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  • यूपी चुनाव 2027 से पहले ओवैसी का अखिलेश यादव पर हमला, आजमगढ़ से बदायूं तक परिवारवाद को लेकर उठाए सवाल

    यूपी चुनाव 2027 से पहले ओवैसी का अखिलेश यादव पर हमला, आजमगढ़ से बदायूं तक परिवारवाद को लेकर उठाए सवाल

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम बहुल सीटों और विपक्षी दलों के बीच गठबंधन को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए परिवारवाद का आरोप लगाया है। कैराना में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने आजमगढ़, बदायूं और फिरोजाबाद का जिक्र किया और दावा किया कि इन क्षेत्रों में पहले मुस्लिम सांसद चुने जाते थे, लेकिन अब यादव परिवार के सदस्य प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

    ओवैसी ने अपने भाषण में कहा कि एक समय आजमगढ़ से मुस्लिम सांसद जीतकर संसद पहुंचते थे, जबकि अब वहां से अखिलेश यादव के भाई सांसद हैं। उन्होंने बदायूं और फिरोजाबाद का उल्लेख करते हुए भी समाजवादी पार्टी पर परिवार के सदस्यों को राजनीतिक अवसर देने का आरोप लगाया। उनके बयान का मुख्य मुद्दा मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और समाजवादी पार्टी में परिवार की भूमिका रहा।

    AIMIM प्रमुख ने तंज कसते हुए कहा कि अखिलेश यादव को अपनी पार्टी का नाम समाजवादी पार्टी के बजाय समाजवादी यादव परिवार रख लेना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि यादव परिवार की राजनीति में परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता दी जा रही है और मुस्लिम समुदाय से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व की मांग पीछे रखे।

    उन्होंने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी सीमित की जा रही है। ओवैसी के अनुसार, समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विभिन्न समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के मामले में उसकी क्या नीति है। उन्होंने परिवारवाद के मुद्दे को उठाते हुए सपा पर मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन का राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया।

    ओवैसी ने मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर भी अखिलेश यादव की आलोचना की। हालांकि, उनके इस बयान के संदर्भ में उपलब्ध जानकारी में सपा की ओर से कोई प्रतिक्रिया शामिल नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन समाजवादी पार्टी समेत कई दलों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में ओवैसी के बयान को आगामी चुनाव से पहले विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    विपक्षी गठबंधन को लेकर ओवैसी ने भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी जताई है। उन्होंने कहा कि यदि विपक्षी दलों का उद्देश्य भाजपा को हराना है, तो AIMIM भी उनके साथ आने के लिए तैयार है। ओवैसी ने यह भी कहा कि वह योगी आदित्यनाथ को तीसरी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते नहीं देखना चाहते। उनके इस रुख से संकेत मिलता है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की संभावना पर उनकी पार्टी बातचीत के लिए तैयार है, हालांकि गठबंधन की कोई अंतिम रूपरेखा सामने नहीं आई है।

    ओवैसी की राजनीतिक रणनीति को लेकर भी चर्चा हो रही है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में AIMIM अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है। खबर में उल्लेख किया गया है कि 15 अक्टूबर को मुस्लिम विद्वान और राजनीतिक विश्लेषक हाजी अब्दुल सलाम ने दावा किया था कि AIMIM राज्य की 200 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति बना रही है। उनके अनुसार, यदि पार्टी को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन में जगह नहीं मिलती है, तो कुछ सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। यह फिलहाल एक रणनीतिक आकलन है, न कि घोषित उम्मीदवारों की अंतिम सूची।

    मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा और संभल जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाताओं का रुझान आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इन क्षेत्रों में विभिन्न दलों की चुनावी रणनीति और गठबंधन की स्थिति राजनीतिक मुकाबले को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि AIMIM कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी और विपक्षी दलों के बीच सीटों के तालमेल को लेकर क्या सहमति बनेगी।

    2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी के बयानों ने समाजवादी पार्टी की राजनीति, परिवारवाद और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्षी दल गठबंधन को लेकर क्या फैसला करते हैं और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए कौन-सी रणनीति अपनाते हैं।

