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  • रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों की सेहत से जुड़ी चिंता बढ़ी, ऑडिट में दूषित पानी और स्वच्छता व्यवस्था की खामियां उजागर

    रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों की सेहत से जुड़ी चिंता बढ़ी, ऑडिट में दूषित पानी और स्वच्छता व्यवस्था की खामियां उजागर

    नई दिल्ली ।रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को उपलब्ध कराई जाने वाली बुनियादी सुविधाओं को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट ने गंभीर कमियां उजागर की हैं। रिपोर्ट में देश के कई गैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशनों पर पेयजल की गुणवत्ता, स्वच्छता और यात्री सुविधाओं के मानकों का पर्याप्त पालन नहीं होने की बात सामने आई है। जांच के दौरान कुछ स्टेशनों के वाटर कूलर और नलों के पानी में ई-कोलाई तथा टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए।

    यह ऑडिट वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच देश के 512 गैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशनों पर किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक रेलवे बोर्ड ने यात्रियों के लिए पेयजल, शौचालय, बैठने की जगह और अन्य सुविधाओं को लेकर नियम और दिशा-निर्देश निर्धारित किए थे, लेकिन कई क्षेत्रीय रेलवे जोन में इनका प्रभावी पालन नहीं हुआ।

    जांच में छह अलग-अलग रेलवे जोन के 59 स्टेशनों पर पेयजल की बैक्टीरियोलॉजिकल जांच तक नहीं कराए जाने की बात सामने आई। जिन स्टेशनों के पानी के नमूनों की जांच हुई, उनमें भी कुछ स्थानों पर गुणवत्ता मानकों से जुड़ी गंभीर समस्याएं मिलीं।

    मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, कल्याण, लोनावाला और भिवंडी रोड जैसे स्टेशनों के वाटर कूलर से लिए गए नमूनों में ई-कोलाई की मौजूदगी पाई गई। दक्षिण रेलवे के कोयंबटूर और पलक्कड़ जंक्शन तथा दक्षिण मध्य रेलवे के हैदराबाद स्टेशन के पेयजल नमूनों में भी ई-कोलाई पाया गया।

    पूर्वी रेलवे के मधुपुर स्टेशन का पानी भी गुणवत्ता जांच में मानकों पर खरा नहीं उतरा। इसके अलावा अलग-अलग वर्षों में कई रेलवे जोन के अनेक स्टेशनों के प्लेटफॉर्म पर लगे नलों के पानी में टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए जाने की जानकारी रिपोर्ट में दी गई है। ऐसे बैक्टीरिया दूषित जल की ओर संकेत करते हैं और इनके कारण संक्रमण तथा पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

    रिपोर्ट में रेलवे स्टेशनों के शौचालयों और अन्य सुविधाओं की स्थिति पर भी चिंता जताई गई है। यात्री सुविधाओं से संबंधित आंकड़ों के अनुसार 2,035 स्टेशनों पर पानी के नलों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। वहीं 403 स्टेशनों पर जरूरत के मुताबिक मूत्रालय और 201 स्टेशनों पर निर्धारित मानकों के अनुसार शौचालय उपलब्ध नहीं पाए गए।

    रेलवे बोर्ड ने अप्रैल 2018 में सभी स्टेशनों पर न्यूनतम आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। इनमें पेयजल, बैठने की व्यवस्था, शेड, शौचालय, पंखे, फुट ओवर ब्रिज और यात्री सूचना बोर्ड जैसी सुविधाएं शामिल थीं। हालांकि ऑडिट में शामिल 512 स्टेशनों में से 458 पर ये सुविधाएं या तो उपलब्ध नहीं थीं या निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थीं।

    रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि न्यू दिल्ली, हावड़ा, सियालदह, मुंबई सेंट्रल और छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस जैसे प्रमुख स्टेशनों पर भी कुछ आवश्यक सुविधाएं पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं थीं या उनकी स्थिति संतोषजनक नहीं थी। इनमें सीटें, पंखे, वाटर कूलर, डस्टबिन और ट्रेन सूचना डिस्प्ले जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

    कैग ने रेलवे प्रशासन को पेयजल और स्वच्छता व्यवस्था में तत्काल सुधार करने की जरूरत बताई है। साथ ही जल आपूर्ति तंत्र की नियमित निगरानी और पानी की गुणवत्ता की व्यवस्थित जांच सुनिश्चित करने की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट का उद्देश्य यात्रियों को सुरक्षित पेयजल और निर्धारित मानकों के अनुरूप बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था को मजबूत करना है।

