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  • दिग्विजय सिंह बोले- ‘मैं सनातन धर्म का समर्थक हूं, हिंदुत्व का नहीं’, सावरकर को लेकर किया दावा

    दिग्विजय सिंह बोले- ‘मैं सनातन धर्म का समर्थक हूं, हिंदुत्व का नहीं’, सावरकर को लेकर किया दावा


    शाजापुर। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने सनातन धर्म और हिंदुत्व को लेकर बयान दिया है। उन्होंने कहा कि वह सनातन धर्म का समर्थन करते हैं, लेकिन हिंदुत्व का नहीं। सिंह ने दावा किया कि ‘हिंदुत्व’ शब्द विनायक दामोदर सावरकर ने दिया था। अपनी ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ के सिलसिले में शाजापुर पहुंचे कांग्रेस नेता ने कहा कि सनातन धर्म का संदेश प्रेम, स्नेह और करुणा है। उन्होंने यात्रा को गैर-राजनीतिक बताते हुए सभी धर्मों के लोगों से इससे जुड़ने की अपील भी की।

    बोले- मां ने सनातन धर्म की सीख दी

    शाजापुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिग्विजय सिंह ने कहा कि उनकी मां ने उन्हें सनातन धर्म के बारे में सिखाया था। उनके अनुसार, सनातन धर्म प्रेम, स्नेह और करुणा का प्रतीक है।

    सिंह ने कहा, “मैं सनातन धर्म का समर्थन करता हूं, हिंदुत्व का नहीं।” उन्होंने दावा किया कि हिंदुत्व शब्द सावरकर ने दिया था। कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि हिंदुत्व का समानता से कोई लेना-देना नहीं है।

    कुरान का भी किया जिक्र

    प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिग्विजय सिंह ने कुरान का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने कुरान पढ़ी है। कांग्रेस नेता ने ‘काफिर’ शब्द का अर्थ बताते हुए दावा किया कि इसका इस्तेमाल ऐसे व्यक्ति के लिए होता है, जो किसी धर्म का पालन नहीं करता और ‘अधर्म’ यानी गलत रास्ते पर चलता है।

    उज्जैन से शुरू हुई यात्रा अयोध्या में होगी समाप्त

    दिग्विजय सिंह इन दिनों ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ पर हैं। यह यात्रा इसी सप्ताह उज्जैन से शुरू हुई थी और अयोध्या में समाप्त होगी। शाजापुर के बाद यात्रा राजगढ़ जिले की ओर बढ़ेगी।

    सिंह ने इस यात्रा को गैर-राजनीतिक पहल बताया। उन्होंने कहा, “अगर यह राजनीतिक होती, तो इसमें केवल कांग्रेस कार्यकर्ता ही शामिल होते।” उन्होंने कहा कि उनकी इच्छा है कि सभी धर्मों के लोग यात्रा से जुड़ें।

    यात्रा के जरिए दिग्विजय सिंह सनातन धर्म से जुड़े अपने विचार रख रहे हैं। शाजापुर में उनके बयान के बाद सनातन धर्म और हिंदुत्व को लेकर उनकी टिप्पणी चर्चा में आ गई है।

  • सनातन की एकता में ही सुरक्षा और मजबूती, अलग-अलग स्वर पराजय का कारण बनेंगे: सीएम योगी

    सनातन की एकता में ही सुरक्षा और मजबूती, अलग-अलग स्वर पराजय का कारण बनेंगे: सीएम योगी


    नई दिल्ली।
    गोरखपुर में मंगलवार को मुख्यमंत्री एवं गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सनातन धर्म की एकता में ही हमारी सुरक्षा और मजबूती है। उन्होंने कहा कि पंथ और संप्रदाय की उपासना पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन सभी का कल्याण वृहद सनातन धर्म की मजबूती में है। उनका कहना था कि 140 करोड़ लोग एक स्वर में हुंकार भरेंगे तो दुनिया की कोई ताकत सामने नहीं ठहर सकती। अलग-अलग गति प्रगति का कारण नहीं, बल्कि दुर्गति और अलग-अलग स्वर ताकत नहीं, बल्कि पराजय का कारण बनेंगे। मुख्यमंत्री गोरखनाथ मंदिर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि पर आयोजित सप्त दिवसीय समारोह के तहत व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने दोनों आचार्यों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके योगदान को याद किया।

    सीएम योगी ने कहा कि अयोध्या में भगवान राम और सनातन का वैभव जिन्हें स्वीकार नहीं है, वे दुष्प्रचार और भ्रम पैदा करेंगे। उन्होंने संजीवनी बूटी लेने जाते समय हनुमान जी द्वारा कालनेमि को पहचानने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि रामभक्तों को भी भ्रम फैलाने वालों को पहचानना होगा। उन्होंने महंत दिग्विजयनाथ के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि वे भारत की आजादी को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं मानते थे। उनके अनुसार संपूर्ण स्वाधीनता के लिए सांस्कृतिक स्वतंत्रता भी जरूरी थी। महंत दिग्विजयनाथ का मानना था कि यदि सोमनाथ मंदिर की पुनर्प्राण प्रतिष्ठा हो सकती है तो अयोध्या में भी यह कार्य होना चाहिए।

