Tag: Saudi

  • मक्का पैक्ट से बदल सकते हैं मध्य पूर्व के समीकरण, IMEC को लेकर भारत के सामने उभरी नई रणनीतिक चुनौती

    मक्का पैक्ट से बदल सकते हैं मध्य पूर्व के समीकरण, IMEC को लेकर भारत के सामने उभरी नई रणनीतिक चुनौती

    नई दिल्ली ।मध्य पूर्व में बदलते रणनीतिक समीकरणों के बीच तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच उभर रहा मक्का पैक्ट अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। इस समझौते को क्षेत्रीय सुरक्षा और सहयोग की नई व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, इसके साथ भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे यानी IMEC की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मक्का पैक्ट और IMEC के पीछे क्षेत्रीय प्रभाव तथा संपर्क मार्गों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण काम कर रहे हैं। हालांकि, इसे सीधे तौर पर IMEC को रोकने के लिए बनाया गया गठबंधन मानने के पर्याप्त आधार अभी स्पष्ट नहीं हैं।

    IMEC में भारत के साथ संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन, इजरायल और यूरोपीय देशों की भागीदारी की परिकल्पना है। इस आर्थिक गलियारे का उद्देश्य भारत को मध्य पूर्व के रास्ते यूरोप से जोड़ना है। इसके तहत समुद्री और रेल संपर्क के माध्यम से व्यापार तथा परिवहन को बेहतर बनाने की योजना है। दूसरी ओर, मक्का पैक्ट से जुड़े क्षेत्रीय संपर्क और सुरक्षा सहयोग को लेकर अलग तरह की रणनीतिक चर्चाएं सामने आ रही हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम में तुर्की की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। IMEC की प्रस्तावित रूपरेखा में तुर्की को शामिल नहीं किया गया है। इस कारण क्षेत्रीय संपर्क व्यवस्था में उसकी स्थिति को लेकर पहले भी चर्चा होती रही है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन की क्षेत्रीय नीतियों और मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों को भी इस संदर्भ में देखा जा रहा है।

    अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों के कुछ विशेषज्ञों ने मक्का पैक्ट और IMEC के बीच संभावित प्रतिस्पर्धा का विश्लेषण किया है। उनका कहना है कि इस क्षेत्र में बन रही नई व्यवस्था को केवल आर्थिक गलियारों या रक्षा सहयोग तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे क्षेत्रीय नेतृत्व, व्यापारिक संपर्क और राजनीतिक प्रभाव जैसे कई मुद्दे जुड़े हुए हैं।

    मक्का रक्षा समझौते के तहत तीनों देशों ने सामूहिक रक्षा और सैन्य सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई है। समझौते की एक प्रमुख शर्त के अनुसार, किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला बाकी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। इसमें खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, रक्षा उद्योग में सहयोग, संयुक्त हथियार निर्माण और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में साझेदारी जैसे विषय भी शामिल हैं। हालांकि, इस व्यवस्था की वास्तविक भूमिका और प्रभाव को लेकर आगे के घटनाक्रम महत्वपूर्ण होंगे।

    इस रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम 15 अक्टूबर को अजरबैजान की राजधानी बाकू में देखने को मिला। एक क्षेत्रीय सम्मेलन के दौरान इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने संबोधन शुरू किया तो तुर्की के विदेश मंत्री हकन फिदान कार्यक्रम से बाहर चले गए। उनके साथ ईरान, पाकिस्तान, कुवैत, सऊदी अरब और फिलिस्तीनी प्राधिकरण के कुछ अधिकारी भी बाहर निकल गए। हालांकि, अजरबैजान के अधिकारी कार्यक्रम में मौजूद रहे।

    इस घटनाक्रम में मध्य एशिया के पांच देशों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उनके प्रतिनिधि सम्मेलन में मौजूद रहे और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव ने इजरायली राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय बैठक भी की। इससे संकेत मिला कि मध्य एशिया के देश तुर्की की क्षेत्रीय प्राथमिकताओं से अलग अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों को भी महत्व दे रहे हैं।

    मध्य पूर्व में अमेरिका की भूमिका को लेकर भी चर्चा हो रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय देश अब अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अधिक स्वतंत्र विकल्प तलाश रहे हैं। ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन से जुड़ी एसली आयदिनताशबाश ने मक्का पैक्ट को अमेरिका के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था विकसित करने की दिशा में एक शुरुआती प्रयोग के रूप में देखा है। वहीं, सोनार कागाप्टे ने समझौते में शामिल नहीं किए गए देशों के आधार पर इसके रणनीतिक उद्देश्य समझने की बात कही है।

    इस चर्चा में भारत, ईरान और इजरायल को तीन महत्वपूर्ण देशों के रूप में देखा जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि इन देशों को नई क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था से बाहर रखने की रणनीति हो सकती है। हालांकि, यह सभी विशेषज्ञों की एक समान राय नहीं है। मक्का पैक्ट को लेकर अलग-अलग आकलन मौजूद हैं और इसके वास्तविक प्रभाव का पता आगे के फैसलों तथा सदस्य देशों के आपसी सहयोग से ही चलेगा।

    भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी है क्योंकि IMEC में सऊदी अरब शामिल है, जबकि मक्का पैक्ट में भी उसकी प्रमुख भूमिका है। ऐसे में रियाद के सामने सुरक्षा सहयोग और आर्थिक संपर्क परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती हो सकती है। फिलहाल दोनों व्यवस्थाओं के बीच सीधा टकराव तय नहीं है। आने वाले समय में मध्य एशिया, दक्षिण काकेशस और खाड़ी क्षेत्र के देशों के फैसले यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि क्षेत्रीय व्यापार और सुरक्षा का नया ढांचा किस दिशा में आगे बढ़ता है।

  • यमन के ताइज पर सऊदी का हवाई हमला…. 13 की मौत, 10 लाख लोगों के सामने भुखमरी का संकट

