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  • अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच ईरान ने भारत से व्यापार बढ़ाने की अपील की, चाबहार बंदरगाह पर भी दिया अहम संकेत

    अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच ईरान ने भारत से व्यापार बढ़ाने की अपील की, चाबहार बंदरगाह पर भी दिया अहम संकेत

    नई दिल्ली ।अमेरिकी प्रतिबंधों और भुगतान संबंधी परेशानियों के बीच ईरान ने भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार जारी रखने और उसे विस्तार देने की अपील की है। भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहली ने भारतीय कारोबारियों से दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग बनाए रखने का आग्रह किया। उन्होंने स्वीकार किया कि प्रतिबंधों के कारण व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं, लेकिन ऊर्जा, कृषि और जरूरी वस्तुओं के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं अब भी मौजूद हैं।

    ईरान के पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल कारोबार से जुड़े भारतीय कारोबारियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण दबाव बढ़ा है। इसके साथ ही भुगतान संबंधी समस्याओं ने दोनों देशों के व्यापार को प्रभावित किया है। इन चुनौतियों के बावजूद ईरान भारत के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने के लिए व्यावहारिक विकल्प तलाशने पर जोर दे रहा है। फतहली के मुताबिक, दोनों देशों के बीच संपर्क जारी है और व्यापार को सुचारु बनाए रखने के उपायों पर चर्चा की जा रही है।

    बासमती चावल की आपूर्ति पर भी ईरान ने भरोसा दिलाया है। ईरान भारत से बासमती चावल और चाय खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। ऐसे में प्रतिबंधों और भुगतान में आ रही दिक्कतों के बीच इन उत्पादों की उपलब्धता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। फतहली ने भारतीय बासमती चावल समेत जरूरी वस्तुओं की किल्लत होने की आशंका को खारिज किया।

    ईरानी राजदूत के अनुसार, उनका देश संभावित आपूर्ति बाधाओं से निपटने की तैयारी कर चुका है और आयात के लिए उसके पास कई विकल्प मौजूद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान में कुछ वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हुई है, लेकिन इसके पीछे केवल आपूर्ति में कमी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। व्यापक आर्थिक दबाव भी कीमतों में बढ़ोतरी का एक कारण है।

    फतहली ने कहा कि ईरान लगभग 47 वर्षों से प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और इस दौरान उसने उनके प्रभाव को कम करने के तरीके विकसित किए हैं। उन्होंने नैनो टेक्नोलॉजी और बायोटेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में ईरान की प्रगति का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, ईरान की भौगोलिक स्थिति और उसके 15 पड़ोसी देश व्यापार तथा आर्थिक साझेदारी के लिए नए अवसर उपलब्ध कराते हैं। ईरान दूसरे देशों के साथ पारस्परिक लाभ वाले संबंध बनाए रखने के लिए व्यावहारिक समाधान तलाशता रहेगा।

    भारत और ईरान के कारोबार को अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव से बचाने के लिए किसी विशेष व्यवस्था की संभावना पर भी चर्चा हुई है। फतहली ने बताया कि भारतीय भागीदारों के साथ संपर्क जारी है। हालांकि, उन्होंने किसी अंतिम समझौते या नई व्यवस्था की घोषणा नहीं की। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे उपायों को तय करने और लागू करने के लिए विशेषज्ञ स्तर पर बातचीत तथा संबंधित पक्षों के बीच समन्वय जरूरी होगा।

    चाबहार बंदरगाह को लेकर भी ईरान ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। यह बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके माध्यम से अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने में मदद मिलती है। भारत के संचालन से संबंधित अमेरिकी प्रतिबंधों की छूट 26 अप्रैल को समाप्त होने के बाद परियोजना के भविष्य को लेकर सवाल उठे हैं।

    फतहली ने कहा कि ईरान चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके विकास में योगदान देने के इच्छुक किसी भी देश के निवेश और भागीदारी का स्वागत किया जाएगा। हालांकि, बंदरगाह से संबंधित आगे की व्यवस्था और भारत-ईरान व्यापार को प्रभावित करने वाली बाधाओं के समाधान के लिए बातचीत तथा समन्वय महत्वपूर्ण बने रहेंगे।

  • ट्रंप ने रूस-ईरान प्रतिबंध कानून पर किए हस्ताक्षर, भारत और चीन जैसे ऊर्जा खरीदार देशों पर बढ़ा अमेरिकी दबाव

    ट्रंप ने रूस-ईरान प्रतिबंध कानून पर किए हस्ताक्षर, भारत और चीन जैसे ऊर्जा खरीदार देशों पर बढ़ा अमेरिकी दबाव