  • ट्रेन स्वच्छता पर नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट उजागर, टॉयलेट की बदबू और रखरखाव में कमियां आईं सामने।

    ट्रेन स्वच्छता पर नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट उजागर, टॉयलेट की बदबू और रखरखाव में कमियां आईं सामने।

    ई दिल्ली । भारतीय रेलवे की सफाई व्यवस्था, डिब्बों के रखरखाव और बायो-टॉयलेट प्रबंधन पर नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक अर्थात कैग की नवीनतम रिपोर्ट में गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। संसद में प्रस्तुत की गई इस रिपोर्ट के अनुसार, ट्रेन यात्रा के दौरान मिलने वाली ऑन-बोर्ड स्वच्छता सेवाओं से लगभग पचास प्रतिशत यात्री असंतुष्ट हैं। लंबी दूरी का सफर तय करने वाले यात्रियों को टॉयलेट में जलभराव, बदबू और सफाई कर्मियों की अनुपस्थिति जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

    रिपोर्ट में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि रेलवे द्वारा प्रतिवर्ष स्वच्छता और रखरखाव के लिए पर्याप्त बजटीय आवंटन किया जाता है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन और वित्तीय अनुशासन में कई खामियां देखी गई हैं। ऑडिट टीम को रेलवे प्रशासन द्वारा ऐसा कोई स्पष्ट और पारदर्शी लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं कराया जा सका, जिससे यह सटीक जानकारी मिल सके कि आवंटित बजट का कितना हिस्सा वास्तव में सफाई कार्यों पर व्यय किया गया।

    वित्तीय प्रक्रियाओं और ठेकेदारों के नियमन को लेकर भी रिपोर्ट में लापरवाही की बात कही गई है। नियमों का उल्लंघन करने वाले ठेकेदारों पर लगाए गए जुर्माने या राशि कटौती का कोई केंद्रीय डेटाबेस या पारदर्शी रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया जा सका। हालांकि रेलवे प्रशासन ने ठेकेदारों पर दंडात्मक कार्रवाई का दावा किया, किंतु ऑडिट प्रक्रिया के दौरान इस संबंध में कोई ठोस साक्ष्य या वित्तीय विवरण जमा नहीं कराए जा सके।

    सर्वेक्षण के आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि चालीस प्रतिशत से अधिक रेल यात्रियों ने ट्रेनों के टॉयलेट में बदबू और पानी के भराव की समस्या पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। इसके अतिरिक्त, पचास प्रतिशत से अधिक यात्रियों ने ऑन-बोर्ड हाउसकीपिंग सेवाओं के सुचारू रूप से कार्य न करने की शिकायत की है। ट्रेन डिब्बों की अत्याधुनिक और स्वचालित धुलाई के लिए स्वीकृत परियोजनाओं की गति भी अत्यंत धीमी पाई गई है।

    कैग की इस रिपोर्ट में झांसी और ग्वालियर जैसे प्रमुख रेल मंडलों का भी संदर्भ देखने को मिलता है, जहां ऑटोमेटिक कोच वाशिंग प्लांट स्थापित करने के लिए बजट स्वीकृत होने के पश्चात भी परियोजनाएं लंबित पाई गईं। मध्य प्रदेश सहित देश भर के रेल यात्रियों की सुविधाओं और स्वास्थ्य सुरक्षा को देखते हुए यह रिपोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कैग ने रेल मंत्रालय को वित्तीय पारदर्शिता और जमीनी क्रियान्वयन को सुदृढ़ करने के निर्देश दिए हैं।

    विमानन और रेल सेवाओं के तुलनात्मक अध्ययन में यात्रियों की मूल सुविधाओं का ध्यान रखना सर्वोपरि माना गया है। कैग की इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि रेलवे प्रशासन ठेकेदारों की जवाबदेही तय करने, ऑन-बोर्ड सफाई कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और बायो-टॉयलेट के नियमित रख-रखाव के लिए नई कार्ययोजना लागू करेगा ताकि यात्रा के अनुभव में सुधार किया जा सके।

  • राजस्थान में 24 हजार से अधिक सफाई कर्मचारी भर्ती, बिना परीक्षा लॉटरी से होगा चयन, 15 अगस्त से शुरू होंगे आवेदन

    राजस्थान में 24 हजार से अधिक सफाई कर्मचारी भर्ती, बिना परीक्षा लॉटरी से होगा चयन, 15 अगस्त से शुरू होंगे आवेदन