    यमन के ताइज पर सऊदी का हवाई हमला…. 13 की मौत, 10 लाख लोगों के सामने भुखमरी का संकट


    सना।
    यमन (Yemen) के ताइज शहर (Ties City) में गुरुवार को सऊदी अरब (Saudi Arabia) के हवाई हमले में कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई. हूती विद्रोहियों (Houthi rebels) के नियंत्रण वाले स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसकी जानकारी दी है. वहीं, स्थानीय अधिकारियों ने दावा किया है कि हूती विद्रोहियों की घेराबंदी के कारण ताइज शहर में भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है. खाने-पीने की चीजों, पानी और रसोई गैस की भारी किल्लत के बीच शहर के करीब 10 लाख लोगों के सामने गंभीर मानवीय संकट खड़ा हो गया है।

    ताइज के गवर्नर नबील शमसान ने एक ब्रीफिंग में कहा, ‘शहर में भुखमरी की स्थिति बन चुकी है.’ उन्होंने बताया कि वह यह बयान मोर्चे से महज एक मील की दूरी पर दे रहे हैं। गवर्नर शमसान के मुताबिक, हूती विद्रोहियों ने शहर के बाहर स्थित पानी के आखिरी स्रोत पर भी कब्जा कर लिया है. इसके कारण ताइज को अब उसकी जरूरत के मुकाबले बेहद कम पानी मिल रहा है. शहर में रसोई गैस की आपूर्ति पूरी तरह बंद हो गई है. इसकी वजह से रेस्तरां बंद करने पड़े हैं और परिवार खाना पकाने के लिए लकड़ियां जलाने को मजबूर हैं. अस्पतालों में मरीजों के लिए ऑक्सीजन का भंडार भी लगभग खत्म हो चुका है।

    विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) ने बताया कि वह ताइज में मानवीय सहायता पर निर्भर छह लाख से अधिक लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है. इसके अलावा गेहूं के आटे का भंडार भी लगभग समाप्त हो गया है।


    अक्टूबर की शुरुआत से अब तक 271 लोगों की मौत

    गवर्नर नबील शमसान के मुताबिक, इस महीने की शुरुआत में सैन्य अभियान शुरू होने के बाद से 271 लोग मारे जा चुके हैं, जबकि 1,129 लोग घायल हुए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि बचाव कार्य में लगे लोगों और एंबुलेंस को भी निशाना बनाया जा रहा है. शमसान ने कहा, ‘जिन लोगों को बचाया जा सकता है, उन पर भी गोलाबारी की जाती है या स्नाइपर एंबुलेंस को निशाना बनाते हैं. हमें एक आम नागरिक की कार को एंबुलेंस की तरह इस्तेमाल करना पड़ा, लेकिन उस पर भी हमला किया गया.’


    ह्यूमन राइट्स वॉच ने जताई युद्ध अपराध की आशंका

    मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) ने गुरुवार को कहा कि अक्टूबर की शुरुआत से जारी ताइज की घेराबंदी युद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकती है, क्योंकि युद्ध के दौरान नागरिकों को भूखा रखना युद्ध के तरीके के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. ह्यूमन राइट्स वॉच की यमन शोधकर्ता निकू जाफरनिया ने कहा कि हूती विद्रोही ताइज की घेराबंदी के जरिए नागरिकों के सामने पैदा हुए मानवीय संकट को उचित नहीं ठहरा सकते.


    हूती नेता ने घेराबंदी के आरोपों को किया खारिज

    दूसरी ओर, हूती नेता अब्दुल मलिक अल-हूती ने ताइज की घेराबंदी की खबरों को खारिज किया है. उन्होंने इन आरोपों को ‘सऊदी अरब द्वारा गढ़े गए दावे’ बताया. हूती नियंत्रण वाले अल-मसीरा टीवी पर गुरुवार को प्रसारित संबोधन में उन्होंने कहा कि खाद्य सामग्री और मानवीय जरूरतों की आपूर्ति के लिए रास्ते खुले हैं. उनका दावा है कि हूती लड़ाके केवल उन हथियारों की आपूर्ति रोक रहे हैं, जो उनके मुताबिक सऊदी समर्थित मिलिशिया तक पहुंचाए जा रहे हैं.

    अगस्त से अब तक 1.24 लाख विस्थापित ताइज पहुंचे
    यमन के दूसरे हिस्सों में जारी संघर्ष के कारण बड़ी संख्या में लोग ताइज पहुंच रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र की प्रवासन एजेंसी के मुताबिक, अगस्त से अब तक करीब 1.24 लाख विस्थापित लोगों ने ताइज में शरण ली है. इससे शहर के पहले से सीमित संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है. यमन में 2014 में गृहयुद्ध शुरू हुआ था, जब हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना समेत देश के उत्तरी हिस्से के बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को निर्वासन में जाना पड़ा।

    ताइज तभी से संघर्ष का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. शहर के मध्य हिस्से पर सरकारी बलों का कंट्रोल है, जबकि आसपास की सड़कों पर हूती विद्रोहियों का कब्जा है।

  • सऊदी अरब में सुरक्षा चिंताओं से उड़ानें प्रभावित, एयर इंडिया समेत कई कंपनियों ने सेवाएं कीं रद्द

    सऊदी अरब में सुरक्षा चिंताओं से उड़ानें प्रभावित, एयर इंडिया समेत कई कंपनियों ने सेवाएं कीं रद्द

