावजूद भारतीय शेयर बाजार ने अपेक्षाकृत स्थिर शुरुआत की और शुरुआती कारोबार में प्रमुख सूचकांक बढ़त के साथ कारोबार करते दिखाई दिए।

    अमेरिका में डॉऊ जोंस इंडस्ट्रियल एवरेज कारोबार के दौरान 1,100 अंकों से अधिक तक फिसल गया। इसके साथ ही नैस्डैक और एसएंडपी 500 सूचकांकों में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को ब्याज दरों को लेकर अधिक स्पष्ट संकेतों की उम्मीद थी, लेकिन फेडरल रिजर्व द्वारा मौजूदा दरों को बरकरार रखने के फैसले ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया। इसके बाद निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से दूरी बनानी शुरू कर दी, जिससे व्यापक बिकवाली देखने को मिली।

    फेडरल रिजर्व ने अपनी नीति समीक्षा के बाद ब्याज दरों को 3.50 से 3.75 प्रतिशत के दायरे में बनाए रखने का निर्णय लिया। केंद्रीय बैंक ने यह संकेत भी दिया कि महंगाई पर पूरी तरह नियंत्रण पाने की प्रक्रिया अभी जारी है और भविष्य के निर्णय आर्थिक आंकड़ों के आधार पर लिए जाएंगे। इसी कारण बाजार को निकट भविष्य में ब्याज दरों को लेकर कोई स्पष्ट दिशा नहीं मिल सकी।

    अमेरिकी बाजार में आई गिरावट का असर एशियाई बाजारों पर भी दिखाई दिया, हालांकि विभिन्न देशों के बाजारों में मिश्रित रुख रहा। कुछ प्रमुख एशियाई सूचकांकों में बढ़त दर्ज की गई, जबकि कुछ बाजारों में हल्की कमजोरी देखने को मिली। इससे यह स्पष्ट हुआ कि निवेशक वैश्विक आर्थिक संकेतकों और अमेरिकी मौद्रिक नीति के संभावित प्रभाव का आकलन करने में जुटे हुए हैं।

    वैश्विक दबाव के बावजूद भारतीय शेयर बाजार ने अपेक्षाकृत संतुलित प्रदर्शन किया। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों हरे निशान के साथ खुले। बाजार में ऑटोमोबाइल और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के शेयरों में खरीदारी देखने को मिली, जबकि बैंकिंग और रियल एस्टेट क्षेत्र के कुछ शेयरों पर दबाव बना रहा। विश्लेषकों का मानना है कि घरेलू निवेशकों का भरोसा और भारतीय अर्थव्यवस्था की अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति ने बाजार को शुरुआती समर्थन दिया।

    विदेशी बाजारों की हलचल के बीच भारतीय मुद्रा में भी मजबूती दर्ज की गई। शुरुआती कारोबार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले छह पैसे मजबूत होकर 95.59 के स्तर पर पहुंच गया। मुद्रा बाजार के जानकारों का कहना है कि घरेलू बाजार की स्थिरता और विदेशी मुद्रा प्रवाह से रुपये को समर्थन मिला, हालांकि वैश्विक घटनाक्रमों पर निवेशकों की नजर बनी हुई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में वैश्विक बाजारों की दिशा काफी हद तक अमेरिका से आने वाले आर्थिक आंकड़ों, महंगाई के रुझान और फेडरल रिजर्व की भविष्य की नीति पर निर्भर करेगी। वहीं भारतीय बाजार में भी विदेशी निवेश, कंपनियों के तिमाही नतीजे और वैश्विक संकेतकों का असर देखने को मिल सकता है। फिलहाल निवेशकों की निगाहें अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों और घरेलू बाजार की मजबूती के बीच संतुलन पर बनी हुई हैं।

  • पश्चिम एशिया तनाव से भारतीय शेयर बाजार पर बड़ा असर, सेंसेक्स 561 अंक टूटा, निफ्टी 24,100 के नीचे फिसला, तीन दिन की तेजी थमी

    पश्चिम एशिया तनाव से भारतीय शेयर बाजार पर बड़ा असर, सेंसेक्स 561 अंक टूटा, निफ्टी 24,100 के नीचे फिसला, तीन दिन की तेजी थमी