    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान से जुड़े एचआर 5334 विधेयक पर 18 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया। इस कानून में रूस पर प्रतिबंधों, टैरिफ और अन्य पाबंदियों को लागू करने तथा उनका दायरा बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। साथ ही ईरान पर पहले से लागू प्रतिबंधों को आगे जारी रखने की व्यवस्था भी की गई है।

    ट्रंप के इस फैसले पर भारत में कांग्रेस की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई है। कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने कहा कि किसी धौंस जमाने वाले का मुकाबला करने का एक ही तरीका है और वह है मजबूती से उसका प्रतिरोध करना।

    नए कानून में रूस के ऊर्जा क्षेत्र को लेकर भी कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। इसमें रूस के ऊर्जा कारोबार और उससे जुड़े प्रमुख खरीदार देशों पर दबाव बढ़ाने की व्यवस्था है। रूस के साथ बड़े स्तर पर ऊर्जा व्यापार करने वाले देशों में भारत और चीन भी शामिल हैं।

    कानून के तहत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। इससे रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों के लिए अमेरिकी प्रतिबंध नीति का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि कानून पर हस्ताक्षर होने के साथ भारत पर तत्काल कोई नया टैरिफ लागू किए जाने की घोषणा नहीं हुई है।

    विधेयक में रूस के नेतृत्व, ऊर्जा क्षेत्र और रक्षा कारोबार से जुड़े नेटवर्क पर कार्रवाई के प्रावधान भी शामिल हैं। रूस के साथ रक्षा क्षेत्र में सहयोग करने वाले देशों और संस्थाओं पर दबाव बढ़ाने की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य रूस के आर्थिक और रणनीतिक नेटवर्क पर प्रतिबंधों का प्रभाव मजबूत करना है।

    कानून में रूस के ऊर्जा निर्यात से जुड़े नेटवर्क पर भी ध्यान दिया गया है। इसके जरिए प्रतिबंधों को दरकिनार करने वाली गतिविधियों पर कार्रवाई का रास्ता तैयार किया गया है। रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए टैरिफ और अन्य प्रतिबंधों का इस्तेमाल किए जाने की व्यवस्था की गई है।

    ईरान को लेकर भी कानून में महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। इसमें ईरान पर पहले से लागू प्रतिबंधों को आगे बढ़ाने की व्यवस्था की गई है। इस तरह रूस के साथ ईरान को लेकर भी अमेरिकी प्रतिबंध व्यवस्था को कानूनी आधार मिला है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने इस विधेयक को 16 सितंबर 2026 को मंजूरी दी थी। इसके बाद विधेयक को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा गया। 18 सितंबर को ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया।

    भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस के साथ उसका ऊर्जा कारोबार लंबे समय से जारी है। रूस भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। ऐसे में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर संभावित अमेरिकी टैरिफ का मुद्दा भारत के आर्थिक और ऊर्जा हितों से जुड़ता है।

    जयराम रमेश की प्रतिक्रिया के बाद यह मुद्दा भारत की राजनीतिक बहस में भी सामने आया है। नए कानून के तहत भारत पर तत्काल कोई नया शुल्क लागू किए जाने की घोषणा नहीं हुई है। हालांकि आगे अमेरिकी प्रशासन इस कानून के प्रावधानों का किस तरह इस्तेमाल करता है, इससे भारत समेत रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों पर संभावित प्रभाव स्पष्ट होगा।

  • रूस से तेल खरीद पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ का प्रावधान, भारत ने राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी

    रूस से तेल खरीद पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ का प्रावधान, भारत ने राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी

    नई दिल्ली । अमेरिकी संसद में रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाले विधेयक के पारित होने के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा नीति को लेकर स्पष्ट रुख सामने रखा है। भारत सरकार ने कहा है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और करीब 1.4 अरब लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तेल और गैस की खरीद जारी रखी जाएगी। सरकार के मुताबिक ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसले बदलती बाजार परिस्थितियों और उपलब्ध विकल्पों के आधार पर लिए जाएंगे।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 को 262 के मुकाबले 159 वोट से पारित किया। इससे पहले यह विधेयक अमेरिकी सीनेट से भी पारित हो चुका था। अब इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजा गया है। विधेयक राष्ट्रपति को रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क अपने आप लागू हो गया है। इसके लिए आगे राष्ट्रपति स्तर पर निर्णय और कानून में दिए गए प्रावधानों के तहत कार्रवाई जरूरी होगी।

    भारत ने कहा है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से तेल और गैस खरीदता रहेगा। सरकार का जोर ऊर्जा आपूर्ति में विविधता बनाए रखने और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार फैसले लेने पर है। इस रुख का उद्देश्य घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त और किफायती ऊर्जा उपलब्धता बनाए रखना है।

