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  • अमित शाह की कुल संपत्ति कितनी है, शेयरों में कितना निवेश और कितनी जमीन-जायदाद, जानिए हलफनामे के आंकड़े

    अमित शाह की कुल संपत्ति कितनी है, शेयरों में कितना निवेश और कितनी जमीन-जायदाद, जानिए हलफनामे के आंकड़े

    नई दिल्ली । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 22 अक्टूबर 2026 को अपना 62वां जन्मदिन मना रहे हैं। राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अमित शाह के वेतन, सरकारी सुविधाओं, निवेश और जमीन-जायदाद को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में गांधीनगर सीट से नामांकन दाखिल करते समय उन्होंने अपनी संपत्ति और देनदारियों का विवरण चुनावी हलफनामे में दिया था। इसके अनुसार, अमित शाह और उनकी पत्नी सोनल शाह की संयुक्त घोषित संपत्ति लगभग 65.67 करोड़ रुपये थी। इसमें अमित शाह की व्यक्तिगत संपत्ति करीब 36.55 करोड़ रुपये बताई गई थी।

    अमित शाह की आय में सांसद के रूप में मिलने वाला वेतन और भत्ते शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, उनके चुनावी हलफनामे में किराये से होने वाली आय, कृषि से प्राप्त आमदनी और शेयरों से मिलने वाले लाभांश का भी उल्लेख है। उनकी कुल संपत्ति को समझने के लिए वेतन के साथ-साथ निवेश और अचल संपत्तियों के विवरण पर भी ध्यान देना जरूरी है।

    उपलब्ध विवरण के अनुसार, अमित शाह का मूल मासिक वेतन 1 लाख 24 हजार रुपये बताया गया है। निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 87 हजार रुपये और अन्य भत्ता 2 हजार रुपये प्रति माह दर्ज किया गया है। दैनिक भत्ते के रूप में 75 हजार रुपये का आंकड़ा भी दिया गया है, लेकिन इसे नियमित मासिक वेतन के साथ जोड़कर निश्चित मासिक आय मानना सही नहीं होगा। दैनिक भत्ता निर्धारित नियमों और पात्रता के अनुसार मिलता है।

    गृह मंत्री के पद पर रहते हुए उन्हें सरकारी कामकाज के लिए आवास, आधिकारिक वाहन, सुरक्षा व्यवस्था और पात्रता के अनुसार चिकित्सा जैसी सुविधाएं भी मिलती हैं। ये सुविधाएं पद से जुड़ी जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए होती हैं। इन्हें उनकी निजी संपत्ति या व्यक्तिगत वेतन का हिस्सा नहीं माना जाता।

    वर्ष 2024 के चुनावी हलफनामे के मुताबिक, अमित शाह की चल संपत्ति लगभग 20.23 करोड़ रुपये और अचल संपत्ति करीब 16.32 करोड़ रुपये थी। इस तरह उनकी कुल व्यक्तिगत घोषित संपत्ति लगभग 36.55 करोड़ रुपये बैठती है। चल संपत्ति में बैंक जमा, शेयर, निवेश, नकदी और आभूषण जैसी चीजें शामिल हैं, जबकि अचल संपत्ति में जमीन, भूखंड और मकान जैसी संपत्तियां आती हैं।

    हलफनामे में अमित शाह के पास लगभग 17.46 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर होने का उल्लेख था। इसके अलावा, करीब 72.87 लाख रुपये के कीमती धातुओं और आभूषणों का विवरण दर्ज किया गया था। उनके पास नकद राशि लगभग 24,164 रुपये बताई गई थी। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि उनकी घोषित चल संपत्ति में शेयर निवेश का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

    उनकी पत्नी सोनल शाह की संपत्ति को जोड़ने पर दंपति की संयुक्त संपत्ति लगभग 65.67 करोड़ रुपये थी। सोनल शाह की चल संपत्ति करीब 22.46 करोड़ रुपये और अचल संपत्ति लगभग 6.55 करोड़ रुपये बताई गई थी। दोनों की कुल घोषित देनदारियां लगभग 42.10 लाख रुपये थीं। ये आंकड़े 2024 में दाखिल हलफनामे पर आधारित हैं, इन्हें वर्तमान बाजार मूल्य नहीं माना जाना चाहिए।

    अमित शाह की घोषित संपत्ति में पिछले वर्षों के दौरान बदलाव भी दर्ज हुआ है। वर्ष 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव के हलफनामे में उनकी संपत्ति लगभग 11.78 करोड़ रुपये बताई गई थी। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में अमित शाह और उनकी पत्नी की संयुक्त संपत्ति करीब 40.33 करोड़ रुपये दर्ज हुई। वर्ष 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 65.67 करोड़ रुपये हो गया। हालांकि, इन आंकड़ों की तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अलग-अलग वर्षों में व्यक्तिगत और संयुक्त संपत्ति के विवरण का आधार अलग हो सकता है।