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों का असर मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। सप्ताह के दूसरे कारोबारी दिन घरेलू बाजार गिरावट के साथ बंद हुआ और लगातार तीन सत्रों से जारी तेजी का सिलसिला टूट गया। निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाई, जिसके चलते अधिकांश सेक्टरों में बिकवाली हावी रही। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और वैश्विक अनिश्चितता ने भी बाजार की धारणा को प्रभावित किया।

    कारोबार समाप्त होने पर बीएसई सेंसेक्स 561.46 अंक यानी 0.72 प्रतिशत की गिरावट के साथ 77,054.94 अंक पर बंद हुआ। वहीं, एनएसई निफ्टी 50 इंडेक्स 158.95 अंक यानी 0.66 प्रतिशत टूटकर 24,052.05 अंक पर पहुंच गया। शुरुआती कारोबार से ही बाजार पर दबाव बना रहा और दिनभर बिकवाली का माहौल देखने को मिला। निवेशकों की सतर्क रणनीति के कारण प्रमुख सूचकांक पूरे सत्र में लाल निशान में कारोबार करते रहे।

    बाजार की व्यापक तस्वीर भी कमजोर रही। कारोबार के दौरान लगभग 1,422 शेयरों में बढ़त दर्ज हुई, जबकि 2,632 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए। करीब 190 शेयरों में कोई विशेष बदलाव नहीं आया। व्यापक बाजारों में भी कमजोरी देखने को मिली। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में 0.44 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में लगभग 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इससे यह संकेत मिला कि केवल बड़ी कंपनियों ही नहीं, बल्कि मझोली और छोटी कंपनियों के शेयरों पर भी बिकवाली का दबाव बना रहा।

    सेक्टरवार प्रदर्शन की बात करें तो रियल्टी क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित रहा और इसमें करीब 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा पीएसयू बैंक, ऑटो, बैंकिंग और आईटी सेक्टरों में भी उल्लेखनीय कमजोरी देखने को मिली। प्राइवेट बैंक, ऑयल एंड गैस, एफएमसीजी, मीडिया और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े शेयर भी दबाव में रहे। हालांकि फार्मा और मेटल सेक्टर ने बाजार को कुछ राहत दी। फार्मा सूचकांक में लगभग 1 प्रतिशत और मेटल इंडेक्स में 0.60 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई, जिससे इन क्षेत्रों में खरीदारी का रुझान बना रहा।

    निफ्टी 50 में शामिल अधिकांश शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। एचसीएल टेक्नोलॉजीज, श्रीराम फाइनेंस, एचडीएफसी लाइफ, टाटा मोटर्स और इंटरग्लोब एविएशन के शेयर प्रमुख नुकसान वाले शेयरों में शामिल रहे। दूसरी ओर भारती एयरटेल, अपोलो हॉस्पिटल्स, सन फार्मा, टीसीएस और डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज के शेयरों में मजबूती देखने को मिली और ये दिन के प्रमुख बढ़त वाले शेयर रहे। इससे स्पष्ट हुआ कि बाजार में चुनिंदा रक्षात्मक क्षेत्रों में निवेशकों की रुचि बनी रही।

    विदेशी मुद्रा बाजार में भी दबाव देखने को मिला। भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 57 पैसे कमजोर होकर 96.25 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 4 प्रतिशत से अधिक उछलकर करीब 87 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए महंगाई और व्यापार घाटे की चिंता बढ़ा सकती हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष से वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो आने वाले कारोबारी सत्रों में भी भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बना रह सकता है।

  • सेबी का बड़ा फैसला, विदेशी निवेशकों की पंजीकरण फीस अब डॉलर नहीं बल्कि रुपये में होगी, छह महीने बाद लागू होंगे नए नियम

    सेबी का बड़ा फैसला, विदेशी निवेशकों की पंजीकरण फीस अब डॉलर नहीं बल्कि रुपये में होगी, छह महीने बाद लागू होंगे नए नियम

