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  • संजय दत्त के साथ पर्दे पर भिड़ेंगे या देंगे साथ, खलनायक रिटर्न्स में सलमान खान की एंट्री पर सुभाष घई ने तोड़ी चुप्पी

    संजय दत्त के साथ पर्दे पर भिड़ेंगे या देंगे साथ, खलनायक रिटर्न्स में सलमान खान की एंट्री पर सुभाष घई ने तोड़ी चुप्पी


    नई दिल्ली। बॉलीवुड की चर्चित फिल्म खलनायक के सीक्वल खलनायक रिटर्न्स को लेकर दर्शकों का उत्साह बढ़ता जा रहा है। साल 1993 में रिलीज हुई इस फिल्म में संजय दत्त ने बलराम प्रसाद उर्फ बल्लू का यादगार किरदार निभाया था। अब एक बार फिर संजय दत्त इसी किरदार के साथ बड़े पर्दे पर वापसी करने की तैयारी में हैं। फिल्म को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा सलमान खान के नाम की हो रही है। खबरें हैं कि सलमान खान भी इस फिल्म का हिस्सा बन सकते हैं और उन्हें एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में दिखाया जा सकता है। हालांकि फिल्म के निर्देशक और निर्माता सुभाष घई ने अभी इन खबरों पर अंतिम मुहर नहीं लगाई है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुभाष घई अपनी राइटिंग टीम के साथ मिलकर फिल्म की कहानी पर काम कर रहे हैं। इसी दौरान सलमान खान के लिए एक खास किरदार तैयार किए जाने की चर्चा सामने आई है। बताया जा रहा है कि सलमान फिल्म में ऐसे पुलिसवाले की भूमिका निभा सकते हैं जो संजय दत्त के किरदार बल्लू की मदद करता नजर आएगा। यह किरदार कहानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और फिल्म की घटनाओं को नया मोड़ दे सकता है। हालांकि अभी तक सलमान खान की कास्टिंग आधिकारिक रूप से तय नहीं हुई है।

    फिल्म से जुड़े सूत्रों के हवाले से आई खबरों में दावा किया गया है कि सलमान का संभावित किरदार केवल कैमियो तक सीमित नहीं होगा बल्कि उसका कहानी पर भी असर पड़ सकता है। इस भूमिका के लिए सलमान खान को उपयुक्त बताया जा रहा है। लेकिन फिल्म की स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले अभी तैयार किए जा रहे हैं। ऐसे में मेकर्स पहले कहानी को अंतिम रूप देना चाहते हैं और उसके बाद ही कलाकारों की कास्टिंग को लेकर फैसला लिया जाएगा।

    सलमान खान की एंट्री को लेकर सुभाष घई ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि इस समय कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि फिल्म की स्क्रिप्टिंग का काम जारी है। स्क्रिप्ट पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि फिल्म किस दिशा में आगे बढ़ेगी और कौन से कलाकार इसका हिस्सा होंगे। उनके बयान से साफ है कि फिलहाल सलमान खान की भूमिका को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    अगर सलमान खान इस फिल्म में काम करते हैं तो यह सुभाष घई के साथ उनकी दूसरी फिल्म होगी। इससे पहले दोनों साल 2008 में रिलीज हुई फिल्म युवराज में साथ काम कर चुके हैं। वहीं संजय दत्त और सलमान खान की जोड़ी को पर्दे पर देखना भी दर्शकों के लिए खास अनुभव हो सकता है। दोनों कलाकारों की अपनी अलग पहचान और मजबूत फैन फॉलोइंग है।

    खलनायक की बात करें तो यह फिल्म साल 1993 में रिलीज हुई थी और बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल की थी। सुभाष घई के निर्देशन में बनी इस फिल्म में संजय दत्त के साथ जैकी श्रॉफ और माधुरी दीक्षित मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। इसके अलावा राखी गुलजार अनुपम खेर और राम्या कृष्णन जैसे कलाकारों ने भी अहम किरदार निभाए थे। फिल्म में बल्लू का किरदार दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था। अब इसके सीक्वल को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं।

    दूसरी ओर सलमान खान की आगामी फिल्म मातृभूमि को लेकर भी चर्चा जारी है। अपूर्वा लाखिया के निर्देशन में बन रही इस फिल्म में सलमान के साथ चित्रांगदा सिंह नजर आएंगी। इसकी कहानी भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में हुई झड़प की पृष्ठभूमि पर आधारित बताई जा रही है। फिलहाल इसकी रिलीज डेट की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसे में दर्शकों की नजरें अब खलनायक रिटर्न्स की स्क्रिप्ट और सलमान खान की संभावित एंट्री पर टिकी हैं।

  • तीसरी शादी और 20 साल का उम्र फासला, मान्यता में संजय दत्त को क्यों दिखी मां नरगिस की झलक, खुद खोला राज

    तीसरी शादी और 20 साल का उम्र फासला, मान्यता में संजय दत्त को क्यों दिखी मां नरगिस की झलक, खुद खोला राज


    नई दिल्ली। संजय दत्त की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रही है। फिल्मों में शानदार करियर से लेकर निजी जिंदगी के उतार चढ़ाव तक अभिनेता ने कई मुश्किल दौर देखे हैं। रिश्तों से जुड़े विवाद रहे हों या कानूनी परेशानियां संजय दत्त की जिंदगी का शायद ही कोई ऐसा दौर रहा हो जिसने सुर्खियां न बटोरी हों। हालांकि इन तमाम मुश्किल परिस्थितियों के बीच एक रिश्ता ऐसा रहा जिसने उन्हें लगातार मजबूती दी और वह रिश्ता है उनकी पत्नी मान्यता दत्त के साथ। हाल ही में संजय दत्त ने मान्यता की जमकर तारीफ की और उन्हें अपनी जिंदगी की सबसे मजबूत महिलाओं में से एक बताया।