  • रामपुर जेल में आजम खान से मिले अखिलेश यादव, एक घंटे की मुलाकात के बाद 2027 चुनाव को लेकर भाजपा पर साधा निशाना

    रामपुर जेल में आजम खान से मिले अखिलेश यादव, एक घंटे की मुलाकात के बाद 2027 चुनाव को लेकर भाजपा पर साधा निशाना

    नई दिल्ली । समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गुरुवार को रामपुर जिला जेल में पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खान से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत हुई। मुलाकात के बाद जेल से बाहर आए अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा और कहा कि समाजवादी पार्टी का लक्ष्य भाजपा को सत्ता से हटाना है। इस मुलाकात को उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों और पार्टी के राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में अहम माना जा रहा है।

    अखिलेश यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि समाजवादी पार्टी का उद्देश्य स्पष्ट है और पार्टी के कार्यकर्ता भाजपा को हराने के लिए मजबूती से काम कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि सत्ताधारी दल का जनाधार कमजोर हो रहा है और आगामी चुनावों में उसे जनता के विरोध का सामना करना पड़ेगा। अखिलेश ने कहा कि उत्तर प्रदेश की जनता भाजपा को सत्ता से बाहर करने का फैसला करेगी। ये बयान सपा अध्यक्ष की राजनीतिक रणनीति और आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी के रुख को दर्शाते हैं।

    सपा प्रमुख ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उन परिणामों से जनता का संदेश सामने आ चुका है। अखिलेश यादव के मुताबिक, 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की रणनीति में पीडीए की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। पीडीए से आशय पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों से है। पार्टी इस सामाजिक समीकरण के साथ सामाजिक न्याय और जमीनी मुद्दों को भी अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाने पर जोर दे रही है।

    मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थानों से जुड़े मुद्दों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन संस्थानों की स्थापना का उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से वंचित और पीडीए समुदायों को आगे बढ़ने का अवसर देना रहा है। उनके बयान में शिक्षा, सामाजिक न्याय और संस्थानों पर हो रही कार्रवाई से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। हालांकि, इन कार्रवाइयों के विशिष्ट मामलों और उनके कानूनी पहलुओं का विस्तृत विवरण उपलब्ध जानकारी में नहीं दिया गया है।

    आजम खान समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शामिल रहे हैं और रामपुर की राजनीति में उनका लंबे समय से प्रभाव रहा है। ऐसे में अखिलेश यादव की उनसे जेल में हुई मुलाकात को पार्टी के भीतर संपर्क और राजनीतिक एकजुटता के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। मुलाकात के दौरान किन विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई, इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। हालांकि, जेल से बाहर आने के बाद अखिलेश यादव की टिप्पणियों में भाजपा के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष और 2027 के चुनाव की तैयारी प्रमुख रही।

    रामपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस मुलाकात को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज होने की संभावना है। समाजवादी पार्टी के समर्थकों के लिए यह मुलाकात वरिष्ठ नेताओं के बीच संवाद का संकेत है, जबकि इसके राजनीतिक प्रभाव का आकलन आगामी घटनाक्रम और पार्टी की रणनीति के आधार पर किया जा सकेगा। फिलहाल अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से भाजपा को हराने और पीडीए के मुद्दों को आगामी विधानसभा चुनाव में केंद्र में रखने का संदेश दिया है।

  • आजमगढ़ में ओवैसी की जनसभा से उत्तर प्रदेश चुनाव की तैयारी तेज, एआईएमआईएम ने एक लाख लोगों के जुटने का किया दावा

    आजमगढ़ में ओवैसी की जनसभा से उत्तर प्रदेश चुनाव की तैयारी तेज, एआईएमआईएम ने एक लाख लोगों के जुटने का किया दावा


    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। इसी क्रम में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी 11 अक्टूबर को आजमगढ़ में एक जनसभा को संबोधित करने वाले हैं। इस कार्यक्रम के जरिए पार्टी पूर्वांचल में अपनी राजनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। जनसभा के लिए आजमगढ़ के कोटिला के पास स्थित सिरसल क्लब ग्राउंड को चुना गया है। पार्टी की ओर से कार्यक्रम में एक लाख से अधिक लोगों के शामिल होने का दावा किया गया है।