    नई दिल्ली ।
    राजस्थान सरकार ने राज्य के विभिन्न नगरीय निकायों में बड़े स्तर पर सफाई कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया है। इस भर्ती अभियान के तहत राज्य के 183 नगरीय निकायों में 24 हजार से अधिक संविदा सफाई कर्मचारी पदों को भरा जाएगा। भर्ती की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि अभ्यर्थियों को किसी भी प्रकार की लिखित परीक्षा या साक्षात्कार से नहीं गुजरना होगा। पात्र उम्मीदवारों का चयन लॉटरी प्रणाली के माध्यम से किया जाएगा, जिससे पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और सरल बनाने का प्रयास किया गया है।

    इस भर्ती के लिए किसी भी प्रकार की शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं रखी गई है। इसका उद्देश्य उन लोगों को भी रोजगार का अवसर उपलब्ध कराना है, जिन्होंने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की है लेकिन सफाई कार्य का व्यावहारिक अनुभव रखते हैं। हालांकि, आवेदन करने वाले उम्मीदवार के पास कम से कम एक वर्ष का सफाई कार्य का अनुभव होना आवश्यक होगा। यह अनुभव लगातार या अलग-अलग अवधि में प्राप्त किया गया हो सकता है, लेकिन इसके समर्थन में सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध अनुभव प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य रहेगा।

    भर्ती प्रक्रिया में संबंधित नगरीय निकाय में पहले से सफाई कार्य का अनुभव रखने वाले अभ्यर्थियों को प्राथमिकता दी जाएगी। यदि किसी निकाय में पर्याप्त पात्र उम्मीदवार उपलब्ध नहीं होते हैं तो राजस्थान के अन्य नगरीय निकायों में कार्य कर चुके योग्य अभ्यर्थियों को भी चयन प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा। प्रत्येक नगरीय निकाय के लिए अलग-अलग लॉटरी आयोजित की जाएगी, जिससे स्थानीय स्तर पर रिक्त पदों के अनुसार चयन सुनिश्चित किया जा सके।

    आवेदन करने के लिए अभ्यर्थी का राजस्थान का स्थायी निवासी होना आवश्यक है। इसके साथ ही उम्मीदवार का शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होना भी जरूरी होगा ताकि वह सफाई कार्य की जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर सके। भर्ती नियमों के अनुसार प्रत्येक अभ्यर्थी केवल 183 नगरीय निकायों में से किसी एक के लिए ही आवेदन कर सकेगा। एक से अधिक निकायों के लिए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

    आयु सीमा की बात करें तो उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और अधिकतम आयु 40 वर्ष निर्धारित की गई है। आयु की गणना 1 जनवरी 2027 को आधार मानकर की जाएगी। आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों को राज्य सरकार के प्रचलित नियमों के अनुसार अधिकतम आयु सीमा में नियमानुसार छूट प्रदान की जाएगी।

    भर्ती के लिए आवेदन शुल्क भी श्रेणी के अनुसार तय किया गया है। सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को 600 रुपये आवेदन शुल्क देना होगा, जबकि आरक्षित वर्ग और दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए शुल्क 400 रुपये निर्धारित किया गया है। आवेदन शुल्क का भुगतान ऑनलाइन माध्यम से किया जाएगा और आवेदन तभी पूर्ण माना जाएगा जब निर्धारित शुल्क सफलतापूर्वक जमा हो जाएगा।

    ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 15 अगस्त 2026 से शुरू होगी। इच्छुक एवं पात्र उम्मीदवार निर्धारित भर्ती पोर्टल पर जाकर आवेदन पत्र भर सकेंगे। आवेदन के दौरान आवश्यक दस्तावेज, अनुभव प्रमाण पत्र और अन्य जरूरी जानकारी अपलोड करनी होगी। निर्धारित प्रक्रिया पूरी करने और शुल्क जमा करने के बाद आवेदन स्वीकार किया जाएगा। इस भर्ती अभियान के माध्यम से राज्य के नगरीय निकायों में सफाई व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ बड़ी संख्या में पात्र अभ्यर्थियों को रोजगार का अवसर मिलने की उम्मीद है।

  • डंपिंग यार्ड नहीं तो कचरा कहां जाए? विदिशा में नगर पालिका और रहवासियों के बीच बढ़ा विवाद

    डंपिंग यार्ड नहीं तो कचरा कहां जाए? विदिशा में नगर पालिका और रहवासियों के बीच बढ़ा विवाद


