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  • गुजरात के मोती पलसन गांव में पानी का संकट, जान जोखिम में डालकर कुओं से पानी भरने को मजबूर ग्रामीण

    गुजरात के मोती पलसन गांव में पानी का संकट, जान जोखिम में डालकर कुओं से पानी भरने को मजबूर ग्रामीण


    नई दिल्ली । गुजरात में विकास और बुनियादी सुविधाओं के बड़े-बड़े दावों के बीच वलसाड जिले के कपराडा तहसील से एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। मोती पलसन गांव में पीने के पानी की गंभीर किल्लत ने ग्रामीणों की जिंदगी को मुश्किलों से भर दिया है। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार की गई जल आपूर्ति योजनाओं के बावजूद गांव के लोग आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

    यह गांव, जिसे भारी वर्षा के कारण कभी-कभी गुजरात का चेरापूंजी भी कहा जाता है, आज गर्मी के मौसम में पानी की भारी कमी से जूझ रहा है। स्थिति इतनी गंभीर है कि गांव की महिलाएं और पुरुष अपने परिवार की प्यास बुझाने के लिए 45 फीट गहरे कुओं में उतरने को मजबूर हैं। कई बार लोहे की सीढ़ियों और रस्सियों के सहारे खतरनाक तरीके से नीचे जाकर पानी निकाला जाता है, जिससे हादसे का खतरा हमेशा बना रहता है।

    ग्रामीणों के अनुसार, गांव में मौजूद सरकारी कुएं भी गर्मी बढ़ते ही सूखने लगते हैं और उनमें बहुत कम पानी बचता है। ऐसे में लोगों को घंटों तक लाइन में खड़ा रहना पड़ता है ताकि वे कुछ बाल्टी पानी भर सकें। कई परिवारों को सिर्फ एक या दो बाल्टी पानी के लिए एक से दो घंटे तक इंतजार करना पड़ता है। इस दौरान महिलाएं छोटे बच्चों को साथ लेकर तेज धूप में कुएं के पास बैठने को मजबूर हैं।

    पानी भरने की यह प्रक्रिया आसान नहीं है। कई बार महिलाएं और युवा कुएं में उतरते समय फिसलकर चोटिल भी हो जाते हैं। इसके बावजूद मजबूरी में यह काम रोजाना करना पड़ता है। गांव में पानी की इतनी कमी है कि हर बूंद की कीमत बढ़ती जा रही है और जीवन की बुनियादी जरूरतें भी चुनौती बन गई हैं।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि कई साल पहले सरकार की ओर से बड़ी जल आपूर्ति योजना शुरू की गई थी, जिसके तहत गांव-गांव में नल लगाए गए। इस योजना पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन नलों से आज तक पानी की एक बूंद भी नियमित रूप से नहीं पहुंची। गांव के लोग इसे योजनाओं की विफलता और प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम मान रहे हैं।

    हालांकि हाल के दिनों में कुछ स्थानों पर पानी की आपूर्ति शुरू किए जाने की बात सामने आई है, लेकिन यह व्यवस्था अभी भी अस्थायी और अपर्याप्त बताई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि समस्या का स्थायी समाधान न होने तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।

    यह स्थिति न केवल गांव की जीवनशैली को प्रभावित कर रही है, बल्कि यह भी सवाल खड़े कर रही है कि जब योजनाओं पर भारी-भरकम बजट खर्च किया जा रहा है, तब भी अंतिम व्यक्ति तक पानी क्यों नहीं पहुंच पा रहा। मोती पलसन गांव की यह तस्वीर ग्रामीण भारत में जल संकट की गंभीरता को उजागर करती है और विकास के दावों की वास्तविकता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।

  • यूपी में हर घर जल का सपना होगा और मजबूत, जल जीवन मिशन 2.0 की औपचारिक शुरुआत

    यूपी में हर घर जल का सपना होगा और मजबूत, जल जीवन मिशन 2.0 की औपचारिक शुरुआत

    नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ पेयजल की पहुंच को और मजबूत बनाने के लिए एक बड़ी पहल की गई है जल जीवन मिशन 2.0 के तहत केंद्र और राज्य सरकार के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं यह समझौता मिशन के अगले चरण की औपचारिक शुरुआत माना जा रहा है