    कार्यक्रम की तैयारियों को लगभग पूरा बताया गया है। एआईएमआईएम के जिला अध्यक्ष नदीम अहमद के अनुसार, जनसभा शाम चार बजे से शुरू होगी, जबकि असदुद्दीन ओवैसी के शाम करीब छह बजे कार्यक्रम में पहुंचने का कार्यक्रम है। नदीम अहमद ने कहा कि ओवैसी अल्लामा शिब्ली नोमानी की ऐतिहासिक धरती से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के अभियान की शुरुआत करेंगे। हालांकि, जनसभा में वास्तविक रूप से कितने लोग शामिल होते हैं, यह कार्यक्रम के बाद ही स्पष्ट होगा।

    आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर एआईएमआईएम ने राज्य में अलग राजनीतिक गठबंधन बनाने का संकेत दिया है। जिला अध्यक्ष नदीम अहमद ने कहा कि उनकी पार्टी ने खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले दलों से भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ने का अनुरोध किया था। उनके मुताबिक, इन दलों ने एआईएमआईएम को अपने साथ शामिल करने में रुचि नहीं दिखाई। ऐसे में पार्टी अब तीसरा मोर्चा बनाकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है। उनके बयान के अनुसार, पार्टी चुनाव में गठबंधन के विकल्प पर आगे बढ़ रही है।

    आजमगढ़ की राजनीतिक स्थिति को लेकर भी नदीम अहमद ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि समाजवादी पार्टी अब जिले में पहले जैसी मजबूत स्थिति में नहीं है। उनका कहना था कि आजमगढ़ को समाजवादी पार्टी का गढ़ मानना उचित नहीं है और पार्टी नेतृत्व ने जिले के विकास की अपेक्षा अपने गृह क्षेत्र सैफई पर अधिक ध्यान दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव के नेतृत्व में आजमगढ़ के विकास के लिए पर्याप्त काम नहीं हुआ। नदीम अहमद के मुताबिक, जिले के लोग अब इन मुद्दों को समझ रहे हैं।

    नदीम अहमद ने यह भी दावा किया कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए ओवैसी के नेतृत्व में एक मजबूत गठबंधन तैयार हो चुका है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह गठबंधन आजमगढ़ की अधिकतर विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करेगा। हालांकि, यह पार्टी पदाधिकारी का चुनावी दावा है और इसके परिणाम का आकलन मतदान के बाद ही किया जा सकेगा।

    आजमगढ़ लंबे समय से समाजवादी पार्टी के प्रभाव वाला क्षेत्र रहा है। वर्ष 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जिले की सभी 10 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी आजमगढ़ सदर और लालगंज, दोनों लोकसभा सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार विजयी रहे। ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में एआईएमआईएम की जनसभा और तीसरा मोर्चा बनाने की घोषणा आगामी चुनाव से पहले जिले में पार्टी की रणनीति को सामने लाती है।

  • अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे पर सियासी घमासान, रामलला के दर्शन नहीं करने को लेकर संतों और भाजपा नेताओं ने उठाए सवाल

    अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे पर सियासी घमासान, रामलला के दर्शन नहीं करने को लेकर संतों और भाजपा नेताओं ने उठाए सवाल

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक बयानबाजी तेज होती दिखाई दे रही है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे को लेकर भाजपा नेताओं और संतों ने सवाल उठाए हैं। अखिलेश यादव बीते दिन पूर्व मंत्री तेज नारायण पांडेय के आवास पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में शामिल होने अयोध्या पहुंचे थे। हालांकि, उनके राम मंदिर में रामलला के दर्शन नहीं करने को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर समेत भाजपा नेताओं ने अखिलेश यादव पर निशाना साधा।

    उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस तरह की राजनीति की जा रही है, उससे खुद अखिलेश यादव के सशंकित होने का संकेत मिलता है। राजभर ने कहा कि यदि अखिलेश यादव अयोध्या गए थे, तो उन्हें हनुमानगढ़ी और भगवान राम के दर्शन भी कर लेने चाहिए थे। उनके मुताबिक, ऐसा करने से इस तरह के सवाल खड़े नहीं होते। राजभर ने श्रीमद्भागवत कथा के आयोजन स्थल पर नारेबाजी को लेकर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि जहां भागवत कथा हो रही है, वहां अखिलेश यादव के लोग नारेबाजी कर रहे हैं। उन्होंने इस कृत्य की निंदा करते हुए कहा कि भागवत कथा के स्थान को राजनीतिक मंच बनाना अखिलेश यादव को ही शोभा देता है।

    उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने भी इस मामले में समाजवादी पार्टी को आत्मावलोकन करने की सलाह दी। भाजपा नेता ने सपा पर मुस्लिम तुष्टिकरण और जाति के नाम पर वोट मांगने की राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ऐसी राजनीति करने वाले लोग उत्तर प्रदेश में सफल नहीं होंगे। पाठक ने अयोध्या में प्रचंड बहुमत के साथ जीत हासिल करने का दावा भी किया। उनके बयान से स्पष्ट है कि भाजपा नेता अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे को आगामी चुनावों के राजनीतिक संदर्भ में देख रहे हैं।

    भाजपा नेता राकेश त्रिपाठी ने भी अखिलेश यादव के दौरे को लेकर पलटवार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव ने सत्ता में रहते हुए अयोध्या को भुला दिया था। त्रिपाठी ने कहा कि योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद अयोध्या में 50 हजार से अधिक की परियोजनाएं आई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राम मंदिर भाजपा का मंदिर नहीं है, लेकिन अयोध्या पहुंचने के बावजूद अखिलेश यादव रामलला के दर्शन करने नहीं गए। उनके बयान में अयोध्या के विकास और राम मंदिर से जुड़े मुद्दों को लेकर सपा की भूमिका पर सवाल उठाए गए।

    अखिलेश यादव के राम मंदिर में दर्शन नहीं करने को लेकर संतों ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। अयोध्या दौरे के दौरान अखिलेश यादव ने श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के मंच से भगवान कृष्ण और न्याय की बात की, लेकिन राम के बारे में कुछ नहीं कहा। यह बात संतों को खटकी और उनके दौरे को लेकर सवाल उठने लगे। इस तरह धार्मिक आयोजन में उनकी मौजूदगी और रामलला के दर्शन नहीं करने का मुद्दा राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।

    उत्तर प्रदेश में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में नेताओं के दौरे और बयानों को चुनावी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी समाजवादी पार्टी के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। अखिलेश यादव के अयोध्या दौरे पर उठे सवालों के बीच भाजपा नेताओं ने सपा की राजनीतिक रणनीति और धार्मिक मुद्दों पर उसके रुख को निशाने पर लिया है। वहीं, इस पूरे विवाद का केंद्र अखिलेश यादव का भागवत कथा में शामिल होना और रामलला के दर्शन नहीं करना बना हुआ है।

  • योगी आदित्यनाथ ने कल्याण सिंह की पुण्यतिथि पर सपा पर साधा निशाना, ‘पी’ की परिभाषा को लेकर दिया बड़ा बयान

    योगी आदित्यनाथ ने कल्याण सिंह की पुण्यतिथि पर सपा पर साधा निशाना, ‘पी’ की परिभाषा को लेकर दिया बड़ा बयान

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को लखनऊ के इकाना स्टेडियम में पूर्व मुख्यमंत्री और पद्म विभूषण कल्याण सिंह की पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कल्याण सिंह के राजनीतिक और सामाजिक योगदान को याद करते हुए समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सपा के पीडीए की राजनीति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि समय के साथ राजनीतिक रंग बदलने वाले लोग ‘पी’ की अलग-अलग परिभाषाएं गढ़ते हैं।

    योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पहले ‘पी’ को पिछड़े से जोड़ा गया, फिर पंडित से जोड़ा गया और एक दिन ऐसे लोग ‘पी’ की परिभाषा पाकिस्तान से भी करने लगेंगे। मुख्यमंत्री की इस टिप्पणी को समाजवादी पार्टी की राजनीतिक रणनीति और उसके पीडीए के दावे पर सीधे हमले के तौर पर देखा गया। उन्होंने कहा कि बदलते राजनीतिक समीकरणों के साथ विचार और परिभाषाएं बदलने वाले लोगों को जनता समझती है।

    कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने कल्याण सिंह के जीवन और सार्वजनिक योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का महत्व केवल उसके पद से निर्धारित नहीं होता। व्यक्ति अपनी सोच, कर्म, सिद्धांत और समाज के प्रति योगदान से बड़ा बनता है। उन्होंने कहा कि अतरौली के सामान्य किसान परिवार में जन्मे कल्याण सिंह ने संघर्ष और मेहनत के बल पर सार्वजनिक जीवन में अलग पहचान बनाई।

    योगी ने बताया कि कल्याण सिंह ने किसान और शिक्षक के रूप में काम करने के बाद विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद और राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। उन्होंने उनके जीवन को सादगी, संघर्ष, तप और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता का उदाहरण बताया। मुख्यमंत्री के अनुसार, कल्याण सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन में दबाव के बावजूद अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया।

    मुख्यमंत्री ने कल्याण सिंह के उस कथन को भी याद किया कि वह टूट सकते हैं, लेकिन झुक नहीं सकते। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने जीवन में इस विचार को व्यवहार में उतारा और गलत कार्यों के लिए किसी भी तरह के दबाव के आगे झुकने से इनकार किया।

    राम जन्मभूमि आंदोलन का उल्लेख करते हुए योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कल्याण सिंह ने सत्ता से अधिक अपने सिद्धांतों को महत्व दिया। उन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन का समर्थन किया और ऐसी परिस्थितियों में भी अपने राजनीतिक निर्णयों पर कायम रहे, जब उन्हें सत्ता गंवाने का जोखिम उठाना पड़ा।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर और रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद कल्याण सिंह का योगदान और अधिक याद आता है। उन्होंने कहा कि राम जन्मभूमि आंदोलन में संतों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद सहित विभिन्न संगठनों की भूमिका रही और कल्याण सिंह भी इस आंदोलन के महत्वपूर्ण राजनीतिक चेहरों में शामिल रहे।

    योगी ने कल्याण सिंह के निधन के समय की परिस्थितियों को भी याद किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली से लखनऊ पहुंचे और कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि दी। अंतिम यात्रा से जुड़े कार्यक्रमों में प्रदेश सरकार के मंत्रियों और अन्य नेताओं की मौजूदगी का भी उन्होंने उल्लेख किया।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि दी थी, जबकि समाजवादी पार्टी के नेतृत्व की ओर से प्रत्यक्ष रूप से श्रद्धांजलि देने या संवेदना व्यक्त करने की पहल नहीं की गई। योगी ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि कल्याण सिंह का जीवन सामाजिक मूल्यों, सिद्धांतों और सनातन परंपराओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए जाना जाता है। पुण्यतिथि कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने उनके राजनीतिक जीवन और सार्वजनिक योगदान को याद करते हुए कहा कि उनका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का विषय रहेगा।

  • अमित शाह के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी की नई रणनीति, विनोद तावड़े के सामने संगठन और सामाजिक समीकरण संभालने की चुनौती

    अमित शाह के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी की नई रणनीति, विनोद तावड़े के सामने संगठन और सामाजिक समीकरण संभालने की चुनौती


    नई दिल्ली । 
    उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने संगठनात्मक स्तर पर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी ने राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया है। उनके साथ राष्ट्रीय मंत्री जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सह प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। तावड़े के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सामाजिक और संगठनात्मक आधार को मजबूत करना तथा समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण का मुकाबला करना है।

    उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीजेपी के लिए अमित शाह का दौर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले अमित शाह को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी मिली थी। उस समय पार्टी ने विभिन्न सामाजिक समूहों को साथ लाने और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने की रणनीति पर काम किया। इसके बाद 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ी सफलता मिली।

