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  • OTT से हटने के बाद गुरुद्वारों तक पहुंची दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’, पांच राज्यों में कम्युनिटी स्क्रीनिंग की तैयारी, जसवंत सिंह खालरा की कहानी फिर बनेगी चर्चा का केंद्र

    OTT से हटने के बाद गुरुद्वारों तक पहुंची दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’, पांच राज्यों में कम्युनिटी स्क्रीनिंग की तैयारी, जसवंत सिंह खालरा की कहानी फिर बनेगी चर्चा का केंद्र

    नई दिल्ली । दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ एक बार फिर चर्चा में है। डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद अब इस फिल्म को देश के विभिन्न गुरुद्वारों में सामुदायिक स्क्रीनिंग के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाने की तैयारी शुरू हो गई है। सिख धार्मिक संस्थाओं की इस पहल का उद्देश्य मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और उनके संघर्ष को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना बताया जा रहा है। इसके तहत पंजाब के साथ हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और जम्मू में भी विशेष स्क्रीनिंग आयोजित करने की योजना बनाई गई है।

    फिल्म के प्रदर्शन को लेकर कई गुरुद्वारा प्रबंधन समितियां एकजुट होकर कार्यक्रम तैयार कर रही हैं। जम्मू में 10 से 13 जुलाई के बीच अलग-अलग गुरुद्वारों में स्क्रीनिंग का कार्यक्रम प्रस्तावित है, जबकि जयपुर में भी विशेष आयोजन की तैयारी की गई है। दिल्ली में भी सिख समुदाय से जुड़े संगठन इस पहल का समर्थन कर रहे हैं और फिल्म को फिर से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने की मांग उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि फिल्म डिजिटल माध्यम पर उपलब्ध नहीं है तो सामुदायिक स्तर पर लोगों को इसे देखने का अवसर मिलना चाहिए।

    सामुदायिक संगठनों का मानना है कि जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित यह कहानी केवल एक फिल्म नहीं बल्कि इतिहास और मानवाधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों को सामने लाने का माध्यम है। उनका कहना है कि किसी भी कारण से यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसकी पहुंच सीमित हो जाती है तो समाज के स्तर पर ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि यह कहानी लोगों तक पहुंचती रहे। इसी सोच के साथ विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं स्क्रीनिंग की तैयारियों में जुटी हैं।

    फिल्म का सफर भी काफी लंबा और चुनौतीपूर्ण रहा है। निर्माण पूरा होने के बाद इसे प्रमाणन प्रक्रिया के दौरान कई स्तरों पर बदलाव और कटौती के सुझावों का सामना करना पड़ा। शुरुआती चरण में फिल्म का शीर्षक बदला गया और कई संशोधनों की बात सामने आई। बाद में समीक्षा प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में अतिरिक्त बदलाव सुझाए गए, जिनमें प्रमुख पात्र से जुड़े परिवर्तन भी शामिल थे। फिल्म निर्माताओं ने इन संशोधनों को स्वीकार नहीं किया, जिसके चलते इसकी रिलीज लंबे समय तक टलती रही।

    इसके बाद फिल्म का संस्करण डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया गया, लेकिन रिलीज के कुछ ही समय बाद इसे हटा दिया गया। इस फैसले के बाद कई सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। फिल्म को लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ऐतिहासिक विषयों की प्रस्तुति और सार्वजनिक पहुंच जैसे मुद्दों पर भी चर्चा तेज हो गई। इस बीच अब गुरुद्वारों में होने वाली सामुदायिक स्क्रीनिंग ने फिल्म को एक नया मंच प्रदान कर दिया है।

    हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी इस फिल्म में दिलजीत दोसांझ के साथ अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओल्यान प्रमुख भूमिकाओं में नजर आए हैं। सामुदायिक स्क्रीनिंग की इस पहल से फिल्म एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है और आने वाले दिनों में इसके जरिए बड़ी संख्या में दर्शकों तक इसकी कहानी पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।