    शेखर सुमन के साथ बातचीत में संजय दत्त ने मान्यता को लेकर अपने दिल की बात कही। अभिनेता ने बताया कि उन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत कम ऐसी महिलाओं को देखा है जो एक मां और पत्नी के तौर पर पूरी तरह समर्पित रही हों। संजय ने मान्यता की तुलना अपनी मां और दिग्गज अभिनेत्री नरगिस दत्त से करते हुए कहा कि उनकी मां के बाद मान्यता ही ऐसी महिला हैं जो हर मुश्किल परिस्थिति में चट्टान की तरह उनके साथ खड़ी रहीं। जेल का दौर हो या जिंदगी की दूसरी परेशानियां मान्यता ने उनका साथ नहीं छोड़ा।

    संजय और मान्यता की प्रेम कहानी भी काफी दिलचस्प रही है। दोनों की उम्र में करीब 20 साल का अंतर है लेकिन उम्र का यह फासला उनके रिश्ते के बीच कभी दीवार नहीं बना। संजय के मुताबिक दोनों की मुलाकात के बाद धीरे धीरे बातचीत बढ़ी और फिर दोनों ने एक दूसरे को डेट करना शुरू किया। रिश्ता आगे बढ़ा तो दोनों ने शादी करने का फैसला लिया। फरवरी 2008 में संजय दत्त और मान्यता दत्त शादी के बंधन में बंध गए। इसके बाद अक्टूबर 2010 में दोनों जुड़वां बच्चों के माता पिता बने।

    संजय दत्त की यह तीसरी शादी थी। इससे पहले उनकी शादी अभिनेत्री ऋचा शर्मा से हुई थी। इस रिश्ते से उनकी बेटी त्रिशाला दत्त हैं। ऋचा के निधन के बाद त्रिशाला का पालन पोषण अमेरिका में उनके नाना नानी के साथ हुआ। संजय और त्रिशाला के रिश्ते में भी एक समय दूरी आई लेकिन बाद में दोनों के बीच संबंध बेहतर हुए। संजय कई मौकों पर अपनी बेटी को लेकर गर्व जाहिर कर चुके हैं।

    मान्यता के साथ संजय दत्त का रिश्ता ऐसे समय में मजबूत हुआ जब अभिनेता अपनी जिंदगी के कई उतार चढ़ाव से गुजर चुके थे। यही वजह है कि संजय के लिए मान्यता सिर्फ जीवनसाथी नहीं बल्कि भरोसेमंद साथी भी हैं। अभिनेता के मुताबिक मान्यता ने परिवार को संभालने के साथ मुश्किल समय में उनका हौसला भी बनाए रखा।

    मान्यता खुद भी फिल्मों से जुड़ी रही हैं और संजय दत्त के साथ शादी के बाद उन्होंने परिवार और बच्चों को प्राथमिकता दी। संजय का हालिया बयान यह बताता है कि उनकी ग्लैमर से भरी जिंदगी के पीछे परिवार की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है। जिस महिला ने मुश्किल वक्त में उनका साथ नहीं छोड़ा आज वही उनके लिए मां नरगिस के बाद सबसे मजबूत सहारा बन चुकी हैं।

  • संजय दत्त के विवादित बयानों पर फिर बवाल, जेल से लेकर शांति और राजनीति तक इन मौकों पर घिरे अभिनेता

    संजय दत्त के विवादित बयानों पर फिर बवाल, जेल से लेकर शांति और राजनीति तक इन मौकों पर घिरे अभिनेता


    नई दिल्ली: बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त एक बार फिर अपने बयान को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में शेखर सुमन के शो में गांधी जयंती विशेष कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भारत में शांति को लेकर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि देश के लोग बेहद अच्छे और बड़े दिल वाले हैं, लेकिन उन्हें अब देश में पहले जैसी शांति महसूस नहीं होती। बयान सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई और आलोचकों ने अभिनेता को घेर लिया। इसके बाद संजय दत्त ने पोस्ट कर सफाई दी कि उनकी बात एक स्क्रिप्टेड, हल्की-फुल्की और हास्यपूर्ण बातचीत के संदर्भ में थी। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय या संस्था की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था।

    यह पहली बार नहीं है जब संजय दत्त अपने शब्दों को लेकर विवादों में आए हों। सितंबर 2026 में महाराष्ट्र के एक कार्यक्रम के दौरान परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने उनसे मराठी में बोलने को कहा था। इस पर संजय दत्त ने मजाकिया अंदाज में अपनी येरवडा जेल की सजा का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने जेल में भी मराठी नहीं सीखी। वीडियो सामने आने के बाद उनकी टिप्पणी चर्चा में आ गई। मामला बढ़ने पर प्रताप सरनाईक ने बताया कि अभिनेता ने फोन करके स्पष्टीकरण दिया और कहा कि अगर उनके मजाक से कोई गलत संदेश गया हो तो वह माफी मांगते हैं। इससे पहले 2017 में फिल्म ‘भूमि’ के प्रमोशन के दौरान बेटी त्रिशाला दत्त को लेकर भी उन्होंने ऐसी टिप्पणी की थी, जिस पर चर्चा हुई थी। उन्होंने कहा था कि अगर त्रिशाला फिल्म इंडस्ट्री में आना चाहती हैं तो उन्हें हिंदी भी सीखनी होगी। इसी बातचीत में उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा था कि त्रिशाला अभिनेत्री बनना चाहती थीं और वह उनकी टांगें तोड़ देना चाहते थे।