    भारत सरकार ने यह भी कहा कि हाल के महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है। भारत ने अपनी चिंताओं से अमेरिका को अवगत कराया है और कहा है कि प्रतिबंधों तथा संभावित टैरिफ का असर केवल द्विपक्षीय व्यापार संबंधों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

    विधेयक में रूस के ऊर्जा क्षेत्र के अलावा उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों पर भी प्रतिबंधात्मक प्रावधान शामिल हैं। इसका एक प्रमुख हिस्सा उन देशों को निशाना बनाने से जुड़ा है जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। भारत और चीन ऐसे प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं, इसलिए विधेयक के प्रावधानों को लेकर दोनों देशों पर विशेष ध्यान है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक पारित होने के बाद अब अगला महत्वपूर्ण चरण राष्ट्रपति की मंजूरी है। राष्ट्रपति की ओर से हस्ताक्षर किए जाने के बाद ही विधेयक कानून का रूप लेगा। इसके बाद इसमें दिए गए टैरिफ संबंधी अधिकारों के इस्तेमाल का रास्ता खुलेगा। कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में छूट या अन्य प्रावधानों की भी गुंजाइश रखी गई है।

    भारत ने अपने रुख में यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। संभावित प्रभावों से निपटने के लिए सरकार व्यापार और उद्योग जगत के साथ मिलकर स्थिति पर नजर रखेगी। फिलहाल भारत का मुख्य जोर ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने और अलग-अलग स्रोतों से खरीद के विकल्प बनाए रखने पर है।

  • अमेरिकी टैरिफ दबाव के बीच भारत का रुख स्पष्ट, ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं, जरूरत के मुताबिक तेल-गैस खरीद जारी

    अमेरिकी टैरिफ दबाव के बीच भारत का रुख स्पष्ट, ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं, जरूरत के मुताबिक तेल-गैस खरीद जारी

    नई दिल्ली ।अमेरिकी संसद में रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाले विधेयक के पारित होने के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा नीति को लेकर स्पष्ट रुख सामने रखा है। भारत सरकार ने कहा है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और करीब 1.4 अरब लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तेल और गैस की खरीद जारी रखी जाएगी। सरकार के मुताबिक ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसले बदलती बाजार परिस्थितियों और उपलब्ध विकल्पों के आधार पर लिए जाएंगे।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 को 262 के मुकाबले 159 वोट से पारित किया। इससे पहले यह विधेयक अमेरिकी सीनेट से भी पारित हो चुका था। अब इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजा गया है। विधेयक राष्ट्रपति को रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क अपने आप लागू हो गया है। इसके लिए आगे राष्ट्रपति स्तर पर निर्णय और कानून में दिए गए प्रावधानों के तहत कार्रवाई जरूरी होगी।

    भारत ने कहा है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से तेल और गैस खरीदता रहेगा। सरकार का जोर ऊर्जा आपूर्ति में विविधता बनाए रखने और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार फैसले लेने पर है। इस रुख का उद्देश्य घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त और किफायती ऊर्जा उपलब्धता बनाए रखना है।

    भारत सरकार ने यह भी कहा कि हाल के महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है। भारत ने अपनी चिंताओं से अमेरिका को अवगत कराया है और कहा है कि प्रतिबंधों तथा संभावित टैरिफ का असर केवल द्विपक्षीय व्यापार संबंधों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

    विधेयक में रूस के ऊर्जा क्षेत्र के अलावा उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों पर भी प्रतिबंधात्मक प्रावधान शामिल हैं। इसका एक प्रमुख हिस्सा उन देशों को निशाना बनाने से जुड़ा है जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। भारत और चीन ऐसे प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं, इसलिए विधेयक के प्रावधानों को लेकर दोनों देशों पर विशेष ध्यान है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक पारित होने के बाद अब अगला महत्वपूर्ण चरण राष्ट्रपति की मंजूरी है। राष्ट्रपति की ओर से हस्ताक्षर किए जाने के बाद ही विधेयक कानून का रूप लेगा। इसके बाद इसमें दिए गए टैरिफ संबंधी अधिकारों के इस्तेमाल का रास्ता खुलेगा। कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में छूट या अन्य प्रावधानों की भी गुंजाइश रखी गई है।

    भारत ने अपने रुख में यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। संभावित प्रभावों से निपटने के लिए सरकार व्यापार और उद्योग जगत के साथ मिलकर स्थिति पर नजर रखेगी। फिलहाल भारत का मुख्य जोर ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने और अलग-अलग स्रोतों से खरीद के विकल्प बनाए रखने पर है।