    1949 में रामलला के प्रकटीकरण के समय महंत दिग्विजयनाथ, बाबा अभिराम दास और महंत रामचंद्र दास परमहंस सक्रिय थे। इसकी रणनीति देवीपाटन में महंत दिग्विजयनाथ, महाराजा बलरामपुर और तत्कालीन गोंडा जिलाधिकारी केके नायर के बीच बनी थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि 500 वर्षों बाद अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर सनातन धर्मावलंबियों को गौरव की अनुभूति करा रहा है।

    मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि और विंध्यवासिनी धाम का भव्य स्वरूप सामने है। उन्होंने प्रयागराज महाकुंभ का उल्लेख करते हुए कहा कि इस आयोजन ने दुनिया के सामने सनातन परंपरा का सामर्थ्य रखा है। उन्होंने वृंदावन के वैष्णव कुंभ का भी उल्लेख किया। मुख्यमंत्री के अनुसार महंत दिग्विजयनाथ ने बिखरे नाथ संप्रदाय को अखिल भारतीय भेष बारह पंथ योगी महासभा के रूप में एकजुट किया था। उन्होंने कहा कि अपनी परंपरा का पालन करते हुए वृहद सनातन धर्म की एकता को मजबूत करना होगा। सीएम योगी ने कहा कि दोनों आचार्यों ने जिन विषयों के लिए अपना जीवन समर्पित किया, उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। महापुरुषों के दूरदर्शी कार्य भविष्य की मजबूत नींव तैयार करते हैं और गोरक्षपीठ तथा महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद दोनों आचार्यों के आदर्शों को आगे बढ़ा रहे हैं।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि देश गुलाम था और संसाधनों का अभाव था, तब महंत दिग्विजयनाथ ने 1932 में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की। महाराणा प्रताप को आदर्श बनाने के पीछे स्वदेश, स्वाभिमान और स्वधर्म का भाव था। उन्होंने कहा कि गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना में भी महंत दिग्विजयनाथ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विश्वविद्यालय के लिए मठ की संपत्ति और दो संस्थाएं सरकार को देने में उन्होंने श्रेय की चिंता नहीं की।

    आज महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अंतर्गत 50 से 55 संस्थाएं संचालित हैं, जिनमें विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज, आयुर्वेद कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, पॉलिटेक्निक, विद्यालय, अस्पताल और कृषि विज्ञान केंद्र शामिल हैं। सीएम योगी ने कहा कि महंत दिग्विजयनाथ ने उस दौर में बालिका शिक्षा के लिए विद्यालय और महाविद्यालय स्थापित किए। गोरखपुर में फर्टिलाइजर कारखाने और बीआरडी मेडिकल कॉलेज की स्थापना के प्रयासों को आगे बढ़ाने में भी उनकी भूमिका रही। उन्होंने कहा कि गोरक्षपीठ नाथ परंपरा की पीठ होते हुए भी पूरे सनातन धर्म के लिए समर्पित है। यहां जाति, पंथ या संप्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं होता। सभी जातियों के लोग एक पंक्ति में अन्न ग्रहण करते हैं और सभी आचार्यों व संतों को समान सम्मान मिलता है।
  • जेन-जी से मोहन भागवत का संवाद- अहंकार देता है सब कुछ अपने नियंत्रण में होने का भ्रम, धर्म को समझने के लिए सोच बदलना जरूरी

    जेन-जी से मोहन भागवत का संवाद- अहंकार देता है सब कुछ अपने नियंत्रण में होने का भ्रम, धर्म को समझने के लिए सोच बदलना जरूरी


    नई दिल्ली। उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने युवाओं से धर्म संस्कृति और जीवन मूल्यों को लेकर संवाद किया। तीन दिवसीय युवा धर्म संसद के दूसरे दिन भागवत ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म को केवल बुढ़ापे से जोड़कर देखना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि गीता और रामायण को अक्सर लोग रिटायरमेंट के बाद पढ़ने वाली किताबों के तौर पर देखते हैं लेकिन धर्म व्यक्ति के जीवन की शुरुआत से अंत तक बना रहता है। उज्जैन में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए।