    इस महत्वपूर्ण अवसर पर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी आर पाटिल और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मौजूद रहे और वर्चुअल माध्यम से इस समझौते को अंतिम रूप दिया गया इस पहल का मुख्य उद्देश्य हर घर तक नल के जरिए स्वच्छ पेयजल पहुंचाना है

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यह समझौता हर घर नल से जल के लक्ष्य को तेजी से पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है इससे जलापूर्ति योजनाओं को बेहतर योजना और समयबद्ध तरीके से लागू किया जा सकेगा उन्होंने यह भी कहा कि इसका सीधा लाभ ग्रामीण परिवारों को मिलेगा जिन्हें सुरक्षित और शुद्ध पानी उपलब्ध होगा

    उन्होंने केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय को इस योजना की सफलता का प्रमुख कारण बताया और कहा कि इससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों मजबूत होंगी मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताते हुए कहा कि अंतिम व्यक्ति तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने का सपना अब तेजी से साकार हो रहा है

    प्रदेश में पहले जहां सीमित गांवों तक ही पाइपलाइन के जरिए पानी पहुंचता था वहीं अब हजारों गांवों में नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित की जा रही है जिन इलाकों में दूषित पानी के कारण बीमारियां आम थीं वहां अब हालात में सुधार देखने को मिल रहा है खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस जैसी गंभीर बीमारी पर नियंत्रण में स्वच्छ पेयजल और बेहतर स्वच्छता की बड़ी भूमिका रही है

    सरकार अब केवल कनेक्शन देने तक सीमित नहीं है बल्कि योजनाओं के लंबे समय तक संचालन और रखरखाव पर भी विशेष ध्यान दे रही है गांवों में जलापूर्ति के साथ-साथ अनुरक्षण व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है

    बुंदेलखंड और विंध्य जैसे क्षेत्र जो कभी पानी की कमी से जूझते थे वहां अब घर-घर नल से जल पहुंच रहा है जिससे लोगों के जीवन स्तर में बड़ा बदलाव आया है

    केंद्रीय मंत्री सी आर पाटिल ने भी इस मौके पर कहा कि जल जीवन मिशन के तहत गुणवत्ता पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए उन्होंने राज्यों से अपील की कि सभी परियोजनाओं को टिकाऊ और दीर्घकालिक उपयोग को ध्यान में रखकर लागू किया जा
  • गैस सिलेंडर की किल्लत ने बदल दी रसोई, पहाड़ों में फिर जगा पारंपरिक चूल्हों का भरोसा

    गैस सिलेंडर की किल्लत ने बदल दी रसोई, पहाड़ों में फिर जगा पारंपरिक चूल्हों का भरोसा


    नई दिल्ली:  उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में इन दिनों गैस सिलेंडर की किल्लत ने आम लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। सप्लाई में देरी और बढ़ती कीमतों के कारण कई परिवारों के सामने रसोई चलाना मुश्किल हो गया है। लेकिन इस संकट के बीच पहाड़ों के गांवों ने एक बार फिर अपने पुराने और भरोसेमंद तरीके को याद कर लिया है। कई घरों में अब पारंपरिक लकड़ी के चूल्हे दोबारा जलने लगे हैं। यह दृश्य एक तरह से उस जीवनशैली की वापसी है, जो कभी पहाड़ों की पहचान हुआ करती थी।

    पहले के समय में पहाड़ों के लगभग हर घर में मिट्टी और पत्थर से बना चूल्हा होता था। यही चूल्हा रसोई का मुख्य साधन था और पूरे परिवार के मेलजोल का भी केंद्र माना जाता था। सुबह से लेकर शाम तक चूल्हे की आंच के आसपास ही घर की दिनचर्या चलती थी। धीरे-धीरे गैस सिलेंडर आने के बाद इन चूल्हों का इस्तेमाल कम हो गया, लेकिन आज गैस की किल्लत ने लोगों को फिर उसी पुराने रास्ते की ओर मोड़ दिया है।

