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  • भारत की तेल खरीद पर दोहरी मार: कच्चा तेल 10 डॉलर महंगा, रूसी क्रूड की छूट भी लगभग खत्म

    भारत की तेल खरीद पर दोहरी मार: कच्चा तेल 10 डॉलर महंगा, रूसी क्रूड की छूट भी लगभग खत्म


    नई दिल्ली। भारतीय तेल रिफाइनरियों के लिए कच्चा तेल खरीदना लगातार महंगा होता जा रहा है। ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत पिछले दो हफ्तों में करीब 10 डॉलर बढ़कर 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। वहीं, खाड़ी और पश्चिम अफ्रीकी तेल की कीमतों पर भी सप्लाई की कमी के चलते प्रीमियम बढ़ गया है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि रूसी तेल पर मिलने वाली छूट लगभग खत्म हो चुकी है, जबकि वेनेजुएला के क्रूड पर भी डिस्काउंट काफी कम हो गया है।

    अगर खाड़ी क्षेत्र में तेल की सप्लाई सामान्य नहीं होती और रूसी क्रूड पर मिलने वाली छूट वापस नहीं आती, तो भारतीय रिफाइनरियों की लागत और बढ़ सकती है। इसका असर तेल कंपनियों के मार्जिन के साथ आगे चलकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से कंपनियों को करीब 6 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो सकता है।

    खाड़ी का तेल ब्रेंट से करीब 10 डॉलर महंगा

    ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ के मुताबिक, बाजार में कच्चे तेल की कमी का फायदा ट्रेडर्स उठा रहे हैं। भारतीय रिफाइनरियों को खाड़ी देशों से तेल खरीदने के लिए स्पॉट मार्केट का सहारा लेना पड़ रहा है, जहां अतिरिक्त प्रीमियम वसूला जा रहा है।

    खाड़ी के सप्लायर दुबई-ओमान बेंचमार्क पर करीब 3 से 4 डॉलर प्रति बैरल अतिरिक्त प्रीमियम मांग रहे हैं। वहीं, दुबई-ओमान बेंचमार्क खुद ब्रेंट से करीब 6 से 7 डॉलर महंगा है। इस तरह भारतीय रिफाइनरों के लिए खाड़ी का कच्चा तेल ब्रेंट की तुलना में करीब 10 डॉलर प्रति बैरल तक महंगा पड़ रहा है।

    सऊदी अरामको की आधिकारिक सेल प्राइस दुबई-ओमान बेंचमार्क से 1.5 से 3 डॉलर नीचे जरूर हैं, लेकिन लाल सागर और होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण टर्म डील के तहत मिलने वाली सप्लाई प्रभावित हुई है। इससे भारतीय रिफाइनरियों की स्पॉट मार्केट पर निर्भरता बढ़ गई है।

    जहाजों की कमी ने बढ़ाई लागत

    संघर्ष वाले क्षेत्रों से कच्चा तेल लाने में जहाजों की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती बन गई है। जोखिम वाले समुद्री रास्तों से तेल पहुंचाने के लिए ट्रेडर्स अतिरिक्त प्रीमियम मांग रहे हैं। टर्म कॉन्ट्रैक्ट में तेल सस्ता होने के बावजूद भारत तक उसे पहुंचाने के लिए पर्याप्त जहाज नहीं मिलना रिफाइनरों की लागत बढ़ा रहा है।

    पश्चिम अफ्रीकी क्रूड भी महंगा

    खाड़ी के बाद पश्चिम अफ्रीका से मिलने वाला कच्चा तेल भी भारतीय रिफाइनरियों के लिए महंगा हो गया है। इसके चलते कंपनियां अब वैकल्पिक स्रोतों पर नजर डाल रही हैं। अमेरिका, ब्राजील और गुयाना जैसे देशों से कच्चा तेल खरीदने के विकल्प पर भी विचार किया जा रहा है।

    रूसी तेल की सबसे बड़ी बढ़त खत्म

    कुछ समय पहले तक रूसी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरों के लिए सबसे आकर्षक विकल्पों में था। इसकी बड़ी वजह उस पर मिलने वाली भारी छूट थी। अब यह डिस्काउंट लगभग खत्म हो चुका है। वेनेजुएला के तेल पर मिलने वाली छूट भी काफी कम हो गई है।

    इससे भारतीय रिफाइनरियों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है—एक तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ रही है और दूसरी तरफ सस्ता रूसी तेल भी पहले जैसा उपलब्ध नहीं है।

    अमेरिकी प्रतिबंध बढ़े तो मुश्किल और बढ़ेगी

    भारतीय तेल कंपनियों के लिए अमेरिकी प्रतिबंध भी बड़ा जोखिम हैं। अगर अमेरिका रूसी तेल खरीदने वाले देशों और कंपनियों पर प्रतिबंध और कड़े करता है, तो भारत के लिए रूसी क्रूड खरीदना और मुश्किल हो सकता है। ऐसे में रिफाइनरियों को दूसरे देशों से महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है।