    संपत्ति में वृद्धि का अर्थ केवल वेतन से हुई कमाई नहीं है। शेयरों के मूल्य में बदलाव, कृषि और किराये से होने वाली आय, विरासत तथा अन्य निवेश भी कुल संपत्ति को प्रभावित कर सकते हैं।

    अमित शाह का जन्म 22 अक्टूबर 1964 को मुंबई में हुआ था। उनके पिता अनिलचंद्र शाह प्लास्टिक पाइप के कारोबार से जुड़े थे। राजनीति में सक्रिय होने से पहले अमित शाह पारिवारिक व्यवसाय से जुड़े रहे और शेयर बाजार में भी काम किया। बाद में वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े तथा भारतीय जनता पार्टी में सक्रिय राजनीति के जरिए आगे बढ़े। गुजरात विधानसभा में उनका चुनावी सफर 1997 में शुरू हुआ। उस समय संपत्ति संबंधी हलफनामों का आज जैसा व्यवस्थित सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था, इसलिए राजनीति में प्रवेश के समय उनकी कुल संपत्ति का सटीक आंकड़ा बताना संभव नहीं है।

  • सीमित सैलरी में घर चलाना है आसान तो अपनाएं ये बजट टिप्स, खर्च संभालने के साथ हर महीने बढ़ेगी आपकी बचत

    सीमित सैलरी में घर चलाना है आसान तो अपनाएं ये बजट टिप्स, खर्च संभालने के साथ हर महीने बढ़ेगी आपकी बचत


    नई दिल्ली । बढ़ती महंगाई के दौर में सीमित सैलरी में घर का खर्च चलाने के साथ बचत करना कई लोगों के लिए चुनौती बन गया है। कई बार महीने के अंत तक पैसे खत्म हो जाते हैं और यह समझना मुश्किल हो जाता है कि रकम कहां खर्च हुई। ऐसी स्थिति में बेहतर वित्तीय योजना और खर्च का सही प्रबंधन जरूरी हो जाता है। सैलरी कितनी भी हो, यदि आय और खर्च का पहले से हिसाब रखा जाए तो घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ भविष्य के लिए भी रकम बचाई जा सकती है। इसके लिए बजट बनाने और खर्च को प्राथमिकता देने की आदत अपनाना जरूरी है।

    सैलरी को व्यवस्थित करने के लिए 50-30-20 का नियम अपनाया जा सकता है। इसके तहत आय का 50 प्रतिशत हिस्सा जरूरी खर्चों के लिए रखा जाता है। इसमें घर का किराया, राशन, बिजली-पानी के बिल, बच्चों की स्कूल फीस और ईएमआई जैसे खर्च शामिल किए जा सकते हैं। आय का 30 प्रतिशत हिस्सा इच्छाओं और जीवनशैली से जुड़े खर्चों के लिए रखा जा सकता है, जिसमें बाहर खाना, खरीदारी, घूमना-फिरना और मनोरंजन शामिल हैं। बाकी 20 प्रतिशत रकम भविष्य के लिए बचत या निवेश में लगाई जा सकती है। इस राशि को सेविंग्स अकाउंट, एफडी, म्यूचुअल फंड या अन्य निर्धारित विकल्पों में रखा जा सकता है।

    महीने की शुरुआत में ही पूरा बजट तैयार करना भी जरूरी है। सैलरी मिलते ही किराना, दूध, सब्जियों और दूसरी जरूरी चीजों पर होने वाले अनुमानित खर्च को तय कर लें। इससे पूरे महीने के दौरान पैसों के इस्तेमाल पर नजर बनी रहती है और गैर-जरूरी खर्च को नियंत्रित करना आसान होता है। साथ ही ‘पहले बचत, फिर खर्च’ का सिद्धांत अपनाना उपयोगी हो सकता है। आमतौर पर लोग महीने भर खर्च करने के बाद बची रकम को बचाने की सोचते हैं, लेकिन ऐसा हमेशा संभव नहीं हो पाता। इसलिए सैलरी आते ही बचत और निवेश के लिए निर्धारित राशि अलग कर लेना बेहतर तरीका माना जाता है।

    घरेलू खर्च में छोटी-छोटी बचत भी महीने के बजट पर असर डाल सकती है। बाजार या सुपरमार्केट जाने से पहले जरूरी सामान की सूची तैयार करने से अनावश्यक खरीदारी से बचा जा सकता है। बिजली और पानी की खपत को नियंत्रित करने से भी नियमित खर्च कम किया जा सकता है। इसके अलावा बाहर खाने और ऑनलाइन खाना मंगाने की संख्या सीमित करना भी बजट को संभालने में मदद कर सकता है। घर में बने भोजन को प्राथमिकता देने से खर्च को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। इस तरह रोजमर्रा की आदतों में थोड़े बदलाव करके महीने के कुल खर्च को व्यवस्थित किया जा सकता है।

