Tag: SaudiArabia

  • पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में ईरान को शामिल होने का आधिकारिक प्रस्ताव मिला है।

    पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में ईरान को शामिल होने का आधिकारिक प्रस्ताव मिला है।

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पश्चिम एशिया में मुस्लिम देशों के बीच रणनीतिक सहयोग को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। इसी क्रम में मक्का एग्रीमेंट में ईरान को शामिल करने की संभावना ने क्षेत्रीय राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी है। तेहरान को इस समझौते में शामिल होने के लिए आधिकारिक न्योता दिए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि ईरान ने अभी इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है और बताया जा रहा है कि इस पर विचार किया जा रहा है।

    मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की पहले ही हस्ताक्षर कर चुके हैं। समझौते का प्रमुख प्रावधान यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति में इसे सभी संबंधित देशों पर हमला माना जाएगा। ऐसे में यह समझौता क्षेत्रीय सुरक्षा और सामूहिक रक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ईरान के संभावित जुड़ाव से इस व्यवस्था का दायरा और राजनीतिक महत्व दोनों बढ़ सकते हैं।

    ईरानी मीडिया में सामने आई जानकारी के अनुसार, ईरान को मक्का एग्रीमेंट में शामिल होने का प्रस्ताव मिला है। ईरानी संसद से जुड़ी समाचार एजेंसी के प्रमुख मेहदी रहीमी के हवाले से बताया गया कि तेहरान के सामने रखे गए प्रस्ताव पर फिलहाल विचार-विमर्श चल रहा है। अभी तक ईरानी पक्ष की ओर से समझौते में शामिल होने को लेकर अंतिम निर्णय की जानकारी सामने नहीं आई है।

    इस बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के तेहरान दौरे को लेकर भी क्षेत्रीय स्तर पर नजरें टिकी हुई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक उनका ईरान दौरा क्षेत्र में शांति स्थापित करने और मौजूदा तनाव को कम करने की कोशिशों से जुड़ा बताया जा रहा है। ऐसे समय में यह यात्रा महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बना हुआ है और पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति संवेदनशील बनी हुई है।

    मक्का समझौते को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के समझौते में शामिल होने का स्वागत करते हुए इसे साहसिक और ऐतिहासिक कदम बताया। हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर उनके दावों ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है।

    ईरान के संभावित जुड़ाव का असर केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं रहने की संभावना है। यदि तेहरान इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है तो पश्चिम एशिया में सुरक्षा समीकरणों पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के साथ ईरान का एक साझा रक्षा ढांचे में आना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण बदलाव माना जा सकता है।

    वहीं बांग्लादेश ने भी इस घटनाक्रम को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। बांग्लादेश के नवनियुक्त विदेश मामलों के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने समझौते को लेकर बयान दिया है। साथ ही बांग्लादेशी पक्ष ने पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों को बातचीत के माध्यम से मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ने के संकेत दिए हैं। ऐसे में मक्का एग्रीमेंट अब केवल तीन देशों के बीच रक्षा सहयोग का विषय नहीं रह गया है, बल्कि पश्चिम एशिया और मुस्लिम देशों की व्यापक रणनीतिक राजनीति से भी जुड़ता दिखाई दे रहा है।

  • सऊदी अरब जाने वाले पाकिस्तानी नागरिकों के लिए सख्त एडवाइजरी जारी, वीजा नियम तोड़ने और अवैध फंड जुटाने पर कार्रवाई

    सऊदी अरब जाने वाले पाकिस्तानी नागरिकों के लिए सख्त एडवाइजरी जारी, वीजा नियम तोड़ने और अवैध फंड जुटाने पर कार्रवाई

    नई दिल्ली । पाकिस्तान ने सऊदी अरब जाने वाले अपने नागरिकों के लिए सख्त एडवाइजरी जारी करते हुए उन्हें भीख मांगने, बिना अनुमति धन जुटाने और वीजा नियमों का उल्लंघन करने से बचने की चेतावनी दी है। यह सलाह खास तौर पर उमराह यात्रियों और कामगारों के लिए जारी की गई है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि सऊदी अरब में स्थानीय कानूनों और वीजा की शर्तों का उल्लंघन करने पर संबंधित व्यक्ति को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

    पाकिस्तान की ओर से जारी संदेश में नागरिकों से सऊदी अरब के कानूनों का पूरी तरह पालन करने को कहा गया है। उन्हें यह भी हिदायत दी गई है कि किसी भी तरह की आर्थिक मदद या धन संग्रह का काम बिना अनुमति के नहीं किया जाए। धार्मिक यात्रा के दौरान भी स्थानीय नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है।

