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  • 8वें वेतन आयोग पर संसद में पहली बार फिटमेंट फैक्टर और फैमिली यूनिट पर चर्चा, सरकार ने दिया बड़ा जवाब

    8वें वेतन आयोग पर संसद में पहली बार फिटमेंट फैक्टर और फैमिली यूनिट पर चर्चा, सरकार ने दिया बड़ा जवाब

    नई दिल्ली। केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे आठवें वेतन आयोग को लेकर चर्चाएं लगातार तेज होती जा रही हैं। वेतन वृद्धि, फिटमेंट फैक्टर और फैमिली यूनिट जैसे मुद्दों पर कर्मचारी संगठनों की ओर से लगातार मांगें उठाई जा रही हैं। इसी बीच संसद में पहली बार इन दोनों अहम विषयों पर विस्तार से सवाल-जवाब हुए, जिससे लाखों कर्मचारियों और पेंशनर्स की निगाहें आयोग की आगामी प्रक्रिया पर टिक गई हैं।

    संसद में हुई चर्चा के दौरान सरकार से पूछा गया कि आठवें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर तय करते समय किन मानकों को आधार बनाया जाएगा और क्या फैमिली यूनिट की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव पर विचार किया जा रहा है। सरकार ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि इन सभी विषयों पर अंतिम निर्णय आयोग की सिफारिशों के आधार पर ही लिया जाएगा। आयोग को स्वतंत्र रूप से अपनी रिपोर्ट तैयार करने और सरकार को सुझाव देने का अधिकार दिया गया है।

    फिटमेंट फैक्टर वह महत्वपूर्ण गुणांक होता है जिसके आधार पर केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के मूल वेतन और पेंशन में संशोधन किया जाता है। नए वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने पर पुराने मूल वेतन को निर्धारित फिटमेंट फैक्टर से गुणा कर नया वेतन तय किया जाता है। यही कारण है कि कर्मचारी संगठनों की सबसे बड़ी मांग फिटमेंट फैक्टर को अधिक रखने की है ताकि वेतन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सके।

    वर्तमान में विभिन्न कर्मचारी संगठनों की ओर से फिटमेंट फैक्टर को 3.68 तक रखने की मांग की जा रही है। वहीं कुछ अन्य संगठन इसे 3 से 3.5 के बीच निर्धारित करने की पैरवी कर रहे हैं। उनका तर्क है कि बढ़ती महंगाई, जीवन-यापन की लागत और कर्मचारियों की आर्थिक जरूरतों को देखते हुए बेहतर फिटमेंट फैक्टर तय किया जाना चाहिए। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस संबंध में अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

    फैमिली यूनिट को लेकर भी कर्मचारी और पेंशनर संगठनों ने अपनी मांग दोहराई है। उनकी मांग है कि वर्तमान व्यवस्था में परिवार की परिभाषा का विस्तार किया जाए और परिवार के सदस्यों की संख्या तीन से बढ़ाकर पांच की जाए, जिसमें माता-पिता को भी शामिल किया जाए। संसद में इस मुद्दे को भी उठाया गया और सरकार से इस संबंध में नीति स्पष्ट करने का आग्रह किया गया। हालांकि सरकार ने कहा कि इस विषय पर भी आयोग अपनी सिफारिशों के आधार पर विचार करेगा।

    सरकार ने यह भी बताया कि आठवें वेतन आयोग की बैठकें लगातार जारी हैं और आयोग विभिन्न राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के कर्मचारियों और पेंशनर्स के प्रतिनिधियों से सुझाव प्राप्त कर रहा है। आगामी बैठक 7 अगस्त को दिल्ली में आयोजित होगी। इसके बाद सितंबर महीने में चेन्नई और पुडुचेरी में भी बैठकें प्रस्तावित हैं। आयोग ने संबंधित संगठनों से आग्रह किया है कि वे केवल अपने निर्धारित क्षेत्र की बैठकों में ही भाग लें, क्योंकि आयोग स्वयं विभिन्न राज्यों का दौरा कर सुझाव एकत्र कर रहा है।

    फिलहाल केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि फिटमेंट फैक्टर कितना तय होगा और वेतन में वास्तविक बढ़ोतरी कितनी होगी। सरकार ने साफ किया है कि आयोग की अंतिम रिपोर्ट मिलने के बाद ही इस पर निर्णय लिया जाएगा। ऐसे में फिलहाल सभी की नजरें आयोग की आगामी बैठकों और अंतिम सिफारिशों पर बनी हुई हैं।

  • नौकरी से निकाले जाने पर मिलते हैं ये कानूनी अधिकार, जानिए पूरी प्रक्रिया….

    नौकरी से निकाले जाने पर मिलते हैं ये कानूनी अधिकार, जानिए पूरी प्रक्रिया….


    नई दिल्ली।नौकरी के क्षेत्र में आज के समय में अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। कई बार कर्मचारियों को बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक नौकरी से निकाल दिया जाता है, जिससे आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियां सामने आती हैं। ऐसी स्थिति में अधिकतर लोग घबरा जाते हैं, लेकिन यह जानना जरूरी है कि कर्मचारियों के अधिकार कानून द्वारा सुरक्षित होते हैं।

    भारत में नौकरी से संबंधित नियम श्रम कानूनों के तहत निर्धारित किए जाते हैं। अधिकतर कंपनियों में नियुक्ति पत्र में नोटिस पीरियड स्पष्ट रूप से लिखा होता है। इसका मतलब यह है कि यदि किसी कर्मचारी की सेवाएं समाप्त की जाती हैं, तो कंपनी को पहले से निर्धारित अवधि का नोटिस देना होता है या उसके बदले में वेतन देना अनिवार्य होता है। यदि कंपनी ऐसा नहीं करती, तो वह कानूनी रूप से गलत मानी जाती है और कर्मचारी अपने अधिकारों की मांग कर सकता है।

    स्थायी कर्मचारियों के मामले में यह नियम और भी सख्ती से लागू होता है। कई बार कंपनियां अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं करतीं, ऐसे में कर्मचारी के पास कानूनी विकल्प मौजूद रहते हैं। नौकरी समाप्त होने के बाद कर्मचारी को उसकी बकाया सैलरी, अवकाश का भुगतान और अन्य देय राशि समय पर मिलना जरूरी होता है। इसे फुल एंड फाइनल सेटलमेंट कहा जाता है, जिसे तय समय सीमा के भीतर पूरा करना कंपनी की जिम्मेदारी होती है।

    यदि किसी कर्मचारी को लगता है कि उसकी नौकरी गलत तरीके से समाप्त की गई है, तो वह श्रम विभाग या संबंधित न्यायिक मंच पर शिकायत दर्ज कर सकता है। इसके अलावा कानूनी नोटिस भेजकर भी अपने अधिकारों की मांग की जा सकती है। ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया कर्मचारी के हितों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत माध्यम बनती है।

    निजी क्षेत्र और आईटी सेक्टर में भी ये नियम लागू होते हैं, खासकर तब जब कंपनी अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करती है। कई बार जानकारी की कमी के कारण कर्मचारी अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाते, जिससे उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है।