  • पश्चिम एशिया तनाव के बीच जेडी वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को बताया अधिक जिम्मेदार देश, दबाव बढ़ाने के संकेत

    पश्चिम एशिया तनाव के बीच जेडी वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को बताया अधिक जिम्मेदार देश, दबाव बढ़ाने के संकेत

    नई दिल्ली ।पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान को लेकर अमेरिकी रणनीति और चीन की संभावित भूमिका पर महत्वपूर्ण बयान दिया है। वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को अधिक जिम्मेदार देश बताते हुए कहा कि बीजिंग ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के अमेरिकी प्रयास में सहयोग के लिए तैयार है।

    अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट शुरू किया है। इस अभियान का उद्देश्य ईरान की आर्थिक गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों पर दबाव बढ़ाना बताया जा रहा है। ऐसे में चीन का सहयोग अमेरिकी रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि चीन ईरान के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक संबंध रखने वाले देशों में शामिल है।

    वेंस ने कहा कि चीन सरकार इस मामले में सहयोग करने के लिए तैयार है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अमेरिका और चीन के बीच कई नीतिगत मतभेद मौजूद हैं। इसके बावजूद उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संबंधों को सकारात्मक बताया।

    ईरान और चीन की तुलना करते हुए वेंस ने कहा कि चीन अंतरराष्ट्रीय विवादों में अपनी बात मनवाने के लिए वाणिज्यिक जहाजों पर उसी तरह गोलीबारी करने वाला देश नहीं है, जैसा अमेरिका ईरान के मामले में आरोप लगा रहा है। उनका बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में समुद्री मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी हुई है।

    वेंस के अनुसार तुर्किये, अजरबैजान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर और अन्य खाड़ी देश भी अलग-अलग स्तर पर अमेरिका की मदद कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कुछ देश सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति जाहिर नहीं करना चाहते, लेकिन निजी तौर पर वे वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों को लेकर ईरान पर दबाव बनाने के पक्ष में हैं।

    अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने ईरान के खिलाफ आगे की रणनीति को लेकर भी स्पष्ट संकेत दिए। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन के पास आर्थिक, सैन्य, राजनयिक और गुप्त उपायों सहित कई विकल्प मौजूद हैं। हालांकि उन्होंने इन विकल्पों की विस्तृत जानकारी देने से इनकार किया।

    वेंस ने कहा कि अमेरिकी प्रशासन अपनी योजनाओं को सार्वजनिक नहीं करेगा, क्योंकि ऐसा करने से राष्ट्रपति ट्रंप की निर्णय लेने की क्षमता सीमित हो सकती है। उनका कहना था कि राष्ट्रपति को परिस्थितियों के अनुसार फैसला लेने के लिए रणनीतिक गोपनीयता बनाए रखना जरूरी है।

    वेंस ने हालिया अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का बचाव करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान वहां वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाने वाली गतिविधियां बंद नहीं करता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के प्रमुख ऊर्जा परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां किसी भी लंबे समय तक व्यवधान से कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका रहती है। इसका असर एशिया और यूरोप सहित उन अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है जो पश्चिम एशिया से ऊर्जा आयात करती हैं।

    अमेरिका की ओर से चीन के सहयोग का दावा इस पूरे घटनाक्रम में विशेष महत्व रखता है। वाशिंगटन और बीजिंग के बीच व्यापार और रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद रहे हैं, लेकिन ईरान के खिलाफ दबाव अभियान में संभावित सहयोग पश्चिम एशिया की बदलती कूटनीतिक परिस्थितियों को दर्शाता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चीन वास्तव में अमेरिकी आर्थिक दबाव अभियान में किस स्तर तक सहयोग करता है और ईरान की प्रतिक्रिया क्या रहती है।

  • ईरान से तेल-पेट्रोकेमिकल डील पर US की बड़ी कार्रवाई: इंडिया-बेस्ड 4 कंपनियों पर प्रतिबंध, 3 भारतीय भी निशाने पर

    ईरान से तेल-पेट्रोकेमिकल डील पर US की बड़ी कार्रवाई: इंडिया-बेस्ड 4 कंपनियों पर प्रतिबंध, 3 भारतीय भी निशाने पर


    नई दिल्ली। ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल कारोबार को लेकर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। अमेरिकी ट्रेजरी ने 4 इंडिया-बेस्ड कंपनियों और 3 भारतीय नागरिकों पर प्रतिबंध लगाए हैं। इन कंपनियों पर ईरानी पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के कारोबार में शामिल होने का आरोप है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, संबंधित लेनदेन की कुल कीमत करीब 119 मिलियन डॉलर है।