    एडवाइजरी में वीजा की अवधि को लेकर भी यात्रियों को सावधान किया गया है। नागरिकों से कहा गया है कि वीजा की वैधता समाप्त होने से पहले सऊदी अरब से निर्धारित प्रक्रिया के तहत बाहर निकलें। वीजा अवधि खत्म होने के बाद वहां रुकना नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है और इसके कारण कानूनी कार्रवाई की स्थिति बन सकती है।

    पाकिस्तानी नागरिकों को सऊदी अरब में किसी भी ऐसी गतिविधि से दूर रहने की सलाह दी गई है, जिसे वहां के कानूनों के तहत अपराध माना जाता है। विशेष रूप से सार्वजनिक स्थानों पर भीख मांगने और बिना अनुमति के लोगों से धन एकत्र करने को लेकर चेतावनी दी गई है। नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों को हिरासत में लिए जाने या देश से बाहर भेजे जाने जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

    इस चेतावनी के साथ एक वीडियो संदेश भी प्रसारित किया गया है, जिसमें सऊदी पुलिस द्वारा एक व्यक्ति को हिरासत में ले जाने का दृश्य दिखाया गया है। संदेश के जरिए पाकिस्तान से आने वाले उमराह यात्रियों और कामगारों को समझाने की कोशिश की गई है कि वे धार्मिक यात्रा या रोजगार के लिए सऊदी अरब पहुंचने के बाद वहां के कानूनों को प्राथमिकता दें।

    पाकिस्तान में यात्रियों के सऊदी अरब जाने से जुड़े मामलों को लेकर पहले भी चिंता सामने आती रही है। वर्ष 2025 में पाकिस्तान के अलग अलग हवाई अड्डों पर बड़ी संख्या में यात्रियों को विदेश जाने से रोके जाने की खबर सामने आई थी। अधिकारियों को आशंका थी कि कुछ लोग सऊदी अरब में भीख मांगने के उद्देश्य से यात्रा कर रहे हैं। इसके बाद यात्रियों की जांच और निगरानी को लेकर सख्ती बढ़ाई गई थी।

    सऊदी अरब में धार्मिक यात्राओं के दौरान नियमों का पालन कराने पर लगातार जोर दिया जाता है। उमराह या अन्य धार्मिक यात्रा के लिए पहुंचने वाले लोगों को अपने वीजा की शर्तों, स्थानीय कानूनों और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े नियमों का पालन करना होता है। किसी अन्य उद्देश्य के लिए जारी वीजा का इस्तेमाल अलग गतिविधियों के लिए करना भी परेशानी का कारण बन सकता है।

    पाकिस्तान की ताजा एडवाइजरी का मुख्य उद्देश्य अपने नागरिकों को सऊदी अरब के कानूनों के संभावित उल्लंघन से बचाना है। इसमें यात्रियों को जिम्मेदारी से व्यवहार करने और किसी भी गैरकानूनी गतिविधि में शामिल नहीं होने की सलाह दी गई है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि नियमों की अनदेखी करने पर संबंधित व्यक्ति को गिरफ्तारी, हिरासत या निर्वासन जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

  • Houthi Attack: मारिब पर मिसाइल हमले के बाद यमनी सेना का पलटवार, सात प्रांतों में सैन्य उपकरण नष्ट करने का दावा

    Houthi Attack: मारिब पर मिसाइल हमले के बाद यमनी सेना का पलटवार, सात प्रांतों में सैन्य उपकरण नष्ट करने का दावा


    नई दिल्ली । 
    यमन में सरकारी सेना और हूती विद्रोहियों के बीच संघर्ष एक बार फिर तेज होता दिखाई दे रहा है। यमनी सरकारी सेना ने दावा किया है कि उसने पिछले 24 घंटे के दौरान हूती विद्रोहियों के कब्जे वाले इलाकों में 181 सैन्य ऑपरेशन किए। इन कार्रवाइयों में ड्रोन, तोप और रॉकेट लॉन्चर का इस्तेमाल किए जाने की जानकारी दी गई है। लगातार बढ़ रही सैन्य गतिविधियों के बीच यमन में सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंता बढ़ गई है।