    मोहन भागवत ने अपने संबोधन में अहंकार को लेकर भी युवाओं से बात की। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति अहंकार में यह मानकर काम करता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है और हर चीज उसकी इच्छा के अनुसार होनी चाहिए तो वह एक तरह के भ्रम में पड़ जाता है। उन्हें लगता है कि परिस्थितियां भी उनकी इच्छा के मुताबिक ही चलेंगी लेकिन ऐसा नहीं होता। भागवत ने प्रकृति के नियमों का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ चीजें अपने निर्धारित नियमों के अनुसार चलती हैं। व्यक्ति उनके बारे में विश्वास करे या न करे लेकिन उनका होना और अपना काम करना जारी रहता है।

    उन्होंने युवाओं से कहा कि धर्म को समझने के लिए पहले से मन में बैठी धारणाओं पर भी विचार करना जरूरी है। भागवत ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य युवाओं के दिमाग को किसी खास विचार से भरना नहीं है। उन्होंने युवाओं से अपने स्तर पर सोचने और चर्चा करने की बात कही। उनके अनुसार धर्म को समझने की प्रक्रिया इतनी व्यापक है कि व्यक्ति पूरा जीवन इसके अर्थ को समझने में लगा सकता है।

    भागवत ने धर्म को केवल पूजा या किसी एक धार्मिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं बताया। उन्होंने कहा कि धर्म का संबंध व्यक्ति के आचरण और कर्तव्य से भी है। जिस तरह पानी का स्वभाव बहना है और आग का स्वभाव जलना है उसी तरह व्यक्ति और समाज के लिए भी उनके स्वभाव और जिम्मेदारी के अनुरूप कर्तव्य निर्धारित होते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म का एक अर्थ कर्तव्य भी है। पुत्र का अपना कर्तव्य है तो राजा का अपना कर्तव्य होता है।

    उन्होंने महाभारत और भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि महाभारत के माध्यम से धर्म को समझने के कई प्रसंग सामने आते हैं। उनके अनुसार युधिष्ठिर ने अपने जीवन में धर्म को समझने और उसका पालन करने का प्रयास किया। भागवत ने युवाओं से कहा कि सुख और इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी धर्म के रास्ते को छोड़ना उचित नहीं है। उन्होंने डर लालच या किसी अन्य दबाव में धर्म से विचलित नहीं होने की बात कही।

    युवा धर्म संसद का आयोजन उज्जैन में 17 से 19 सितंबर तक किया जा रहा है। आयोजकों के अनुसार इसमें 24 राज्यों से 1500 से अधिक युवा शामिल हो रहे हैं। कार्यक्रम में धर्म संस्कृति शिक्षा तकनीक परिवार मानवीय मूल्य और राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका जैसे विषयों पर संवाद हो रहा है। 19 सितंबर को होने वाले समापन कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के शामिल होने की जानकारी दी गई है।

  • पति के बाईं ओर पत्नी के बैठने का क्या है राज? धर्म और परंपरा में छिपा है समानता और सामंजस्य का संदेश

    पति के बाईं ओर पत्नी के बैठने का क्या है राज? धर्म और परंपरा में छिपा है समानता और सामंजस्य का संदेश


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म की पूजा पद्धति में पति और पत्नी को एक साथ बैठकर धार्मिक अनुष्ठान करने की परंपरा रही है। घर में सत्यनारायण कथा हो या कोई शुभ पूजा हवन अथवा धार्मिक आयोजन हो अक्सर पत्नी को पति के बाईं ओर बैठे हुए देखा जाता है। पहली नजर में यह सामान्य परंपरा लग सकती है लेकिन धार्मिक मान्यताओं में इसके पीछे कई प्रतीकात्मक अर्थ बताए गए हैं। पत्नी को पति की अर्धांगिनी और वामांगी कहा जाता है। वामांगी का अर्थ पति के बाएं अंग से जुड़ी स्त्री से लिया जाता है। इसी विचार के कारण गृहस्थ जीवन से जुड़े कई शुभ कार्यों में पत्नी का स्थान पति के बाईं ओर माना गया है।

    इस परंपरा को भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। अर्धनारीश्वर की प्रतिमा में शिव और शक्ति को एक ही शरीर के दो हिस्सों के रूप में दर्शाया जाता है। पारंपरिक रूप से इस स्वरूप में स्त्री पक्ष बाईं ओर दिखाई देता है। इसका आध्यात्मिक संदेश यह माना जाता है कि पुरुष और स्त्री अलग होते हुए भी एक दूसरे के पूरक हैं। पति और पत्नी के रिश्ते में भी इसी एकता और संतुलन की भावना को महत्वपूर्ण माना गया है। इसीलिए पूजा में दोनों का साथ बैठना केवल धार्मिक प्रक्रिया नहीं बल्कि दांपत्य साझेदारी का प्रतीक भी माना जाता है।