    यह कार्रवाई ईरान के वित्तीय नेटवर्क पर दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका की ओर से चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा है। अमेरिकी ट्रेजरी का कहना है कि इसका उद्देश्य उन आर्थिक रास्तों को निशाना बनाना है, जिनका इस्तेमाल ईरान राजस्व जुटाने और अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए करता है।

    सदाशिव ओवरसीज पर 69 मिलियन डॉलर के आयात का आरोप
    अमेरिकी ट्रेजरी के अनुसार, इंडिया-बेस्ड सदाशिव ओवरसीज लिमिटेड ने फरवरी 2024 से जून 2025 के बीच करीब 69 मिलियन डॉलर के ईरानी पेट्रोलियम उत्पादों का आयात किया। इनमें कुछ शिपमेंट ऐसी कंपनी से जुड़े बताए गए हैं, जिस पर अमेरिका पहले ही प्रतिबंध लगा चुका है।

    इसके अलावा PP सॉफ्टटेक प्राइवेट लिमिटेड और प्रकृतिस इंफ्रा इम्पेक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड पर करीब 25-25 मिलियन डॉलर के ईरानी पेट्रोलियम उत्पादों के आयात का आरोप लगाया गया है। इन तीनों कंपनियों के कारोबार को मिलाकर कुल रकम करीब 119 मिलियन डॉलर बताई गई है।

    चौथी कंपनी पर पेट्रोकेमिकल शिपमेंट में मदद का आरोप
    अमेरिका ने पोर्टईज पार्टनर्स LLP पर भी कार्रवाई की है। आरोप है कि कंपनी ने ईरान से पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कई खेप भारत लाने में मदद की। अमेरिका ने कंपनियों के अलावा तीन भारतीय नागरिकों को भी प्रतिबंध सूची में शामिल किया है। इनमें PP सॉफ्टटेक के निदेशक प्रशांत गर्ग, पोर्टईज पार्टनर्स से जुड़े इदरीसमिया अशरफमिया शेख और हरीश रामचंद्र रंगी शामिल हैं।

    अमेरिका ने देशों को दी चेतावनी
    अमेरिका पहले ही विभिन्न देशों को चेतावनी दे चुका है कि वे ईरान को समर्थन देने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए तय समयसीमा का पालन करें। ऐसा नहीं करने पर संबंधित कंपनियों और संस्थाओं को भी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, इस अभियान का मकसद ईरान के उन आर्थिक रास्तों को बंद करना है, जिनके जरिए वह राजस्व हासिल करता है और अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने की कोशिश करता है।

  • सोने की कीमतों में सीमित दायरे में तेजी, एमसीएक्स पर 1.63 लाख रुपये के ऊपर कारोबार, चांदी में 542 रुपये की गिरावट

    सोने की कीमतों में सीमित दायरे में तेजी, एमसीएक्स पर 1.63 लाख रुपये के ऊपर कारोबार, चांदी में 542 रुपये की गिरावट

    नई दिल्ली ।घरेलू वायदा बाजार में मंगलवार को सोने और चांदी की कीमतों में मिला-जुला रुख देखने को मिला। सोने में सीमित दायरे में कारोबार के बीच मामूली बढ़त दर्ज की गई, जबकि चांदी की कीमत में गिरावट रही। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और ईरान को लेकर बढ़ते तनाव के बीच निवेशकों की नजर कीमती धातुओं के बाजार पर बनी हुई है।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर दोपहर 12 बजे अक्टूबर 2026 डिलीवरी वाला सोना 247 रुपये यानी 0.15 प्रतिशत की बढ़त के साथ 1,63,476 रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहा था। कारोबार के दौरान सोने ने 1,62,564 रुपये प्रति 10 ग्राम का निचला स्तर और 1,63,617 रुपये प्रति 10 ग्राम का ऊपरी स्तर दर्ज किया।

    सोने की कीमत में दिन के दौरान ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं देखा गया। इससे बाजार में फिलहाल सीमित दायरे में कारोबार का संकेत मिला। मंगलवार सुबह सोना पिछले कारोबारी सत्र के 1,63,229 रुपये प्रति 10 ग्राम के बंद भाव की तुलना में मामूली कमजोरी के साथ 1,63,015 रुपये प्रति 10 ग्राम पर खुला था। बाद में खरीदारी बढ़ने के साथ कीमत में सुधार हुआ और यह 1.63 लाख रुपये के स्तर को पार कर गया।