  • भारत समेत रूसी तेल खरीद वाले पांच देशों पर 100% टैरिफ…., US में कड़े प्रतिबंध वाला विधेयक पेश

    भारत समेत रूसी तेल खरीद वाले पांच देशों पर 100% टैरिफ…., US में कड़े प्रतिबंध वाला विधेयक पेश


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) के दोनों प्रमुख दलों के सीनेटरों (Senators) ने रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाने वाला बहुप्रतीक्षित विधेयक (Bill) पेश किया है। इसमें भारत समेत पांच देशों का नाम शामिल है, जिन पर रूस से तेल की खरीद जारी रखने पर शुल्क लगाया जा सकता है। कुछ सांसद इस प्रस्ताव को “लिंडसे ग्राहम रूस अकाउंटेबिलिटी बिल” (Lindsey Graham Russia Accountability Bill) कह रहे हैं। इसे मंगलवार को कैपिटल हिल में डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल और जीन शाहीन के साथ रिपब्लिकन सीनेटर रोजर विकर, केटी ब्रिट और दोनों दलों के एक दर्जन से अधिक सांसदों ने पेश किया।

    यह विधेयक सीनेटर लिंडसे ग्राहम के निधन के तुरंत बाद पेश किया गया है। ग्राहम ने करीब दो वर्षों तक इस विधेयक पर काम किया था और उनके सहयोगियों ने उन्हें इसका प्रमुख सूत्रधार बताया। इस विधेयक में ग्राहम ने रूसी तेल खरीद करने वाले देशों पर 500 फीसदी टैरिफ लगाने की सिफारिश की थी।


    अमेरिकी सांसदों ने क्यों पेश किया 100 फीसदी टैरिफ वाला बिल?

    मुख्य डेमोक्रेटिक प्रायोजक ब्लूमेंथल ने कहा कि यह विधेयक केवल शुल्क लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें रूस की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से, ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्र, रक्षा उद्योग, रूसी उद्योगपतियों तथा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। विधेयक में प्रशासन को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह रूस से सबसे अधिक तेल खरीदने वाले देशों पर शून्य से अधिक दर पर शुल्क लगा सके। हालांकि, शुल्क की अधिकतम सीमा तय की गई है।

    विधेयक के अनुसार, अब शुल्क केवल रूस से तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों पर लागू होगा। विधेयक के प्रायोजकों ने कहा कि इस सूची में चीन और भारत सबसे ऊपर हैं। संशोधित मसौदे में पहले प्रस्तावित 500 फीसदी शुल्क को घटाकर अधिकतम 100 फीसदी कर दिया गया है।


    टैरिफ वाले देशों की सूची में भारत का भी नाम

    ब्लूमेंथल ने जिन पांच देशों का नाम लिया, उनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। विधेयक में रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों को भी दायरे में लाने का प्रावधान है। हालांकि, जो देश अपनी कुल गैस का 15 फीसदी से कम रूस से आयात करते हैं और इन आयातों को कम करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें इससे छूट मिलेगी। इस प्रावधान से अधिकांश यूरोपीय सहयोगी देशों को राहत मिलेगी।

    सीनेटरों ने स्पष्ट किया कि शुल्क की वास्तविक दर अभी तय नहीं की गई है। इसे विधेयक में निर्धारित नहीं किया गया है, बल्कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव) तय करेंगे। ब्लूमेंथल ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि शुल्क की दर इतनी होगी कि “चीन, भारत और रूस से तेल तथा गैस खरीदने वाले अन्य बड़े देशों को इससे हतोत्साहित किया जा सके।” हालांकि, उन्होंने कोई निश्चित प्रतिशत बताने से इनकार कर दिया।


    ट्रंप के पास छूट देने का विशेषाधिकार

    विधेयक में राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। अगर बाद में शुल्क कम किया जाता है तो इसकी जानकारी कांग्रेस को देना भी अनिवार्य होगा। अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष सीनेटर जेम्स रिश ने कहा कि उन्होंने एक अलग प्रावधान जोड़ने पर जोर दिया, जिसके तहत रूस के तथाकथित “शैडो फ्लीट” यानी उन तेल टैंकरों पर कार्रवाई की जाएगी, जिनका इस्तेमाल मौजूदा प्रतिबंधों से बचकर तेल निर्यात के लिए किया जाता है।

    सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को पहले के मसौदे की तुलना में काफी सीमित किया गया है। पहले के संस्करण में कथित तौर पर 63 देशों तक पर शुल्क लगाने का प्रावधान था। ब्लूमेंथल ने कहा कि मौजूदा मसौदा केवल रूस से तेल खरीदने वाले पांच और गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों पर केंद्रित है। इनमें कुछ देशों के नाम दोनों सूचियों में शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह बदलाव ट्रंप प्रशासन के सुझाव पर किया गया है और प्रशासन ने लिखित रूप से इस विधेयक का समर्थन भी किया है।


    लिंडसे ग्राहम को लेकर क्या बोले अमेरिकी सांसद?