    अब करीब एक दशक बाद परिस्थितियां बदल चुकी हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत की और बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने में सफलता हासिल की। अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा ने पीडीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश की। ऐसे में बीजेपी को अपने गैर यादव ओबीसी और अन्य पारंपरिक सामाजिक आधार को फिर से मजबूत करने की चुनौती है।

    विनोद तावड़े की पहचान शांत कार्यशैली और संगठनात्मक प्रबंधन के लिए होती है। उन्हें बूथ स्तर तक चुनावी रणनीति को लागू करने और पार्टी कार्यकर्ताओं के नेटवर्क को सक्रिय रखने का अनुभव है। बिहार विधानसभा चुनाव में भी उनकी भूमिका को चुनावी प्रबंधन और सामाजिक समीकरणों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया। इसी अनुभव के आधार पर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई है।

    तावड़े के सामने केवल विपक्षी दलों की रणनीति का मुकाबला करना ही चुनौती नहीं है। उन्हें राज्य संगठन, सरकार और केंद्रीय नेतृत्व के बीच बेहतर समन्वय भी बनाए रखना होगा। टिकट वितरण, क्षेत्रीय समीकरण, पार्टी के भीतर संभावित मतभेद और स्थानीय स्तर पर विधायकों के खिलाफ नाराजगी जैसे मुद्दों का समाधान भी उनके चुनावी प्रबंधन का हिस्सा होगा।

    उत्तर प्रदेश में बीजेपी के कई सहयोगी दल भी हैं। निषाद पार्टी, अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी सहित अन्य सहयोगियों के साथ तालमेल बनाए रखना और चुनावी परिस्थितियों के अनुसार सीटों के बंटवारे पर सहमति बनाना भी महत्वपूर्ण होगा। तावड़े के लिए यह अनुभव बिहार की तुलना में अधिक व्यापक चुनौती लेकर आएगा, क्योंकि उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें हैं और प्रत्येक क्षेत्र के सामाजिक समीकरण अलग हैं।

    तावड़े की प्राथमिकताओं में पार्टी के बूथ नेटवर्क को दोबारा सक्रिय करना और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय मजबूत करना शामिल हो सकता है। इसके साथ अवध और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में बीजेपी के कमजोर हुए जनाधार को मजबूत करना भी अहम रहेगा। पार्टी को उन मतदाताओं तक दोबारा पहुंच बनाने की जरूरत होगी, जिनका रुख पिछले चुनाव में बदला दिखाई दिया।

    अमित शाह के समय बीजेपी की रणनीति को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, मजबूत संगठन और व्यापक चुनावी माहौल का लाभ मिला था। 2027 में राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। विपक्षी दल अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं और सपा ने पीडीए को अपनी राजनीतिक रणनीति का प्रमुख आधार बनाया है। ऐसे में तावड़े के सामने अमित शाह की रणनीति की हूबहू नकल करने के बजाय मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप नई रणनीति तैयार करने की जरूरत होगी।

    विनोद तावड़े की नियुक्ति से यह संकेत भी मिलता है कि बीजेपी उत्तर प्रदेश में केवल बड़े नेताओं की रैलियों पर निर्भर रहने के बजाय संगठन और माइक्रो मैनेजमेंट पर विशेष जोर देना चाहती है। बूथ स्तर की सक्रियता, सामाजिक समूहों के बीच संतुलन, सहयोगी दलों से तालमेल और संगठन के भीतर एकजुटता 2027 के चुनाव में पार्टी की स्थिति तय करने वाले प्रमुख कारक हो सकते हैं।

    अब तावड़े के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह बीजेपी के पुराने सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से मजबूत कर पाएंगे और सपा के पीडीए आधार का प्रभाव कम कर सकेंगे। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में उनका प्रदर्शन यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगा कि संगठनात्मक रणनीति के दम पर बीजेपी 2027 में सत्ता बरकरार रखने की अपनी कोशिश को कितनी मजबूती दे पाती है।