    पहाड़ों में ईंधन के लिए लोगों को ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता था। जंगलों और खेतों के आसपास आसानी से मिलने वाली सूखी लकड़ियां, पिरूल यानी चीड़ के सूखे पत्ते और गोबर के उपले ही ईंधन का काम करते थे। गांव की महिलाएं रोजमर्रा के काम के साथ-साथ इन चीजों को इकट्ठा कर लेती थीं और घर की रसोई आसानी से चल जाती थी। इस व्यवस्था में जहां खर्च लगभग शून्य होता था, वहीं चूल्हे पर धीमी आंच में पकने वाले खाने का स्वाद भी अलग ही होता था। आज भी कई लोग मानते हैं कि लकड़ी के चूल्हे पर बने भोजन की खुशबू और स्वाद गैस पर बने खाने से कहीं ज्यादा अच्छा होता है।

    मौजूदा समय में कई परिवारों ने एक नया तरीका अपनाया है, जिसे गांवों में लोग डबल सिस्टम कह रहे हैं। यानी घर में गैस सिलेंडर भी है और साथ ही पारंपरिक चूल्हा भी जलाया जा रहा है। जरूरत पड़ने पर गैस का इस्तेमाल किया जाता है और बाकी समय चूल्हे पर खाना बनाकर गैस की बचत की जाती है। इससे एक फायदा यह भी है कि अगर सिलेंडर खत्म हो जाए या समय पर न मिले, तो घर की रसोई बंद नहीं होती। इस तरह यह तरीका पहाड़ों के लोगों के लिए सस्ता और सुरक्षित विकल्प बन गया है।

    गांव की बुजुर्ग महिला नर्वदा देवी बताती हैं कि पुराने समय के तरीके आज भी उतने ही कारगर हैं जितने पहले थे। उनका कहना है कि पहले गैस का कोई सवाल ही नहीं था। लोग जंगल से सूखी लकड़ी और पिरूल लेकर आते थे और उसी से खाना बनाते थे। अब जब गैस महंगी हो गई है और समय पर नहीं मिल रही है, तो फिर से चूल्हे का सहारा लेना पड़ रहा है। उनके अनुसार पहाड़ों में रहने वाले लोगों के लिए ये पुराने तरीके आज भी बेहद उपयोगी हैं।

    दरअसल पहाड़ों की पारंपरिक जीवनशैली सिर्फ पुरानी यादें नहीं हैं, बल्कि संकट के समय वही सबसे बड़ा सहारा बन जाती हैं। बदलते दौर में भले ही आधुनिक तकनीक ने लोगों की जिंदगी को आसान बनाया हो, लेकिन पहाड़ों में पूर्वजों की समझ और आत्मनिर्भरता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। गैस सिलेंडर की इस समस्या ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ तालमेल ही पहाड़ी जीवन की असली ताकत है।

  • दमोह में दिल दहला देने वाला हादसा: चूल्हे की चिंगारी से झोपड़ी में लगी आग, 4 महीने के मासूम की जिंदा जलकर मौत

    दमोह में दिल दहला देने वाला हादसा: चूल्हे की चिंगारी से झोपड़ी में लगी आग, 4 महीने के मासूम की जिंदा जलकर मौत


    मध्य प्रदेश के दमोह जिले से एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है जहां एक छोटी-सी लापरवाही ने एक मासूम की जान ले ली। देहात थाना क्षेत्र के ग्राम बांसातारखेड़ा के चिथरयाऊ टोला में खेत पर बनी कच्ची झोपड़ी में आग लगने से चार महीने के मासूम बच्चे की जिंदा जलकर मौत हो गई। इस हादसे के बाद पूरे गांव में मातम पसरा हुआ है और परिजन गहरे सदमे में हैं।