    सांसदों ने उम्मीद जताई कि संशोधित मसौदे को प्रतिनिधि सभा में भी व्यापक समर्थन मिलेगा, क्योंकि पहले के व्यापक प्रस्ताव पर कई सांसदों ने आपत्ति जताई थी। विधेयक की घोषणा के दौरान कई सीनेटरों ने लिंडसे ग्राहम को श्रद्धांजलि दी। सीनेटर रोजर विकर ने कहा कि ग्राहम के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम करने के दौरान उन्होंने कई उपलब्धियां देखीं, लेकिन “यह उनका सबसे बड़ा योगदान है।”

    सीनेटर टेड क्रूज ने कहा कि ग्राहम ने निधन से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ इस विधेयक की शर्तों पर सीधे बातचीत की थी। उन्होंने सांसदों से अपील की कि इसे भारी बहुमत से पारित कर ग्राहम को श्रद्धांजलि दी जाए। सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को जल्द पारित करना जरूरी है। उन्होंने यूक्रेन की युद्धक्षेत्र में बढ़त और रूस की ओर से नागरिक इलाकों पर जारी हमलों का हवाला दिया।

    कई सीनेटरों ने उम्मीद जताई कि अगस्त के अंत तक सीनेट इस पर कार्रवाई कर सकती है। उनका कहना है कि पर्याप्त समर्थन मिलते ही इस पर मतदान कराया जाएगा। जब राष्ट्रपति ट्रंप के उस सुझाव के बारे में पूछा गया कि इस विधेयक में ईरान या हिजबुल्ला पर प्रतिबंधों को भी शामिल किया जा सकता है, तो ब्लूमेंथल ने कहा कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता मौजूदा विधेयक को आगे बढ़ाने की है। हालांकि, उन्होंने भविष्य में अलग विधेयक लाने की संभावना से इनकार नहीं किया।


    भारत पर क्यों गहराया संकट?

    भारत ने अब तक रियायती दर पर रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने के लिए पश्चिमी देशों के दबाव को स्वीकार नहीं किया है। 2022 के बाद से रूस से भारत का तेल आयात काफी बढ़ा है और अब यह भारत के कुल तेल आयात का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। नई दिल्ली पहले भी कह चुका है कि यह व्यापार देश की ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं के हित में है। भारत का यह भी कहना रहा है कि इससे वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिलती है।

    यह विधेयक अभी सीनेट की प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद प्रतिनिधि सभा से भी पारित होना बाकी है। इसके बाद ही इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। इससे पहले व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने एएनआई से कहा कि ट्रंप प्रशासन इस रूस प्रतिबंध विधेयक का समर्थन करता है। व्हाइट हाउस के अधिकारी ने कहा कि इस विधेयक के तहत राष्ट्रपति ट्रंप को उन देशों से आने वाले आयात पर 500 फीसदी तक शुल्क लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूस के ऊर्जा क्षेत्र के साथ कारोबार जारी रखते हैं।

  • मिडिल ईस्ट तनाव के बीच रूसी तेल की जमकर हो रही खरीदी… रिकॉर्ड हाई पर पहुंचा भारत का आयात

    मिडिल ईस्ट तनाव के बीच रूसी तेल की जमकर हो रही खरीदी… रिकॉर्ड हाई पर पहुंचा भारत का आयात


    नई दिल्ली।
    अमेरिका-ईरान के बीच शुरू हुए युद्ध (America-Iran War) से ग्लोबल टेंशन (Global Tension) फिर से चरम पर पहुंच गई है और होर्मुज स्ट्रेट बंद (Hormuz Strait Closure) होने के चलते दुनिया के तमाम देशों के सामने तेल-गैस का संकट गहराने लगा है. वहीं दूसरी ओर भारत की बात करें, तो मिडिल ईस्ट के देशों तनाव के बीच भारत ने अपने तेल आयात में विविधता लाने का जो कदम Plan-B के तहत उठाया, उसका फायदा मिल रहा है।

    मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच भी भारत लगातार रूसी तेल खरीदने (India’s Russian Oil Import) में लगा है और ताजा आंकड़े देखें, तो जून महीने में भारत की रूसी तेल आयात रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गया, इसमें 34 फीसदी का जबर्दस्त उछाल दर्ज किया गया है।