    नई दिल्ली । भारतीय पूंजी बाजार के नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों (एफवीसीआई) के लिए पंजीकरण शुल्क व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नए नियमों के तहत अब इन निवेशकों की पंजीकरण फीस अमेरिकी डॉलर के बजाय भारतीय रुपये में निर्धारित की जाएगी। यह बदलाव करीब छह महीने बाद लागू होगा, ताकि सभी संबंधित संस्थाओं और निवेशकों को नई व्यवस्था के अनुरूप अपनी प्रक्रियाएं व्यवस्थित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

    नए शुल्क ढांचे के अनुसार अब पहले लागू 1,000 अमेरिकी डॉलर की पंजीकरण फीस के स्थान पर 90,000 रुपये का भुगतान करना होगा। इसी प्रकार कैटेगरी-1 एफपीआई और एफवीसीआई के लिए पहले निर्धारित 2,500 अमेरिकी डॉलर की फीस को बदलकर 2.30 लाख रुपये कर दिया गया है। इसके साथ ही विलंब शुल्क और पंजीकरण जारी रखने से संबंधित शुल्कों में भी संशोधन किया गया है, जिससे पूरी शुल्क प्रणाली भारतीय मुद्रा पर आधारित हो जाएगी।

    सेबी का मानना है कि रुपये में शुल्क निर्धारित करने से विदेशी मुद्रा आधारित भुगतान व्यवस्था से जुड़ी कई व्यावहारिक चुनौतियां समाप्त होंगी। अब तक डॉलर आधारित शुल्क प्रणाली के कारण लेखांकन, बिलिंग, भुगतान मिलान और वित्तीय रिपोर्टिंग जैसी प्रक्रियाओं में अतिरिक्त समय और संसाधनों की आवश्यकता पड़ती थी। नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन प्रक्रियाओं को अधिक सरल, पारदर्शी और प्रभावी बनाया जा सकेगा।

    संशोधित नियमों के तहत डिपॉजिटरी संस्थानों की जिम्मेदारी भी तय की गई है। अब उन्हें एफपीआई और एफवीसीआई से प्राप्त शुल्क पंजीकरण स्वीकृत होने के पांच कार्य दिवसों के भीतर सेबी के पास जमा कराना होगा। इससे शुल्क संग्रह और नियामकीय प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित होने की उम्मीद है। नियामक का उद्देश्य पूरी प्रणाली को समयबद्ध और डिजिटल प्रक्रियाओं के अनुरूप बनाना है।

    सेबी ने पंजीकरण प्रक्रिया को भी पहले की तुलना में अधिक सरल बनाने की दिशा में कदम उठाया है। अब सामान्य आवेदन पत्र में व्यक्तिगत निवेशकों के लिए जन्मतिथि तथा संस्थागत आवेदकों के लिए कंपनी की स्थापना तिथि जैसी आवश्यक जानकारियों को शामिल किया गया है। इससे आवेदन प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित होगी और अन्य नियामकीय औपचारिकताओं को पूरा करना भी आसान हो जाएगा।

    यह बदलाव कर संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाने की व्यापक पहल के अनुरूप भी माना जा रहा है। विशेष रूप से स्थायी खाता संख्या (पैन) के आवेदन और उससे जुड़ी औपचारिकताओं को आसान बनाने के उद्देश्य से विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय बढ़ाया गया है। इससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय पूंजी बाजार में प्रवेश और अनुपालन की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक सहज हो सकती है।

    इसके अतिरिक्त सेबी ने कस्टोडियन संस्थानों के शुल्क भुगतान के तरीके में भी संशोधन किया है। पहले जहां उन्हें वार्षिक आधार पर शुल्क जमा करना पड़ता था, वहीं अब मासिक भुगतान व्यवस्था लागू की गई है। इससे भुगतान प्रक्रिया अधिक नियमित और प्रबंधन के लिहाज से सुविधाजनक बनने की उम्मीद है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रुपये में शुल्क निर्धारण से प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी, विनिमय दर के उतार-चढ़ाव का प्रभाव कम होगा और विदेशी निवेशकों के लिए अनुपालन प्रक्रिया अधिक स्पष्ट बनेगी। यह कदम भारतीय पूंजी बाजार को और अधिक पारदर्शी, आधुनिक और निवेशक-अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