    यमनी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल माजिद अल-नुजैली के अनुसार, सैन्य अभियान के दौरान हूती ठिकानों, हथियारों के भंडार, सैन्य वाहनों और उन सुविधाओं को निशाना बनाया गया, जिनका इस्तेमाल हमलों के लिए किया जा रहा था। सेना ने दावा किया कि इन कार्रवाइयों में हूती समूह के कई सदस्य मारे गए या घायल हुए हैं।

    सरकारी सेना के मुताबिक सात प्रांतों में हूती विद्रोहियों के सैन्य उपकरणों को भी नष्ट किया गया। हालांकि, सेना ने कार्रवाई में मारे गए या घायल हुए लोगों की सटीक संख्या सार्वजनिक नहीं की है। ऐसे में अभियान के मानवीय प्रभाव को लेकर फिलहाल विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है।

    यमनी सेना ने अपनी कार्रवाई को हाल के हूती हमलों की प्रतिक्रिया बताया है। सेना के अनुसार सरकारी सैनिकों के साथ-साथ नागरिक ढांचे, आर्थिक प्रतिष्ठानों और बंदरगाहों को भी हाल के दिनों में निशाना बनाया गया है। इन हमलों के कारण सरकारी नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है।

    इस बीच हूती विद्रोहियों ने शनिवार शाम तेल संपदा वाले मारिब प्रांत की राजधानी मारिब शहर को निशाना बनाने का दावा किया। सरकार समर्थक मीडिया के अनुसार शहर के रिहायशी इलाकों की दिशा में तीन बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं। शुरुआती जानकारी में किसी व्यक्ति के हताहत होने या बड़े नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है।

    स्थानीय लोगों के मुताबिक मिसाइल हमलों के दौरान शहर के अलग-अलग हिस्सों में तेज धमाकों की आवाज सुनी गई। मारिब लंबे समय से यमन के संघर्ष में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। यहां ऊर्जा संसाधनों और भौगोलिक स्थिति के कारण सरकारी सेना और हूती विद्रोहियों के बीच संघर्ष का असर विशेष रूप से देखा जाता रहा है।

    यमन के अलावा हूती गतिविधियों का असर पड़ोसी सऊदी अरब तक भी पहुंचा है। हाल के हफ्तों में हूती समूह ने यमन के सरकारी नियंत्रण वाले क्षेत्रों के साथ-साथ सऊदी अरब में मौजूद ठिकानों पर भी मिसाइल और ड्रोन हमले बढ़ाने का दावा किया है। सऊदी अरब यमनी सरकार का प्रमुख समर्थक है और लंबे समय से इस संघर्ष में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

    हूती समूह ने 20 जुलाई को सऊदी जहाजों के लिए समुद्री प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। इसके बाद संगठन की ओर से लाल सागर में सऊदी तेल टैंकरों और सऊदी अरब के भीतर ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने के दावे भी सामने आए। इन घटनाओं से क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री मार्गों को लेकर भी चिंता बढ़ी है।

    यमन में मौजूदा संघर्ष की जड़ें 2014 में हुए हूती कब्जे से जुड़ी हैं। विद्रोहियों ने उस दौरान उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था, जिसमें राजधानी सना भी शामिल थी। इसके बाद 2015 में यमनी सरकार के समर्थन में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने सैन्य हस्तक्षेप किया।

    करीब एक दशक से जारी संघर्ष ने यमन को गंभीर मानवीय और आर्थिक संकट में धकेला है। हालिया सैन्य कार्रवाइयों और मिसाइल हमलों के बीच तनाव फिर बढ़ने से नागरिकों की सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और भविष्य की शांति प्रक्रिया को लेकर नई चुनौतियां पैदा होने की आशंका है।

  • यमन और सऊदी अरब में हूती हमलों से बढ़ा तनाव, 58 सैनिकों की मौत के बाद मिडिल ईस्ट में युद्ध का खतरा गहराया

    यमन और सऊदी अरब में हूती हमलों से बढ़ा तनाव, 58 सैनिकों की मौत के बाद मिडिल ईस्ट में युद्ध का खतरा गहराया

    नई दिल्ली । यमन और सऊदी अरब में हुए ताजा हमलों के बाद मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। गुरुवार को यमन में सेना के ठिकानों को मिसाइल और ड्रोन से निशाना बनाए जाने की जानकारी सामने आई। इस हमले में 58 सैनिकों की मौत हो गई और कई अन्य घायल बताए गए हैं। इन हमलों के लिए ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। घटना के बाद यमन में सुरक्षा स्थिति और गंभीर हो गई है।