    दूसरी ओर चांदी के वायदा भाव में कमजोरी रही। सितंबर 2026 डिलीवरी वाली चांदी दोपहर तक 542 रुपये यानी 0.22 प्रतिशत की गिरावट के साथ 2,43,678 रुपये प्रति किलोग्राम पर कारोबार कर रही थी। दिन के कारोबार में चांदी ने 2,44,420 रुपये प्रति किलोग्राम का ऊपरी स्तर और 2,42,299 रुपये प्रति किलोग्राम का निचला स्तर छुआ।

    चांदी की शुरुआत भी पिछले बंद भाव की तुलना में कमजोर रही। इसका पिछला बंद भाव 2,44,220 रुपये प्रति किलोग्राम था, जबकि मंगलवार सुबह कारोबार की शुरुआत 2,42,299 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर हुई। इसके बाद कीमत में कुछ सुधार आया, लेकिन यह पिछले बंद स्तर से नीचे बनी रही।

    बाजार में सोने की मजबूती के पीछे अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ईरान पर अमेरिका के प्रतिबंधों और ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर सेकेंडरी सैंक्शन के खतरे ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ाई है। ऐसे माहौल में सुरक्षित निवेश के विकल्प के रूप में सोने की मांग को समर्थन मिल सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने की कीमत मजबूत बनी हुई थी। कॉमेक्स पर सोना 0.24 प्रतिशत की तेजी के साथ 4,708 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था। अंतरराष्ट्रीय कीमत का यह स्तर पिछले करीब तीन महीनों में सबसे ऊंचे स्तर के आसपास रहा। दूसरी ओर चांदी लगभग स्थिर रही और करीब 68 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करती दिखाई दी।

    कीमती धातुओं के बाजार में आगे की दिशा वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, भू-राजनीतिक घटनाक्रम और निवेशकों की धारणा से प्रभावित हो सकती है। सोने को सुरक्षित निवेश की मांग से समर्थन मिलता रहा तो इसकी कीमतों में मजबूती बनी रह सकती है। वहीं चांदी की चाल पर औद्योगिक मांग और वैश्विक बाजारों के संकेतों का भी असर पड़ सकता है।

    फिलहाल घरेलू बाजार की तस्वीर में सोना बढ़त के साथ और चांदी गिरावट के साथ कारोबार कर रही है। निवेशकों के लिए आने वाले कारोबारी सत्रों में अंतरराष्ट्रीय बाजार की दिशा और ईरान से जुड़े घटनाक्रम महत्वपूर्ण संकेतक बने रह सकते हैं।

  • महान एयर और आईआरजीसी को सहायता पहुंचाने के आरोप में चार देशों की छह संस्थाओं व व्यक्तियों पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू।

    महान एयर और आईआरजीसी को सहायता पहुंचाने के आरोप में चार देशों की छह संस्थाओं व व्यक्तियों पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू।

    नई दिल्ली। वैश्विक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर एक नया तनावपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका ने ईरान की शक्तिशाली सेना इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सहायता प्रदान करने के गंभीर आरोप में भारत, चीन, रूस और ईरान से जुड़ी छह संस्थाओं तथा व्यक्तियों पर कड़े प्रतिबंध लगाने की आधिकारिक घोषणा की है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा उठाए गए इस कदम का मुख्य उद्देश्य मध्य पूर्व क्षेत्र में ईरानी सैन्य गतिविधियों को मिलने वाले वित्तीय, तकनीकी और रसद संबंधी सहयोग को पूरी तरह से रोकना है।

    अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, इन प्रतिबंधों की मुख्य जद में वे अंतरराष्ट्रीय इकाइयां और कंपनियां आई हैं जो ईरान की विवादित विमानन सेवा ‘महान एयर’ को रसद तथा अन्य संसाधन उपलब्ध करा रही थीं। वाशिंगटन का आरोप है कि इस एयरलाइन का उपयोग लंबे समय से मध्य पूर्व के विभिन्न संघर्ष क्षेत्रों में हथियार, सैन्य कर्मियों और आधुनिक युद्ध उपकरणों के परिवहन के लिए किया जाता रहा है। इसके अतिरिक्त, टेक सेक्टर से जुड़ी संस्था डाडेनेगर स्टार्टअप स्टूडियो को भी प्रतिबंधित सूची में डाला गया है, जिस पर आईआरजीसी की फ्रंट कंपनी के रूप में काम करने और अमेरिकी व इजरायली रक्षा ठिकानों की निगरानी जानकारी जुटाने का आरोप है।