    विदिशा । विदिशा शहर में कचरा निस्तारण की समस्या अब गंभीर संकट का रूप ले चुकी है। स्थायी डंपिंग यार्ड नहीं होने के कारण नगर पालिका के सामने रोजाना शहर से निकलने वाले कचरे के निपटान की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। हालात ऐसे हैं कि जहां भी कचरा डंप करने की कोशिश की जाती है, वहां स्थानीय लोगों का विरोध शुरू हो जाता है। रविवार को भी हर्ष विहार कॉलोनी में ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जब रहवासियों ने कचरा लेकर पहुंचे नगर पालिका के वाहनों को रोक दिया और इलाके में कचरा डालने का विरोध किया।

    रहवासियों का कहना है कि कॉलोनी के पास कचरा डंप होने से पूरे क्षेत्र में तेज दुर्गंध फैल रही है। मक्खियों और मच्छरों की संख्या बढ़ने से संक्रमण और बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। लोगों का आरोप है कि बदबू के कारण घरों में रहना मुश्किल हो गया है और बच्चे, बुजुर्ग तथा मवेशी सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। उनका कहना है कि घरों में भोजन करना भी मुश्किल हो गया है। स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि विरोध करने पर नगर पालिका कर्मचारियों द्वारा एफआईआर कराने की धमकी दी जा रही है।

    दरअसल, जिला प्रशासन ने पहले सोठिया गांव के पास डंपिंग यार्ड के लिए जमीन उपलब्ध कराई थी, लेकिन ग्रामीणों के विरोध के चलते वहां कचरा डालने की व्यवस्था बंद करनी पड़ी। इसके बाद नगर पालिका ने जतरापुरा और मिर्जापुर की खंतियों का विकल्प चुना, लेकिन लगातार बारिश के कारण वहां तक पहुंचने का रास्ता बंद हो गया। नतीजतन शहर से कचरा उठाने की व्यवस्था भी प्रभावित होने लगी और कचरे से भरे ट्रैक्टर-ट्रॉली तथा डंपर नगर पालिका परिसर में ही खड़े रहने लगे।

    इसके बाद नगर पालिका ने सुआखेड़ी, गेहूंखेड़ी और फिर डाबर रोड स्थित एक खंती में कचरा डालने का प्रयास किया, लेकिन हर स्थान पर ग्रामीणों और स्थानीय रहवासियों ने विरोध दर्ज कराया। इससे स्पष्ट हो गया कि शहर में कचरा निस्तारण की समस्या अब केवल सफाई व्यवस्था तक सीमित नहीं रही, बल्कि सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चिंता का विषय भी बन गई है।

    नगर पालिका का कहना है कि डाबर रोड स्थित खंती के मालिक बंटी रघुवंशी की सहमति से वहां कचरा डाला जा रहा है। कर्मचारियों के अनुसार खंती में कचरा डालने के बाद उसे हाइड्रा मशीन से दबाकर ऊपर मिट्टी की परत डाली जा रही है, ताकि दुर्गंध और प्रदूषण न फैले। उनका दावा है कि कचरा खुले मैदान में नहीं फेंका जा रहा, बल्कि केवल खंती को भरने का काम किया जा रहा है। इसके बावजूद स्थानीय लोगों ने कचरा वाहनों को वहां तक पहुंचने नहीं दिया।

    खंती के मालिक बंटी रघुवंशी का कहना है कि बरसात के दौरान उनकी करीब एक बीघा की खंती पानी से भर जाती है, जिससे दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। इसी कारण उन्होंने खंती भरवाने की अनुमति दी है। वहीं नगर पालिका का सवाल है कि जब हर स्थान पर विरोध हो रहा है, तो शहर से रोज निकलने वाले कचरे का निस्तारण आखिर कहां किया जाए। अब यह मामला केवल सफाई व्यवस्था का नहीं, बल्कि शहर के लिए स्थायी डंपिंग यार्ड विकसित करने की तत्काल आवश्यकता का संकेत बन गया है।

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  • क्या बाथरूम की छोटी-छोटी गलतियां रोक रही हैं आपकी तरक्की? वास्तु के इन नियमों को अपनाकर घर में बढ़ा सकते हैं सकारात्मक ऊर्जा और संतुलन

    क्या बाथरूम की छोटी-छोटी गलतियां रोक रही हैं आपकी तरक्की? वास्तु के इन नियमों को अपनाकर घर में बढ़ा सकते हैं सकारात्मक ऊर्जा और संतुलन