    अचानक आने वाले खर्चों के लिए इमरजेंसी फंड बनाना भी जरूरी है। मेडिकल खर्च या दूसरी आकस्मिक जरूरत के समय यह रकम आर्थिक दबाव कम कर सकती है। इसके लिए धीरे-धीरे बचत करके कम से कम तीन से छह महीने के घरेलू खर्च के बराबर आपातकालीन कोष तैयार करने की सलाह दी जाती है। इससे अचानक जरूरत पड़ने पर उधार लेने की स्थिति से बचने में मदद मिल सकती है। सही बजट, नियमित बचत, नियंत्रित खर्च और आपातकालीन फंड के जरिए सीमित सैलरी में भी घर का वित्तीय प्रबंधन बेहतर तरीके से किया जा सकता है।

  • MP: HC का बड़ा फैसला….कहा- OBC क्रीमी लेयर में शामिल होने का आधार सिर्फ वेतन नहीं

    MP: HC का बड़ा फैसला….कहा- OBC क्रीमी लेयर में शामिल होने का आधार सिर्फ वेतन नहीं


    ग्वालियर।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में हाईकोर्ट (High Court) की ग्वालियर बेंच (Gwalior Bench) ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) क्रीमी लेयर (Creamy layer) को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को OBC क्रीमी लेयर में शामिल करने के लिए सिर्फ वेतन से होने वाली आय को आधार नहीं बनाया जा सकता। क्रीमी लेयर निर्धारित करते समय माता-पिता का पद, उनकी सेवा की प्रकृति, सेवा काल और सामाजिक परिस्थितियों समेत अन्य प्रासंगिक पहलुओं पर भी विचार करना होगा।

    यह मामला सिविल जज की बेटी रागिनी राठौर की याचिका से जुड़ा है। रागिनी ने OBC प्रमाणपत्र बनवाने के लिए आवेदन किया था। स्थानीय सक्षम अधिकारियों ने उनके आवेदन को निरस्त कर दिया था। आवेदन खारिज करने के पीछे उनके पिता की करीब 16 लाख रुपए सालाना आय को आधार बनाया गया था। अधिकारियों की ओर से OBC क्रीमी लेयर के लिए निर्धारित 8 लाख रुपए की आय सीमा का हवाला दिया गया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


    कोर्ट बोला- तय करते वक्त यह देखना जरूरी

    मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि क्रीमी लेयर तय करने के लिए आय का आकलन करते समय यह देखना जरूरी है कि आय किस स्रोत से प्राप्त हो रही है। इसके साथ ही माता-पिता का पद, सेवा की स्थिति और अन्य परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें केवल वेतन के आधार पर क्रीमी लेयर निर्धारित करने को लेकर आपत्ति जताई गई थी।

    ‘छह सप्ताह के भीतर दोबारा विचार करें’
    फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित सक्षम अधिकारी को निर्देश दिया है कि रागिनी राठौर के OBC प्रमाणपत्र के आवेदन पर छह सप्ताह के भीतर दोबारा विचार किया जाए। अधिकारी को सभी प्रासंगिक पहलुओं की जांच करने के बाद स्पष्ट और कारणयुक्त आदेश जारी करने के निर्देश दिए गए हैं।


    ‘क्रीमी लेयर की मौजूदा आय सीमा में कोई बदलाव नहीं’

    इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट के आदेश से OBC आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था या क्रीमी लेयर की आय सीमा में कोई बदलाव नहीं हुआ है। कोर्ट ने किसी नई आय सीमा को लागू नहीं किया है, बल्कि क्रीमी लेयर के निर्धारण की प्रक्रिया में सभी जरूरी पहलुओं को ध्यान में रखने की बात कही है।

    फैसले के बाद अब OBC प्रमाणपत्र और क्रीमी लेयर से जुड़े मामलों में केवल आय का आंकड़ा देखने के बजाय संबंधित व्यक्ति की सामाजिक और सेवा संबंधी परिस्थितियों पर भी विचार करना होगा।

  • 8वें वेतन आयोग के सामने कर्मचारियों की बड़ी मांग, हर तीन महीने में DA बढ़ाने और 25% पर बेसिक में मर्जर का प्रस्ताव

    8वें वेतन आयोग के सामने कर्मचारियों की बड़ी मांग, हर तीन महीने में DA बढ़ाने और 25% पर बेसिक में मर्जर का प्रस्ताव