    CREA की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

    एक रिपोर्ट में सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के हवाले से बताया गया है कि रूस के कुल तेल निर्यात राजस्व में गिरावट के बावजूद, भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात बीते जून में रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गया, जो इससे पिछले मई महीने की तुलना में 34% अधिक रहा।


    Oil-Gas Supply पर फिर मंडराया बड़ा खतरा

    डेटा पर नजर डालें, तो भारत ने जून में 4.5 अरब यूरो मूल्य का रूसी कच्चा तेल खरीदा, जो उसके कुल 5.5 अरब यूरो के रूसी जीवाश्म ईंधन आयात का 83% है. इस आंकड़े के साथ भारत चीन के बाद रूसी ईंधन का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना है. वहीं जून में चीन रूस का सबसे बड़ा ग्राहक बना रहा, जिसने 7.3 अरब यूरो की खरीदारी की.


    रिफाइनरियों की आपूर्ति में उछाल

    भारत के कुल कच्चे तेल आयात में महीने-दर-महीने 5.4 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली है और यह उछाल प्रमुख रिफाइनरियों को रूसी आपूर्ति में इजाफे के चलते देखने को मिली है. रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी को सप्लाई जून में मई के मुकाबले 150% बढ़ गई, जबकि इंडियन ऑयल कॉर्प (IOCL) की पारादीप रिफाइनरी में आयात 126% बढ़ा. CREA का कहना है कि BPCL की कोच्चि रिफाइनरी 82% और नायरा एनर्जी की वडीनार रिफाइनरी में 45% की वृद्धि हुई है।

    Russian Oil की खरीद, फिर एक्सपोर्ट
    न सिर्फ भारत की रूसी कच्चे तेल से तैयार ईंधन के ग्लोबल व्यापार में बड़ी भूमिका बनी हुई है. यही नहीं रूस से तेल का आयात करते भारत, तुर्की, ब्रुनेई और जॉर्जिया की रिफाइनरियों ने जून में रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले देशों को जमकर तेल प्रोडक्ट का निर्यात भी किया. यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका को 814 मिलियन यूरो मूल्य के तेल उत्पादों का निर्यात किया गया।

    बात अमेरिका को निर्यात की करें, तो इसमें भारत की जामनगर रिफाइनरी, तुर्की में SOCAR के स्वामित्व वाली STAR रिफाइनरी और तुप्रास इजमित रिफाइनरी आगे है. सीआरईए के आंकड़ों के मुताबिक, बीते तीन महीनों में, तुप्रास इजमित रिफाइनरी के कच्चे तेल का 60% और जामनगर रिफाइनरी के कच्चे तेल का 27% रूस से आया था और इनके द्वारा US को निर्यात किया गया।

  • रूसी तेल खरीद पर राहत, भारत की सप्लाई पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर

    रूसी तेल खरीद पर राहत, भारत की सप्लाई पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर


    नई दिल्ली। वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता के बीच अमेरिका ने एक अहम कदम उठाते हुए रूसी तेल से जुड़े प्रतिबंधों में 30 दिनों की अतिरिक्त छूट देने का ऐलान किया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के अनुसार यह राहत उन कच्चे तेल कार्गो पर लागू होगी जो पहले से समुद्र में मौजूद हैं, ताकि उनकी सप्लाई बाधित न हो और वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव कम किया जा सके।

    यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में ऊर्जा संकट और कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। अमेरिका का कहना है कि यह “अस्थायी जनरल लाइसेंस” उन देशों के लिए राहत की तरह है, जिनकी ऊर्जा जरूरतें तत्काल हैं और जो समुद्र में फंसे तेल कार्गो पर निर्भर हैं।

    इस बीच भारत ने अपनी स्थिति एक बार फिर स्पष्ट कर दी है कि वह किसी भी अमेरिकी छूट या प्रतिबंध ढांचे पर निर्भर नहीं है। पेट्रोलियम मंत्रालय की ज्वाइंट सेक्रेट्री सुजाता शर्मा ने साफ कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीदना न तो पहले रोका था, न छूट के दौरान रोका और न ही आगे रोकेगा। उनके मुताबिक यह निर्णय पूरी तरह से व्यावसायिक और आर्थिक जरूरतों पर आधारित है।

    सरकारी पक्ष का कहना है कि भारत की प्राथमिकता देश में ईंधन आपूर्ति को स्थिर बनाए रखना है, ताकि किसी भी प्रकार की कमी या मूल्य वृद्धि का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर न पड़े। हाल के समय में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद भारत में तेल कंपनियों पर दबाव बना हुआ है, जिससे प्रतिदिन करोड़ों रुपये के नुकसान की स्थिति भी बनी हुई है।

    भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से किसी भी तरह की सप्लाई बाधा देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता पर सीधा असर डाल सकती है। इसी कारण रूस से कच्चे तेल की खरीद को एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