  • पये की कमजोरी पर विशेषज्ञों की राय ने बढ़ाया भरोसा: अस्थिर वैश्विक माहौल खत्म होते ही दिख सकती है रिकवरी

    पये की कमजोरी पर विशेषज्ञों की राय ने बढ़ाया भरोसा: अस्थिर वैश्विक माहौल खत्म होते ही दिख सकती है रिकवरी


    नई दिल्ली। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में लगातार हो रहे बदलाव और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय रुपये की स्थिति को लेकर चर्चा तेज हो गई है। डॉलर के मुकाबले रुपये में आई कमजोरी ने बाजार और आम लोगों के बीच चिंता बढ़ाई है, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति को घबराहट के नजरिए से देखने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियां अस्थायी हैं और जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितता कम होगी, भारतीय मुद्रा में भी धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल सकता है।

    आर्थिक जानकारों का मानना है कि वैश्विक बाजार इस समय कई तरह के दबावों से गुजर रहे हैं। दुनिया के कई हिस्सों में जारी तनाव, बढ़ती आर्थिक चुनौतियां और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी अनिश्चितताओं ने मुद्रा बाजार पर भी असर डाला है। ऐसे समय में किसी भी देश की मुद्रा पर दबाव बनना असामान्य नहीं माना जाता। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति अभी भी मजबूत है और अस्थायी उतार-चढ़ाव को स्थायी संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि डॉलर के मुकाबले रुपया मनोवैज्ञानिक स्तर तक भी पहुंचता है तो यह केवल एक आंकड़ा होगा, न कि किसी गंभीर आर्थिक संकट का संकेत। कई बार बाजार परिस्थितियों के अनुसार मुद्राएं अपने आप संतुलन बनाती हैं और ऐसी स्थितियों में अत्यधिक हस्तक्षेप लंबे समय में नुकसानदायक भी साबित हो सकता है। उनका मानना है कि बाजार आधारित समायोजन कई बार कृत्रिम नियंत्रण की तुलना में अधिक प्रभावी और टिकाऊ साबित होते हैं।

    इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि केंद्रीय संस्थाएं अत्यधिक दबाव बनाकर मुद्रा को एक तय स्तर पर रोकने की कोशिश करती हैं तो इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। आर्थिक नीतियों का उद्देश्य केवल तात्कालिक राहत देना नहीं बल्कि दीर्घकालिक स्थिरता बनाए रखना भी होना चाहिए। इसलिए कई विशेषज्ञ विनिमय दर को अपनी स्वाभाविक प्रक्रिया के अनुसार काम करने देने की बात कर रहे हैं।

    कच्चे तेल की कीमतों को लेकर भी आर्थिक जगत में चर्चा बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में वृद्धि का असर घरेलू बाजारों पर धीरे-धीरे दिखाई देना स्वाभाविक माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी उत्पाद की कीमतों को लंबे समय तक कृत्रिम रूप से नियंत्रित रखना व्यवहारिक नहीं होता। बाजार की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप ही आर्थिक नीतियां अधिक प्रभावी साबित होती हैं।

    इसके अलावा विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने के लिए अल्पकालिक उपायों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आर्थिक जानकारों का कहना है कि ऐसे कदम शुरुआती राहत तो दे सकते हैं, लेकिन भविष्य में अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव भी पैदा कर सकते हैं। फिलहाल विशेषज्ञों की राय यही है कि मौजूदा हालात को धैर्य और संतुलन के साथ देखने की आवश्यकता है, क्योंकि वैश्विक परिस्थितियां सामान्य होते ही भारतीय रुपये में मजबूती की संभावना अभी भी बरकरार मानी जा रही है।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं और डॉलर की मजबूती के बीच सोने पर लगातार दबाव और चांदी में सीमित लेकिन स्थिर मजबूती का रुझान

    वैश्विक अनिश्चितताओं और डॉलर की मजबूती के बीच सोने पर लगातार दबाव और चांदी में सीमित लेकिन स्थिर मजबूती का रुझान