    साल 2012 में अमीषा पटेल से जुड़ा एक मामला भी चर्चा में रहा। एक समारोह में संजय दत्त ने उनके पहनावे को बहुत रिवीलिंग माना और उनसे कपड़े ढकने के लिए कहा। बाद में उनके दुपट्टे से उनका शरीर ढक दिया। इस पर सफाई देते हुए दत्त की तरफ से कहा गया कि वह अमीषा को बहन की तरह मानते हैं और इसी भावना से उन्होंने ऐसा किया था। 2007 में ‘कॉफी विद करण’ के दौरान महिलाओं के साथ संबंधों की संख्या को लेकर दिया गया उनका जवाब भी काफी चर्चित हुआ था। जब उनसे 50, 100, 150, 200 या उससे ज्यादा का विकल्प पूछा गया तो उन्होंने ‘ज्यादा’ कहा था। इसके बाद तीन इच्छाओं के सवाल पर उन्होंने पैसा, आजादी और महिलाएं बताई थीं। 2018 में फिल्म ‘संजू’ में भी उनकी जिंदगी से जुड़ी महिलाओं की संख्या का संदर्भ आया, जिसके बाद उनकी निजी जिंदगी को लेकर बहस हुई।

    साल 2009 में प्रतापगढ़ में समाजवादी पार्टी के स्टार प्रचारक के रूप में दी गई संजय दत्त की स्पीच भी विवादों में रही थी। तत्कालीन बसपा सरकार के दौर में सपा उम्मीदवार अक्षय प्रताप के समर्थन में सभा के दौरान उन्होंने जनता को ‘जादू की झप्पी’ देने की बात कही थी और कहा था कि मौका मिलने पर वह मायावती को भी ऐसा उपहार देना चाहेंगे। इस बयान पर बवाल हुआ और अभिनेता पर महिला को लेकर आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल का आरोप लगा। इसके अलावा 1993 के मुंबई बम धमाका मामले के दौरान उनके पिता सुनील दत्त से हुई बातचीत का भी जिक्र मिलता है। संजय दत्त के मुताबिक, पुलिस के सामने हथियार रखने की बात स्वीकार करने के बाद उन्होंने पिता से कहा था कि उनकी रगों में मुस्लिम खून है और वह शहर में हो रही घटनाओं को बर्दाश्त नहीं कर सके। यह सुनकर सुनील दत्त बेहद परेशान हुए थे।

    विवादित बयानों के मामले में संजय दत्त अकेले बॉलीवुड अभिनेता नहीं हैं। आमिर खान ने 2015 में देश में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर अपनी पत्नी किरण राव की चिंता का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि किरण ने भारत छोड़ने की बात तक पूछी थी और उन्हें अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर डर लगता था। इसके बाद आमिर की काफी आलोचना हुई और उन्हें देशद्रोही तक कहा गया। इसी साल शाहरुख खान ने भी असहिष्णुता पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है और धार्मिक असहिष्णुता सबसे बड़ा अपराध है। उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर बवाल हुआ और उन्हें पाकिस्तान चले जाने जैसी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। बाद में शाहरुख ने कहा था कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया था। 2018 में नसीरुद्दीन शाह ने अपने बच्चों को लेकर चिंता जताते हुए धर्म और भीड़ हिंसा से जुड़ी टिप्पणी की थी, जिसके बाद उनकी भी आलोचना हुई थी।

  • भारत में शांति नहीं वाले बयान पर घिरे संजय दत्त, ट्रोलिंग के बाद दी सफाई, मुन्नाभाई और गांधीगिरी से जोड़ा कनेक्शन

    भारत में शांति नहीं वाले बयान पर घिरे संजय दत्त, ट्रोलिंग के बाद दी सफाई, मुन्नाभाई और गांधीगिरी से जोड़ा कनेक्शन


    नई दिल्ली। अभिनेता संजय दत्त इन दिनों अपने एक बयान को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में वह शेखर सुमन के टॉक शो में पहुंचे थे जहां बातचीत के दौरान उन्होंने भारत में शांति और भाईचारे को लेकर अपनी बात रखी। उनकी टिप्पणी का एक हिस्सा सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आया और इसके बाद कुछ यूजर्स ने अभिनेता की आलोचना शुरू कर दी। विवाद बढ़ने के बाद अब संजय दत्त ने सोशल मीडिया के जरिए अपने बयान पर सफाई पेश की है।

    संजय दत्त ने अपनी सफाई में कहा कि उनका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति समुदाय या संस्था की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया कि शो में हुई बातचीत एक तय स्क्रिप्ट के संदर्भ में थी और इसका मकसद हल्का फुल्का तथा हास्यपूर्ण संवाद करना था। अभिनेता के मुताबिक उनकी बात को जिस संदर्भ में समझा गया वह उनके मूल इरादे से अलग था।