    आंकड़ों के अनुसार, भारत अपनी कुल तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और यह निर्भरता लगातार बढ़ रही है। घरेलू उत्पादन में गिरावट और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती मांग ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऐसे में आयातित तेल देश की ऊर्जा व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

    कुल मिलाकर, जहां अमेरिका वैश्विक बाजार को स्थिर रखने के लिए अस्थायी राहत दे रहा है, वहीं भारत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति पूरी तरह घरेलू जरूरतों और आर्थिक वास्तविकताओं पर आधारित रहेगी।

  • रूस-पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती से बढ़ी भारत की चिंता! सस्ते तेल से लेकर सैन्य सहयोग तक गहराते रिश्ते

    रूस-पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती से बढ़ी भारत की चिंता! सस्ते तेल से लेकर सैन्य सहयोग तक गहराते रिश्ते




    नई दिल्ली। पाकिस्तान और रूस के बीच तेजी से बढ़ती नजदीकियों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। ऊर्जा संकट, तेल व्यापार और सैन्य सहयोग को लेकर दोनों देशों के रिश्ते लगातार मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं। रूस में पाकिस्तान के राजदूत Faisal Niaz Tirmizi ने संकेत दिए हैं कि पाकिस्तान एक बार फिर रूस से बड़े पैमाने पर तेल आयात बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। इस बयान के बाद क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

    रूस की सरकारी समाचार एजेंसी TASS की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने होर्मुज जलडमरूमध्य संकट और वैश्विक ऊर्जा अस्थिरता के बीच रूसी तेल आयात बढ़ाने की योजना पर काम शुरू किया है। पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट, विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और बढ़ती महंगाई से जूझ रहा है। ऐसे में सस्ता रूसी तेल इस्लामाबाद के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

    दरअसल, पाकिस्तान ने पहली बार रूस से सस्ते तेल खरीदने की पहल तत्कालीन प्रधानमंत्री Imran Khan के कार्यकाल में की थी। इमरान खान की मॉस्को यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को लेकर बातचीत तेज हुई थी। इसके बाद अप्रैल 2023 में पाकिस्तान ने रूस को रियायती दरों पर कच्चे तेल का पहला आधिकारिक ऑर्डर दिया। जून 2023 में रूसी कच्चे तेल की पहली खेप कराची बंदरगाह पहुंची थी, जिसमें करीब 45 हजार मीट्रिक टन यूराल क्रूड शामिल था। खास बात यह रही कि पाकिस्तान ने इस तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर की बजाय चीनी युआन में किया था।

    हालांकि बाद में पाकिस्तान ने रूसी तेल आयात धीमा कर दिया था। इसकी बड़ी वजह रूसी क्रूड का भारी होना और खाड़ी देशों की तुलना में ट्रांसपोर्ट लागत ज्यादा होना बताया गया। लेकिन अब वैश्विक ऊर्जा संकट और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान फिर से रूस की ओर झुकता दिखाई दे रहा है।

    सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र ही नहीं, बल्कि रक्षा और सैन्य सहयोग में भी रूस और पाकिस्तान के संबंध मजबूत हो रहे हैं। दोनों देशों के बीच नियमित सैन्य अभ्यास और सुरक्षा सहयोग पहले से जारी हैं। यही कारण है कि रूस-पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियों को भारत के लिए रणनीतिक नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रूस पारंपरिक रूप से भारत का करीबी सहयोगी रहा है, लेकिन बदलती वैश्विक राजनीति में मॉस्को अब दक्षिण एशिया में अपने विकल्प भी मजबूत करना चाहता है। वहीं पाकिस्तान अपनी कमजोर अर्थव्यवस्था और ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए रूस के साथ रिश्ते गहरे करने में जुटा है।

    हालांकि भारत और रूस के बीच रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी अब भी बेहद मजबूत मानी जाती है, लेकिन पाकिस्तान और रूस के बढ़ते संपर्कों ने क्षेत्रीय राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा जरूर तेज कर दी है।

  • होर्मुज तनाव के बीच अमेरिका ने बदला रुख, रूसी तेल खरीद पर फिर मिली अस्थायी छूट

    होर्मुज तनाव के बीच अमेरिका ने बदला रुख, रूसी तेल खरीद पर फिर मिली अस्थायी छूट


    नई दिल्‍ली । ईरान के साथ जारी तनाव और वैश्विक तेल कीमतों में उछाल के बीच अमेरिका ने अपने रुख में बदलाव करते हुए बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने रूसी तेल की खरीद पर एक बार फिर अस्थायी छूट दे दी है। खास बात यह है कि यह निर्णय उस घोषणा के दो दिन बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि इस राहत को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

