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  • भारत से तनाव के बीच बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके की चुनौतियां पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति पर भारी

    भारत से तनाव के बीच बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके की चुनौतियां पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति पर भारी

    नई दिल्ली । पाकिस्तान इस समय कई स्तरों पर सुरक्षा और रणनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। भारत के साथ जारी तनाव के अलावा बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अफगानिस्तान से जुड़े मुद्दे उसकी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। इसी बीच ईरान और उसके समर्थक समूहों से जुड़ी संभावित परिस्थितियां भी पाकिस्तान के सामने अतिरिक्त दबाव पैदा कर रही हैं।

    हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का रक्षा समझौते ने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को लेकर चर्चा बढ़ा दी है। इस समझौते को व्यापक इस्लामी सुरक्षा ढांचे की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान के लिए इसकी वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने मौजूदा सुरक्षा संकटों से किस तरह निपटता है।

    पाकिस्तान के सामने सबसे प्रमुख चुनौती भारत से जुड़ा सुरक्षा तनाव है। पिछले वर्ष मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाए जाने का दावा किया गया था। इसके बाद पाकिस्तान के रक्षा ढांचे और एयरबेस की क्षमता को लेकर भी सवाल उठे।

    पाकिस्तान के भीतर बलूचिस्तान लंबे समय से सुरक्षा संकट का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। अलगाववादी गतिविधियों और हिंसक घटनाओं ने इस क्षेत्र में सरकार के नियंत्रण को चुनौती दी है। खैबर पख्तूनख्वा में भी आतंकवादी गतिविधियां पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों के लिए लगातार परेशानी का कारण बनी हुई हैं।

    पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी राजनीतिक और सामाजिक असंतोष से जूझ रहा है। दूसरी ओर अफगानिस्तान के साथ सीमा और सुरक्षा संबंधी तनाव पाकिस्तान के लिए अलग चुनौती पेश करता है। इन परिस्थितियों के बीच ईरान के साथ क्षेत्रीय समीकरण भी महत्वपूर्ण हो गए हैं, खासकर तब जब मध्य पूर्व में तनाव का प्रभाव आसपास के देशों पर पड़ रहा है।

    तुर्की और सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग पाकिस्तान को राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन दे सकता है, लेकिन इससे उसकी सभी आंतरिक समस्याओं का समाधान अपने आप नहीं हो जाता। तुर्की नाटो का सदस्य है और उसकी अपनी मजबूत सैन्य क्षमता है। सऊदी अरब के लिए भी ईरान और हूती गतिविधियों से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां लंबे समय से महत्वपूर्ण रही हैं।

    भारत ने भी क्षेत्रीय स्तर पर अपने रक्षा और रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया है। ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया के साथ भारत के संबंधों में रक्षा सहयोग का महत्व बढ़ा है। इजरायल के साथ भारत की सैन्य और तकनीकी साझेदारी भी लंबे समय से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

    ऐसे में मक्का रक्षा समझौता पाकिस्तान को एक व्यापक सुरक्षा ढांचे से जोड़ने की कोशिश जरूर है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके अपने घरेलू हालात हैं। यदि बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके जैसे क्षेत्रों में अस्थिरता बनी रहती है, तो बाहरी रक्षा सहयोग के बावजूद पाकिस्तान पर सुरक्षा और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

    पाकिस्तान के लिए आने वाला समय इस लिहाज से महत्वपूर्ण रहेगा कि वह इन अलग-अलग मोर्चों पर एक साथ बढ़ते दबाव को किस तरह नियंत्रित करता है। सऊदी अरब और तुर्की का समर्थन उसके लिए रणनीतिक सहारा हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक क्षमता को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी होगा।

  • जंगल से ‘गुलेल’ की तरह मिसाइल-ड्रोन लॉन्च कर रहे हूती, सऊदी की तेल फैसिलिटी पर हमला