    संजय दत्त ने अपनी सफाई में अपनी चर्चित फिल्म मुन्नाभाई का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनके बयान के पीछे वही हास्य और व्यंग्य वाली शैली थी जो मुन्नाभाई जैसी फिल्मों में दिखाई गई है। उन्होंने विशेष तौर पर गांधीगिरी की सोच का उल्लेख किया। उनके अनुसार गांधीगिरी का संदेश प्रेम एकजुटता और सद्भावना से जुड़ा हुआ है और उनकी बातचीत को भी इसी भावना के साथ समझा जाना चाहिए था।

    दरअसल शेखर सुमन के शो में संजय दत्त से देश के मौजूदा माहौल को लेकर बातचीत हुई थी। इसी दौरान अभिनेता ने कहा था कि भारत के लोग बहुत प्यारे हैं और देश में शांति होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें अब देश में पहले जैसी शांति महसूस नहीं होती। इसके साथ ही उन्होंने भारतीयों को बड़े दिल वाला और मेहमाननवाज बताया था।

    संजय दत्त ने बातचीत के दौरान यह भी कहा था कि भारत ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है और भारतीयों को आगे भी अपनी इसी भावना को बनाए रखना चाहिए। उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना करते हुए उम्मीद जताई थी कि देश में शांति और भाईचारे का माहौल फिर से लौटेगा। हालांकि उनके बयान के एक हिस्से को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।

    विवाद के बाद अभिनेता ने अपनी बात का संदर्भ समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणी का उद्देश्य किसी का अपमान करना या किसी समुदाय के प्रति अनादर दिखाना नहीं था। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि बातचीत के हास्यपूर्ण संदर्भ को अलग करके देखने की वजह से उनकी बात का अर्थ बदल गया।

    संजय दत्त के लिए मुन्नाभाई फ्रेंचाइजी से जुड़ा गांधीगिरी वाला किरदार और संदेश काफी महत्वपूर्ण रहा है। फिल्मों में उनके किरदार के जरिए हिंसा और टकराव के बजाय प्रेम और शांति से समस्याओं का सामना करने की बात दिखाई गई थी। यही वजह है कि अभिनेता ने अपने हालिया बयान की सफाई देते समय इसी फिल्म और उसके संदेश का उदाहरण दिया।

    इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह दिखाया है कि सार्वजनिक मंच पर कही गई किसी बात का छोटा सा हिस्सा भी सोशल मीडिया पर अलग संदर्भ में तेजी से फैल सकता है। संजय दत्त ने विवाद बढ़ने के बाद अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि उनकी मंशा किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की नहीं थी। अब उनकी सफाई के बाद इस बयान को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा किस दिशा में जाती है यह देखने वाली बात होगी।

  • जेल में तोड़ने की कोशिश पर संजय दत्त ने सुनाया किस्सा, बोले- पिता की आंखों में आंसू थे, फिर भी खुद को रखा मजबूत

    जेल में तोड़ने की कोशिश पर संजय दत्त ने सुनाया किस्सा, बोले- पिता की आंखों में आंसू थे, फिर भी खुद को रखा मजबूत

    नई दिल्ली: संजय दत्त ने जेल में बिताए अपने समय को याद करते हुए बताया कि वहां उन्हें तोड़ने की कोशिश की गई थी, लेकिन वह परिस्थितियों के सामने नहीं टूटे। एक बातचीत के दौरान उन्होंने अपने करियर में आए उतार-चढ़ाव के साथ जेल के अनुभव भी साझा किए। उन्होंने बताया कि अधिकारियों को लगता था कि उनके सेलिब्रिटी स्टेटस से जुड़ी सुविधाएं छीन लेने से वह परेशान होकर टूट जाएंगे। हालांकि, संजय दत्त के मुताबिक ऐसा नहीं हुआ और उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों में खुद को संभाले रखा। उन्होंने यह भी बताया कि जेल में उनके साथ व्यवहार और सुविधाओं में हुए बदलावों का उन पर वैसा असर नहीं पड़ा, जैसा अधिकारियों ने सोचा था।

    बातचीत के दौरान संजय दत्त से यह भी पूछा गया कि क्या जेल की कठिन परिस्थितियों में कभी उन्होंने अपना जीवन समाप्त करने के बारे में सोचा था। उन्होंने इस सवाल का जवाब साफ तौर पर ‘नहीं, कभी नहीं’ में दिया। इससे पहले बातचीत में उनके जेल में रहने और मानसिक संतुलन बनाए रखने का जिक्र किया गया था। संजय दत्त ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि वहां मौजूद अधिकारियों को लगता था कि उनके लिए उपलब्ध सुविधाएं छीन लेने से वह टूट जाएंगे। उन्होंने बताया कि जब उन्हें सिगरेट नहीं मिलने की बात कही गई, तब उन्होंने मजाकिया अंदाज में पूछा कि क्या बीड़ी मिल सकती है। उनके मुताबिक इस तरह के बदलावों से उन्हें कोई खास फर्क नहीं पड़ा।

    संजय दत्त ने जेल जाने से पहले का एक भावुक पल भी याद किया। उन्होंने बताया कि जब पुलिस ने पहली बार उन्हें हथकड़ी पहनाई, तब उनके पिता सुनील दत्त को गहरा झटका लगा था। उनकी आंखों में आंसू थे और उन्होंने पूछा था कि उनके बेटे के साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है। संजय दत्त के मुताबिक उन्होंने उस समय अपने पिता को गले लगाया और उन्हें समझाने की कोशिश की कि हथकड़ी लगना प्रक्रिया का हिस्सा है और उन्हें परेशान नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वास्तविकता यह थी कि वह खुद भी अंदर से इस स्थिति से प्रभावित थे, लेकिन उस समय उनके लिए अपने पिता के सामने मजबूत बने रहना जरूरी था।