    पत्नी को बाईं ओर स्थान देने के पीछे एक लोकप्रिय सांस्कृतिक व्याख्या हृदय से भी जुड़ी है। मानव शरीर में हृदय बाईं ओर स्थित होता है और इसी कारण बाईं दिशा को प्रेम भावना आत्मीयता और स्नेह से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक और लोक मान्यताओं में पति के बाईं ओर पत्नी का स्थान उसके प्रति निकटता और सम्मान का प्रतीक माना गया है। इसे पति पत्नी के बीच भावनात्मक जुड़ाव और पारिवारिक सामंजस्य की अभिव्यक्ति के तौर पर भी समझा जाता है। यह वैज्ञानिक नियम नहीं बल्कि परंपरा से जुड़ी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक व्याख्या है।

    योग और आध्यात्मिक परंपराओं में भी शरीर की ऊर्जा और संतुलन को लेकर कई अवधारणाएं मिलती हैं। कुछ धार्मिक व्याख्याओं में पुरुष और स्त्री ऊर्जा को एक दूसरे का पूरक बताया जाता है। बाईं दिशा को चंद्र या शांत ऊर्जा से और दाईं दिशा को सूर्य या सक्रिय ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है। पति पत्नी के साथ बैठने को इसी संतुलन का प्रतीक माना जाता है। हालांकि ऊर्जा से जुड़े इन विचारों को धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यता के रूप में ही देखना उचित है। इन्हें आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

    यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि हर धार्मिक अनुष्ठान में पत्नी का स्थान हमेशा बाईं ओर ही हो ऐसा जरूरी नहीं है। अलग-अलग परंपराओं और कर्मकांडों में दिशा बदलने की मान्यता भी मिलती है। कुछ स्रोतों के अनुसार सामान्य गृहस्थ और शुभ कार्यों में पत्नी को पति के बाईं ओर बैठाया जाता है जबकि कुछ यज्ञ हवन या विशेष संस्कारों में दाईं ओर बैठने की परंपरा बताई गई है। इसलिए किसी विशेष पूजा या संस्कार के लिए अपने परिवार की परंपरा और संबंधित आचार्य की विधि को प्राथमिकता देना बेहतर माना जाता है।

    वामांगी की यह अवधारणा अंततः पति पत्नी के रिश्ते में समान भागीदारी का संदेश देती है। पूजा में पत्नी की मौजूदगी यह दर्शाती है कि गृहस्थ जीवन और धार्मिक जिम्मेदारियों में दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि कई धार्मिक परंपराओं में पत्नी को केवल साथ बैठने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि पूजा के संकल्प और अनुष्ठान की सहभागी माना जाता है। इस नजरिए से देखें तो पति के बाईं ओर पत्नी का स्थान केवल बैठने की दिशा नहीं बल्कि प्रेम सम्मान साझेदारी और शिव शक्ति के संतुलन का प्रतीक बन जाता है। यही इस परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश माना जा सकता है।

  • नारायण की कृपा पाने का आसान तरीका, भगवान विष्णु को प्रिय हैं ये चीजें; पूजा में शामिल करते ही मिलेगा शुभ फल

    नारायण की कृपा पाने का आसान तरीका, भगवान विष्णु को प्रिय हैं ये चीजें; पूजा में शामिल करते ही मिलेगा शुभ फल


    नई दिल्ली। सनातन धर्म में भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु की पूजाLord Vishnu, Vishnu Puja, Hindu Religion, Lord Vishnu Bhog, Sanatan Dharma श्रद्धा और भक्ति के साथ करने से जीवन में सुख शांति और समृद्धि बनी रहती है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए भक्त अलग अलग प्रकार की पूजा सामग्री और भोग अर्पित करते हैं। माना जाता है कि नारायण को कुछ विशेष चीजें बेहद प्रिय हैं और पूजा के दौरान इनका इस्तेमाल करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त हो सकती है। हालांकि पूजा में सबसे महत्वपूर्ण चीज भक्त की श्रद्धा और सच्ची भावना को माना गया है।

    भगवान विष्णु को पीला रंग विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। यही वजह है कि उनकी पूजा में पीले फूल पीले वस्त्र और पीले रंग की मिठाई का इस्तेमाल किया जाता है। पूजा के दौरान भगवान विष्णु को पीले फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है। इसके साथ ही भक्त भगवान को पीले चंदन का तिलक भी लगा सकते हैं। धार्मिक मान्यता है कि पीले रंग का संबंध गुरु और ज्ञान से भी है इसलिए विष्णु पूजा में इसका विशेष महत्व बताया गया है।

    भगवान विष्णु को केले का फल भी प्रिय माना जाता है। पूजा में केले का भोग लगाया जा सकता है। कई स्थानों पर गुरुवार के दिन भगवान विष्णु के साथ केले के पेड़ की भी पूजा करने की परंपरा है। माना जाता है कि ऐसा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और परिवार में सुख समृद्धि का वातावरण मजबूत होता है।