    नई दिल्ली ।सऊदी अरब में सुरक्षा स्थिति को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच भारतीय विमानन कंपनियों ने कई शहरों के लिए अपनी उड़ान सेवाएं अस्थायी रूप से निलंबित कर दी हैं। एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस ने रियाद, जेद्दा तथा दम्माम के लिए आने-जाने वाली उड़ानें 20 अक्टूबर 2026 तक रद्द रखने का फैसला किया है। वहीं, इंडिगो और अकासा एयर ने भी कुछ सऊदी गंतव्यों के लिए अपनी सेवाओं को अलग-अलग तारीखों तक स्थगित कर दिया है।
    एयर इंडिया ने यात्रियों के लिए जारी यात्रा परामर्श में बताया कि सऊदी अरब में विकसित हो रही स्थिति को देखते हुए रियाद, दम्माम और जेद्दा से संबंधित उसकी सभी उड़ानें 20 अक्टूबर तक संचालित नहीं होंगी। कंपनी ने स्पष्ट किया कि रद्द उड़ानों से प्रभावित यात्रियों को पूरा रिफंड दिया जाएगा। एयरलाइन ने कहा कि यात्रियों और चालक दल की सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
    एयर इंडिया एक्सप्रेस ने भी अपने परिचालन से जुड़ी जानकारी साझा करते हुए दम्माम, जेद्दा और रियाद के लिए आने-जाने वाली उड़ानों का निलंबन 20 अक्टूबर तक बढ़ाने की घोषणा की है। कंपनी के अनुसार, वह क्षेत्र की स्थिति पर लगातार नजर रख रही है और आवश्यकता के मुताबिक उड़ानों के संचालन की समीक्षा करेगी। प्रभावित यात्रियों को सहायता उपलब्ध कराने के लिए संबंधित टीमें काम कर रही हैं।
    एयर इंडिया एक्सप्रेस ने रद्द उड़ानों के यात्रियों को दो विकल्प दिए हैं। वे बिना अतिरिक्त शुल्क के अपनी यात्रा की तारीख बदल सकते हैं या टिकट का पूरा रिफंड ले सकते हैं। यात्रियों को अपनी यात्रा की योजना बनाते समय इन विकल्पों और उड़ान की मौजूदा स्थिति की जानकारी लेने की सलाह दी गई है।
    इससे पहले इंडिगो ने भी सऊदी अरब की स्थिति का आकलन करने के बाद रियाद, जेद्दा, दम्माम और मदीना के लिए तथा वहां से संचालित उड़ानों को 24 अक्टूबर 2026 तक रद्द रखने की घोषणा की थी। इस फैसले से इन शहरों के बीच यात्रा करने वाले यात्रियों को अपनी योजनाओं में बदलाव करना पड़ सकता है। हालांकि, उड़ानों की बहाली को लेकर अंतिम निर्णय स्थिति की समीक्षा के आधार पर लिया जाएगा।
    अकासा एयर ने भी सऊदी अरब के लिए अपनी सेवाओं पर अस्थायी रोक बढ़ाई है। एयरलाइन ने रियाद से आने-जाने वाली उड़ानों का निलंबन 24 अक्टूबर तक और जेद्दा के लिए उड़ानों का निलंबन 21 अक्टूबर तक बढ़ाने की जानकारी दी है। प्रभावित यात्रियों को पूरा रिफंड लेने या बिना अतिरिक्त शुल्क के यात्रा की तारीख बदलने का विकल्प दिया गया है।
    अलग-अलग एयरलाइंस की ओर से घोषित तारीखों में अंतर होने के कारण यात्रियों के लिए अपनी संबंधित उड़ान की जानकारी अलग से जांचना जरूरी है। फिलहाल एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस ने 20 अक्टूबर तक, जबकि इंडिगो ने 24 अक्टूबर तक कुछ सेवाएं रद्द रखने की घोषणा की है। अकासा एयर की ओर से रियाद और जेद्दा के लिए अलग-अलग समयसीमा तय की गई है।
    एयरलाइंस ने यात्रियों को हवाई अड्डे के लिए रवाना होने से पहले अपनी उड़ान की स्थिति की पुष्टि करने की सलाह दी है। साथ ही, टिकट बुकिंग के दौरान दिया गया मोबाइल नंबर और ईमेल पता अपडेट रखने को कहा गया है, ताकि उड़ान में बदलाव या रद्द होने की स्थिति में जरूरी सूचना समय पर मिल सके।
    सऊदी अरब में स्थिति की लगातार समीक्षा के बीच उड़ान सेवाओं की बहाली इस बात पर निर्भर करेगी कि परिचालन को सुरक्षित तरीके से दोबारा शुरू करना कब संभव होता है। यात्रियों को सलाह दी गई है कि वे यात्रा से पहले अपनी एयरलाइन से संपर्क करें और रिफंड या पुनर्निर्धारण से संबंधित विकल्पों की जानकारी लेकर ही आगे की योजना बनाएं।
  • हूतियों के हमलों से दहला सऊदी… दुनिया की सबसे बड़ी ऑयल कंपनी अरामको पर दागी मिसाइल

    हूतियों के हमलों से दहला सऊदी… दुनिया की सबसे बड़ी ऑयल कंपनी अरामको पर दागी मिसाइल


    नई दिल्ली।
    सऊदी अरब (Saudi Arabia) और यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) के बीच छिड़ा संघर्ष अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है. मंगलवार देर रात सऊदी अरब के पूर्वी शहर धहरान (Dharan) में दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी ‘सऊदी अरामको’ (World’s Largest oil company, ‘Saudi Aramco’) के प्रशासनिक परिसर को बैलिस्टिक मिसाइल से निशाना बनाया गया. सऊदी सरकारी समाचार एजेंसी एसपीए ने बुधवार को ऊर्जा मंत्रालय के एक अधिकारी के हवाले से बताया कि हमले के बाद इमारत में आग लगी, लेकिन किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि मिसाइल हमले में ऑफिस बिल्डिंग की ऊपरी तीन मंजिलों को नुकसान पहुंचा. सूत्र और मामले से परिचित दो अन्य लोगों ने इमारत में आग लगने की जानकारी दी. हालांकि, हमले की जिम्मेदारी को लेकर उपलब्ध रिपोर्ट में स्वतंत्र पुष्टि नहीं दी गई है।