    नई दिल्ली ।8वें वेतन आयोग को लेकर कर्मचारी संगठनों की ओर से कई महत्वपूर्ण मांगें और सुझाव सामने आ रहे हैं। इनमें महंगाई भत्ते यानी DA की समीक्षा साल में दो बार के बजाय चार बार करने और 25 प्रतिशत DA होने पर उसे बेसिक पे में मर्ज करने की मांग प्रमुख है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इससे महंगाई के असर के अनुसार वेतन में बदलाव अधिक नियमित तरीके से किया जा सकेगा।

    चेन्नई और पुडुचेरी के बाद 8वें वेतन आयोग की बैठक चंडीगढ़ में होने की जानकारी दी गई है। चंडीगढ़ में 16 से 18 अगस्त के बीच होने वाली बैठक में उत्तर भारत के विभिन्न कर्मचारी संघ और पेंशनर्स संगठन अपनी मांगें आयोग के सामने रखेंगे। बैठक में फिटमेंट फैक्टर, DA और HRA सहित वेतन से जुड़े मुद्दों पर सुझाव दिए जा सकते हैं। इसके बाद 7 और 8 अक्टूबर को बेंगलुरु में बैठक प्रस्तावित है।

    वर्तमान व्यवस्था के तहत केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में साल में दो बार, जनवरी और जुलाई में संशोधन किया जाता है। कर्मचारी संगठनों के एक वर्ग ने अब इसकी समीक्षा हर तीन महीने में यानी साल में चार बार करने की मांग की है। उनका कहना है कि इससे महंगाई में होने वाले बदलावों के अनुसार DA में अधिक नियमित संशोधन किया जा सकेगा।

    नेशनल काउंसिल यानी NC-JCM सहित कुछ संगठनों ने DA के 25 प्रतिशत होने पर उसे बेसिक पे में शामिल करने की मांग भी रखी है। इस मांग के लागू होने पर आगे कर्मचारियों के वेतन के साथ HRA और TA जैसे भत्तों की गणना बढ़े हुए बेसिक पे के आधार पर होने की बात कही गई है। फिलहाल केंद्रीय कर्मचारियों का DA 60 प्रतिशत से अधिक बताया गया है।

    कर्मचारी संगठनों की ओर से वित्तीय अपग्रेडेशन से जुड़ी MACP व्यवस्था में भी बदलाव की मांग की गई है। इसमें हर 10 साल के बजाय हर पांच साल में फाइनेंशियल अपग्रेडेशन देने का सुझाव शामिल है। इसके अलावा कुछ संगठनों ने 3.83 के फिटमेंट फैक्टर को लागू करने की मांग रखी है। फिटमेंट फैक्टर के आधार पर कर्मचारियों के बेसिक पे में बदलाव का प्रस्ताव है।

    7वें वेतन आयोग में फैमिली यूनिट की संख्या तीन निर्धारित किए जाने का उल्लेख करते हुए इसे 8वें वेतन आयोग में बढ़ाकर पांच करने की मांग भी सामने आई है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि वेतन और सेवा शर्तों से जुड़े मुद्दों को नए वेतन आयोग में ध्यान में रखा जाना चाहिए।

    हालांकि, कर्मचारी संगठनों की ओर से रखी जा रही ये मांगें और सुझाव अभी अंतिम निर्णय नहीं हैं। 8वें वेतन आयोग को विभिन्न कर्मचारी संगठनों और अन्य संबंधित पक्षों से सुझाव मिल रहे हैं। इन सुझावों पर विचार के बाद आयोग अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार आयोग मई-जून 2027 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंप सकता है। 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों को 1 जनवरी 2026 से प्रभावी माना जाएगा। फिलहाल DA में साल में चार बार संशोधन, 25 प्रतिशत पर बेसिक पे में मर्जर, फिटमेंट फैक्टर, MACP और फैमिली यूनिट से संबंधित मांगों पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

  • वोंग बने दुनिया में सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले प्रधानमंत्री, 64% वृद्धि के बाद ट्रंप से भी ज्यादा हुआ वेतन

    वोंग बने दुनिया में सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले प्रधानमंत्री, 64% वृद्धि के बाद ट्रंप से भी ज्यादा हुआ वेतन


    सिंगापुर।
    सिंगापुर (Singapore) के प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग (Prime Minister Lawrence Wong) ने मंगलवार को संसद को बताया कि राजनीतिक नेताओं (Political Leaders) की सैलरी बढ़ाई जाएगी। इससे मंत्रियों की सैलरी में 60% से ज्यादा की बढ़ोतरी होगी।

    सिंगापुर ने राजनीतिक नेताओं के भारी-भरकम वेतन को सही ठहराया है। तर्क दिया है कि इससे काबिल लोग आकर्षित होते हैं और अच्छा शासन सुनिश्चित होता है। फिर भी यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, क्योंकि कैबिनेट सदस्यों की आय ज्यादातर आम नागरिकों की आय से कहीं ज्यादा है।


    कितनी हो जाएगी सिंगापुर के पीएम की सैलरी?