    एक महीने के लिए मिली नई छूट

    अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने 17 अप्रैल से लागू नया नोटिफिकेशन जारी किया है। इसके तहत देशों को 16 मई तक रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद की अनुमति दी गई है। यानी लगभग एक महीने तक समुद्र में लोड किए गए रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू नहीं होंगे। इससे पहले दी गई 30 दिन की छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी और संकेत मिल रहे थे कि अब अमेरिका सख्ती अपनाएगा, लेकिन बदलते हालात ने फैसले को भी बदल दिया।

    क्या वजह रही इस फैसले की?
    ईरान के साथ टकराव और होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। दुनिया की करीब 20% तेल और गैस सप्लाई इसी मार्ग से गुजरती है। इस रूट पर खतरा बढ़ने से तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। ऐसे में अमेरिका के सामने चुनौती थी कि सप्लाई घटने से कीमतें और न बढ़ जाएं, जिसका असर सीधे आम जनता पर पड़ता। इसी वजह से ट्रंप प्रशासन ने बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए यह अस्थायी राहत देने का फैसला किया।

    रूस के राष्ट्रपति के दूत किरिल दिमित्रिएव के अनुसार, पहले दी गई छूट से लगभग 100 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल बाजार में आ सकता था, जो एक दिन की वैश्विक खपत के बराबर है। नई छूट से भी सप्लाई को सहारा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    सहयोगी देशों की नाराजगी बढ़ी

    अमेरिका के इस कदम से उसके सहयोगी देशों में असंतोष बढ़ सकता है। यूरोप लगातार रूस पर कड़े प्रतिबंध बनाए रखने के पक्ष में रहा है। यूरोपीय यूनियन की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भी स्पष्ट किया है कि फिलहाल रूस पर नरमी दिखाने का समय नहीं है। ऐसे में अमेरिका का यह फैसला पश्चिमी देशों की एकजुट रणनीति को कमजोर कर सकता है और यूक्रेन युद्ध से जुड़ी नीतियों पर सवाल खड़े कर सकता है।

    तेल बाजार को मिली राहत
    इस घोषणा के बाद तेल बाजार में कुछ राहत देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 9% गिरकर 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई, जो पिछले एक महीने का न्यूनतम स्तर है। इस गिरावट की एक वजह यह भी है कि ईरान की ओर से संकेत मिले हैं कि सीजफायर के दौरान होर्मुज स्ट्रेट को व्यावसायिक जहाजों के लिए खोल दिया गया है।

  • रूसी तेल ले जा रहे टैंकर ने अचानक लिया यू-टर्न, अब चीन नहीं भारत आएगा; क्यों बदला रास्ता?

    रूसी तेल ले जा रहे टैंकर ने अचानक लिया यू-टर्न, अब चीन नहीं भारत आएगा; क्यों बदला रास्ता?


    तेहरान। दुनियाभर में ईंधन आपूर्ति को लेकर मचे हाहाकार के बीच रूसी तेल को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक एक रूसी तेल से भरा टैंकर, जो चीन की तरफ बढ़ रहा था, दक्षिण चीन सागर में अपना रास्ता बदलकर अब तेजी से भारत की ओर बढ़ रहा है। ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक ‘एक्वा टाइटन’ 21 मार्च को न्यू मैंगलोर तट पर पहुंचने वाला है।
    यह टैंकर अपने साथ ‘यूराल’ तेल का कार्गो ला रहा है, जिसे जनवरी के आखिर में बाल्टिक सागर के एक बंदरगाह से लोड किया गया था।

    जानकारी के मुताबिक यह जहाज शुरुआत में चीन के रिझाओ पोर्ट की तरफ जा रहा था। लेकिन हाल ही में इसने अपनी मंजिल बदल ली। वहीं ‘वॉर्टेक्सा लिमिटेड’ के मुताबिक रूस से तेल ले जा रहे कम से कम सात टैंकर ने सफर के बीच में ही चीन की बजाय भारत की ओर मुड़ गए हैं।

    इसके अलावा ट्रैकिंग डेटा से यह भी पता चला है कि ‘स्वेज़मैक्स ज़ूज़ू एन.’ जहाज ने भारत के सिक्का बंदरगाह को अपनी अगली मंजिल बताया है और यह 25 मार्च को यहां पहुंच सकता है। यह टैंकर कजाखस्तान का कच्चा तेल ले जा रहा है।
    होर्मुज प्रभावी रूप से बंद

    यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद सबसे अहम जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रभावी रूप से बंद हो गया है।

    अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद ईरान से इस रास्ते से जहाजों को ना गुजरने की धमकी दी है। बता दें कि इस रास्ते से वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 से 25 फीसदी हिस्सा गुजरता है।
    रिफाइनर हुए सक्रिय