    अरामको का यह परिसर कंपनी के एक प्रमुख संचालन केंद्र के रूप में काम करता है. दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनियों में शामिल अरामको सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था का अहम आधार है. इसके संचालन नेटवर्क में तेल के कुएं, पाइपलाइन, रिफाइनरी और निर्यात टर्मिनल शामिल हैं।


    रियाद समेत कई इलाकों में मिसाइल और ड्रोन नष्ट करने का दावा

    सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने बताया कि धहरान के ऊपर रोकी गई एक मिसाइल के टुकड़े आवासीय इलाके में गिरे. हालांकि, इससे हुए नुकसान के बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दी गई. अधिकारियों ने रियाद और देश के दक्षिणी हिस्से में भी मिसाइलों तथा ड्रोन को रोककर नष्ट करने की जानकारी दी।

    इससे पहले मंगलवार को सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में हूतियों को बार-बार हमले करने के गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई थी.

    रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक सप्ताह से हूती विद्रोही सऊदी अरब के अहम ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले कर रहे हैं. इनमें राजधानी रियाद का हवाई अड्डा भी शामिल है. शनिवार को रियाद हवाई अड्डे पर हुए बैलिस्टिक मिसाइल हमले में 13 लोगों की मौत की जानकारी दी गई थी. रिपोर्ट इसे पिछले एक दशक में सऊदी अरब पर हुआ सबसे घातक हमला बताती है. लगातार हमलों के कारण देश में उड़ान सेवाएं भी प्रभावित हुईं. यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया, जब सऊदी अरब में एक बड़े ऊर्जा सम्मेलन का आयोजन हो रहा था।


    हूतियों ने पहले ही अरामको को दी थी धमकी

    धहरान पर हमले से पहले हूती प्रवक्ता याह्या सरी ने यमन की राजधानी सना पर सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के हमलों के जवाब में ‘कड़ी और दर्दनाक’ कार्रवाई की चेतावनी दी थी. उनके मुताबिक, संभावित निशानों में धहरान स्थित अरामको मुख्यालय और रियाद की एक तेल रिफाइनरी शामिल थे.हूतियों ने सऊदी अरब में तेल क्षेत्र के कर्मचारियों को भी उन ठिकानों से दूर रहने की चेतावनी दी थी, जिन्हें वे संभावित लक्ष्य मानते हैं।


    सना में तेल डिपो पर भी हमला

    हूती विद्रोहियों ने मंगलवार को आरोप लगाया कि सऊदी अरब सना पर हमले कर रहा है. दूसरी ओर, सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन की राजधानी के बाहरी इलाके में स्थित एक तेल डिपो से नागरिकों को दूर रहने की चेतावनी दी. हूती संचालित अल-मसीरा टेलीविजन ने बताया कि गठबंधन ने यमन पेट्रोलियम कंपनी के सबाह केंद्रीय स्टेशन को निशाना बनाया. यह ईंधन डिपो सना के बाहर स्थित है. गठबंधन ने स्टेशन और अन्य ठिकानों पर हमले की पुष्टि की. उसका कहना था कि कार्रवाई का उद्देश्य हूतियों की सऊदी अरब, यमन और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों को खतरा पहुंचाने की क्षमता को कमजोर करना था।

  • मरीब की ओर बढ़े बनी हशीश के हथियारबंद लड़ाके, हूतियों की ताकत बढ़ने से सऊदी की बढ़ी चिंता

    मरीब की ओर बढ़े बनी हशीश के हथियारबंद लड़ाके, हूतियों की ताकत बढ़ने से सऊदी की बढ़ी चिंता


    नई दिल्ली। यमन में कबीलाई ताकत और आधुनिक हथियारों का गठजोड़ एक बार फिर क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने वाला है। राजधानी सना के पूर्वी पहाड़ी इलाकों से बनी हशीश कबीले के हथियारबंद लड़ाकों की बड़ी लामबंदी मरीब की दिशा में हुई है। लड़ाकों के हाथों में AK-47, रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड और अन्य आधुनिक हथियार दिखाई दे रहे हैं। इस काफिले में युवा और अधेड़ लड़ाकों के साथ 8-10 साल के बच्चे भी नजर आ रहे हैं। हूतियों के समर्थन में हुई यह लामबंदी सऊदी अरब के लिए इसलिए अहम है, क्योंकि मरीब लंबे समय से हूती विरोधी ताकतों का प्रमुख गढ़ रहा है।

    सदियों पुरानी कबीलाई ताकत का नया चेहरा

    यमन के पहाड़ी इलाकों से निकल रहे इस काफिले में परंपरागत पोशाक और जाम्बिया पहने लड़ाके भी दिखाई दे रहे हैं। फर्क इतना है कि पुराने दौर के घोड़ों और तलवारों की जगह अब पिकअप ट्रक, मशीनगन और रॉकेट लॉन्चर हैं।

    बनी हशीश कबीले का क्षेत्र सना के पूर्व में पहाड़ों में फैला है। राजधानी के बेहद करीब होने के कारण इसका रणनीतिक महत्व काफी बड़ा है। यहां प्रभाव रखने वाली ताकतें सना के पूर्वी रास्तों और आसपास के इलाकों पर असर डाल सकती हैं।

    यमन में जनजातियां केवल सामाजिक इकाइयां नहीं रही हैं। दशकों से उनका राजनीतिक और सैन्य प्रभाव भी रहा है। बनी हशीश इसी कबीलाई शक्ति का उदाहरण है।

    कभी हूतियों से हुई थी खूनी लड़ाई

    हूतियों और बनी हशीश के रिश्ते हमेशा से एक जैसे नहीं रहे। 2000 के दशक में हुसैन बद्र अल-दीन अल-हूती के नेतृत्व में आंदोलन उभरने और 2004 के बाद हूती विद्रोह शुरू होने के दौरान उत्तरी यमन की कई जनजातियां बदलते सत्ता समीकरणों में उलझी थीं।