    वोंग ने कहा कि इस बदलाव के बाद उनकी सालाना बेंचमार्क सैलरी 2.2 मिलियन सिंगापुर डॉलर (1.7 मिलियन डॉलर) से बढ़कर 3.6 मिलियन सिंगापुर डॉलर हो जाएगी। उप-प्रधानमंत्री की 1.87 मिलियन सिंगापुर डॉलर से बढ़कर 3.06 मिलियन सिंगापुर डॉलर हो जाएगी, जबकि कैबिनेट मंत्रियों को उनकी सीनियरिटी और पोर्टफोलियो के महत्व के आधार पर 1.80 मिलियन सिंगापुर डॉलर से 2.88 मिलियन सिंगापुर डॉलर के बीच सैलरी मिलेगी।


    दुनिया में सबसे ज्यादा सैलरी पाने वाले पीएम

    वोंग ने कहा कि वे अपने कार्यकाल के दौरान वेतन में हुई पूरी बढ़ोतरी को सही और अच्छे कामों के लिए दान करने की योजना बना रहे हैं। वेतन में बढ़ोतरी से पहले भी सिंगापुर के प्रधानमंत्री की सैलरी अमेरिका और जी7 देशों समेत कई अन्य नेताओं की सैलरी से कहीं ज्यादा थी।

    वोंग ने कहा, “राजनीतिक वेतन एक मुश्किल और भावनात्मक मुद्दा है।” वोंग की पीपल्स एक्शन पार्टी लंबे समय से सत्ता में है और सिंगापुर की संसद तथा 21 सदस्यों वाली कैबिनेट पर उसका दबदबा है। उन्होंने कहा, “इसमें शामिल रकम ज्यादातर नागरिकों की कमाई से कहीं ज्यादा है, इसलिए मैं समझता हूं कि सिंगापुर के लोग इसकी बारीकी से जांच-पड़ताल क्यों करते हैं और क्यों कई लोग इस मामले को लेकर इतनी मजबूत राय रखते हैं।”

    हालांकि, वोंग ने कहा कि असल मुद्दा यह है कि क्या आने वाले दशकों में सिंगापुर में वैसी राजनीतिक लीडरशिप बनी रहेगी, जिसकी हमारे देश को आगे ले जाने के लिए जरूरत है। सिंगापुर को दुनिया के सबसे कम भ्रष्टाचार वाले देशों में लगातार गिना जाता है। वोंग ने कहा कि वेतन बढ़ाने की सिफारिश एक स्वतंत्र समिति ने की थी। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा पदधारियों को तुरंत नए वेतनमानों पर नहीं लाया जाएगा।

  • इंदौर पहुंचे मुख्यमंत्री मोहन यादव, मेट्रो का विस्तार 17 किलोमीटर तक, कांग्रेस पर युवाओं के मुद्दे को लेकर साधा निशाना

    इंदौर पहुंचे मुख्यमंत्री मोहन यादव, मेट्रो का विस्तार 17 किलोमीटर तक, कांग्रेस पर युवाओं के मुद्दे को लेकर साधा निशाना

    इंदौर:  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शनिवार को इंदौर पहुंचे, जहां वे विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होने के साथ शहर में मेट्रो सेवा के विस्तारित चरण की शुरुआत करेंगे। इंदौर मेट्रो का संचालन अब तक करीब छह किलोमीटर के दायरे में किया जा रहा था, लेकिन विस्तार के बाद यह सेवा लगभग 17 किलोमीटर के क्षेत्र तक पहुंच जाएगी। मुख्यमंत्री इस विस्तारित सेवा का विधिवत शुभारंभ करेंगे।

    इंदौर पहुंचने के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि शहर को मेट्रो के विस्तार के रूप में एक महत्वपूर्ण सौगात मिल रही है। उन्होंने कहा कि शुरुआती चरण में मेट्रो संचालन के बाद अब इसके दायरे को बढ़ाकर करीब 17 किलोमीटर किया जा रहा है। उनके मुताबिक, आर्थिक गतिविधियों के लिहाज से इंदौर मध्य प्रदेश का महत्वपूर्ण शहर है और यहां बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की जरूरत लगातार बढ़ रही है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि मेट्रो सेवा के विस्तार से इंदौर के स्थानीय निवासियों के साथ-साथ दूसरे शहरों और क्षेत्रों से आने वाले लोगों को भी आवागमन में सुविधा मिलेगी। बढ़ते यातायात दबाव के बीच सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना शहर के विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने इंदौर के लोगों को मेट्रो के विस्तारित चरण की शुरुआत के लिए शुभकामनाएं दीं।