    नई दिल्ली । गृह निर्माण और आंतरिक साज-सज्जा में वास्तु शास्त्र के नियमों का विशेष महत्व होता है। सामान्यतः लोग अपने शयनकक्ष या बैठक की व्यवस्था पर तो पर्याप्त ध्यान देते हैं, लेकिन स्नानघर अथवा बाथरूम की स्थिति को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं। ज्योतिष एवं प्राचीन भारतीय वास्तुकला विशेषज्ञों के अनुसार, घर के प्रत्येक हिस्से की अपनी एक विशिष्ट ऊर्जा होती है। बाथरूम की गलत दिशा, वहां फैली गंदगी या अनुपयोगी वस्तुओं का जमावड़ा पूरे परिवार की आर्थिक उन्नति, मानसिक शांति और स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। पारिवारिक समृद्धि और जीवन में सकारात्मक बदलाव सुनिश्चित करने के लिए दैनिक जीवन की इन छोटी किंतु महत्वपूर्ण आदतों में सुधार करना अत्यंत आवश्यक माना गया है।

    वास्तु सिद्धांतों के अनुसार, भवन में बाथरूम के निर्माण के लिए सबसे उपयुक्त और शुभ दिशा उत्तर या उत्तर-पश्चिम यानी वायव्य कोण मानी गई है। इसके विपरीत, दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्नेय कोण या फिर घर के बिल्कुल मध्य भाग जिसे ब्रह्मस्थान कहा जाता है, वहां भूलकर भी बाथरूम का निर्माण नहीं करना चाहिए। दक्षिण दिशा में स्थित बाथरूम न केवल परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि निरंतर रहने वाले मानसिक तनाव का कारण भी बनता है। इसके साथ ही, खिड़कियों और वेंटिलेशन की सही व्यवस्था न होने से उत्पन्न होने वाला अंधकार भी नकारात्मकता को बढ़ावा देता है, इसलिए वहां हमेशा पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था होनी चाहिए।

    प्राचीन मान्यताओं के अनुसार जल के अनियंत्रित प्रवाह को सीधे तौर पर धन की हानि से जोड़कर देखा जाता है। यदि बाथरूम का कोई नल अथवा पाइपलाइन लगातार टपक रही है, तो इसे केवल पानी की बर्बादी नहीं बल्कि संचित धन के धीरे-धीरे नष्ट होने का स्पष्ट सूचक माना जाता है। ऐसे तकनीकी दोषों को बिना किसी विलंब के तुरंत ठीक कराया जाना चाहिए ताकि वित्तीय स्थिरता प्रभावित न हो। इसके अतिरिक्त, स्नान के पश्चात पूरे फर्श को अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए क्योंकि सीलन, अत्यधिक नमी और जलभराव के कारण उत्पन्न होने वाले दोष घर के भीतर नकारात्मक ऊर्जा के संचरण को तीव्र कर देते हैं।

    बाथरूम के भीतर साफ-सफाई और अनुशासन का अभाव भी दरिद्रता को आमंत्रित करता है। अक्सर लोग टूटी हुई बाल्टी, खाली प्लास्टिक की बोतलें, या अनुपयोगी सौंदर्य प्रसाधनों की सामग्रियां वहीं छोड़ देते हैं, जो वास्तु सम्मत नहीं है। उपयोग के उपरांत बाथरूम के मुख्य द्वार को हमेशा बंद रखना अनिवार्य है, क्योंकि खुला हुआ द्वार वहां की दूषित ऊर्जा को घर के अन्य कमरों में फैलने का अवसर देता है। दर्पण की स्थिति भी इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बाथरूम का शीशा कभी भी प्रवेश द्वार के ठीक सामने नहीं लगाना चाहिए, अन्यथा वहां से निकलने वाली नकारात्मक तरंगें परावर्तित होकर संपूर्ण गृह क्षेत्र को प्रभावित करती हैं।

    घर की सुख-शांति को बनाए रखने और दूषित प्रभावों को बेअसर करने के लिए वास्तुकला में कुछ बेहद सरल उपाय भी सुझाए गए हैं। इसके अंतर्गत, एक छोटी कांच की कटोरी में समुद्री अथवा सेंधा नमक भरकर बाथरूम के किसी सुरक्षित कोने में स्थापित किया जा सकता है। माना जाता है कि नमक में वातावरण की अशुद्धियों और नकारात्मकता को अवशोषित करने की अद्भुत क्षमता होती है। इस नमक को प्रत्येक सात से दस दिनों के भीतर बदलते रहना चाहिए। इन मूलभूत नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करने से न केवल गृह जनित दोषों का शमन होता है, बल्कि पारिवारिक आय में वृद्धि और मानसिक संतोष की प्राप्ति भी संभव होती है।