    यह दंडात्मक कार्रवाई अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के ‘ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल’ (ओएफएसी) द्वारा संशोधित कार्यकारी आदेश 13224 के तहत लागू की गई है। यह विशेष आदेश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवादी संगठनों, उनके सहयोगियों, समर्थकों और वित्तीय तंत्र को निशाना बनाने के लिए बनाया गया है। अमेरिकी नीति निर्माताओं ने स्पष्ट किया है कि आईआरजीसी और उससे जुड़े वैश्विक तंत्र को किसी भी प्रकार की सहायता प्रदान करने वाली विदेशी संस्थाओं को अमेरिकी वित्तीय बाजार से पूरी तरह से अलग कर दिया जाएगा।

    कार्रवाई के साथ ही अमेरिकी विदेश विभाग ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और निजी वैश्विक कंपनियों के लिए एक गंभीर चेतावनी भी जारी की है। इसमें विशेष रूप से महान एयर या अन्य किसी प्रतिबंधित ईरानी एयरलाइन के साथ वाणिज्यिक संबंध रखने वाली संस्थाओं को उनसे जुड़े गंभीर कानूनी, व्यावसायिक और वित्तीय जोखिमों के प्रति आगाह किया गया है। अमेरिकी विदेश नीति के अधिकारियों ने दोहराया कि वे उन सभी व्यक्तिगत और संस्थागत नेटवर्क की पहचान जारी रखेंगे जो क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने वाले सैन्य संगठनों को संसाधन उपलब्ध कराते हैं।

    उल्लेखनीय है कि महान एयर को सबसे पहले वर्ष 2011 में आईआरजीसी की विशेष ‘कुद्स फोर्स’ को तकनीकी और वित्तीय सहायता देने के कारण अमेरिकी प्रतिबंधों की सूची में शामिल किया गया था। वहीं, आईआरजीसी स्वयं कई वर्षों से अमेरिका की ओर से कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। चार प्रमुख देशों से जुड़ी संस्थाओं पर एक साथ हुई इस कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक क्षेत्र और वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।

  • ईरान समर्थित हमले के बाद ट्रंप का कड़ा संदेश, सैन्य जवाबी कार्रवाई के संकेतों से मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव

    ईरान समर्थित हमले के बाद ट्रंप का कड़ा संदेश, सैन्य जवाबी कार्रवाई के संकेतों से मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में लगातार बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान समर्थित समूहों की ओर से हुए हालिया हमले के बाद कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना ने आने वाली मिसाइलों को सफलतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया, लेकिन इस घटना के बाद अब अमेरिका की ओर से जवाबी कार्रवाई का समय आ गया है। ट्रंप के इस बयान ने क्षेत्र में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है।

    वाशिंगटन में एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि हालिया हमले में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की गई थी। उनके अनुसार अमेरिकी रक्षा प्रणाली ने सभी मिसाइलों को रास्ते में ही रोक दिया, जिससे किसी बड़े नुकसान की स्थिति नहीं बनी। उन्होंने अमेरिकी सैनिकों और रक्षा प्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि उनकी तत्परता के कारण संभावित खतरे को समय रहते टाल दिया गया।

    राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि अमेरिका इस तरह के हमलों को नजरअंदाज नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि जिन समूहों ने हमला किया है, उन्हें इसका परिणाम भुगतना होगा और अमेरिका आवश्यक होने पर सैन्य कार्रवाई करेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि भविष्य में बातचीत और समझौते की कोई संभावना बनती है तो उसके लिए भी दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हैं। इस बयान से यह संकेत मिला कि अमेरिका एक ओर सुरक्षा के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक विकल्पों को भी पूरी तरह खारिज नहीं कर रहा है।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिकी बलों को क्षेत्र से हटाने का फिलहाल कोई विचार नहीं है। उनके अनुसार मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और मौजूदा परिस्थितियों में उनकी तैनाती जारी रहेगी। उन्होंने भरोसा जताया कि अमेरिकी सेना किसी भी संभावित खतरे का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

    बयान के दौरान ट्रंप ने ईरान को संभावित हथियार आपूर्ति से जुड़ी खबरों पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यदि किसी तीसरे देश के माध्यम से ईरान को बड़े पैमाने पर हथियार उपलब्ध कराए जाते हैं तो यह चिंताजनक होगा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस विषय पर उन्हें पहले सकारात्मक आश्वासन मिल चुके हैं और उन्हें उम्मीद है कि क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाने वाले कदम नहीं उठाए जाएंगे।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने की भी वकालत की। उन्होंने कांग्रेस से आग्रह किया कि मौजूदा प्रतिबंधों के अलावा अतिरिक्त आर्थिक उपायों पर भी विचार किया जाए। उनका मानना है कि आर्थिक और कूटनीतिक दबाव के साथ-साथ सुरक्षा संबंधी रणनीति अपनाना आवश्यक हो सकता है।