    यमन के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन से हमला किया गया। हमले में बड़ी संख्या में सैनिक हताहत हुए। अधिकारियों ने कहा है कि इस कार्रवाई का जवाब उचित समय पर दिया जाएगा। सैन्य ठिकानों पर हुए हमले ने यमन में लंबे समय से जारी संघर्ष को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।

    इसी बीच सऊदी अरब के नजरान शहर में भी हमला हुआ। यहां 11 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है। घायलों में सऊदी अरब के नागरिकों के साथ यमन, मिस्र और पाकिस्तान के नागरिक भी शामिल बताए गए हैं। घायलों में चार साल का एक बच्चा भी बताया गया है। हमले के बाद कुछ स्थानों पर आग लग गई, जिसके बाद बचाव दलों ने मौके पर पहुंचकर राहत और बचाव अभियान चलाया।

    यमन और सऊदी अरब में लगभग एक ही समय पर सामने आई इन घटनाओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। खासतौर पर मिसाइल और ड्रोन के इस्तेमाल से यह आशंका पैदा हुई है कि संघर्ष का दायरा आगे और बढ़ सकता है। यदि इस तरह के हमले जारी रहते हैं तो इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहने की संभावना है।

    मध्य पूर्व में तनाव ऐसे समय बढ़ रहा है जब महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को लेकर भी स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जैसे प्रमुख समुद्री रास्तों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति जुड़ी हुई है। इन मार्गों पर जहाजों की आवाजाही कम होने की खबरों ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ाई है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की चर्चाओं के बीच क्षेत्रीय घटनाक्रम पर भी नजर बनी हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ने के संकेत दिए जाने के बावजूद क्षेत्र में सैन्य तनाव कम होता नजर नहीं आ रहा है। समुद्री मार्गों पर किसी नए शुल्क या सुरक्षा संकट की स्थिति में परिवहन लागत बढ़ सकती है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ सकता है।

    इसी दौरान लेबनान में हुए एक धमाके में दो इजराइली सैनिकों की मौत की जानकारी भी सामने आई है। अलग-अलग इलाकों में सामने आ रही ऐसी घटनाएं मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति को और जटिल बना रही हैं। एक मोर्चे पर तनाव कम होने की उम्मीद के बीच दूसरे क्षेत्र में हिंसा बढ़ने से स्थायी शांति की कोशिशों को चुनौती मिल रही है।

    हूती संगठन यमन का एक सशस्त्र विद्रोही संगठन है, जो लंबे समय से यमन की सरकार और सऊदी समर्थित गठबंधन के खिलाफ संघर्ष करता रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का आरोप है कि ईरान हूतियों को हथियार और सैन्य सहायता उपलब्ध कराता है। इसी वजह से हूती गतिविधियों को ईरान और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच व्यापक तनाव से जोड़कर देखा जाता है।

    माना जाता है कि क्षेत्र में किसी एक पक्ष पर सैन्य या राजनीतिक दबाव बढ़ने पर दूसरे मोर्चों पर गतिविधियां तेज हो सकती हैं। ताजा हमलों ने इसी आशंका को फिर मजबूत किया है। यमन और सऊदी अरब में हुए हमलों के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती तनाव को और फैलने से रोकना है। आने वाले दिनों में सैन्य जवाब, समुद्री मार्गों की स्थिति और अमेरिका-ईरान बातचीत का असर पूरे मध्य पूर्व के घटनाक्रम पर पड़ सकता है।

  • सऊदी परमाणु समझौते पर 24 घंटे में बदला अमेरिकी रुख, ट्रम्प ने इजराइल से रिश्तों की नई शर्त जोड़कर बढ़ाई अड़चन

    सऊदी परमाणु समझौते पर 24 घंटे में बदला अमेरिकी रुख, ट्रम्प ने इजराइल से रिश्तों की नई शर्त जोड़कर बढ़ाई अड़चन