    2008-09 के आसपास बनी हशीश के कुछ हिस्सों और हूती लड़ाकों के बीच गंभीर संघर्ष हुआ था। उस समय दोनों पक्ष एक-दूसरे के विरोध में खड़े थे।

    हालात 2014 में बदले, जब हूतियों ने सना पर कब्जा कर लिया। इसके बाद राजधानी और उसके आसपास के इलाकों में उनका सैन्य प्रभाव तेजी से बढ़ा। कई स्थानीय जनजातियां या तो हूतियों के साथ आ गईं या उनके नियंत्रण में चली गईं। बनी हशीश भी इसी बदलाव का हिस्सा बना।

    आज कबीले के कई प्रभावशाली लोग और लड़ाके हूती नेटवर्क से जुड़े बताए जाते हैं। इसलिए बनी हशीश की लामबंदी हूती नेतृत्व के लिए स्थानीय समर्थन के साथ-साथ सैन्य क्षमता बढ़ाने का जरिया भी मानी जाती है।

    मरीब ही क्यों बना निशाना?

    मरीब सना से करीब 175 किलोमीटर पूर्व में उत्तर-मध्य यमन में स्थित है। इसके पश्चिम में सना, उत्तर में अल-जौफ, दक्षिण में अल-बैदा और शबवा तथा पूर्व में हद्रमौत है। भौगोलिक स्थिति के कारण यह राजधानी और यमन के पूर्वी रेगिस्तानी इलाकों के बीच महत्वपूर्ण संपर्क क्षेत्र है।

    मरीब की अहमियत केवल उसके स्थान तक सीमित नहीं है। यह यमन के प्रमुख तेल और गैस क्षेत्रों में शामिल है। 1980 के दशक में यहां बड़े व्यावसायिक तेल भंडार मिले थे। तेल और गैस के अलावा यहां देश का एक महत्वपूर्ण बिजली संयंत्र भी है। मरीब, शबवा और हद्रमौत को मिलाकर यमन का प्रमुख तेल-गैस बेल्ट बनता है।

    यही वजह है कि मरीब पर नियंत्रण की लड़ाई में सत्ता के साथ ऊर्जा संसाधनों का सवाल भी जुड़ा हुआ है।

    हूतियों के लिए मरीब पर कब्जा क्यों अहम

    मरीब लंबे समय से हूती विरोधी यमनी सरकार और स्थानीय कबीलों का मजबूत गढ़ रहा है। ऐसे में यहां अपनी पकड़ बनाना हूतियों के लिए कई मोर्चों पर फायदा दे सकता है।

    मरीब पर दबाव बढ़ने से सना के पूर्व में हूतियों की स्थिति मजबूत होगी। साथ ही उन्हें यमन के ऊर्जा संसाधनों के करीब पहुंच और पूर्वी इलाकों की ओर रणनीतिक रास्तों पर प्रभाव हासिल करने का मौका मिल सकता है।

    2021 में भी हूती सेना ने मरीब पर कब्जे के लिए बड़ा अभियान चलाया था। हालांकि स्थानीय कबीलों और सरकार समर्थक बलों ने उनका मुकाबला किया और हूतियों को सफलता नहीं मिली।

    अब 2026 में फिर बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच मरीब महत्वपूर्ण हो गया है। पश्चिमी यमन में हूतियों ने बड़े इलाकों और रणनीतिक बंदरगाहों पर बढ़त बनाई है, जबकि दूसरी ओर सऊदी समर्थित यमनी बल उनके खिलाफ दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

    सऊदी अरब की चिंता सिर्फ मरीब तक सीमित नहीं

    बनी हशीश की यह लामबंदी सीधे सऊदी अरब की सुरक्षा चिंता से भी जुड़ती है। मरीब फिलहाल सऊदी समर्थित यमनी सरकारी सेना के नियंत्रण में है और यह इलाका सना से सऊदी सीमा की ओर जाने वाले रणनीतिक क्षेत्र का हिस्सा है।

    यदि हूती मरीब पर कब्जा करने में सफल होते हैं तो सना के पूर्व में उनकी पकड़ मजबूत हो सकती है। इसके साथ ही तेल-गैस संसाधनों और रणनीतिक मार्गों तक उनकी पहुंच बढ़ने की आशंका है।

    सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि मरीब में हूतियों की स्थिति मजबूत होने पर उन्हें सऊदी सीमा की दिशा में रणनीतिक दबाव बढ़ाने के लिए बेहतर भौगोलिक स्थिति मिल सकती है। इससे मिसाइल और ड्रोन हमलों के लिए उनका ऑपरेशनल स्पेस और संसाधन भी बढ़ सकता है।

    यानी बनी हशीश की पहाड़ों से हुई यह लामबंदी सिर्फ एक कबीले के लड़ाकों की आवाजाही नहीं है। इसके पीछे मरीब की सत्ता, यमन के तेल-गैस संसाधन और सऊदी अरब की सुरक्षा—तीनों के समीकरण जुड़े हुए हैं।

  • सऊदी पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान ने ईरान को दी चेतावनी, तेहरान ने कहा- हूतियों पर हमारा नियंत्रण नहीं

    सऊदी पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान ने ईरान को दी चेतावनी, तेहरान ने कहा- हूतियों पर हमारा नियंत्रण नहीं

    नई दिल्ली । सऊदी अरब पर हूतियों के बढ़ते हमलों के बीच पाकिस्तान ने ईरान को बड़ी चेतावनी दी है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान ने पिछले 24 घंटे के दौरान तेहरान तक यह संदेश पहुंचाया है कि वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके हूतियों को सऊदी अरब पर हमले रोकने के लिए कहे। ईरान को यह मैसेज तब दिया गया है जब हूतियों ने बीते दिनों सऊदी के तेल ठिकानों पर हमले किए थे।