    नारायण को पंचामृत का भोग भी अर्पित किया जाता है। दूध दही घी शहद और शक्कर से तैयार पंचामृत को धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता है। भगवान विष्णु की पूजा में पंचामृत अर्पित करने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा भी कई घरों में है। इसके अलावा तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय मानी जाती है। विष्णु पूजा में तुलसी दल अर्पित करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। मान्यता है कि तुलसी के बिना विष्णु पूजा को कई भक्त अधूरा मानते हैं।

    भगवान विष्णु को खीर और पीली मिठाइयों का भोग लगाने की भी परंपरा है। बेसन के लड्डू बूंदी के लड्डू या अन्य सात्विक मिठाइयां श्रद्धा के अनुसार अर्पित की जा सकती हैं। पूजा के बाद इस भोग को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बांटना शुभ माना जाता है।

    भगवान विष्णु की पूजा करते समय स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थान को स्वच्छ करें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर पीले फूल तुलसी दल फल और भोग अर्पित करें। विष्णु मंत्र का जाप करें और भगवान से परिवार की सुख शांति तथा कल्याण की प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए दिखावे से ज्यादा जरूरी मन की पवित्रता और सच्ची श्रद्धा है।

  • भोपाल में धीरेंद्र शास्त्री का बड़ा बयान राम मंदिर दान मामले की निष्पक्ष जांच की मांग इंडोनेशिया मॉडल का किया जिक्र

    भोपाल में धीरेंद्र शास्त्री का बड़ा बयान राम मंदिर दान मामले की निष्पक्ष जांच की मांग इंडोनेशिया मॉडल का किया जिक्र


    नई दिल्ली। भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने राम मंदिर से जुड़े दान विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस पूरे घटनाक्रम ने करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि भगवान राम के धाम से जुड़ा कोई भी मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं होता बल्कि यह पूरे सनातन समाज की भावनाओं और विश्वास से जुड़ा विषय है। उनके अनुसार यदि किसी ने भगवान के धाम में रहकर अनुचित कार्य किया है तो उसे कानून के साथ साथ ईश्वर का भी महादंड मिलेगा।

    उन्होंने कहा कि इस मामले की जांच पहले से विशेष जांच एजेंसियां और एसआईटी कर रही हैं इसलिए बिना तथ्यों के किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय जांच पूरी होने का इंतजार करना चाहिए। जब उनसे राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े आरोपों और कुछ नामों पर एफआईआर नहीं होने को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस मामले की पूरी जानकारी नहीं है इसलिए जांच एजेंसियों को निष्पक्ष तरीके से अपना काम करने देना चाहिए।

    धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कहा कि सनातन परंपरा से जुड़े लोगों के मन में इस पूरे प्रकरण को लेकर पीड़ा है। उन्होंने बताया कि विदेश यात्रा के दौरान भी उनसे इस विषय पर चर्चा हुई थी और उन्होंने इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में भी इस मुद्दे का उल्लेख किया था। उनके अनुसार भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणा का विषय है इसलिए इससे जुड़े मामलों में पारदर्शिता और विश्वास बनाए रखना जरूरी है।

    मंदिरों के प्रबंधन को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि देश में कुछ धर्म विरोधी ताकतें ऐसा माहौल तैयार कर रही हैं जिससे मंदिरों और संत समाज पर लगातार सवाल खड़े किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मंदिरों की सेवा और प्रबंधन ऐसे लोगों के हाथ में होना चाहिए जो पूरी निष्ठा के साथ सनातन परंपरा भगवान और धार्मिक मूल्यों के प्रति समर्पित हों। इससे मंदिरों की गरिमा और श्रद्धालुओं का विश्वास दोनों सुरक्षित रहेंगे।

    अपने संबोधन के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने भारत के मुसलमानों के संदर्भ में इंडोनेशिया का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी होने के बावजूद वहां धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समरसता देखने को मिलती है। उनके अनुसार वहां पांच वक्त की नमाज पढ़ने वाले लोग दीपावली जैसे त्योहार भी मनाते हैं और रामकथा जैसे धार्मिक आयोजनों में भी शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि भारत में भी सामाजिक सौहार्द और आपसी सम्मान की भावना को मजबूत करने की जरूरत है।

    धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री भोपाल में हबीबगंज स्थित कैंसर हीलर सेंटर के उद्घाटन कार्यक्रम में पहुंचे थे। इस अवसर पर उन्होंने आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की सराहना करते हुए कहा कि समय पर जांच और बेहतर इलाज से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। कार्यक्रम में चिकित्सा विशेषज्ञों समाजसेवियों जनप्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। आयोजकों के अनुसार यह सेंटर भोपाल सहित आसपास के जिलों के मरीजों को आधुनिक कैंसर उपचार की सुविधा उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

  • गरुड़ पुराण में बताई गईं ये 5 आदतें बना सकती हैं कंगाल! धनवान व्यक्ति भी हो सकता है आर्थिक संकट का शिकार

