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  • साफ पानी की योजना में सेंसरों का खेल, ब्रांडेड स्टीकर के नीचे निकला लोकल माल जांच में सामने आई चौंकाने वाली गड़बड़ी

    साफ पानी की योजना में सेंसरों का खेल, ब्रांडेड स्टीकर के नीचे निकला लोकल माल जांच में सामने आई चौंकाने वाली गड़बड़ी


    भोपाल। मध्य प्रदेश में लोगों तक साफ और सुरक्षित पेयजल पहुंचाने के लिए चलाई जा रही अमृत 2.0 योजना के तहत बन रहे वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स में उपकरणों की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के कई जलप्रदाय प्रोजेक्ट्स में SCADA सिस्टम के लिए अप्रूव्ड ब्रांड के उपकरणों की जगह दूसरे और कथित तौर पर लोकल उपकरण लगाए गए। कुछ उपकरणों पर नामी कंपनियों के स्टीकर भी चिपके मिले। एक मामले में सेंसर से स्टीकर हटाने पर उसके नीचे दूसरी कंपनी का नाम दिखाई दिया।

    अमृत 2.0 के तहत प्रदेश में 622 जलप्रदाय प्रोजेक्ट मंजूर किए गए हैं। इनमें 416 प्रोजेक्ट के टेंडर वर्ष 2025 में जारी हुए थे। किसी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट की कुल लागत का करीब 5 प्रतिशत हिस्सा SCADA सिस्टम पर खर्च किया जाता है। प्लांट की क्षमता के हिसाब से इसकी लागत लगभग 50 से 80 लाख रुपए तक हो सकती है। SCADA सिस्टम पानी की गुणवत्ता और सप्लाई से जुड़े कई मानकों की निगरानी करता है इसलिए इसमें इस्तेमाल होने वाले सेंसर और नियंत्रण उपकरणों की गुणवत्ता महत्वपूर्ण मानी जाती है।

    रिपोर्ट के मुताबिक सात जिलों के दस वाटर ट्रीटमेंट प्लांट की मौके पर जांच की गई। इनमें तीन जगह उपकरणों और उनकी ब्रांडिंग को लेकर गड़बड़ी सामने आई। एक प्लांट में Siemens के स्थान पर Holisys का PLC लगा मिला जबकि फ्लो मीटर वॉल्व पर अपेक्षित SBEM ब्रांड नहीं था। दूसरे प्लांट में भी Siemens की जगह Holisys का PLC और SBEM की जगह दूसरी कंपनी का प्रेशर ट्रांसमीटर मिला।

    सबसे ज्यादा सवाल उस प्लांट में उठे जहां प्रेशर ट्रांसमीटर पर SBEM का स्टीकर लगा था। रिपोर्टर ने जब स्टीकर हटाया तो उसके नीचे ATC कंपनी का नाम दिखाई दिया। इसी प्लांट में PLC और pH तथा क्लोरीन सेंसर भी निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं मिलने का दावा किया गया है। इससे उपकरणों की वास्तविक कंपनी और उनकी स्वीकृति को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।

    मामले को लेकर SBEM से भी संपर्क किया गया। शहडोल की वीरानी इंजीनियरिंग ने प्लांट में लगे सेंसरों की तस्वीर और जानकारी QAP में अप्रूव्ड कंपनी SBEM को भेजी थी। जवाब में कंपनी ने लिखित रूप से कहा कि उसने इस प्रोजेक्ट के लिए कोई उपकरण या तकनीक सप्लाई नहीं की है। इसके बाद प्लांट में SBEM के नाम से लगाए गए स्टीकर की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठने लगे।

    वहीं संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों ने कहा कि प्रोजेक्ट अभी पूरा नहीं हुआ है और PDMC की निगरानी में काम चल रहा है। उनका कहना है कि किसी अमानक उपकरण को अंतिम रूप से स्वीकार नहीं किया गया है। एक ठेकेदार ने बताया कि SCADA का काम Orbit Engineering Solutions को दिया गया था।

    Orbit Engineering Solutions के मालिक विजय कुमार तिवारी ने कहा कि अप्रूव्ड कंपनियों से उपकरणों की सप्लाई में देरी हो रही थी इसलिए समय पर काम पूरा करने के लिए दूसरी कंपनियों के उपकरण लगाए गए। उन्होंने इन उपकरणों की गुणवत्ता को अच्छा बताया। हालांकि अप्रूव्ड ब्रांड की जगह दूसरे उपकरण लगाने के लिए अनुमति ली गई थी या नहीं इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।