    जंगल से ‘गुलेल’ की तरह मिसाइल-ड्रोन लॉन्च कर रहे हूती, सऊदी की तेल फैसिलिटी पर हमला


    नई दिल्ली। यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब और यमन के रणनीतिक ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों का वीडियो जारी किया है। फुटेज में हूती लड़ाके खुले मैदानों और जंगल जैसे इलाकों से एक के बाद एक मिसाइल और ड्रोन लॉन्च करते दिखाई दे रहे हैं। लॉन्चिंग का तरीका ऐसा नजर आता है, मानो किसी गुलेल से निशाना साधकर प्रोजेक्टाइल छोड़ा जा रहा हो। हूतियों की ओर से यह वीडियो ऐसे समय जारी किया गया है, जब संगठन ने सऊदी अरब की एक अहम तेल सुविधा और यमन के मोखा बंदरगाह को निशाना बनाने का दावा किया है।

    जिजान में अरामको रिफाइनरी से जुड़ी सुविधा पर ड्रोन हमला
    हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने दावा किया कि हमलों में सऊदी सैनिकों की मौजूदगी वाले इलाकों और हथियारों के गोदामों को निशाना बनाया गया। इसी दौरान सऊदी अरब के जिजान में स्थित अरामको रिफाइनरी से जुड़ी एक सुविधा पर ड्रोन हमला किए जाने का भी दावा किया गया। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने एक सुविधा में आग लगने की पुष्टि की। हालांकि, आग पर बाद में काबू पा लिया गया। घटना में किसी के घायल होने की खबर नहीं है।

    मोखा बंदरगाह पर हमले में 7 लोगों की मौत
    हूतियों के हमले का दूसरा बड़ा निशाना यमन का मोखा बंदरगाह बना। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार के नियंत्रण में है और लाल सागर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के करीब स्थित है। यमनी सरकार से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, हमले में कम से कम 7 लोगों की मौत हुई। मृतकों में चार सैनिक और तीन नागरिक शामिल हैं। वहीं, 30 नागरिकों के घायल होने की जानकारी सामने आई है। हमले में बंदरगाह की इमारतों, पियर्स और वहां रखे सामान को नुकसान पहुंचा।

    मिसाइल और ड्रोन के साथ मानवरहित नाव का भी दावा
    हूतियों ने इन हमलों को सऊदी ड्रोन के यमन के हज्जाह और सादा प्रांतों में घुसने की कार्रवाई का जवाब बताया है। यमनी सेना के मुताबिक, हमले में मिसाइल और ड्रोन के अलावा विस्फोटकों से लदी एक मानवरहित नाव के इस्तेमाल की कोशिश भी की गई। जारी वीडियो में हूती लड़ाकों को अलग-अलग स्थानों से मिसाइल और ड्रोन लॉन्च करते हुए दिखाया गया है। इससे संगठन की हमले करने की रणनीति और इस्तेमाल किए जा रहे हथियारों को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।

    2022 के बाद फिर बढ़ सकती है क्षेत्रीय अशांति
    इन घटनाओं ने यमन में 2022 के बाद से बनी अपेक्षाकृत शांत स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मोखा बंदरगाह बाब-अल-मंदेब के नजदीक है, जो वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है। ऐसे में यदि इलाके में हूती हमले और जवाबी सैन्य कार्रवाई बढ़ती है, तो इसका असर केवल यमन और सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहेगा। लाल सागर के समुद्री व्यापार मार्गों के साथ-साथ क्षेत्र की शिपिंग और ऊर्जा सुरक्षा पर भी इसका असर पड़ सकता है।

  • ईरान से बातचीत पर अमेरिका ने गिनाए प्रमुख साझेदार, पाकिस्तान का नाम गायब रहने से बढ़ी राजनीतिक चर्चा

    ईरान से बातचीत पर अमेरिका ने गिनाए प्रमुख साझेदार, पाकिस्तान का नाम गायब रहने से बढ़ी राजनीतिक चर्चा