    खेत में काम कर रहे थे माता-पिता

    पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, बांसातारखेड़ा निवासी जितेंद्र गौंड गांव के ही किसान शैलेंद्र तिवारी के खेत में सिंचाई का ठेका लेकर काम करता था। खेत की देखरेख के लिए उसने वहीं एक अस्थायी झोपड़ी बना रखी थी, जहां वह अपने परिवार के साथ रहता था।शनिवार की रात जितेंद्र अपनी पत्नी धनाबाई के साथ खेत में पानी देने गया हुआ था। इस दौरान उनका चार महीने का बेटा निशांत झोपड़ी के अंदर सो रहा था। झोपड़ी में चूल्हा जल रहा था जिस पर खाना बनाया गया था।

    चूल्हे की चिंगारी बनी काल
    बताया जा रहा है कि रात के समय चूल्हे से निकली एक चिंगारी झोपड़ी में रखे कपड़ों पर गिर गई। देखते ही देखते आग भड़क उठी। झोपड़ी कच्ची होने और आसपास सूखी घास व अन्य ज्वलनशील सामग्री मौजूद होने के कारण आग ने कुछ ही पलों में विकराल रूप ले लिया। आग लगने के बाद झोपड़ी के अंदर सो रहा मासूम जोर-जोर से रोने लगा। उसकी चीखें सुनकर आसपास मौजूद ग्रामीणों ने शोर मचाया और माता-पिता को सूचना दी।

    अस्पताल पहुंचने से पहले ही तोड़ा दम

    ग्रामीणों की आवाज सुनते ही जितेंद्र और धनाबाई दौड़ते हुए झोपड़ी की ओर पहुंचे। किसी तरह आग की लपटों के बीच से वे अपने झुलसे हुए बच्चे को बाहर निकाल पाए। आनन-फानन में मासूम को इलाज के लिए जिला अस्पताल दमोह ले जाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने जांच के बाद बच्चे को मृत घोषित कर दिया। इस हादसे में पूरी झोपड़ी जलकर खाक हो गई। परिवार के पास रहने और खाने तक का सामान भी नहीं बचा।

    प्रशासन और पुलिस मौके पर पहुंची
    घटना की सूचना मिलते ही देहात थाना पुलिस मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू की। देर रात एएसपी सुजीत सिंह भदोरिया, दमोह एसडीएम आर.एल. बागरी और पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया। नगर पुलिस अधीक्षक एच.आर. पांडेय ने बताया कि यह एक दुर्घटनाजन्य मामला प्रतीत हो रहा है। पुलिस ने मर्ग कायम कर लिया है और सभी पहलुओं की जांच की जा रही है।

    पोस्टमार्टम के बाद सौंपा जाएगा शव

    मासूम के शव को जिला अस्पताल के शवगृह में सुरक्षित रखवाया गया है। प्रशासन के अनुसार, रविवार को तहसीलदार की मौजूदगी में पोस्टमार्टम कराया जाएगा, जिसके बाद शव परिजनों को सौंप दिया जाएगा। घटना के बाद से परिजन गहरे सदमे में हैं और रात में ही अपने गांव लौट गए थे।

    पीड़ित परिवार को मिलेगी आर्थिक सहायता

    दमोह कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर ने बताया कि घटना बेहद दुखद है। प्रशासन की ओर से पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता दी जाएगी। साथ ही शासन की योजनाओं के तहत मिलने वाली मदद भी सुनिश्चित की जाएगी। देहात थाना प्रभारी रचना मिश्रा ने कहा कि मामले में मर्ग कायम कर जांच की जा रही है। प्रारंभिक जांच में आग लगने का कारण चूल्हे की चिंगारी ही सामने आया है।

    गांव में शोक का माहौल

    इस दर्दनाक हादसे के बाद पूरे गांव में शोक की लहर है। हर कोई इस बात से आहत है कि महज चार महीने का मासूम इस तरह काल का शिकार हो गया। ग्रामीणों का कहना है कि खेतों में बनी कच्ची झोपड़ियों में आग लगने का खतरा हमेशा बना रहता है, लेकिन मजबूरी में लोग वहीं रहने को विवश होते हैं।