    नई दिल्ली । अमेरिका और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से प्रस्तावित असैन्य परमाणु सहयोग समझौता एक बार फिर अनिश्चितता में घिर गया है। समझौते पर हस्ताक्षर होने के महज 24 घंटे के भीतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसके लिए नई शर्त जोड़ दी। ट्रम्प ने स्पष्ट किया कि यह समझौता तभी आगे बढ़ेगा, जब सऊदी अरब अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होकर इजराइल के साथ अपने राजनयिक संबंध सामान्य करेगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि सऊदी अरब को अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति नहीं दी जाएगी।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब दोनों देशों के बीच लगभग दो दशक से परमाणु ऊर्जा सहयोग को लेकर बातचीत चल रही थी। हाल ही में हुए हस्ताक्षर समारोह के बाद माना जा रहा था कि समझौते का रास्ता साफ हो गया है, लेकिन ट्रम्प के नए बयान ने पूरी प्रक्रिया को फिर से जटिल बना दिया। अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग संकेत सामने आए हैं, जिससे समझौते की दिशा को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार, वॉशिंगटन में आयोजित हस्ताक्षर समारोह में अमेरिकी ऊर्जा मंत्री की मौजूदगी में समझौते की घोषणा की गई थी। बाद में यह जानकारी सामने आई कि व्हाइट हाउस इस घोषणा के समय और प्रक्रिया से पूरी तरह संतुष्ट नहीं था। इसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से अपनी नई शर्तों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि उनकी नीति के अनुसार क्षेत्रीय रणनीतिक सहयोग और इजराइल के साथ संबंध सामान्य करना इस समझौते का अहम हिस्सा रहेगा।

    ट्रम्प की नई घोषणा ने सऊदी अरब को भी असमंजस में डाल दिया है। पहले तैयार किए गए मसौदे में कुछ सुरक्षा शर्तों के साथ सीमित परमाणु गतिविधियों की संभावना पर चर्चा हुई थी, लेकिन अब यूरेनियम संवर्धन की अनुमति को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। अमेरिका का मानना है कि संवर्धित यूरेनियम का उपयोग केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रहता और भविष्य में इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार कार्यक्रम के लिए भी किया जा सकता है। इसी कारण वॉशिंगटन इस तकनीक को लेकर बेहद सतर्क रुख अपनाता है।

    इस पूरे विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष अब्राहम अकॉर्ड्स है। वर्ष 2020 में अमेरिका की पहल पर शुरू हुए इस समझौते के तहत कई अरब देशों ने पहली बार इजराइल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए थे। अब अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब भी इस प्रक्रिया में शामिल हो। हालांकि सऊदी नेतृत्व लगातार यह कहता रहा है कि फिलिस्तीन मुद्दे पर ठोस प्रगति और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के रास्ते के बिना वह इजराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं करेगा। यही मतभेद अब परमाणु समझौते की सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को केवल तेल आधारित मॉडल से बाहर निकालने की रणनीति पर काम कर रहा है। बढ़ती ऊर्जा मांग, बिजली उत्पादन में विविधता और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वह परमाणु ऊर्जा, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाना चाहता है। ऐसे में अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु सहयोग उसके दीर्घकालिक विकास कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि ट्रम्प की नई शर्तों के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि समझौते का भविष्य अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति और पश्चिम एशिया की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा।

  • यमन में फिर बढ़ा युद्ध का खतरा, ईरानी विमान की लैंडिंग के बाद सऊदी गठबंधन की हूतियों को कड़ी चेतावनी, क्षेत्रीय तनाव गहराया

    यमन में फिर बढ़ा युद्ध का खतरा, ईरानी विमान की लैंडिंग के बाद सऊदी गठबंधन की हूतियों को कड़ी चेतावनी, क्षेत्रीय तनाव गहराया

    नई दिल्ली । यमन में एक बार फिर सैन्य तनाव बढ़ने के संकेत दिखाई दे रहे हैं। राजधानी सना में ईरान के एक नागरिक विमान के उतरने के बाद सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन और हूती विद्रोहियों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। दोनों पक्षों की ओर से जारी चेतावनियों ने पूरे मध्य पूर्व में सुरक्षा स्थिति को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब क्षेत्र पहले से ही कई भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है।

    जानकारी के अनुसार, हूती नियंत्रण वाले सना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक ईरानी विमान के उतरने के दौरान तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई। हूती पक्ष का दावा है कि विमान को रोकने की कोशिश के जवाब में उन्होंने अपने वायु रक्षा तंत्र को सक्रिय किया। वहीं दूसरी ओर सऊदी समर्थित गठबंधन इस घटनाक्रम को क्षेत्रीय सुरक्षा और यमन की स्थिति के लिए गंभीर मान रहा है।

    सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने स्पष्ट किया है कि यदि उसकी सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता या यमन की संप्रभुता को चुनौती देने की कोई भी कोशिश की गई तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। गठबंधन का कहना है कि हाल के घटनाक्रम केवल सैन्य चुनौती नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी असर डाल सकते हैं।