    इस दौरान ट्रंप ने यूक्रेन संकट का भी उल्लेख किया और कहा कि उनकी इच्छा युद्ध को समाप्त करने की है। उन्होंने दोनों पक्षों के साथ संवाद की आवश्यकता पर बल देते हुए उम्मीद जताई कि कूटनीतिक प्रयास आगे भी जारी रहेंगे। हालांकि उनका मुख्य फोकस मध्य पूर्व की मौजूदा स्थिति और अमेरिकी सुरक्षा हितों पर रहा।

    हाल के दिनों में ईरान समर्थित समूहों और क्षेत्र में तैनात अमेरिकी बलों के बीच कई घटनाएं सामने आई हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ी हैं। अमेरिका पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि उसके सैनिकों और सैन्य प्रतिष्ठानों पर किसी भी हमले का जवाब दिया जाएगा। ऐसे में ट्रंप का ताजा बयान यह संकेत देता है कि आने वाले दिनों में क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और अधिक संवेदनशील बनी रह सकती है।

  • भारत के लिए राहतभरा कदम, अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों को प्रतिबंध सूची से हटाया, व्यापारिक गतिविधियों को मिलेगी नई गति

    भारत के लिए राहतभरा कदम, अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों को प्रतिबंध सूची से हटाया, व्यापारिक गतिविधियों को मिलेगी नई गति

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के आर्थिक एवं रणनीतिक संबंधों के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों को अपनी प्रतिबंध सूची से हटा दिया है। इन कंपनियों पर पहले रूस से जुड़े सैन्य-औद्योगिक नेटवर्क को उन्नत तकनीक और उपकरणों की आपूर्ति करने के आरोप लगाए गए थे। अब प्रतिबंध हटने के बाद इन कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय कारोबारी गतिविधियों को सामान्य रूप से आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।

    प्रतिबंध सूची से हटाई गई कंपनियों में हैदराबाद की आरआरजी इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड और लोकेश मशीन्स लिमिटेड, अहमदाबाद की गैलेक्सी बियरिंग्स तथा नई दिल्ली की शौर्य एयरोनॉटिक्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं। इन सभी कंपनियों के नाम अब अमेरिकी प्रतिबंधित संस्थाओं की सूची से हटा दिए गए हैं, जिससे उनके अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेनदेन पर लगी बाधाएं समाप्त हो गई हैं।

    इन कंपनियों पर पहले विभिन्न प्रकार के औद्योगिक उपकरण, मशीन टूल्स, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स, रोलर बियरिंग्स तथा अन्य दोहरे उपयोग वाली तकनीकों के निर्यात से जुड़े आरोप लगाए गए थे। अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि इन उत्पादों का उपयोग रूस के सैन्य-औद्योगिक ढांचे में किया जा सकता है। इन्हीं आरोपों के आधार पर वर्ष 2024 में इनके खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई थी।

    प्रतिबंध लगने के बाद संबंधित कंपनियों के लिए कई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और कारोबारी लेनदेन प्रभावित हुए थे। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में काम करने वाली कंपनियों के लिए ऐसी कार्रवाई का सीधा असर निर्यात, बैंकिंग सेवाओं और विदेशी साझेदारियों पर पड़ता है। अब प्रतिबंध हटने से इन कंपनियों को वैश्विक बाजार में फिर से सामान्य कारोबारी अवसर मिलने की संभावना बढ़ गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग और विश्वास का संकेत भी माना जा सकता है। दोनों देश रक्षा, प्रौद्योगिकी, विनिर्माण और व्यापार सहित कई क्षेत्रों में लगातार सहयोग बढ़ा रहे हैं। ऐसे में प्रतिबंध हटने से उद्योग जगत को सकारात्मक संदेश मिलने की उम्मीद है।

    हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने इस फैसले के साथ यह स्पष्ट किया है कि निर्यात नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से जुड़े नियमों का पालन सभी कंपनियों के लिए अनिवार्य रहेगा। वैश्विक व्यापार में संवेदनशील तकनीकों और दोहरे उपयोग वाले उपकरणों के निर्यात पर विभिन्न देशों की निगरानी पहले की तरह जारी रहेगी।

    उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम भारतीय कंपनियों के लिए राहत लेकर आया है और भविष्य में दोनों देशों के बीच औद्योगिक सहयोग, निवेश और उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्र में साझेदारी को भी नई गति मिल सकती है। साथ ही यह निर्णय उन भारतीय निर्यातकों के लिए भी सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, जो वैश्विक बाजार में अपनी उपस्थिति लगातार मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे हैं।