    गरुड़ पुराण में बताई गईं ये 5 आदतें बना सकती हैं कंगाल! धनवान व्यक्ति भी हो सकता है आर्थिक संकट का शिकार


    नई दिल्ली । सनातन परंपरा के महत्वपूर्ण ग्रंथों में शामिल Garuda Purana केवल मृत्यु और परलोक से जुड़े विषयों का ही वर्णन नहीं करता, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने वाले अनेक आचार-विचार भी सिखाता है। इसके आचार कांड में व्यक्ति के दैनिक व्यवहार, स्वच्छता, अनुशासन और सामाजिक आचरण को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुछ ऐसी आदतें हैं जो घर की समृद्धि को प्रभावित कर सकती हैं और आर्थिक परेशानियों का कारण बन सकती हैं।

    हालांकि इन बातों को धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के रूप में देखा जाता है, लेकिन इनमें से कई आदतें व्यवहारिक जीवन में भी अनुशासन और सकारात्मकता बनाए रखने की सीख देती हैं।

    सुबह देर तक सोना
    गरुड़ पुराण के अनुसार सूर्योदय के बाद भी लंबे समय तक सोते रहना शुभ नहीं माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि सुबह का समय सकारात्मक ऊर्जा और नए कार्यों की शुरुआत का समय होता है। देर तक सोने से आलस्य बढ़ता है और व्यक्ति के कार्यों की गति प्रभावित हो सकती है। इसी कारण शास्त्रों में ब्रह्म मुहूर्त में जागने की सलाह दी गई है।

    गंदे कपड़े पहनना और स्वच्छता की अनदेखी
    धार्मिक ग्रंथों में स्वच्छता को विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता है कि जहां साफ-सफाई होती है, वहां सुख और समृद्धि का वास होता है। गंदे कपड़े पहनना, नियमित स्नान न करना या घर में अव्यवस्था बनाए रखना नकारात्मकता को बढ़ावा देता है। यही कारण है कि घर और शरीर दोनों को स्वच्छ रखने पर जोर दिया गया है।

    रसोई में जूठे बर्तन छोड़ना
    रसोई को घर का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार रात में सिंक या रसोई में जूठे बर्तन छोड़ना शुभ नहीं माना जाता। कहा जाता है कि इससे घर में नकारात्मक वातावरण बन सकता है। इसलिए सोने से पहले रसोई को साफ-सुथरा रखने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है।

    दूसरों की निंदा और बेवजह क्रोध
    गरुड़ पुराण में दूसरों की बुराई करने, ईर्ष्या रखने और हर समय क्रोधित रहने की प्रवृत्ति को भी नुकसानदायक बताया गया है। ऐसी आदतें व्यक्ति के रिश्तों को प्रभावित करती हैं और घर का वातावरण अशांत बना सकती हैं। धार्मिक मान्यता है कि जहां कलह और तनाव अधिक होता है, वहां सुख-शांति लंबे समय तक नहीं टिकती।

    नाखून चबाने जैसी अशुभ आदतें
    ग्रंथ में दांतों से नाखून चबाने जैसी आदतों को भी अनुचित माना गया है। इसे अनुशासनहीनता और अस्वच्छ व्यवहार का प्रतीक माना जाता है। आधुनिक दृष्टिकोण से भी यह आदत स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं मानी जाती। इसलिए इसे छोड़ने की सलाह दी जाती है।

    जीवन में अनुशासन का महत्व
    गरुड़ पुराण की इन शिक्षाओं का मूल संदेश यही है कि व्यक्ति अपने जीवन में स्वच्छता, अनुशासन, सकारात्मक सोच और अच्छे व्यवहार को अपनाए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। वहीं व्यवहारिक दृष्टि से भी ये आदतें व्यक्ति के जीवन को व्यवस्थित और सफल बनाने में मदद कर सकती हैं।

  • सनातन धर्म क्यों कहलाता है शाश्वत? जानिए जीवन, कर्म और पुनर्जन्म से जुड़े इसके मूल सिद्धांत

    सनातन धर्म क्यों कहलाता है शाश्वत? जानिए जीवन, कर्म और पुनर्जन्म से जुड़े इसके मूल सिद्धांत


    नई दिल्ली । सनातन धर्म को भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा की आधारशिला माना जाता है। हजारों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी करोड़ों लोगों के जीवन का मार्गदर्शन कर रही है। सनातन शब्द का अर्थ ही है – जो सदैव बना रहे, जिसका न आदि हो और न अंत। यही कारण है कि सनातन धर्म को शाश्वत धर्म भी कहा जाता है।

    महामंडलेश्वर स्वामी आदित्य कृष्ण गिरि महाराज के अनुसार सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के संपूर्ण जीवन को दिशा देने वाला दर्शन है। उनके अनुसार यह धर्म जीवन के उन मूल प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करता है, जिनके बारे में प्रत्येक व्यक्ति कभी न कभी विचार करता है। जैसे मनुष्य इस संसार में क्यों आया है, उसके जीवन का उद्देश्य क्या है, उसे अपने कर्म कैसे करने चाहिए और जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग क्या है।