    उधर हूती विद्रोहियों ने भी अपने हालिया बयानों में सऊदी अरब के विभिन्न रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि यदि उनके नियंत्रण वाले क्षेत्रों में हस्तक्षेप जारी रहा तो वे जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेंगे। इस बयान के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव और अधिक बढ़ गया है।

    यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार ने भी पूरे घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त की है। सरकार की ओर से आयोजित आपात बैठक में ईरानी विमान की लैंडिंग पर आपत्ति जताते हुए इसे देश की संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा बताया गया। साथ ही संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से क्षेत्र में तनाव कम करने तथा हालात को नियंत्रण में रखने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल यमन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव हो सकते हैं। सऊदी अरब और ईरान लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रीय मुद्दों पर अलग-अलग पक्षों का समर्थन करते रहे हैं। ऐसे में यमन में बढ़ता तनाव दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद संवेदनशील समीकरणों को और जटिल बना सकता है।

    यमन वर्ष 2015 से लगातार संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। लंबे समय से जारी गृहयुद्ध के कारण लाखों लोग विस्थापित हुए हैं और देश गंभीर मानवीय संकट का सामना कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठन समय-समय पर संघर्ष विराम और राजनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल सका है।

    ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि यदि सभी पक्ष संयम नहीं बरतते, तो यमन में सैन्य टकराव का नया दौर शुरू हो सकता है। फिलहाल पूरे क्षेत्र की नजर सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन, हूती विद्रोहियों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आगामी रणनीति पर बनी हुई है, क्योंकि किसी भी बड़े कदम का असर पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा और स्थिरता पर पड़ सकता है।

  • सऊदी अरब-फ्रांस के बीच उच्चस्तरीय संवाद, ईरान-अमेरिका समझौते, होर्मुज संकट और क्षेत्रीय स्थिरता पर हुई विस्तृत चर्चा

    सऊदी अरब-फ्रांस के बीच उच्चस्तरीय संवाद, ईरान-अमेरिका समझौते, होर्मुज संकट और क्षेत्रीय स्थिरता पर हुई विस्तृत चर्चा

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में लगातार बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच सऊदी अरब और फ्रांस ने क्षेत्रीय शांति तथा सुरक्षा को लेकर अपने समन्वय को और मजबूत करने के संकेत दिए हैं। इसी क्रम में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस एवं प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच टेलीफोन पर महत्वपूर्ण बातचीत हुई, जिसमें क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के साथ-साथ दोनों देशों के साझा हितों से जुड़े कई अहम मुद्दों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

    सऊदी प्रेस एजेंसी के अनुसार, बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया ज्ञापन समझौते से जुड़े ताजा घटनाक्रम की समीक्षा की। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में स्थायी शांति, सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जारी कूटनीतिक प्रयासों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि तनाव कम करने के लिए संवाद और सहयोग की प्रक्रिया को लगातार आगे बढ़ाना आवश्यक है।

    वार्ता में समुद्री मार्गों की सुरक्षा भी प्रमुख विषय रही। दोनों पक्षों ने अंतरराष्ट्रीय नौवहन की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि समुद्री व्यापार को किसी भी प्रकार के तनाव या टकराव से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने क्षेत्रीय विवादों के समाधान के लिए सैन्य विकल्पों के बजाय कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता दोहराई।

    बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने सऊदी अरब और फ्रांस के द्विपक्षीय संबंधों की भी समीक्षा की। आर्थिक, रणनीतिक और राजनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने के साथ-साथ विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समन्वय बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की गई। इसके अलावा साझा वैश्विक चुनौतियों और क्षेत्रीय मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करते हुए भविष्य में सहयोग को और मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई गई।

    गौरतलब है कि अमेरिका और ईरान के बीच 17 जून को हस्ताक्षरित ज्ञापन समझौते का उद्देश्य लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करना और संवाद के माध्यम से समाधान की दिशा में आगे बढ़ना था। हालांकि समझौते के बावजूद दोनों देशों के बीच समय-समय पर तनावपूर्ण घटनाएं सामने आती रही हैं, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बनी हुई है।