    संजय दत्त को साल 1993 में मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर मामले से जुड़े अवैध हथियार रखने के आरोप में टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट यानी TADA और आर्म्स एक्ट के तहत कार्रवाई हुई थी। उन्होंने अलग-अलग समय में कुल मिलाकर करीब 18 महीने अंडरट्रायल के तौर पर जेल में बिताए। साल 2007 में विशेष TADA अदालत ने उन्हें आतंकवाद से जुड़े आरोपों से बरी कर दिया, लेकिन आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराते हुए छह साल की सजा सुनाई। इसके बाद साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा की अवधि छह साल से घटाकर पांच साल कर दी। जेल के अपने अनुभव को याद करते हुए संजय दत्त ने बताया कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने खुद को संभाले रखा।

  • सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने बयां किया आर्म्स एक्ट की सजा के वक्त का पूरा कोर्ट रूम ड्रामा

    सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने बयां किया आर्म्स एक्ट की सजा के वक्त का पूरा कोर्ट रूम ड्रामा

    नई दिल्ली । वर्ष 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले ने देश के साथ-साथ पूरे फिल्म जगत को हिलाकर रख दिया था। इस ऐतिहासिक मुकदमे में सबसे चर्चित चेहरा रहे बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त की सजा और उनके अदालती संघर्ष की कहानियां आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। हाल ही में इस संवेदनशील मामले के विशेष सरकारी अभियोजक रहे वरिष्ठ वकील उज्ज्वल निकम ने एक साक्षात्कार में उस वक्त के अदालती माहौल और फैसले के दिन संजय दत्त की मानसिक स्थिति को लेकर बेहद चौंकाने वाले और अनसुने खुलासे किए हैं। निकम ने बताया कि फैसला सुनाए जाने के वक्त अभिनेता किस कदर डरे हुए थे और सजा का ऐलान होते ही अदालत कक्ष के भीतर वह पूरी तरह टूट गए थे।

    मुंबई की विशेष टाडा अदालत में चल रहे इस लंबे मुकदमे के दौरान पूरे देश की निगाहें संजय दत्त पर टिकी हुई थीं। उज्ज्वल निकम के अनुसार, फैसला आने वाले दिन अदालत कक्ष के भीतर भारी तनाव और सन्नाटा पसरा हुआ था। संजय दत्त को उस समय सबसे बड़ा डर इस बात का था कि क्या उन पर देशद्रोह या आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का ठप्पा लगेगा। जब अदालत ने उन्हें टाडा यानी आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां अधिनियम के तहत लगे गंभीर आरोपों से बरी कर दिया, तो उनके चेहरे पर कुछ पल के लिए राहत जरूर दिखी थी। लेकिन इसके तुरंत बाद जब गैर-कानूनी हथियार रखने के आरोप में आर्म्स एक्ट के तहत उन्हें दोषी ठहराया गया, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

    उज्ज्वल निकम ने बताया कि टाडा के आरोपों से मुक्ति मिलने के बाद संजय दत्त को लगा था कि शायद वे पूरी तरह बच जाएंगे या उन्हें प्रोबेशन का लाभ मिल जाएगा। लेकिन कानून अपनी राह पर चल रहा था। जैसे ही न्यायाधीश ने आर्म्स एक्ट के तहत सजा की अवधि का ऐलान करना शुरू किया, संजय दत्त के शरीर में कंपन होने लगा। निकम ने उस दृश्य को याद करते हुए साझा किया कि अभिनेता के हाथ-पैर कांप रहे थे और वह अदालत में खड़े होने की स्थिति में भी नहीं दिख रहे थे। उनकी आंखें आंसुओं से भर गईं और वह पूरी तरह लाचार नजर आने लगे थे। एक ऐसा अभिनेता जिसे स्क्रीन पर हमेशा कड़े और मजबूत किरदारों में देखा गया था, वह कानून के सामने पूरी तरह बेबस खड़ा था।

    अभियोजन पक्ष के रूप में उज्ज्वल निकम ने संजय दत्त के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत कड़ी सजा की वकालत की थी क्योंकि देश की सुरक्षा के दृष्टिकोण से प्रतिबंधित हथियार रखना एक अक्षम्य अपराध था। निकम ने खुलासा किया कि सजा के बाद संजय दत्त ने उनकी तरफ देखा था और उनकी आंखों में अपने भविष्य को लेकर एक गहरा डर और असमंजस साफ दिखाई दे रहा था। इस ऐतिहासिक मामले में संजय दत्त को पांच साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसके बाद उन्हें यरवदा जेल भेजा गया। उज्ज्वल निकम का यह संस्मरण न केवल एक वीआईपी आरोपी की न्यायिक प्रक्रिया के दौरान की मनोवैज्ञानिक स्थिति को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि कानून की नजर में कोई भी व्यक्ति अपने प्रभाव या शोहरत के बल पर बच नहीं सकता।

  • मुन्ना भाई एमबीबीएस में नहीं दिखा वह सीन जिसने बाद में 3 इडियट्स के क्लाइमैक्स को यादगार बना दिया

    मुन्ना भाई एमबीबीएस में नहीं दिखा वह सीन जिसने बाद में 3 इडियट्स के क्लाइमैक्स को यादगार बना दिया