    सनातन परंपरा में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को मानव जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ माना गया है। इन सिद्धांतों के माध्यम से व्यक्ति को संतुलित और मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा दी जाती है। यही वजह है कि सनातन धर्म को केवल एक धार्मिक व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी माना जाता है।

    सनातन धर्म की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी उत्सव परंपरा भी है। वर्षभर में मनाए जाने वाले विभिन्न पर्व और त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति सम्मान और आध्यात्मिक उन्नति के अवसर भी प्रदान करते हैं। भारतीय संस्कृति में उत्सवों को जीवन में सकारात्मकता, ऊर्जा और सामूहिकता का प्रतीक माना गया है।

    पुनर्जन्म की अवधारणा भी सनातन दर्शन का एक महत्वपूर्ण अंग है। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इस मान्यता के अनुसार व्यक्ति के कर्म उसके भविष्य को प्रभावित करते हैं और आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से गुजरती है। मोक्ष को इस चक्र से मुक्ति की अंतिम अवस्था माना गया है।

    स्वामी आदित्य कृष्ण गिरि महाराज का कहना है कि सनातन धर्म प्रकृति के शाश्वत नियमों और जीवन के निरंतर परिवर्तन को स्वीकार करता है। ऋतुओं का बदलना, जीवन और मृत्यु का चक्र तथा सृष्टि के निरंतर परिवर्तन को यह धर्म प्राकृतिक सत्य के रूप में देखता है। इसी कारण यह परंपरा समय के साथ स्वयं को प्रासंगिक बनाए रखने में सक्षम रही है।

    धार्मिक विद्वानों के अनुसार सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता इसकी व्यापकता और समावेशी दृष्टिकोण है। यह विभिन्न विचारधाराओं, आध्यात्मिक मार्गों और उपासना पद्धतियों को स्थान देता है। यही कारण है कि हजारों वर्षों के इतिहास के बाद भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है और यह आज भी करोड़ों लोगों को जीवन के मूल्यों, कर्तव्यों और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखा रहा है।

    सनातन धर्म का मूल संदेश यही है कि मनुष्य अपने कर्मों, नैतिक मूल्यों और आत्मिक विकास के माध्यम से जीवन को श्रेष्ठ बना सकता है। यही विचार इसे एक शाश्वत और निरंतर प्रवाहित होने वाली परंपरा के रूप में स्थापित करते हैं।

  • गरुड़ पुराण का रहस्य: मृत्यु के बाद गहनों और सामान को लेकर क्या कहते हैं शास्त्र?

    गरुड़ पुराण का रहस्य: मृत्यु के बाद गहनों और सामान को लेकर क्या कहते हैं शास्त्र?


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में जीवन और मृत्यु दोनों को प्रकृति का शाश्वत सत्य माना गया है। जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के बाद किए जाने वाले संस्कारों का भी धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से वर्णन मिलता है। इन्हीं ग्रंथों में एक प्रमुख ग्रंथ गरुड़ पुराण है, जिसमें मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा, कर्मों के फल और अंतिम संस्कार से जुड़े अनेक नियमों का उल्लेख किया गया है।

    जब किसी व्यक्ति का निधन होता है, तब उसके अंतिम संस्कार के दौरान उपयोग में आने वाले कपड़े, बिस्तर और अन्य व्यक्तिगत वस्तुओं को प्रायः घर से बाहर कर दिया जाता है या दान कर दिया जाता है। हालांकि एक बात अक्सर लोगों के मन में सवाल पैदा करती है कि मृतक के गहनों को आमतौर पर सुरक्षित क्यों रखा जाता है। गरुड़ पुराण में इसके पीछे एक विशेष मान्यता का वर्णन मिलता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के बाद भी कुछ समय तक आत्मा का अपने जीवन से जुड़ी वस्तुओं और प्रिय लोगों के प्रति मोह बना रह सकता है। माना जाता है कि आभूषण ऐसी वस्तुएं होती हैं जिनसे व्यक्ति का भावनात्मक और व्यक्तिगत जुड़ाव अधिक होता है। इसी कारण गरुड़ पुराण में सलाह दी गई है कि मृतक के गहनों का तुरंत नियमित उपयोग नहीं करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इससे आत्मा का उन वस्तुओं के प्रति मोह बढ़ सकता है, जो उसकी आगे की यात्रा में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