    हालिया घटनाक्रमों के बीच अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच आगे की बातचीत को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देशों ने फिलहाल आपसी हमलों को रोकने और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े विवादों के समाधान के लिए कतर की राजधानी दोहा में वार्ता करने पर सहमति जताई है। पहले यह बैठक स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित थी, लेकिन क्षेत्र में बढ़े तनाव को देखते हुए इसका स्थान बदल दिया गया।

    सूत्रों के अनुसार, दोनों पक्ष तकनीकी स्तर की वार्ताओं को जारी रखते हुए समुद्री मार्गों पर जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार का तनाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा बाजार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब और फ्रांस के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुआ यह संवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब पश्चिम एशिया में स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रमुख देशों के बीच निरंतर कूटनीतिक संपर्क और सहयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। ऐसे प्रयास क्षेत्रीय तनाव कम करने और दीर्घकालिक शांति स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • Eid Ul Fitr 2026 डेट कन्फर्म चांद दिखने के बाद भारत में इस दिन मनाई जाएगी ईद

    Eid Ul Fitr 2026 डेट कन्फर्म चांद दिखने के बाद भारत में इस दिन मनाई जाएगी ईद

    नई दिल्ली:  Eid ul-Fitr 2026 को लेकर लोगों के बीच उत्सुकता बढ़ गई है, खासकर चांद दिखने के समय और तारीख को लेकर। रमजान के पावन महीने के समापन के बाद मनाया जाने वाला यह त्योहार खुशियों, मिठास और भाईचारे का प्रतीक होता है।

    इस साल सऊदी अरब में आधिकारिक तौर पर घोषणा की गई है कि ईद 20 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। वहां शव्वाल का चांद 18 मार्च को नजर नहीं आया, जिसके बाद रमजान के रोजे 30 पूरे किए गए। इसके बाद 19 मार्च की शाम चांद दिखने की संभावना जताई गई और उसी के आधार पर 20 मार्च को ईद मनाने का फैसला लिया गया। यूएई और अन्य खाड़ी देशों में भी इसी तारीख को ईद मनाई जाएगी।

    भारत समेत दक्षिण एशिया के देशों में ईद आमतौर पर सऊदी अरब के एक दिन बाद मनाई जाती है। ऐसे में भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में 20 मार्च की शाम को चांद देखने की कोशिश की जाएगी। अगर उस दिन चांद दिखाई देता है, तो भारत में 21 मार्च 2026 को ईद मनाई जाएगी।

    चांद देखने का सही समय सूर्यास्त के बाद का होता है। भारत में आमतौर पर शाम लगभग 6:30 बजे से 7:30 बजे के बीच चांद दिखने की संभावना रहती है, हालांकि यह समय स्थान के अनुसार थोड़ा बदल सकता है। इसके लिए स्थानीय मस्जिदों और चांद देखने वाली समितियों की घोषणा को अंतिम माना जाता है।

    ईद उल फितर को रोजा खोलने का त्योहार भी कहा जाता है, क्योंकि यह रमजान के खत्म होने के अगले दिन मनाई जाती है। इस दिन लोग नमाज अदा करते हैं, एक दूसरे को गले लगाकर मुबारकबाद देते हैं और मिठाइयों के साथ खुशियां बांटते हैं।

    ईद की तैयारी कैसे करें
    ईद से पहले घरों की साफ सफाई की जाती है और नए कपड़े खरीदे जाते हैं। लोग अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए खास पकवान तैयार करते हैं। सेवइयां और अन्य मीठे व्यंजन इस त्योहार की खास पहचान होते हैं। इसके अलावा जरूरतमंदों को जकात और फितरा देना भी इस दिन का अहम हिस्सा होता है, ताकि हर कोई इस खुशी में शामिल हो सके।

    ईद उल फितर 2026 को लेकर तारीख लगभग तय मानी जा रही है, लेकिन अंतिम निर्णय चांद दिखने पर ही निर्भर करेगा। ऐसे में लोगों को सलाह दी जाती है कि वे स्थानीय घोषणाओं पर नजर बनाए रखें और उसी के अनुसार त्योहार की तैयारी करें

  • भारत–सऊदी सुरक्षा सहयोग को नई धार: NSA डोभाल और सऊदी समकक्ष के बीच हुई अहम चर्चा

    भारत–सऊदी सुरक्षा सहयोग को नई धार: NSA डोभाल और सऊदी समकक्ष के बीच हुई अहम चर्चा


    नई दिल्‍ली । भारत और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने बुधवार को रियाद में अपने सऊदी समकक्ष मूसाएद बिन मोहम्मद अल-ऐबन से मुलाकात की। इस उच्चस्तरीय बैठक में द्विपक्षीय सहयोग के साथ-साथ क्षेत्रीय सुरक्षाआतंकवाद से निपटने और आपसी हितों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।