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय फिल्मों में शामिल मुन्ना भाई एमबीबीएस और 3 इडियट्स के बीच एक दिलचस्प कड़ी सामने आई है। मशहूर निर्देशक राजकुमार हिरानी ने खुलासा किया है कि 3 इडियट्स का एक बेहद चर्चित और भावुक दृश्य दरअसल पहले मुन्ना भाई एमबीबीएस की स्क्रिप्ट का हिस्सा था। हालांकि उस समय इसे फिल्म से हटा दिया गया लेकिन वर्षों बाद यही विचार नए रूप में 3 इडियट्स में नजर आया और दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरने में सफल रहा।

    साल 2003 में रिलीज हुई मुन्ना भाई एमबीबीएस ने भारतीय सिनेमा में एक नया अध्याय लिखा था। संजय दत्त और अरशद वारसी की जोड़ी ने दर्शकों को हंसाया भी और भावुक भी किया। फिल्म की कहानी और उसके किरदार आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस फिल्म की स्क्रिप्ट में कई ऐसे दृश्य भी लिखे गए थे जो बाद में अंतिम संस्करण का हिस्सा नहीं बन पाए।

    राजकुमार हिरानी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने मुन्ना भाई एमबीबीएस के लिए एक खास दृश्य लिखा था जो मुख्य किरदार मुन्ना के जीवन में बड़ा बदलाव लाने वाला था। कहानी के अनुसार एक रात मुन्ना और सर्किट शराब पीकर सड़क पर घूम रहे होते हैं। शहर में कर्फ्यू लगा होता है और सन्नाटा पसरा होता है। तभी एक छोटा बच्चा घबराया हुआ उनके पास आता है और बताता है कि उसकी मां को प्रसव पीड़ा हो रही है लेकिन कोई एम्बुलेंस या डॉक्टर मदद के लिए उपलब्ध नहीं है।

    जब बच्चे को पता चलता है कि मुन्ना डॉक्टर बनने की पढ़ाई कर रहा है तो वह उसे अपने साथ चलने के लिए मजबूर कर देता है। मुन्ना के पास कोई वास्तविक चिकित्सकीय अनुभव नहीं होता लेकिन वह फिल्मों में देखी गई बातों के आधार पर मदद करने की कोशिश करता है। वह लोगों से गर्म पानी और जरूरी सामान लाने को कहता है और हालात को संभालने का प्रयास करता है।

    कहानी के अनुसार अंततः बच्चे का जन्म हो जाता है और जब मुन्ना पहली बार नवजात को अपनी गोद में उठाता है तब उसके भीतर एक बड़ा भावनात्मक परिवर्तन आता है। उसी पल उसे जीवन की कीमत और अपने पेशे की जिम्मेदारी का एहसास होता है। यही दृश्य उसके किरदार के विकास में महत्वपूर्ण मोड़ बनने वाला था।

    हालांकि बाद में यह पूरा दृश्य फिल्म से हटा दिया गया। लेकिन राजकुमार हिरानी को इस विचार की ताकत पर पूरा भरोसा था। इसलिए वर्षों बाद जब उन्होंने 3 इडियट्स बनाई तो इसी भावनात्मक आधार को नए अंदाज में इस्तेमाल किया। फिल्म में रैंचो आपात स्थिति में पिया की बहन की डिलीवरी करवाता है। यह दृश्य न सिर्फ फिल्म के सबसे यादगार पलों में शामिल हुआ बल्कि इसके जरिए वायरस के किरदार का हृदय परिवर्तन भी दिखाया गया।

    3 इडियट्स में यह दृश्य दर्शकों के लिए रोमांच भावनाओं और प्रेरणा का अनूठा मिश्रण साबित हुआ। शायद यही वजह है कि आज भी यह सीन फिल्म के सबसे चर्चित हिस्सों में गिना जाता है।

    राजकुमार हिरानी का यह खुलासा बताता है कि कई बार फिल्म निर्माण के दौरान हटाए गए विचार भी वर्षों बाद नई कहानी में जगह पाकर इतिहास रच देते हैं। मुन्ना भाई एमबीबीएस से निकलकर 3 इडियट्स तक पहुंचा यह दृश्य इसका बेहतरीन उदाहरण है।

  • साहसी सिनेमा की नई पहचान बनी ‘आखिरी सवाल’, तीखे सवालों से झकझोर देने वाली दमदार राजनीतिक ड्रामा फिल्म

    साहसी सिनेमा की नई पहचान बनी ‘आखिरी सवाल’, तीखे सवालों से झकझोर देने वाली दमदार राजनीतिक ड्रामा फिल्म

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा में कभी-कभी कुछ ऐसी फिल्में सामने आती हैं जो केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहतीं, बल्कि समाज, इतिहास और राजनीति पर गहरे सवाल खड़े कर देती हैं। ऐसी ही एक फिल्म है ‘आखिरी सवाल’, जिसे एक साहसी राजनीतिक ड्रामा के रूप में देखा जा रहा है। यह फिल्म अपने तीखे विषयों, बेबाक प्रस्तुति और भावनात्मक गहराई के कारण दर्शकों के बीच चर्चा का केंद्र बन गई है।