    इंदौर दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ने राजनीतिक मुद्दों पर भी कांग्रेस को घेरा। शहर में कांग्रेस के प्रस्तावित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम और इसमें राहुल गांधी के शामिल होने की चर्चा के बीच उन्होंने विपक्षी दल पर निशाना साधा। मुख्यमंत्री ने कहा कि विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी मध्य प्रदेश आ रहे हैं तो उनका स्वागत है, लेकिन कांग्रेस को अपने शासनकाल में युवाओं के साथ हुए कथित अन्याय के लिए माफी मांगनी चाहिए।

    मुख्यमंत्री ने कांग्रेस के लंबे शासनकाल का उल्लेख करते हुए किसान, महिला और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अपने पुराने शासन के दौरान प्रदेश की स्थिति को लेकर जवाब देना चाहिए। मुख्यमंत्री ने बिजली उत्पादन और प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए वर्तमान स्थिति की तुलना कांग्रेस के पुराने शासनकाल से की।

    मुख्यमंत्री के अनुसार, प्रदेश में वर्ष 1955 से 2003 तक कांग्रेस की सरकारें रहीं और उस दौरान बिजली उत्पादन क्षमता करीब पांच हजार मेगावाट के स्तर पर थी। उन्होंने कहा कि बाद के वर्षों में यह क्षमता बढ़ी और वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भी इसमें वृद्धि हुई है। मुख्यमंत्री ने दावा किया कि राज्य की बिजली उत्पादन क्षमता अब करीब 31 हजार मेगावाट तक पहुंच चुकी है।

    उन्होंने प्रति व्यक्ति आय का भी उल्लेख किया। मुख्यमंत्री के मुताबिक, लंबे कांग्रेस शासन के दौरान प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय करीब 11,700 रुपये थी, जबकि अब यह बढ़कर लगभग एक लाख 67 हजार रुपये हो गई है। उन्होंने इन आंकड़ों के आधार पर कांग्रेस से अपने शासनकाल के प्रदर्शन पर स्पष्टीकरण और माफी की मांग की।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि राजनीतिक दलों को वर्तमान मुद्दों के साथ अपने पुराने कार्यकाल का भी मूल्यांकन करना चाहिए। उन्होंने राहुल गांधी के मध्य प्रदेश दौरे का स्वागत करते हुए कांग्रेस से युवाओं से जुड़े पुराने सवालों का जवाब देने को कहा। उनके बयान से इंदौर में होने वाले कांग्रेस के कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने के संकेत मिले हैं।

    इसी बीच शिक्षक दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदेश के सभी शिक्षकों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उनके योगदान का सम्मान किया। इंदौर में मेट्रो विस्तार और राजनीतिक कार्यक्रमों के बीच मुख्यमंत्री का दौरा प्रशासनिक तथा राजनीतिक, दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा।

  • कर्मचारी संगठनों की 40 प्रतिशत HRA मांग से बढ़ी उम्मीद, नए फिटमेंट फैक्टर के बाद भत्ते में बदलाव की संभावना

    कर्मचारी संगठनों की 40 प्रतिशत HRA मांग से बढ़ी उम्मीद, नए फिटमेंट फैक्टर के बाद भत्ते में बदलाव की संभावना


    नई दिल्ली । केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के लिए 8वें वेतन आयोग को लेकर वेतन और भत्तों में संभावित बदलाव की चर्चा तेज है। इसी क्रम में House Rent Allowance यानी HRA में भी बढ़ोतरी की मांग सामने आई है। कर्मचारी संगठनों ने नए वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर बढ़ाने के साथ X श्रेणी के शहरों में HRA की मौजूदा दर 30 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत करने की मांग रखी है।

    अगर प्रस्तावित बदलावों को मंजूरी मिलती है तो कुछ वेतन स्तरों पर कर्मचारियों को मौजूदा व्यवस्था की तुलना में अधिक आवास भत्ता मिल सकता है। हालांकि अभी 8वें वेतन आयोग की अंतिम सिफारिशें सामने नहीं आई हैं और HRA की नई दर को लेकर कोई अंतिम सरकारी फैसला नहीं हुआ है। इसलिए सामने आ रहे आंकड़ों को संभावित गणना के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

    मौजूदा 7वें वेतन आयोग की व्यवस्था में Level 5 कर्मचारी का शुरुआती बेसिक पे 29,200 रुपये है। X श्रेणी के शहरों में 30 प्रतिशत HRA के हिसाब से इस स्तर के कर्मचारी को हर महीने 8,760 रुपये का आवास भत्ता मिलता है।

    कर्मचारी संगठनों की मांग के अनुसार यदि नए वेतन ढांचे में Level 5 का बेसिक पे बढ़कर करीब 61,320 रुपये होता है और X श्रेणी के शहरों के लिए HRA की दर 40 प्रतिशत निर्धारित की जाती है, तो मासिक HRA की गणना 24,528 रुपये तक पहुंच सकती है।