    जानकारी के मुताबिक यह मार्ग बाधित होने और अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीदने की ‘छूट’ मिलने के बाद भारत के सभी प्रमुख रिफाइनर रूसी कच्चे तेल को खरीदने के लिए सक्रिय हो गए हैं। भारतीय रिफाइनरियों ने बीते कुछ दिनों में रूस से करीब 30 मिलियन बैरल तेल खरीदा है। इससे पहले भारत ने स्पष्ट किया है कि वह ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अन्य स्रोतों के विकल्प भी तलाश रहा है और देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा।

  • रूसी तेल को लेकर अमेरिका पर ईरान का तंज, कहा- 'भारत समेत दुनिया के सामने भीख मांग रहा अमेरिका'

    रूसी तेल को लेकर अमेरिका पर ईरान का तंज, कहा- 'भारत समेत दुनिया के सामने भीख मांग रहा अमेरिका'


    तेहरान। ईरान के विदेश मंत्री अब्‍बास अराघची (Abbas Araghchi) ने रूसी तेल के मुद्दे पर अमेरिका पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जो अमेरिका (United States) पहले भारत समेत कई देशों पर रूस (Russia) से तेल आयात रोकने के लिए दबाव बना रहा था, वही अब दुनिया के देशों से रूसी कच्चा तेल खरीदने की गुहार लगा रहा है।

    अराघची ने यह टिप्पणी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (Twitter) पर की। उन्होंने अपनी पोस्ट में Financial Times की एक रिपोर्ट भी साझा की, जिसमें कहा गया है कि ईरान से जुड़े युद्ध ने रूस की तेल इंडस्ट्री को बड़ा फायदा पहुंचाया है।

    अमेरिका पर साधा निशाना

    अराघची ने पोस्ट में लिखा कि अमेरिका ने महीनों तक India को रूस से तेल आयात बंद करने के लिए धमकाया। लेकिन ईरान के साथ दो हफ्ते के युद्ध के बाद अब White House दुनिया के देशों—जिनमें भारत भी शामिल है—से रूसी कच्चा तेल खरीदने की अपील कर रहा है।
    उन्होंने यह भी कहा कि यूरोप को लगा था कि ईरान के खिलाफ कथित अवैध युद्ध का समर्थन करने से उसे रूस के खिलाफ अमेरिका का साथ मिलेगा।

    रूसी तेल खरीदने पर अस्थायी राहत

    अराघची की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अमेरिकी वित्त मंत्री Scott Bessent ने हाल ही में कहा कि अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने पर लगे प्रतिबंध में अस्थायी ढील देने का फैसला किया है।
    उन्होंने बताया कि वित्त विभाग ने 30 दिनों के लिए उस रूसी तेल को खरीदने की अनुमति दी है जो पहले से समुद्र में मौजूद है। कुछ दिन पहले भारत को भी इसी तरह की राहत दी गई थी।

    बेसेंट के मुताबिक, इस फैसले का उद्देश्य वैश्विक तेल आपूर्ति को बनाए रखना और ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाना है। उन्होंने कहा कि इससे रूस को कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि जिस तेल को मंजूरी दी गई है वह पहले से ही समुद्र में है।

    ईरान युद्ध से रूस को बड़ा फायदा

    वहीं Financial Times की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान से जुड़े युद्ध और तेल संकट के कारण रूस को रोजाना लगभग 150 मिलियन डॉलर (करीब 1389 करोड़ रुपये) की अतिरिक्त कमाई हो रही है। इसकी एक वजह यह भी बताई जा रही है कि ईरान ने Strait of Hormuz को बंद कर दिया है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि संघर्ष के शुरुआती 12 दिनों में ही रूस ने तेल निर्यात से लगभग 1.3 से 1.9 अरब डॉलर की अतिरिक्त आय अर्जित की। यदि मौजूदा कीमतें इसी तरह बनी रहती हैं तो महीने के अंत तक Moscow को 3.3 अरब से 5 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त कमाई हो सकती है।

  • रिलायंस इंडस्ट्रीज ने रूसी तेल खरीदने के आरोपों को बताया पूरी तरह झूठ, दी सफाई

    रिलायंस इंडस्ट्रीज ने रूसी तेल खरीदने के आरोपों को बताया पूरी तरह झूठ, दी सफाई


    नई दिल्ली।
    रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries- RIL) ने उन खबरों का खंडन किया है जिनमें दावा किया गया था कि रूसी तेल (Russian oil) से लदे तीन जहाज उसकी जामनगर रिफाइनरी (Jamnagar Refinery) की ओर जा रहे हैं। RIL ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में इस रिपोर्ट को “पूरी तरह से झूठा” बताते हुए कहा कि पिछले लगभग तीन हफ्तों में उसकी रिफाइनरी को रूसी तेल का कोई कार्गो नहीं मिला है और न ही जनवरी में कोई रूसी कच्चे तेल की डिलीवरी होने वाली है।


    पत्रकारिता पर नाराजगी

    कंपनी ने आगे कहा, “हमें गहरा दुख है कि जो लोग निष्पक्ष पत्रकारिता के अग्रणी होने का दावा करते हैं, उन्होंने RIL के इस खंडन की अनदेखी की कि वह जनवरी में डिलीवरी के लिए कोई रूसी तेल नहीं खरीद रही है। उन्होंने हमारी छवि को धूमिल करने वाली एक गलत रिपोर्ट प्रकाशित की।”


    क्या आरोप लगाया गया था?