  • असम के तिनसुकिया में स्वच्छता नियम तोड़ने वालों पर सख्ती, खुले में पेशाब और गंदगी फैलाने वालों के वीडियो अब LED स्क्रीन पर होंगे प्रदर्शित

    असम के तिनसुकिया में स्वच्छता नियम तोड़ने वालों पर सख्ती, खुले में पेशाब और गंदगी फैलाने वालों के वीडियो अब LED स्क्रीन पर होंगे प्रदर्शित

    नई दिल्ली । असम के तिनसुकिया शहर में सार्वजनिक स्वच्छता बनाए रखने के उद्देश्य से नगर प्रशासन ने एक नई पहल शुरू की है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। तिनसुकिया नगर बोर्ड ने सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने और खुले में पेशाब करने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए ‘हॉल ऑफ शेम’ अभियान लागू किया है। इस अभियान के तहत नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों की पहचान सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से की जाती है और उनके वीडियो फुटेज शहर के प्रमुख स्थानों पर लगी बड़ी एलईडी स्क्रीन पर प्रदर्शित किए जाते हैं। प्रशासन का मानना है कि इस कदम से लोगों में स्वच्छता के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी और सार्वजनिक स्थानों पर अनुशासन बढ़ेगा।

    नगर बोर्ड ने शहर के विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में सीसीटीवी कैमरों का नेटवर्क स्थापित किया है। इन कैमरों की सहायता से ऐसे लोगों की निगरानी की जा रही है जो सड़कों, दीवारों या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकते हैं या खुले में पेशाब करते हैं। कैमरों में रिकॉर्ड हुई घटनाओं को डिजिटल स्क्रीन पर दिखाकर लोगों को नियमों के पालन के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि बार-बार जागरूकता अभियान चलाने और जुर्माना लगाने के बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा था, इसलिए यह नई व्यवस्था लागू की गई है।

    नगर निकाय के अधिकारियों के अनुसार इस अभियान का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अपमानित करना नहीं, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी को मजबूत करना है। उनका मानना है कि जब लोगों को यह एहसास होगा कि नियमों की अनदेखी सार्वजनिक रूप से सामने आ सकती है, तो वे स्वच्छता नियमों का अधिक गंभीरता से पालन करेंगे। प्रशासन को उम्मीद है कि इससे शहर में गंदगी फैलाने की घटनाओं में कमी आएगी और सार्वजनिक स्थान अधिक साफ-सुथरे बने रहेंगे।

    हालांकि इस पहल ने सामाजिक और कानूनी स्तर पर नई बहस को भी जन्म दिया है। कई नागरिकों ने इसे स्वच्छ भारत की दिशा में एक प्रभावी कदम बताते हुए समर्थन दिया है। उनका कहना है कि सार्वजनिक स्थानों की सफाई केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व भी है। ऐसे में यदि कठोर उपायों से लोगों की आदतों में सुधार आता है तो इससे पूरे शहर को लाभ मिलेगा।

    वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने इस अभियान पर गंभीर सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति की तस्वीर या वीडियो को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना निजता के अधिकार से जुड़ा संवेदनशील विषय है। उनका तर्क है कि नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए कानूनी कार्रवाई, जुर्माना और जागरूकता अभियान जैसे उपाय पर्याप्त हो सकते हैं, जबकि सार्वजनिक प्रदर्शन से व्यक्तिगत सम्मान और गोपनीयता प्रभावित हो सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि स्वच्छता बनाए रखने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग प्रभावी साबित हो सकता है, लेकिन इसके साथ नागरिकों के अधिकारों और कानूनी प्रावधानों का संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है। यदि तकनीक का उपयोग पारदर्शिता, स्पष्ट नियमों और उचित निगरानी के साथ किया जाए तो ऐसे अभियान बेहतर परिणाम दे सकते हैं।

    तिनसुकिया नगर बोर्ड की यह पहल अब अन्य शहरों के लिए भी चर्चा का विषय बन गई है। आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि यह अभियान सार्वजनिक स्वच्छता में कितना बदलाव ला पाता है और साथ ही निजता एवं नागरिक अधिकारों से जुड़े उठ रहे सवालों का समाधान किस प्रकार किया जाता है। फिलहाल यह पहल देश में स्वच्छता प्रबंधन और तकनीक के उपयोग को लेकर एक नई बहस का केंद्र बन चुकी है।