    निर्देशक अभिजीत मोहन वरंग और निर्माता निखिल नंदा की यह फिल्म उस श्रेणी में रखी जा रही है, जो सुरक्षित रास्तों से हटकर सिनेमा को एक नई दिशा देने की कोशिश करती है। फिल्म उन विषयों को छूती है, जिन्हें अक्सर संवेदनशील या विवादित मानकर बड़े पर्दे पर सीमित रूप में ही दिखाया जाता है। इसमें ऐतिहासिक घटनाओं, सामाजिक धारणाओं और राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े कई गंभीर सवालों को सामने रखा गया है, जो दर्शकों को सहज नहीं रहने देते बल्कि सोचने पर मजबूर करते हैं।

    फिल्म की कहानी उन मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती है जिन पर लंबे समय से समाज में बहस होती रही है। इसमें इतिहास की कुछ प्रमुख घटनाओं और उनसे जुड़े विभिन्न दृष्टिकोणों को भी जगह दी गई है। कहानी का उद्देश्य किसी एक निष्कर्ष को थोपना नहीं, बल्कि दर्शकों को उन सवालों से रूबरू कराना है जिनके जवाब अक्सर अधूरे या विवादित रहे हैं। यही वजह है कि फिल्म को एक साहसी प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

    अभिनय की बात करें तो संजय दत्त ने इस फिल्म में अपने करियर का एक अलग और गंभीर रूप प्रस्तुत किया है। उनका किरदार संयमित, भावनात्मक और भीतर से टूटे हुए व्यक्ति का है, जो अपने अतीत और सच्चाई के बीच उलझा हुआ नजर आता है। उनकी आंखों और संवादों में एक गहरी गंभीरता दिखाई देती है, जो फिल्म को मजबूती प्रदान करती है।

    इसके साथ ही नमाशी चक्रवर्ती ने भी अपने अभिनय से सभी को प्रभावित किया है। उनकी स्क्रीन उपस्थिति और भावनात्मक अभिव्यक्ति कहानी में एक नई ऊर्जा जोड़ती है। कई दृश्यों में उनका प्रदर्शन दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ता है और यह संकेत देता है कि वह एक उभरते हुए मजबूत कलाकार के रूप में अपनी पहचान बना सकते हैं।

    फिल्म का एक और महत्वपूर्ण पहलू इसके संवाद और डिबेट वाले दृश्य हैं, जो बेहद तीव्र और वास्तविक महसूस होते हैं। न्यूजरूम और सार्वजनिक बहसों को जिस तरह से फिल्म में प्रस्तुत किया गया है, वह दर्शकों को सीधे कहानी से जोड़ देता है। ये दृश्य केवल स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं लगते, बल्कि वास्तविक समाज में चल रही विचारधाराओं की टकराहट को भी दर्शाते हैं।

    दृश्यात्मक रूप से भी फिल्म मजबूत पकड़ बनाए रखती है। हर फ्रेम में तनाव और उद्देश्य स्पष्ट दिखाई देता है। कहानी भले ही जटिल और बहुस्तरीय विषयों पर आधारित हो, लेकिन इसका नैरेटिव दर्शकों को लगातार बांधे रखता है। फिल्म का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह उपदेश देने के बजाय सवाल पूछती है और दर्शकों को अपने निष्कर्ष खुद निकालने के लिए प्रेरित करती है।

    सहायक कलाकारों का प्रदर्शन भी फिल्म को और प्रभावशाली बनाता है, जिससे कहानी की भावनात्मक गहराई और बढ़ जाती है। पूरी फिल्म एक ऐसे संवाद की तरह महसूस होती है, जो समाज को आईना दिखाने का प्रयास करती है।

  • राज कपूर का दामाद बनते-बनते रह गया बॉलीवुड का यह 'लव स्टोरी' हीरो, पिता की दोस्ती के खातिर दत्त खानदान से जोड़ा अटूट रिश्ता

    राज कपूर का दामाद बनते-बनते रह गया बॉलीवुड का यह 'लव स्टोरी' हीरो, पिता की दोस्ती के खातिर दत्त खानदान से जोड़ा अटूट रिश्ता


    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में अस्सी का दशक बदलाव की एक ऐसी लहर लेकर आया था जिसने रातों-रात एक नया सुपरस्टार पैदा कर दिया था। उस दौर में जहाँ एक्शन और एंग्री यंग मैन का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था, वहीं एक दुबले-पतले और मासूम चेहरे वाले युवक ने ‘चॉकलेटी हीरो’ की परिभाषा को नए सिरे से परिभाषित किया। यह शख्स कोई और नहीं बल्कि बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता राजेंद्र कुमार के बेटे कुमार गौरव थे। कुमार गौरव ने जब साल 1981 में फिल्म ‘लव स्टोरी’ से अपना डेब्यू किया, तो उन्होंने सफलता के ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए कि बड़े-बड़े स्थापित अभिनेताओं के सिंहासन डोल गए थे। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उस दौर में उन्हें देखने के लिए सिनेमाघरों के बाहर मीलों लंबी कतारें लगती थीं और उनकी पर्सनैलिटी के आगे खुद संजय दत्त तक को कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ा था।