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत की प्रक्रिया जारी है और इसमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात तथा कतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि उन्होंने अपने बयान में पाकिस्तान का कोई उल्लेख नहीं किया, जिससे क्षेत्रीय कूटनीतिक समीकरणों को लेकर नई अटकलें शुरू हो गई हैं।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान की ओर से बातचीत की पहल हुई है और कई क्षेत्रीय देशों के सहयोग से संवाद आगे बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सऊदी अरब, यूएई और कतर इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ट्रंप के बयान में पाकिस्तान का नाम शामिल नहीं होने को कई विश्लेषक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    पिछले कुछ समय से पाकिस्तान स्वयं को अमेरिका और ईरान के बीच संभावित मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता रहा है। इस दौरान उसने दोनों देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखने की रणनीति अपनाई। लेकिन ट्रंप के ताजा बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि मौजूदा वार्ता प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका सीमित या नगण्य मानी जा रही है।

    विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं रहे हैं। ईरान पहले भी पाकिस्तान की विदेश नीति और अमेरिका के साथ उसके संबंधों को लेकर सवाल उठाता रहा है। वहीं अमेरिका के कुछ नेताओं ने भी समय-समय पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर चिंता जताई है। ऐसे माहौल में ट्रंप का बयान क्षेत्रीय कूटनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत माना जा रहा है।

    हाल के महीनों में पाकिस्तान को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और दावों ने भी चर्चा को प्रभावित किया है। कुछ रिपोर्टों में पाकिस्तान, चीन और ईरान के बीच रक्षा सहयोग तथा हथियारों की आपूर्ति से जुड़े दावे किए गए थे। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। इन घटनाक्रमों के बीच पाकिस्तान की संभावित भूमिका पर भी बहस जारी है।

    इसी दौरान ट्रंप ने ईरान को परमाणु समझौते के मुद्दे पर भी कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यदि ईरान समझौते का अवसर नहीं अपनाता है तो उसे गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। ट्रंप के अनुसार मौजूदा समय किसी सकारात्मक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण अवसर है और सभी पक्षों को इसका लाभ उठाना चाहिए।

    हालांकि दूसरी ओर ईरान ने अमेरिका के साथ किसी औपचारिक वार्ता की बात से इनकार किया है। ईरानी पक्ष का कहना है कि ऐसी किसी प्रत्यक्ष बातचीत की पुष्टि नहीं की जा सकती। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच संवाद को लेकर अभी भी अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं और स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

    अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों में क्षेत्रीय सहयोगी देशों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या किसी नए समझौते का रास्ता निकलता है, इस पर वैश्विक समुदाय की नजर बनी रहेगी। साथ ही पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर भी आगे के घटनाक्रम महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

  • सऊदी टैंकरों पर हमले के बाद पाकिस्तान की सिर्फ बयानबाजी, रक्षा समझौते के बावजूद किया किनारा

    सऊदी टैंकरों पर हमले के बाद पाकिस्तान की सिर्फ बयानबाजी, रक्षा समझौते के बावजूद किया किनारा


    नई दिल्‍ली । पाकिस्तान (Pakistan) के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (PM Shehbaz Sharif) के सामने जब सऊदी अरब (Saudi Arabia) को दिया वादा निभाने की जिम्मेदारी आई तो उन्होंने अपना असली रंग दिखा दिया. लाल सागर में जब हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के तेल टैंकर पर हमला किया तो पाकिस्तान ने जी भरकर इसकी आलोचना की. शहबाज शरीफ ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस (Crown Prince) को फोन लगाकर उनके साथ सॉलिडरिटी जताई, सऊदी को बिरादर मुल्क बताया, हूतियों की निंदा की. लेकिन असल एक्शन के नाम पर पाकिस्तान के पास जुबानी जमा खर्च करने के अलावा कुछ नहीं था.