    पाकिस्तान की इस दखल को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि वह लंबे समय से सऊदी अरब और ईरान, दोनों के साथ अपने रिश्तों को संभालता रहा है। अब इस्लामाबाद को डर है कि हूती हमले अगर और बढ़े तो प्रॉक्सी जंग एक बड़े क्षेत्रीय सुरक्षा संकट में बदल सकती है।

    ईरान बोला- हूतियों पर हमारा कंट्रोल नहीं

    एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने पुष्टि की है कि पाकिस्तान ने मंगलवार को तेहरान तक अपना संदेश पहुंचाया था। ईरान की तरफ से जवाब दिया गया कि ईरान हूतियों को कंट्रोल नहीं करता। हालांकि, दो ईरानी सूत्रों ने अलग दावा किया है। उनके मुताबिक, तेहरान ने पिछले हफ्ते हूतियों से सऊदी अरब पर हमले करने को कहा था।

    दावा है कि ईरान ने इसके लिए अतिरिक्त पैसा और हथियार देने का वादा भी किया था। साथ ही इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC के कई कमांडर हमलों के तालमेल में मदद के लिए यमन पहुंचे थे।

    सऊदी की रक्षा में पाकिस्तान-तुर्की की तैयारी

    पाकिस्तान की चेतावनी का एक बड़ा कारण सऊदी अरब के साथ उसका डिफेंस पैक्ट भी है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पहले ही कहा है कि अगर हमले सऊदी की जमीन तक फैलते हैं तो रियाद, अंकारा और इस्लामाबाद के बीच ज्वाइंट सिक्योरिटी अरेंजमेंट सामने आ सकता है।

    रिपोर्ट में बताया गया है कि सऊदी अधिकारियों ने रियाद में पाकिस्तान और तुर्की के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से मुलाकात की है। तीनों देशों के बीच इस बात पर सहमति बनी है कि उनकी सेनाएं यमन में दाखिल नहीं होंगी और किसी भी जवाबी कार्रवाई को सऊदी की जमीन से अंजाम दिया जाएगा।

  • भारत से तनाव के बीच बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके की चुनौतियां पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति पर भारी

    भारत से तनाव के बीच बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके की चुनौतियां पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति पर भारी

    नई दिल्ली । पाकिस्तान इस समय कई स्तरों पर सुरक्षा और रणनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। भारत के साथ जारी तनाव के अलावा बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अफगानिस्तान से जुड़े मुद्दे उसकी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। इसी बीच ईरान और उसके समर्थक समूहों से जुड़ी संभावित परिस्थितियां भी पाकिस्तान के सामने अतिरिक्त दबाव पैदा कर रही हैं।

    हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का रक्षा समझौते ने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को लेकर चर्चा बढ़ा दी है। इस समझौते को व्यापक इस्लामी सुरक्षा ढांचे की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान के लिए इसकी वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने मौजूदा सुरक्षा संकटों से किस तरह निपटता है।

    पाकिस्तान के सामने सबसे प्रमुख चुनौती भारत से जुड़ा सुरक्षा तनाव है। पिछले वर्ष मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाए जाने का दावा किया गया था। इसके बाद पाकिस्तान के रक्षा ढांचे और एयरबेस की क्षमता को लेकर भी सवाल उठे।

    पाकिस्तान के भीतर बलूचिस्तान लंबे समय से सुरक्षा संकट का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। अलगाववादी गतिविधियों और हिंसक घटनाओं ने इस क्षेत्र में सरकार के नियंत्रण को चुनौती दी है। खैबर पख्तूनख्वा में भी आतंकवादी गतिविधियां पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों के लिए लगातार परेशानी का कारण बनी हुई हैं।

    पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी राजनीतिक और सामाजिक असंतोष से जूझ रहा है। दूसरी ओर अफगानिस्तान के साथ सीमा और सुरक्षा संबंधी तनाव पाकिस्तान के लिए अलग चुनौती पेश करता है। इन परिस्थितियों के बीच ईरान के साथ क्षेत्रीय समीकरण भी महत्वपूर्ण हो गए हैं, खासकर तब जब मध्य पूर्व में तनाव का प्रभाव आसपास के देशों पर पड़ रहा है।

    तुर्की और सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग पाकिस्तान को राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन दे सकता है, लेकिन इससे उसकी सभी आंतरिक समस्याओं का समाधान अपने आप नहीं हो जाता। तुर्की नाटो का सदस्य है और उसकी अपनी मजबूत सैन्य क्षमता है। सऊदी अरब के लिए भी ईरान और हूती गतिविधियों से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां लंबे समय से महत्वपूर्ण रही हैं।

    भारत ने भी क्षेत्रीय स्तर पर अपने रक्षा और रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया है। ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया के साथ भारत के संबंधों में रक्षा सहयोग का महत्व बढ़ा है। इजरायल के साथ भारत की सैन्य और तकनीकी साझेदारी भी लंबे समय से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

    ऐसे में मक्का रक्षा समझौता पाकिस्तान को एक व्यापक सुरक्षा ढांचे से जोड़ने की कोशिश जरूर है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके अपने घरेलू हालात हैं। यदि बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके जैसे क्षेत्रों में अस्थिरता बनी रहती है, तो बाहरी रक्षा सहयोग के बावजूद पाकिस्तान पर सुरक्षा और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

    पाकिस्तान के लिए आने वाला समय इस लिहाज से महत्वपूर्ण रहेगा कि वह इन अलग-अलग मोर्चों पर एक साथ बढ़ते दबाव को किस तरह नियंत्रित करता है। सऊदी अरब और तुर्की का समर्थन उसके लिए रणनीतिक सहारा हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक क्षमता को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी होगा।

  • जंगल से ‘गुलेल’ की तरह मिसाइल-ड्रोन लॉन्च कर रहे हूती, सऊदी की तेल फैसिलिटी पर हमला