    कुमार गौरव का फिल्मी सफर जितना दिलचस्प रहा, उससे कहीं ज्यादा चर्चा में उनकी निजी जिंदगी और उनके पारिवारिक रिश्ते रहे। बहुत कम लोग जानते हैं कि कुमार गौरव और संजय दत्त का रिश्ता केवल दोस्ती तक सीमित नहीं था, बल्कि वे एक-दूसरे के बेहद करीबी रिश्तेदार भी हैं। इस रिश्ते की नींव दो पुराने दोस्तों ने मिलकर रखी थी। एक जमाने में संजय दत्त के पिता सुनील दत्त और कुमार गौरव के पिता राजेंद्र कुमार के बीच इतनी गहरी दोस्ती थी कि उन्होंने इस मित्रता को रिश्तेदारी में बदलने का साहसिक निर्णय लिया। इसी वादे और दोस्ती के सम्मान में कुमार गौरव ने साल 1984 में सुनील दत्त की बेटी और संजय दत्त की बहन नम्रता दत्त से विवाह किया। यह शादी बॉलीवुड की उन चुनिंदा शादियों में से एक रही जिसने दो महान फिल्मी घरानों को हमेशा के लिए एक सूत्र में पिरो दिया।

    हालांकि, नम्रता दत्त के साथ सात फेरे लेने से पहले कुमार गौरव की निजी जिंदगी में कई बड़े उतार-चढ़ाव आए थे। उनके करियर की शुरुआत में ही उनका नाम उनकी पहली को-स्टार विजयता पंडित के साथ जोड़ा गया था और दोनों के अफेयर की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनी हुई थीं। लेकिन अपने पिता के प्रति निष्ठा और पारिवारिक मूल्यों के चलते उन्होंने इस रिश्ते से दूरी बना ली। इतना ही नहीं, एक वक्त ऐसा भी था जब कुमार गौरव बॉलीवुड के शो-मैन राज कपूर के दामाद बनने वाले थे। खबरों की मानें तो राज कपूर की बेटी के साथ उनकी सगाई तक हो चुकी थी, लेकिन वक्त और नियति को कुछ और ही मंजूर था। वह सगाई टूट गई और अंततः पिता राजेंद्र कुमार की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होंने दत्त खानदान की बेटी का हाथ थामा और आज वे अपनी शादीशुदा जिंदगी में बेहद खुश और संतुष्ट हैं।

    आज भले ही कुमार गौरव बड़े पर्दे की चमक-धमक से दूर हो गए हों, लेकिन 80 के दशक की उन यादों में वे आज भी एक अमर सितारे की तरह चमकते हैं। उनकी पहली फिल्म के गानों की धुन आज भी युवाओं के बीच उतनी ही लोकप्रिय है। संजय दत्त और उनका रिश्ता आज भी उतना ही मजबूत है, जितना दशकों पहले हुआ करता था। संजू बाबा के हर मुश्किल दौर में कुमार गौरव और नम्रता चट्टान की तरह उनके साथ खड़े रहे। कुमार गौरव की कहानी हमें यह सिखाती है कि ग्लैमर की दुनिया में सफलता और असफलता तो आती-जाती रहती है, लेकिन जो रिश्ते सच्चे दिल और ईमानदारी से बनाए जाते हैं, वही जीवन की असली विरासत होते हैं। फिल्म जगत में उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में याद किया जाएगा जिसने अपनी सादगी और शालीनता से करोड़ों दिलों पर राज किया।

  • संजय दत्त का बड़ा कदम: विवाद के बाद मांगी माफी, अब 50 बच्चों को कराएंगे शिक्षा

    संजय दत्त का बड़ा कदम: विवाद के बाद मांगी माफी, अब 50 बच्चों को कराएंगे शिक्षा


    नई दिल्ली| बॉलीवुड अभिनेता Sanjay Dutt एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार किसी फिल्म या किरदार को लेकर नहीं, बल्कि विवादित गाने ‘सरके चुनर तेरी’ को लेकर उठे विवाद के कारण। मामला तब और गंभीर हो गया जब राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने इस गाने के कथित आपत्तिजनक बोलों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए उन्हें और अभिनेत्री Nora Fatehi को तलब किया।
    रविवार को Sanjay Dutt सरिता विहार स्थित आयोग के कार्यालय पहुंचे, जहां उनसे करीब एक घंटे तक पूछताछ हुई। पूछताछ के बाद उन्होंने आयोग के सामने अपनी सफाई दी और कथित विवादित बोलों को लेकर खेद भी व्यक्त किया। उनके वकील हेमंत शाह के अनुसार, अभिनेता ने स्पष्ट किया कि जिस समय शूटिंग हुई थी, उस दौरान गाना कन्नड़ भाषा में था और उन्हें इसके अर्थ की पूरी जानकारी नहीं थी। बाद में हिंदी डबिंग के दौरान इसके कुछ शब्दों पर आपत्ति उठी।
    मामले में एक अहम मोड़ तब आया जब संजय दत्त ने न सिर्फ माफी मांगी, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी निभाने का बड़ा फैसला भी लिया। उन्होंने घोषणा की कि वे 50 आदिवासी बच्चों की शिक्षा का पूरा खर्च उठाएंगे, जिससे यह विवाद एक सकारात्मक पहल में बदलता नजर आ रहा है।
    हालांकि, दूसरी ओर Nora Fatehi लगातार दूसरी बार आयोग के सामने पेश नहीं हुईं। उनके वकील ने आयोग के समक्ष पक्ष रखा, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया। आयोग ने स्पष्ट किया है कि नोरा फतेही को 27 अप्रैल 2026 को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का अंतिम अवसर दिया गया है।
    इस पूरे मामले ने मनोरंजन जगत में हलचल पैदा कर दी है। एक तरफ विवादित गीत को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी ओर संजय दत्त के सामाजिक कदम को लेकर उनकी चर्चा भी हो रही है। अब देखना होगा कि आने वाली सुनवाई में यह मामला किस दिशा में आगे बढ़ता है।