    इसी वजह से कई परिवार मृतक के गहनों को संभालकर रखते हैं और उनका उपयोग लंबे समय तक नहीं करते। कुछ लोग धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार उन्हें शुद्धिकरण के बाद परिवार में सुरक्षित रखते हैं, जबकि कुछ लोग उन्हें दान करना अधिक उचित मानते हैं। मान्यता है कि यदि किसी को इन गहनों को घर में रखने में असहजता महसूस हो, तो उनका दान करना भी पुण्यदायी माना जाता है।

    गरुड़ पुराण में केवल गहनों ही नहीं, बल्कि मृतक द्वारा उपयोग की गई अन्य वस्तुओं के संबंध में भी निर्देश दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि मृत्यु के बाद व्यक्ति के कपड़े, चश्मा, हाथ की घड़ी, बिस्तर और दैनिक उपयोग की अन्य व्यक्तिगत वस्तुओं का उपयोग करने से बचना चाहिए। धार्मिक दृष्टि से इन वस्तुओं को दान करना या उचित तरीके से अलग कर देना बेहतर माना गया है।

    इसके अलावा सामान्य पुस्तकों को भी घर में न रखने की सलाह दी गई है, यदि उनका नियमित उपयोग मृतक द्वारा किया जाता था। हालांकि धार्मिक ग्रंथों के मामले में अलग व्यवस्था बताई गई है। मान्यता है कि धार्मिक पुस्तकों पर गंगाजल का छिड़काव कर उन्हें पुनः उपयोग में लाया जा सकता है। इसी प्रकार यदि मृतक की जन्म कुंडली मौजूद हो, तो उसे किसी पवित्र जल में प्रवाहित करने या पीपल के वृक्ष के नीचे मिट्टी में दबाने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।

    धार्मिक विद्वानों का मानना है कि ये मान्यताएं केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण ही नहीं बल्कि परिवार को मानसिक रूप से शोक से उबरने का अवसर देने का भी एक माध्यम हैं। हालांकि विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों में परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं, इसलिए इन विषयों में स्थानीय रीति-रिवाजों और पारिवारिक परंपराओं का भी विशेष महत्व माना जाता है।

  • सनातन धर्म पर बयान से सियासी घमासान, टीवीके विधायक वीएमएस मुस्तफा के समर्थन पर विवाद

    सनातन धर्म पर बयान से सियासी घमासान, टीवीके विधायक वीएमएस मुस्तफा के समर्थन पर विवाद


    नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजनीति में सनातन धर्म को लेकर दिए गए एक बयान ने एक बार फिर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन द्वारा दिए गए बयान को लेकर चर्चा तेज थी, जिसमें उन्होंने सनातन धर्म को समाप्त करने की बात कही थी। इसी बयान के समर्थन में टीवीके पार्टी के विधायक वीएमएस मुस्तफा के बयान ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया।

    वीएमएस मुस्तफा के बयान के बाद राज्य की राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई राजनीतिक दलों और संगठनों ने उनके बयान की कड़ी आलोचना की और इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया। मामला इतना बढ़ गया कि पार्टी नेतृत्व और सरकार को स्थिति स्पष्ट करने के लिए आगे आना पड़ा।

    विवाद के बीच टीवीके पार्टी की ओर से यह कहा गया कि पार्टी किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह सामाजिक असमानता और जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ अपनी विचारधारा रखती है। पार्टी के अनुसार, उनका उद्देश्य किसी धार्मिक आस्था का विरोध करना नहीं है, बल्कि समाज में समानता और न्याय की स्थापना करना है। इस बयान के जरिए यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की गई कि पार्टी सभी धर्मों का सम्मान करती है और किसी भी प्रकार की धार्मिक नफरत का समर्थन नहीं करती।

    हालांकि, राजनीतिक विरोध और सार्वजनिक आलोचना के बढ़ने के बाद वीएमएस मुस्तफा को अपने बयान पर सफाई देनी पड़ी। उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणी का उद्देश्य किसी धर्म का विरोध करना नहीं था, बल्कि सामाजिक व्यवस्था और असमानताओं पर अपनी राय व्यक्त करना था। उन्होंने यह भी कहा कि वह पेरियार ईवी रामासामी और डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा से प्रेरित सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का समर्थन करते हैं।

    बढ़ते विवाद को देखते हुए उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी सभी धर्मों का सम्मान करती है और किसी भी आस्था के खिलाफ नहीं है। सोशल मीडिया पर भी उन्होंने अपने बयान से जुड़े भ्रम को दूर करने की कोशिश की और कहा कि उनके शब्दों को गलत संदर्भ में लिया गया है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर धार्मिक और वैचारिक बहस को तेज कर दिया है। एक ओर जहां कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार की बहस के रूप में देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा माना जा रहा है।

    वीएमएस मुस्तफा का राजनीतिक सफर भी चर्चा में आ गया है, क्योंकि वह मदुरै सेंट्रल सीट से विधायक चुने गए हैं और इससे पहले भी सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। उनका यह बयान अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है, जिसने राज्य की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।