    इस हिसाब से मौजूदा 8,760 रुपये के मुकाबले संभावित HRA में करीब 15,768 रुपये प्रति माह की बढ़ोतरी हो सकती है। सालाना आधार पर देखें तो यह अंतर 1.89 लाख रुपये से अधिक बैठ सकता है। हालांकि यह केवल प्रस्तावित बेसिक पे और HRA दर के आधार पर की गई गणना है। वास्तविक राशि सरकार के अंतिम निर्णय पर निर्भर करेगी।

    HRA सरकारी कर्मचारियों को किराए के मकान से जुड़े खर्च में सहायता देने के लिए दिया जाने वाला भत्ता है। इसकी दर कर्मचारी के वेतन और शहर की श्रेणी के आधार पर तय होती है। मौजूदा व्यवस्था में X श्रेणी के शहरों के लिए 30 प्रतिशत, Y श्रेणी के शहरों के लिए 20 प्रतिशत और Z श्रेणी के शहरों के लिए 10 प्रतिशत HRA की दर बताई गई है।

    8वें वेतन आयोग में यदि बेसिक पे में बदलाव होता है तो उससे HRA समेत दूसरे वेतन घटकों की गणना पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से कर्मचारी संगठनों की नजर फिटमेंट फैक्टर और नई वेतन संरचना पर है। फिटमेंट फैक्टर बढ़ने की स्थिति में मूल वेतन में वृद्धि का आधार तैयार हो सकता है, जिसका असर संबंधित भत्तों पर भी पड़ सकता है।

    HRA से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण पहलू आयकर नियम हैं। पात्र कर्मचारी पुरानी कर व्यवस्था में आयकर अधिनियम की धारा 10(13A) के तहत निर्धारित शर्तों के अनुसार HRA पर कर छूट का लाभ ले सकते हैं। हालांकि कर लाभ और वास्तविक HRA की गणना अलग-अलग नियमों पर निर्भर करती है।

    8वें वेतन आयोग की अंतिम सिफारिशों के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कर्मचारियों के बेसिक पे, फिटमेंट फैक्टर और HRA की दरों में कितना बदलाव किया जाएगा। फिलहाल 24,528 रुपये का आंकड़ा किसी सरकारी घोषणा के बजाय प्रस्तावित वेतन और HRA दर के आधार पर निकाली गई संभावित राशि है।

  • 8वें वेतन आयोग पर संसद में पहली बार फिटमेंट फैक्टर और फैमिली यूनिट पर चर्चा, सरकार ने दिया बड़ा जवाब

    8वें वेतन आयोग पर संसद में पहली बार फिटमेंट फैक्टर और फैमिली यूनिट पर चर्चा, सरकार ने दिया बड़ा जवाब

    नई दिल्ली। केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे आठवें वेतन आयोग को लेकर चर्चाएं लगातार तेज होती जा रही हैं। वेतन वृद्धि, फिटमेंट फैक्टर और फैमिली यूनिट जैसे मुद्दों पर कर्मचारी संगठनों की ओर से लगातार मांगें उठाई जा रही हैं। इसी बीच संसद में पहली बार इन दोनों अहम विषयों पर विस्तार से सवाल-जवाब हुए, जिससे लाखों कर्मचारियों और पेंशनर्स की निगाहें आयोग की आगामी प्रक्रिया पर टिक गई हैं।

    संसद में हुई चर्चा के दौरान सरकार से पूछा गया कि आठवें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर तय करते समय किन मानकों को आधार बनाया जाएगा और क्या फैमिली यूनिट की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव पर विचार किया जा रहा है। सरकार ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि इन सभी विषयों पर अंतिम निर्णय आयोग की सिफारिशों के आधार पर ही लिया जाएगा। आयोग को स्वतंत्र रूप से अपनी रिपोर्ट तैयार करने और सरकार को सुझाव देने का अधिकार दिया गया है।

    फिटमेंट फैक्टर वह महत्वपूर्ण गुणांक होता है जिसके आधार पर केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के मूल वेतन और पेंशन में संशोधन किया जाता है। नए वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने पर पुराने मूल वेतन को निर्धारित फिटमेंट फैक्टर से गुणा कर नया वेतन तय किया जाता है। यही कारण है कि कर्मचारी संगठनों की सबसे बड़ी मांग फिटमेंट फैक्टर को अधिक रखने की है ताकि वेतन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सके।

    वर्तमान में विभिन्न कर्मचारी संगठनों की ओर से फिटमेंट फैक्टर को 3.68 तक रखने की मांग की जा रही है। वहीं कुछ अन्य संगठन इसे 3 से 3.5 के बीच निर्धारित करने की पैरवी कर रहे हैं। उनका तर्क है कि बढ़ती महंगाई, जीवन-यापन की लागत और कर्मचारियों की आर्थिक जरूरतों को देखते हुए बेहतर फिटमेंट फैक्टर तय किया जाना चाहिए। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस संबंध में अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