    रियाद स्थित भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि अजीत डोभाल और सऊदी अरब के विदेश राज्य मंत्री, कैबिनेट सदस्य एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डॉ. मूसाएद बिन मोहम्मद अल-ऐबन के बीच हुई यह बैठक बेहद सकारात्मक और उपयोगी” रही। पोस्ट के अनुसार, बातचीत में भारत सऊदी संबंधों के विभिन्न आयामों के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों पर भी विचार-विमर्श हुआ।

    आधिकारिक दौरे पर रियाद पहुंचे डोभाल

    अजीत डोभाल मंगलवार को एक आधिकारिक दौरे पर सऊदी अरब की राजधानी रियाद पहुंचे थे। किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उनका स्वागत सऊदी अरब में भारत के राजदूत सुहेल एजाज खान और सऊदी विदेश मंत्रालय में राजनीतिक मामलों के उप मंत्री सऊद अल-साती ने किया। डोभाल की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब भारत और सऊदी अरब के बीच सुरक्षा और काउंटर टेररिज्म सहयोग लगातार गहराता जा रहा है।

    रणनीतिक साझेदारी के तहत सुरक्षा सहयोग पर जोर

    गौरतलब है कि पिछले सप्ताह ही भारत और सऊदी अरब ने रियाद में स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप काउंसिल के तहत पॉलिटिकल, काउंसलर और सिक्योरिटी कोऑपरेशन कमेटी के अंतर्गत सिक्योरिटी वर्किंग ग्रुप की तीसरी बैठक आयोजित की थी। इस बैठक में दोनों देशों के बीच चल रहे द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग की व्यापक समीक्षा की गई थी और भविष्य की दिशा तय करने पर सहमति बनी थी।

    आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ साझा रणनीति

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों देशों ने आतंकवाद का मुकाबला करने से जुड़ी मौजूदा और उभरती चुनौतियों पर गहन विचार-विमर्श किया। इसमें उग्रवाद और कट्टरपंथ से निपटना, आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकना, आतंकवादी उद्देश्यों के लिए टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग को नियंत्रित करना और अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध व आतंकवाद के बीच बढ़ते संबंधों जैसे मुद्दे शामिल रहे।

    ने बताया कि भारत और सऊदी अरब के अधिकारियों ने द्विपक्षीय कानूनी और न्यायिक सहयोग को और मजबूत करने तथा कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाने के उपायों पर भी चर्चा की। इसका उद्देश्य आतंकवाद और संगठित अपराध के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।

    आतंकवाद की कड़ी निंदा, हालिया हमलों का उल्लेख

    विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया कि दोनों पक्षों ने आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों की कड़ी निंदा दोहराई। इसमें सीमा पार आतंकवाद के साथ-साथ भारत में हुए हालिया आतंकवादी हमलों का भी विशेष रूप से उल्लेख किया गया। बयान में 22 अप्रैल, 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में निर्दोष नागरिकों पर हुए कायरतापूर्ण आतंकवादी हमले और 10 नवंबर, 2025 को नई दिल्ली में लाल किले के पास हुई आतंकवादी घटना को गंभीर चिंता का विषय बताया गया।

    उच्चस्तरीय अधिकारियों की भागीदारी

    सिक्योरिटी वर्किंग ग्रुप की इस अहम बैठक की सह-अध्यक्षता भारत की ओर से विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव काउंटर टेररिज्म विनोद बहादे और सऊदी अरब की ओर से गृह मंत्रालय में लीगल अफेयर्स एवं इंटरनेशनल कोऑपरेशन के डायरेक्टर जनरल अहमद अल-ईसा ने की। बैठक में दोनों देशों के वरिष्ठ सुरक्षा और कूटनीतिक अधिकारियों ने हिस्सा लिया।

    अगली बैठक भारत में होगी

    MEA के अनुसार, सिक्योरिटी वर्किंग ग्रुप की अगली बैठक आपसी सहमति से तय की गई तारीख पर भारत में आयोजित की जाएगी। यह बैठक भारत–सऊदी अरब के बीच बढ़ते रणनीतिक विश्वास और सुरक्षा साझेदारी को और मजबूती देने में अहम भूमिका निभाएगी।