    जंगल से ‘गुलेल’ की तरह मिसाइल-ड्रोन लॉन्च कर रहे हूती, सऊदी की तेल फैसिलिटी पर हमला


    नई दिल्ली। यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब और यमन के रणनीतिक ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों का वीडियो जारी किया है। फुटेज में हूती लड़ाके खुले मैदानों और जंगल जैसे इलाकों से एक के बाद एक मिसाइल और ड्रोन लॉन्च करते दिखाई दे रहे हैं। लॉन्चिंग का तरीका ऐसा नजर आता है, मानो किसी गुलेल से निशाना साधकर प्रोजेक्टाइल छोड़ा जा रहा हो। हूतियों की ओर से यह वीडियो ऐसे समय जारी किया गया है, जब संगठन ने सऊदी अरब की एक अहम तेल सुविधा और यमन के मोखा बंदरगाह को निशाना बनाने का दावा किया है।

    जिजान में अरामको रिफाइनरी से जुड़ी सुविधा पर ड्रोन हमला
    हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने दावा किया कि हमलों में सऊदी सैनिकों की मौजूदगी वाले इलाकों और हथियारों के गोदामों को निशाना बनाया गया। इसी दौरान सऊदी अरब के जिजान में स्थित अरामको रिफाइनरी से जुड़ी एक सुविधा पर ड्रोन हमला किए जाने का भी दावा किया गया। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने एक सुविधा में आग लगने की पुष्टि की। हालांकि, आग पर बाद में काबू पा लिया गया। घटना में किसी के घायल होने की खबर नहीं है।

    मोखा बंदरगाह पर हमले में 7 लोगों की मौत
    हूतियों के हमले का दूसरा बड़ा निशाना यमन का मोखा बंदरगाह बना। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार के नियंत्रण में है और लाल सागर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के करीब स्थित है। यमनी सरकार से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, हमले में कम से कम 7 लोगों की मौत हुई। मृतकों में चार सैनिक और तीन नागरिक शामिल हैं। वहीं, 30 नागरिकों के घायल होने की जानकारी सामने आई है। हमले में बंदरगाह की इमारतों, पियर्स और वहां रखे सामान को नुकसान पहुंचा।

    मिसाइल और ड्रोन के साथ मानवरहित नाव का भी दावा
    हूतियों ने इन हमलों को सऊदी ड्रोन के यमन के हज्जाह और सादा प्रांतों में घुसने की कार्रवाई का जवाब बताया है। यमनी सेना के मुताबिक, हमले में मिसाइल और ड्रोन के अलावा विस्फोटकों से लदी एक मानवरहित नाव के इस्तेमाल की कोशिश भी की गई। जारी वीडियो में हूती लड़ाकों को अलग-अलग स्थानों से मिसाइल और ड्रोन लॉन्च करते हुए दिखाया गया है। इससे संगठन की हमले करने की रणनीति और इस्तेमाल किए जा रहे हथियारों को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।

    2022 के बाद फिर बढ़ सकती है क्षेत्रीय अशांति
    इन घटनाओं ने यमन में 2022 के बाद से बनी अपेक्षाकृत शांत स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मोखा बंदरगाह बाब-अल-मंदेब के नजदीक है, जो वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है। ऐसे में यदि इलाके में हूती हमले और जवाबी सैन्य कार्रवाई बढ़ती है, तो इसका असर केवल यमन और सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहेगा। लाल सागर के समुद्री व्यापार मार्गों के साथ-साथ क्षेत्र की शिपिंग और ऊर्जा सुरक्षा पर भी इसका असर पड़ सकता है।

  • ईरान से बातचीत पर अमेरिका ने गिनाए प्रमुख साझेदार, पाकिस्तान का नाम गायब रहने से बढ़ी राजनीतिक चर्चा

    ईरान से बातचीत पर अमेरिका ने गिनाए प्रमुख साझेदार, पाकिस्तान का नाम गायब रहने से बढ़ी राजनीतिक चर्चा


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत की प्रक्रिया जारी है और इसमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात तथा कतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि उन्होंने अपने बयान में पाकिस्तान का कोई उल्लेख नहीं किया, जिससे क्षेत्रीय कूटनीतिक समीकरणों को लेकर नई अटकलें शुरू हो गई हैं।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान की ओर से बातचीत की पहल हुई है और कई क्षेत्रीय देशों के सहयोग से संवाद आगे बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सऊदी अरब, यूएई और कतर इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ट्रंप के बयान में पाकिस्तान का नाम शामिल नहीं होने को कई विश्लेषक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    पिछले कुछ समय से पाकिस्तान स्वयं को अमेरिका और ईरान के बीच संभावित मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता रहा है। इस दौरान उसने दोनों देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखने की रणनीति अपनाई। लेकिन ट्रंप के ताजा बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि मौजूदा वार्ता प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका सीमित या नगण्य मानी जा रही है।

    विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं रहे हैं। ईरान पहले भी पाकिस्तान की विदेश नीति और अमेरिका के साथ उसके संबंधों को लेकर सवाल उठाता रहा है। वहीं अमेरिका के कुछ नेताओं ने भी समय-समय पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर चिंता जताई है। ऐसे माहौल में ट्रंप का बयान क्षेत्रीय कूटनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत माना जा रहा है।

    हाल के महीनों में पाकिस्तान को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और दावों ने भी चर्चा को प्रभावित किया है। कुछ रिपोर्टों में पाकिस्तान, चीन और ईरान के बीच रक्षा सहयोग तथा हथियारों की आपूर्ति से जुड़े दावे किए गए थे। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। इन घटनाक्रमों के बीच पाकिस्तान की संभावित भूमिका पर भी बहस जारी है।