    नई दिल्ली: कीमती धातुओं और वैश्विक बाजारों में उतार चढ़ाव का मिला जुला असर निवेशकों की धारणा पर भारी पड़ा सोना दबाव में रहा जबकि चांदी ने मजबूती दिखाई रुपया भी डॉलर के मुकाबले उतार चढ़ाव के बीच हल्की बढ़त के साथ खुला और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना रहा

    सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन वैश्विक संकेतों के बीच घरेलू कमोडिटी बाजार में अस्थिरता साफ दिखाई दी मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में जून डिलीवरी वाला सोना कारोबार की शुरुआत में मजबूती के साथ खुला लेकिन दिन बढ़ने के साथ इसमें गिरावट देखने को मिली सोने ने कारोबार के दौरान एक सीमित दायरे में उतार चढ़ाव दिखाया और निवेशकों की सतर्कता के कारण इसमें बड़ी तेजी नहीं बन सकी शुरुआती कारोबार में जहां सोने को वैश्विक मांग और सुरक्षित निवेश के रुझान से समर्थन मिला वहीं बाद में डॉलर की मजबूती और मुनाफावसूली के चलते इसमें दबाव बढ़ गया

    दूसरी ओर चांदी ने दिनभर अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया और इसमें हल्की तेजी दर्ज की गई चांदी की कीमतों को औद्योगिक मांग से समर्थन मिला हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार इसमें स्थायी तेजी के लिए अभी और मजबूत संकेतों की आवश्यकता बनी हुई है बाजार प्रतिभागियों का मानना है कि जब तक प्रमुख स्तरों को निर्णायक रूप से पार नहीं किया जाता तब तक इसमें सीमित दायरे में कारोबार जारी रह सकता है

    मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले हल्की मजबूती दिखाई शुरुआती कारोबार में रुपया पिछले सत्र की तुलना में मजबूत खुला जिसका प्रमुख कारण घरेलू शेयर बाजार में स्थिरता और विदेशी बाजारों में जोखिम भावना में सुधार रहा साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भी रुपये को समर्थन मिला हालांकि वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती ने रुपये की बढ़त पर दबाव बनाए रखा और इसका प्रभाव दिनभर देखने को मिला

    कच्चे तेल के बाजार में भी नरमी का रुख रहा ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी कच्चे तेल दोनों में गिरावट दर्ज की गई जिसका कारण वैश्विक मांग को लेकर अनिश्चितता और भू राजनीतिक घटनाक्रम में अपेक्षाकृत स्थिरता माना जा रहा है मध्य पूर्व में तनाव में कमी और संघर्ष विराम की खबरों ने भी ऊर्जा बाजार की धारणा को प्रभावित किया जिससे तेल की कीमतों में नरमी आई

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू राजनीतिक घटनाक्रमों ने बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई इजरायल और लेबनान के बीच संघर्ष विराम की घोषणा और अमेरिका ईरान वार्ता में प्रगति की उम्मीदों ने वैश्विक निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को बढ़ाया है हालांकि इसके बावजूद निवेशक पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखे और उन्होंने सुरक्षित निवेश विकल्पों में संतुलित रुख बनाए रखा

    घरेलू शेयर बाजार में भी सीमित दायरे में हल्की बढ़त देखने को मिली जिससे रुपये को कुछ समर्थन मिला लेकिन समग्र बाजार माहौल सतर्क ही बना रहा कमोडिटी विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल बाजार में स्पष्ट दिशा का अभाव है और यह स्थिति वैश्विक आर्थिक संकेतों तथा भू राजनीतिक घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी

    इस पूरे परिदृश्य में निवेशकों की नजर आगामी आर्थिक आंकड़ों और केंद्रीय बैंकों की नीतिगत टिप्पणियों पर टिकी हुई है जो आने वाले समय में बाजार की दिशा तय कर सकती हैं फिलहाल बाजार में सतर्कता और अवसर दोनों का मिश्रण बना हुआ है और हर बदलाव पर निवेशक नजर बनाए हुए हैं