Tag: SardarSarovar

  • सरदार सरोवर वन टाइम सेटलमेंट बना सियासी मुद्दा क्या मध्य प्रदेश ने घाटे का सौदा किया या बचाए 1268 करोड़

    सरदार सरोवर वन टाइम सेटलमेंट बना सियासी मुद्दा क्या मध्य प्रदेश ने घाटे का सौदा किया या बचाए 1268 करोड़


    मध्य प्रदेश। करीब तीन दशक से लंबित सरदार सरोवर डैम विवाद पर आखिरकार वन टाइम सेटलमेंट हो गया लेकिन इस समझौते ने मध्य प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। जिस राज्य ने अपनी हजारों हेक्टेयर जमीन डूबने और सैकड़ों गांवों के विस्थापन के बदले गुजरात से 7669 करोड़ रुपए का मुआवजा मांगा था उसे अब यह दावा पूरी तरह छोड़ना पड़ा है। इतना ही नहीं राज्य सरकार को गुजरात को 231 करोड़ 80 लाख रुपए का भुगतान भी करना होगा। यही वजह है कि इस समझौते को लेकर सरकार और विपक्ष आमने सामने हैं।

    सरदार सरोवर परियोजना नर्मदा नदी पर गुजरात में बनाई गई थी लेकिन इसके बैकवाटर का सबसे बड़ा असर मध्य प्रदेश पर पड़ा। डैम की ऊंचाई बढ़ने के बाद प्रदेश के 192 गांव और करीब 21 हजार हेक्टेयर भूमि स्थायी रूप से डूब क्षेत्र में आ गई। इसके बाद नए भूमि अधिग्रहण कानून के आधार पर मध्य प्रदेश ने गुजरात से 7669 करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग की थी। दूसरी ओर गुजरात पुराने दावों के आधार पर सीमित भुगतान की बात करता रहा और निर्माण लागत में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी का मुद्दा उठाता रहा। इसी विवाद के कारण मामला वर्षों तक अटका रहा।

    दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में चार राज्यों के बीच हुए समझौते में पुरानी फाइल को हमेशा के लिए बंद करने पर सहमति बनी। इसके तहत मध्य प्रदेश ने अपना पूरा मुआवजा दावा वापस ले लिया जबकि गुजरात की ओर से निर्माण लागत में प्रदेश की करीब 1500 करोड़ रुपए की संभावित देनदारी घटाकर केवल 231.80 करोड़ रुपए तय कर दी गई।

    यही फैसला अब राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने प्रदेश के किसानों आदिवासियों और विस्थापित परिवारों के हितों से समझौता किया है। विपक्ष का कहना है कि हजारों करोड़ रुपए के दावे को छोड़ना प्रदेश के अधिकारों का नुकसान है और सरकार को इस पूरे समझौते पर श्वेत पत्र जारी करना चाहिए।

    वहीं मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और सरकार इस समझौते को प्रदेश के हित में लिया गया व्यावहारिक फैसला बता रहे हैं। उनका कहना है कि गुजरात किसी भी स्थिति में 7669 करोड़ रुपए देने को तैयार नहीं था। ऐसे में लंबे कानूनी विवाद को समाप्त करते हुए राज्य ने 1500 करोड़ रुपए की संभावित देनदारी को घटाकर केवल 231.80 करोड़ रुपए में निपटा लिया जिससे सरकारी खजाने पर बड़ा वित्तीय बोझ टल गया।

    सरकार यह भी तर्क दे रही है कि सरदार सरोवर परियोजना से मध्य प्रदेश को दीर्घकालिक लाभ लगातार मिल रहे हैं। परियोजना से बनने वाली जल विद्युत का सबसे बड़ा हिस्सा प्रदेश को मिलता है। साथ ही लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई और कई बड़े शहरों की पेयजल आपूर्ति भी इसी परियोजना पर निर्भर है। इसलिए सरकार इस समझौते को भविष्य के हितों और व्यावहारिक समाधान के रूप में देख रही है।

    हालांकि सबसे बड़ा सवाल अब उन विस्थापित परिवारों को लेकर है जिनके पुनर्वास और मुआवजे की जिम्मेदारी अब पूरी तरह मध्य प्रदेश सरकार पर आ गई है। चूंकि गुजरात से कोई मुआवजा राशि नहीं मिलेगी इसलिए राज्य सरकार को ही अपने संसाधनों से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और भुगतान की व्यवस्था करनी होगी। ऐसे में यह समझौता कानूनी विवाद का अंत जरूर है लेकिन इसके आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव आने वाले समय में भी चर्चा का विषय बने रहेंगे।

  • मुख्यमंत्री राजा हरिश्चंद्र नहीं हैं, सच बताइए 7669 करोड़ कहां गए, सरदार सरोवर समझौते पर कांग्रेस का तीखा हमला