    2 जनवरी को, ब्लूमबर्ग ने खबर दी कि कम से कम तीन टैंकर, जिनमें 2.2 मिलियन बैरल यूरल्स (रूसी कच्चा तेल) भरा हुआ था, आरआईएल के जामनगर रिफाइनरी की ओर जा रहे थे और संभवतः इसी महीने (जनवरी) में पहुंचने वाले थे।

    इसने एनालिटिक्स फर्म ‘कपलर’ के डेटा का हवाला दिया, जो कप्तानों द्वारा भेजे गए अपने वर्तमान स्थान और आगामी डिस्चार्ज बंदरगाहों के विवरण वाले लाइव सिग्नल के आधार पर जहाजों की आवाजाही पर नज़र रखती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अंतिम गंतव्य बदल सकते हैं ,क्योंकि जहाज भारत के पास पहुंचते हैं।

    कंपनी के प्रवक्ता ने क्या कहा
    एक रिलायंस प्रवक्ता ने यह स्पष्ट किया कि कार्गो कंपनी द्वारा खरीदे गए थे और यह भी कहा कि जनवरी में डिलीवरी के लिए रूसी कच्चे तेल की कोई प्रतिबद्ध शिपमेंट नहीं है। शुरुआत में अमेरिका द्वारा रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगाने के बाद दूर हटने के बाद, रिलायंस ने नवंबर में घोषणा की कि वह अपनी रिफाइनरी के निर्यात-केंद्रित हिस्से में रूसी कच्चे तेल का उपयोग बंद कर देगा। तब से इसने घरेलू उपयोग के लिए गैर-प्रतिबंधित रूसी उत्पादकों से तेल की आपूर्ति शुरू कर दी है। रोसनेफ्ट पहले इस रिफाइनरी का रूसी तेल का सबसे बड़ा स्रोत था, जो प्रति दिन 5,00,000 बैरल आपूर्ति के एक दीर्घकालिक समझौते पर आधारित था।


    रुसी तेल पर ट्रंप की नजर तिरछी

    हाल के वर्षों में ओपेक उत्पादक से तेल के लिए एक प्रमुख गंतव्य रहे भारत को, रूस के साथ अपने व्यापार के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रशासन के प्रमुख सदस्यों की कड़ी निगरानी का सामना करना पड़ा है। ऐसी आलोचना, जिसका जवाब सार्वजनिक रूप से अवज्ञा से मिला है। इस अनिश्चितता के कारण देश की रिफाइनरियों ने अपनी खरीद कम कर दी है, और पिछले महीने आयात तीन साल के निचले स्तर पर पहुंच गया।


    दुनिया की शीर्ष खरीदार थी रिलायंस

    अरबपति मुकेश अंबानी के नियंत्रण वाली रिलायंस, कपलर के आंकड़ों के अनुसार, 2024 से 2025 के अधिकांश समय तक रूसी कच्चे तेल का दुनिया की शीर्ष खरीदार थी। रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी परिसर को रूसी तेल की डिलीवरी पिछले साल जनवरी से नवंबर की अवधि में प्लांट के आयात का 40% से अधिक थी।

    कपलर के डेटा के अनुसार, इन कार्गो पर व्यापारिक कंपनियों अलगफ मरीन डीएमसीसी, रेडवुड ग्लोबल सप्लाई एफजेड एलएलसी, रसएक्सपोर्ट और एथोस एनर्जी द्वारा आपूर्ति किए जाने का निशान लगा है। अलगफ मरीन और रेडवुड ग्लोबल पर यूके द्वारा प्रतिबंध लगाया गया है, और पूर्व लुकोइल की ट्रेडिंग इकाई लिटास्को की मध्य पूर्वी शाखा की उत्तराधिकारी कंपनी है।

    रिलायंस एकमात्र भारतीय रिफाइनर नहीं है, जो रूसी कच्चा तेल ले रहा है, राज्य स्वामित्व वाली इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन भी गैर-प्रतिबंधित विक्रेताओं से कार्गो उठा रहे हैं। उन्हें भारी छूट, कम रिफाइनिंग मार्जिन और वाशिंगटन के साथ व्यापार वार्ता की स्थिति में अनिश्चितता ने आकर्षित किया है।