    सवाल है कि शहबाज शरीफ ने सऊदी अरब के साथ कौन सा कमिटमेंट किया है. बताना चाहेंगे कि सऊदी अरब और पाकिस्तान ने डिफेंस डील किया है. इसके तहत दोनों देशों ने कहा है कि एक के ऊपर हमला दूसरे पर भी अटैक माना जाएगा और दोनों देश मिलकर इस हमले का जवाब देंगे.

    यमन के ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों ने गुरुवार तड़के लाल सागर में सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों पर हमला किया. सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते के मुताबिक पाकिस्तान को ऐसे किसी सिचुएशन में सऊदी अरब की तरफ से हूती विद्रोहियों को जवाब देकर अपना सिक्योरिटी कमिटमेंट पूरा करना चाहिए था.

    कहां गया सऊदी-पाकिस्तान का डिफेंस डील
    लेकिन इस दौरान पाकिस्तान खामोश रहा. यहां अहम यह है कि पाकिस्तान ईरान का भी हितैषी होने का गेम खेल रहा है. ईरान के गृह मंत्री ने हाल ही में पाकिस्तान का दौरा खत्म किया है. इस दौरान ईरान-पाकिस्तान ने दोस्ती को नई ऊंचाई पर ले जाने का वादा किया.

    पाकिस्तान के सामने समस्या यह है कि हूती विद्रोही ईरान के इशारे पर ही चलते हैं. अगर पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ कुछ करता है तो वह ईरान की दुश्मनी मोल लेगा. जिसके साथ उसकी लंबी सीमा है. लेकिन अगर पाकिस्तान लाल सागर में सऊदी अरब के टैंकरों पर हमला कर रहे हूती विद्रोहियों पर कोई एक्शन नहीं लेता है तो इससे सऊदी अरब को उसकी असलियत समझ आ जाएगी.

    ऐसी हरकतें मंज़ूर नहीं
    फिलहाल इस बार जब हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में सऊदी अरब के दो टैंकरों को ब्लास्ट कर आग के हवाले कर दिया तो पाकिस्तान ने क्राउन प्रिंस सलमान को फोन कर एक बार फिर से बड़े बड़े वादे किए.

    पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि उन्होंने लाल सागर में सऊदी टैंकरों पर हूतियों के हमले की निंदा की है और उन्हें चेतावनी दी है. शहबाज ने एक्स पर लिखा, “आज सुबह मैंने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री, महामहिम प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद से टेलीफ़ोन पर बातचीत की. मैंने लाल सागर में सऊदी तेल टैंकरों पर हूतियों के हमलों की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा की. ऐसी हरकतें मंज़ूर नहीं हैं; ये अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन करती हैं, समुद्री आवाजाही की आज़ादी के लिए खतरा हैं और क्षेत्रीय शांति व सुरक्षा को कमज़ोर करती हैं.”

    पाक विदेश मंत्रालय की चेतावनी
    बाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने हूती विद्रोहियों को चेतावनी देकर जरूर भड़ास निकाली. हालांकि पाकिस्तान की ये चेतावनी उसके जहाजों पर हमलों की आशंका को लेकर थी. पाकिस्तान ने कहा कि लाल सागर में उसके झंडे वाले जहाजों या समुद्री हितों के खिलाफ किसी भी हमले का तुरंत जवाब दिया जाएगा. उसने चेतावनी दी कि ऐसी हरकतों को उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए “गंभीर खतरा” माना जाएगा.

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि पाकिस्तानी झंडे वाले जहाजों या उसके कमर्शियल जहाजों पर किसी भी हमले को “पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा और उसका तुरंत जवाब दिया जाएगा.”

    हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की घोषणा की है. उन्होंने कहा था कि वे बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में सऊदी जहाजों को रोकेंगे. यह कदम उन्होंने यमन में बंदरगाहों और हवाई अड्डों की रियाद द्वारा की गई नाकेबंदी के जवाब में उठाया है.