    मुख्यमंत्री राजा हरिश्चंद्र नहीं हैं, सच बताइए 7669 करोड़ कहां गए, सरदार सरोवर समझौते पर कांग्रेस का तीखा हमला


    मध्यप्रदेश । सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े अंतरराज्यीय वित्तीय समझौते को लेकर मध्यप्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और राज्य सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि मध्यप्रदेश के हितों से समझौता किया गया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जो कह दें वही अंतिम सत्य नहीं हो जाता। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि जब मध्यप्रदेश ने सरदार सरोवर परियोजना में हुए नुकसान के आधार पर 7669 करोड़ रुपए का दावा किया था तो आखिर वह दावा किस आधार पर छोड़ दिया गया। पटवारी ने पूरे समझौते पर श्वेत पत्र जारी करने और विधानसभा में विस्तृत चर्चा कराने की मांग भी की।

    भोपाल में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में जीतू पटवारी ने कहा कि नर्मदा नदी मध्यप्रदेश की जीवनरेखा है और सरदार सरोवर परियोजना के कारण सबसे अधिक नुकसान भी प्रदेश को ही उठाना पड़ा। उन्होंने कहा कि सबसे अधिक कृषि भूमि वन क्षेत्र और आदिवासी गांव मध्यप्रदेश में डूब क्षेत्र में आए। हजारों परिवारों का विस्थापन हुआ और पुनर्वास का सबसे बड़ा दायित्व भी प्रदेश ने निभाया। ऐसे में तत्कालीन आकलन के आधार पर मध्यप्रदेश ने 7669 करोड़ रुपए का दावा किया था। अब सरकार यह बताए कि वह दावा अचानक समाप्त कैसे हो गया।

    कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार केवल यह प्रचार कर रही है कि गुजरात की लगभग 1500 करोड़ रुपए की देनदारी को कम कर 231 करोड़ रुपए में निपटा दिया गया और इसे बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है। लेकिन सरकार यह नहीं बता रही कि मध्यप्रदेश के हजारों करोड़ रुपए के दावे का क्या हुआ। उन्होंने कहा कि जनता को पूरे समझौते की सच्चाई जानने का अधिकार है और सरकार को सभी दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए।

    पटवारी ने सरकार से कई सीधे सवाल भी पूछे। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री बताएं यह फैसला किस कानूनी और वित्तीय आधार पर लिया गया। क्या इस विषय पर राज्य मंत्रिमंडल में चर्चा हुई थी। क्या विधानसभा को विश्वास में लिया गया था। क्या पर्यावरण विशेषज्ञों और परियोजना से जुड़े जानकारों की राय ली गई थी। उन्होंने दावा किया कि दिल्ली में हुई बैठक में शामिल होने जा रहे अधिकारियों से उनकी विमान यात्रा के दौरान बातचीत हुई थी और अधिकारियों ने बताया था कि मध्यप्रदेश अपने दावे को लेकर पूरी तैयारी के साथ बैठक में जा रहा है। ऐसे में समझौते के बाद दावा समाप्त होने पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

    कांग्रेस ने प्रदेश की आर्थिक स्थिति को भी इस मुद्दे से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा। पटवारी ने कहा कि मध्यप्रदेश पर पांच लाख इकसठ हजार करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज हो चुका है और सरकार लगातार नया कर्ज लेकर खर्च कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास की ठोस योजना के बजाय सरकार केवल प्रचार और आयोजनों पर ध्यान दे रही है। हाल ही में लिए गए नए कर्ज का उल्लेख करते हुए उन्होंने वित्तीय प्रबंधन पर भी सवाल उठाए।

    दरअसल नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध को लेकर मध्यप्रदेश गुजरात महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच कई वर्षों से वित्तीय विवाद चल रहा था। मध्यप्रदेश का कहना था कि परियोजना से सबसे अधिक भूमि और गांव उसके प्रभावित हुए हैं इसलिए उसे मुआवजा मिलना चाहिए जबकि गुजरात परियोजना की लागत में अन्य राज्यों की हिस्सेदारी की मांग कर रहा था। हाल ही में नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में चारों राज्यों ने वन टाइम सेटलमेंट पर हस्ताक्षर कर वर्षों पुराने विवाद को समाप्त करने पर सहमति जताई। समझौते के तहत मध्यप्रदेश महाराष्ट्र और राजस्थान गुजरात को 550 550 करोड़ रुपए देंगे जबकि पुराने सभी वित्तीय दावों को समाप्त माना जाएगा। इसी समझौते को लेकर अब प्रदेश में सियासी घमासान तेज हो गया है और कांग्रेस सरकार से पूरे मामले में पारदर्शिता की मांग कर रही है।