    फैमिली यूनिट को लेकर भी कर्मचारी और पेंशनर संगठनों ने अपनी मांग दोहराई है। उनकी मांग है कि वर्तमान व्यवस्था में परिवार की परिभाषा का विस्तार किया जाए और परिवार के सदस्यों की संख्या तीन से बढ़ाकर पांच की जाए, जिसमें माता-पिता को भी शामिल किया जाए। संसद में इस मुद्दे को भी उठाया गया और सरकार से इस संबंध में नीति स्पष्ट करने का आग्रह किया गया। हालांकि सरकार ने कहा कि इस विषय पर भी आयोग अपनी सिफारिशों के आधार पर विचार करेगा।

    सरकार ने यह भी बताया कि आठवें वेतन आयोग की बैठकें लगातार जारी हैं और आयोग विभिन्न राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के कर्मचारियों और पेंशनर्स के प्रतिनिधियों से सुझाव प्राप्त कर रहा है। आगामी बैठक 7 अगस्त को दिल्ली में आयोजित होगी। इसके बाद सितंबर महीने में चेन्नई और पुडुचेरी में भी बैठकें प्रस्तावित हैं। आयोग ने संबंधित संगठनों से आग्रह किया है कि वे केवल अपने निर्धारित क्षेत्र की बैठकों में ही भाग लें, क्योंकि आयोग स्वयं विभिन्न राज्यों का दौरा कर सुझाव एकत्र कर रहा है।

    फिलहाल केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि फिटमेंट फैक्टर कितना तय होगा और वेतन में वास्तविक बढ़ोतरी कितनी होगी। सरकार ने साफ किया है कि आयोग की अंतिम रिपोर्ट मिलने के बाद ही इस पर निर्णय लिया जाएगा। ऐसे में फिलहाल सभी की नजरें आयोग की आगामी बैठकों और अंतिम सिफारिशों पर बनी हुई हैं।

  • नौकरी से निकाले जाने पर मिलते हैं ये कानूनी अधिकार, जानिए पूरी प्रक्रिया….

    नौकरी से निकाले जाने पर मिलते हैं ये कानूनी अधिकार, जानिए पूरी प्रक्रिया….


    नई दिल्ली।नौकरी के क्षेत्र में आज के समय में अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। कई बार कर्मचारियों को बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक नौकरी से निकाल दिया जाता है, जिससे आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियां सामने आती हैं। ऐसी स्थिति में अधिकतर लोग घबरा जाते हैं, लेकिन यह जानना जरूरी है कि कर्मचारियों के अधिकार कानून द्वारा सुरक्षित होते हैं।

    भारत में नौकरी से संबंधित नियम श्रम कानूनों के तहत निर्धारित किए जाते हैं। अधिकतर कंपनियों में नियुक्ति पत्र में नोटिस पीरियड स्पष्ट रूप से लिखा होता है। इसका मतलब यह है कि यदि किसी कर्मचारी की सेवाएं समाप्त की जाती हैं, तो कंपनी को पहले से निर्धारित अवधि का नोटिस देना होता है या उसके बदले में वेतन देना अनिवार्य होता है। यदि कंपनी ऐसा नहीं करती, तो वह कानूनी रूप से गलत मानी जाती है और कर्मचारी अपने अधिकारों की मांग कर सकता है।

    स्थायी कर्मचारियों के मामले में यह नियम और भी सख्ती से लागू होता है। कई बार कंपनियां अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं करतीं, ऐसे में कर्मचारी के पास कानूनी विकल्प मौजूद रहते हैं। नौकरी समाप्त होने के बाद कर्मचारी को उसकी बकाया सैलरी, अवकाश का भुगतान और अन्य देय राशि समय पर मिलना जरूरी होता है। इसे फुल एंड फाइनल सेटलमेंट कहा जाता है, जिसे तय समय सीमा के भीतर पूरा करना कंपनी की जिम्मेदारी होती है।

    यदि किसी कर्मचारी को लगता है कि उसकी नौकरी गलत तरीके से समाप्त की गई है, तो वह श्रम विभाग या संबंधित न्यायिक मंच पर शिकायत दर्ज कर सकता है। इसके अलावा कानूनी नोटिस भेजकर भी अपने अधिकारों की मांग की जा सकती है। ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया कर्मचारी के हितों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत माध्यम बनती है।

    निजी क्षेत्र और आईटी सेक्टर में भी ये नियम लागू होते हैं, खासकर तब जब कंपनी अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करती है। कई बार जानकारी की कमी के कारण कर्मचारी अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाते, जिससे उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है।