    इस पूरे मामले ने अमृत 2.0 योजना के तहत बन रहे वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स में निगरानी और गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जांच में मानकों के विपरीत उपकरण लगाने की पुष्टि होती है तो यह न केवल सरकारी धन के इस्तेमाल से जुड़ा मामला होगा बल्कि पानी की गुणवत्ता और लोगों की सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाएगा।

  • बिजली कटौती से नहीं रुकेगी नमो भारत ट्रेन, NCRTC ने बताया, मजबूत मल्टी-लेयर बैकअप सिस्टम से पूरी तरह सुरक्षित संचालन

    बिजली कटौती से नहीं रुकेगी नमो भारत ट्रेन, NCRTC ने बताया, मजबूत मल्टी-लेयर बैकअप सिस्टम से पूरी तरह सुरक्षित संचालन




    नई दिल्ली। दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ कॉरिडोर पर चल रही नमो भारत (RRTS) ट्रेन को लेकर यात्रियों के बीच बिजली कटौती के दौरान सेवा बाधित होने की आशंका जताई जा रही थी, खासकर गुड़गांव में हाल ही में मेट्रो सेवा प्रभावित होने की घटना के बाद। लेकिन नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (NCRTC) ने साफ किया है कि नमो भारत ट्रेन का सिस्टम सामान्य मेट्रो या ट्रेनों की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक और सुरक्षित है, जिससे बिजली फेल होने की स्थिति में भी संचालन रुकने की संभावना बेहद कम है।

    NCRTC के अनुसार नमो भारत ट्रेनें 25 केवी (किलोवोल्ट) 50 हर्ट्ज ओवरहेड इलेक्ट्रिक सिस्टम से चलती हैं, जिसे ओवरहेड कैटेनरी सिस्टम (OCS) के जरिए सप्लाई दी जाती है। पूरा कॉरिडोर अलग-अलग बड़े सब-स्टेशनों और मल्टी-ग्रिड नेटवर्क से जुड़ा हुआ है, जिससे किसी एक स्थान पर फॉल्ट आने पर दूसरा ग्रिड तुरंत पावर सपोर्ट संभाल लेता है और ट्रेन संचालन बाधित नहीं होता।

    रीजनरेटिव ब्रेकिंग से खुद बनती है बिजली
    इस ट्रेन की एक खास तकनीक रीजनरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम है, जिसमें ट्रेन ब्रेक लगाने के दौरान अपनी गतिज ऊर्जा को बिजली में बदलकर वापस ग्रिड में भेजती है। इससे लगभग 30 प्रतिशत तक ऊर्जा की बचत होती है और सिस्टम को अतिरिक्त पावर सपोर्ट भी मिलता है, जो आपात स्थिति में मददगार साबित होता है।

    SCADA सिस्टम से रियल टाइम निगरानी
    पूरे 82 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर की निगरानी के लिए SCADA (Supervisory Control and Data Acquisition) सिस्टम लगाया गया है। यह सिस्टम हर सब-स्टेशन और पावर फ्लो पर लगातार नजर रखता है और किसी भी तकनीकी खराबी की स्थिति में तुरंत पावर को दूसरे स्रोत की ओर डायवर्ट कर देता है, जिससे सेवा बिना रुके जारी रहती है।

    पूरी तरह बिजली गुल होने पर भी सुरक्षित संचालन
    NCRTC के अनुसार, यदि किसी वजह से मुख्य बिजली आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो जाती है, तब भी ट्रेनों और स्टेशनों में लगी बैकअप बैटरियां जरूरी सिस्टम जैसे लाइट, एयर कंडीशनिंग, कंट्रोल सिस्टम और इमरजेंसी गेट को चालू रखती हैं। इससे यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित रहती है और किसी भी तरह की आपात स्थिति में ट्रेन को सुरक्षित तरीके से रोका जा सकता है।

    गुड़गांव घटना से तुलना नहीं संभव
    हाल ही में गुड़गांव में बिजली बाधित होने से रैपिड मेट्रो सेवा प्रभावित हुई थी, लेकिन NCRTC का दावा है कि नमो भारत का पावर इंफ्रास्ट्रक्चर मल्टी-लेयर बैकअप सिस्टम पर आधारित है, इसलिए ऐसी स्थिति यहां बनने की संभावना बेहद कम है। इस तकनीकी मजबूती के चलते दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ कॉरिडोर पर यात्रा करने वाले लाखों यात्रियों को भरोसेमंद और निर्बाध सेवा मिलने का दावा किया गया है।