  • 'सतलुज' हटने पर पंजाब में सियासी संग्राम, दिलजीत दोसांझ की फिल्म की बहाली को BJP, कांग्रेस, AAP और अकाली दल एकजुट

    'सतलुज' हटने पर पंजाब में सियासी संग्राम, दिलजीत दोसांझ की फिल्म की बहाली को BJP, कांग्रेस, AAP और अकाली दल एकजुट

    नई दिल्ली । अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद पंजाब में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक बहस छिड़ गई है। रिलीज के कुछ ही समय बाद फिल्म के भारत में उपलब्ध नहीं रहने से विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। कई नेताओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ऐतिहासिक तथ्यों से जुड़े विमर्श का विषय बताते हुए फिल्म को तत्काल बहाल करने की मांग की है।

    फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है। इसमें पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और अवैध हत्याओं से जुड़े मामलों को दर्शाया गया है। इसी कारण फिल्म के अचानक हटने के बाद यह मामला केवल मनोरंजन जगत तक सीमित न रहकर राजनीतिक मुद्दा बन गया है।

    पंजाब के विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस निर्णय पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल सहित कई दलों के नेताओं ने अलग-अलग बयान जारी कर फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने की मांग की है। उनका कहना है कि ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित किसी रचना को सार्वजनिक विमर्श से हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

    कांग्रेस नेता सुखपाल सिंह खैरा ने कहा कि फिल्म में जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया है, उनसे जुड़े कई मामलों पर न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। उनके अनुसार इस प्रकार की फिल्म को हटाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने केंद्र सरकार से फिल्म को पुनः उपलब्ध कराने की मांग की।

    शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भी इस कदम पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास से जुड़े संवेदनशील विषयों पर खुली चर्चा लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अकाली दल के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा ने भी कहा कि फिल्म एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के जीवन पर आधारित है और इस मामले पर संबंधित पक्षों को स्पष्ट स्थिति सामने रखनी चाहिए।

    आम आदमी पार्टी के नेताओं ने भी फिल्म हटाने के निर्णय पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि कला और रचनात्मक अभिव्यक्ति को स्वतंत्र वातावरण मिलना चाहिए तथा ऐसे मामलों में पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है। वहीं शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रतिनिधियों ने भी ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्मों को सार्वजनिक चर्चा का माध्यम बताते हुए प्रतिबंध के बजाय संवाद की आवश्यकता पर बल दिया।

    इस विवाद पर कानूनी क्षेत्र से भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। जसवंत सिंह खालड़ा से जुड़े मामलों में कार्य कर चुके कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि फिल्म में प्रस्तुत कई घटनाएं न्यायिक और जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड का हिस्सा रही हैं। उनके अनुसार किसी फिल्म को हटाने से इतिहास से जुड़े प्रश्न समाप्त नहीं होते, बल्कि सार्वजनिक बहस और अधिक तेज हो सकती है।

    दूसरी ओर कुछ पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों ने कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से भी इस विषय को देखने की जरूरत बताई है। उनका मानना है कि संवेदनशील विषयों पर आधारित सामग्री के प्रसारण के दौरान सामाजिक शांति और सार्वजनिक व्यवस्था को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ऐसे विषयों पर तथ्यात्मक चर्चा लोकतांत्रिक समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    फिल्म की रिलीज से पहले भी इसे लंबी सेंसर प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। बताया जाता है कि शुरुआती चरण में फिल्म के शीर्षक और सामग्री को लेकर कई स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ था। बाद में संशोधित शीर्षक के साथ इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जारी किया गया, लेकिन कुछ ही समय बाद भारत में इसकी उपलब्धता समाप्त हो गई, जिससे विवाद और गहरा गया।

    फिल्म हटाए जाने के बाद दिलजीत दोसांझ ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व और उनके संघर्ष से जुड़े विचारों को दबाया नहीं जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम के बाद ‘सतलुज’ एक फिल्म से आगे बढ़कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ऐतिहासिक विमर्श और सार्वजनिक संवाद से जुड़ा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है।