    इसी दौरान ट्रंप ने ईरान को परमाणु समझौते के मुद्दे पर भी कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यदि ईरान समझौते का अवसर नहीं अपनाता है तो उसे गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। ट्रंप के अनुसार मौजूदा समय किसी सकारात्मक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण अवसर है और सभी पक्षों को इसका लाभ उठाना चाहिए।

    हालांकि दूसरी ओर ईरान ने अमेरिका के साथ किसी औपचारिक वार्ता की बात से इनकार किया है। ईरानी पक्ष का कहना है कि ऐसी किसी प्रत्यक्ष बातचीत की पुष्टि नहीं की जा सकती। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच संवाद को लेकर अभी भी अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं और स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

    अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों में क्षेत्रीय सहयोगी देशों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या किसी नए समझौते का रास्ता निकलता है, इस पर वैश्विक समुदाय की नजर बनी रहेगी। साथ ही पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर भी आगे के घटनाक्रम महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

  • सऊदी टैंकरों पर हमले के बाद पाकिस्तान की सिर्फ बयानबाजी, रक्षा समझौते के बावजूद किया किनारा

    सऊदी टैंकरों पर हमले के बाद पाकिस्तान की सिर्फ बयानबाजी, रक्षा समझौते के बावजूद किया किनारा


    नई दिल्‍ली । पाकिस्तान (Pakistan) के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (PM Shehbaz Sharif) के सामने जब सऊदी अरब (Saudi Arabia) को दिया वादा निभाने की जिम्मेदारी आई तो उन्होंने अपना असली रंग दिखा दिया. लाल सागर में जब हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के तेल टैंकर पर हमला किया तो पाकिस्तान ने जी भरकर इसकी आलोचना की. शहबाज शरीफ ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस (Crown Prince) को फोन लगाकर उनके साथ सॉलिडरिटी जताई, सऊदी को बिरादर मुल्क बताया, हूतियों की निंदा की. लेकिन असल एक्शन के नाम पर पाकिस्तान के पास जुबानी जमा खर्च करने के अलावा कुछ नहीं था.

    सवाल है कि शहबाज शरीफ ने सऊदी अरब के साथ कौन सा कमिटमेंट किया है. बताना चाहेंगे कि सऊदी अरब और पाकिस्तान ने डिफेंस डील किया है. इसके तहत दोनों देशों ने कहा है कि एक के ऊपर हमला दूसरे पर भी अटैक माना जाएगा और दोनों देश मिलकर इस हमले का जवाब देंगे.

    यमन के ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों ने गुरुवार तड़के लाल सागर में सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों पर हमला किया. सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते के मुताबिक पाकिस्तान को ऐसे किसी सिचुएशन में सऊदी अरब की तरफ से हूती विद्रोहियों को जवाब देकर अपना सिक्योरिटी कमिटमेंट पूरा करना चाहिए था.

    कहां गया सऊदी-पाकिस्तान का डिफेंस डील
    लेकिन इस दौरान पाकिस्तान खामोश रहा. यहां अहम यह है कि पाकिस्तान ईरान का भी हितैषी होने का गेम खेल रहा है. ईरान के गृह मंत्री ने हाल ही में पाकिस्तान का दौरा खत्म किया है. इस दौरान ईरान-पाकिस्तान ने दोस्ती को नई ऊंचाई पर ले जाने का वादा किया.

    पाकिस्तान के सामने समस्या यह है कि हूती विद्रोही ईरान के इशारे पर ही चलते हैं. अगर पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ कुछ करता है तो वह ईरान की दुश्मनी मोल लेगा. जिसके साथ उसकी लंबी सीमा है. लेकिन अगर पाकिस्तान लाल सागर में सऊदी अरब के टैंकरों पर हमला कर रहे हूती विद्रोहियों पर कोई एक्शन नहीं लेता है तो इससे सऊदी अरब को उसकी असलियत समझ आ जाएगी.

    ऐसी हरकतें मंज़ूर नहीं
    फिलहाल इस बार जब हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में सऊदी अरब के दो टैंकरों को ब्लास्ट कर आग के हवाले कर दिया तो पाकिस्तान ने क्राउन प्रिंस सलमान को फोन कर एक बार फिर से बड़े बड़े वादे किए.

    पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि उन्होंने लाल सागर में सऊदी टैंकरों पर हूतियों के हमले की निंदा की है और उन्हें चेतावनी दी है. शहबाज ने एक्स पर लिखा, “आज सुबह मैंने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री, महामहिम प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद से टेलीफ़ोन पर बातचीत की. मैंने लाल सागर में सऊदी तेल टैंकरों पर हूतियों के हमलों की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा की. ऐसी हरकतें मंज़ूर नहीं हैं; ये अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन करती हैं, समुद्री आवाजाही की आज़ादी के लिए खतरा हैं और क्षेत्रीय शांति व सुरक्षा को कमज़ोर करती हैं.”

    पाक विदेश मंत्रालय की चेतावनी
    बाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने हूती विद्रोहियों को चेतावनी देकर जरूर भड़ास निकाली. हालांकि पाकिस्तान की ये चेतावनी उसके जहाजों पर हमलों की आशंका को लेकर थी. पाकिस्तान ने कहा कि लाल सागर में उसके झंडे वाले जहाजों या समुद्री हितों के खिलाफ किसी भी हमले का तुरंत जवाब दिया जाएगा. उसने चेतावनी दी कि ऐसी हरकतों को उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए “गंभीर खतरा” माना जाएगा.

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि पाकिस्तानी झंडे वाले जहाजों या उसके कमर्शियल जहाजों पर किसी भी हमले को “पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा और उसका तुरंत जवाब दिया जाएगा.”

    हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की घोषणा की है. उन्होंने कहा था कि वे बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में सऊदी जहाजों को रोकेंगे. यह कदम उन्होंने यमन में बंदरगाहों और हवाई अड्डों की रियाद द्वारा की गई नाकेबंदी के जवाब में उठाया है.