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  • ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्य से उठा पर्दा! डार्क मैटर से जुड़े कण का मिला चौंकाने वाला संकेत

    ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्य से उठा पर्दा! डार्क मैटर से जुड़े कण का मिला चौंकाने वाला संकेत


    नई दिल्ली । ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों में शामिल डार्क मैटर को लेकर वैज्ञानिकों को एक बेहद अहम संकेत मिला है। जिस पदार्थ को वैज्ञानिक दशकों से खोजने की कोशिश कर रहे हैं उसे आज तक सीधे तौर पर देखा या पकड़ा नहीं जा सका है। अब अमेरिका की जमीन से करीब एक मील नीचे मौजूद एक अत्याधुनिक प्रयोगशाला में लगे डिटेक्टर ने एक ऐसी रहस्यमयी घटना दर्ज की है जिसने वैज्ञानिकों की उम्मीद बढ़ा दी है। हालांकि अभी इसे डार्क मैटर की पक्की खोज कहना जल्दबाजी होगी।

    यह संकेत LZ डिटेक्टर से मिला है। इस प्रयोग से जुड़े करीब 250 वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने लगभग दो वर्षों तक इसके आंकड़ों का अध्ययन किया है। टीम में छह देशों के 39 संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हैं। जांच के दौरान वैज्ञानिकों को एक ऐसा कण मिला जो एक परमाणु से टकराता हुआ दिखाई दिया। वैज्ञानिकों को आशंका है कि यह WIMP यानी Weakly Interacting Massive Particle हो सकता है। WIMP को लंबे समय से डार्क मैटर के संभावित कणों में से एक माना जाता है।

    इस खोज की खास बात यह है कि LZ डिटेक्टर बेहद संवेदनशील है और बहुत छोटे कणों के बीच होने वाली हल्की सी प्रतिक्रिया को भी पकड़ने की कोशिश करता है। इसे अमेरिका के साउथ डकोटा में सैनफोर्ड अंडरग्राउंड रिसर्च फैसिलिटी में जमीन के करीब एक मील नीचे स्थापित किया गया है। इतनी गहराई में प्रयोग करने का मकसद ऊपर से आने वाले दूसरे कणों और विकिरण के प्रभाव को कम करना है ताकि बेहद कमजोर संकेतों को भी पहचाना जा सके।

    आसान भाषा में समझें तो वैज्ञानिक ऐसे संकेत की तलाश कर रहे हैं जो यह बता सके कि डार्क मैटर का कोई कण सामान्य पदार्थ के परमाणु से टकराया है। इस बार मिले संकेत ने इसी संभावना को जन्म दिया है। लेकिन वैज्ञानिक अभी बेहद सावधानी से आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि केवल एक घटना के आधार पर डार्क मैटर की मौजूदगी साबित नहीं की जा सकती।

    इस संकेत को 2.6 सिग्मा का स्तर मिला है। वैज्ञानिक प्रयोगों में सिग्मा का इस्तेमाल यह समझने के लिए किया जाता है कि किसी नतीजे के संयोग से सामने आने की कितनी संभावना है। बड़ी वैज्ञानिक खोज के लिए आम तौर पर 5 सिग्मा का स्तर जरूरी माना जाता है। इसका मतलब साफ है कि अभी इस संकेत को निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता।

    ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रिक गैटस्कैल ने भी स्पष्ट किया है कि वैज्ञानिकों की टीम डार्क मैटर खोज लेने का दावा नहीं कर रही है। टीम ने जरूर कुछ असामान्य और दिलचस्प देखा है लेकिन इसके पीछे की असली वजह समझने के लिए और जांच की आवश्यकता है। वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाने की कोशिश की है कि कहीं यह घटना किसी दूसरे कारण से तो नहीं हुई।

    डार्क मैटर आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह ऐसा पदार्थ है जिसे हम सीधे देख नहीं सकते क्योंकि यह प्रकाश को सामान्य पदार्थ की तरह उत्सर्जित या परावर्तित नहीं करता। फिर भी इसके अस्तित्व के संकेत ब्रह्मांड में मौजूद गुरुत्वाकर्षण प्रभावों से मिलते हैं। माना जाता है कि ब्रह्मांड के कुल पदार्थ का करीब 85 फीसदी हिस्सा डार्क मैटर हो सकता है।

    अब वैज्ञानिक LZ डिटेक्टर से मिलने वाले आगे के आंकड़ों पर नजर रखेंगे। यदि भविष्य में इसी तरह के कई संकेत मिलते हैं और वैज्ञानिक प्रमाण 5 सिग्मा के स्तर तक पहुंचते हैं तो डार्क मैटर की खोज का दावा काफी मजबूत हो सकता है। फिलहाल वैज्ञानिकों के हाथ डार्क मैटर नहीं बल्कि उसका एक बेहद दिलचस्प संभावित सुराग लगा है। आने वाले प्रयोग यह तय करेंगे कि यह वास्तव में डार्क मैटर का संकेत था या किसी दूसरे कण से जुड़ी दुर्लभ घटना।

  • कभी अंटार्कटिका का हिस्सा था भारत! लाखों साल पुरानी चट्टानों ने खोला पृथ्वी के इतिहास का बड़ा राज

    कभी अंटार्कटिका का हिस्सा था भारत! लाखों साल पुरानी चट्टानों ने खोला पृथ्वी के इतिहास का बड़ा राज



    नई दिल्ली। वैज्ञानिकों ने एक नई रिसर्च में बड़ा खुलासा किया है कि आज का भारत कभी अंटार्कटिका से जुड़ा हुआ था। लाखों नहीं बल्कि करोड़ों साल पहले दोनों भूभाग एक विशाल पर्वत श्रृंखला और साझा भूवैज्ञानिक संरचना का हिस्सा थे। अब आंध्र प्रदेश की प्राचीन चट्टानों और पूर्वी अंटार्कटिका की चट्टानों के अध्ययन से इस रहस्य पर नई रोशनी पड़ी है।

    रिसर्च के मुताबिक आंध्र प्रदेश के विजयनगरम और सालूर इलाके में मिली चट्टानों की संरचना, उम्र और रासायनिक गुण पूर्वी अंटार्कटिका की चट्टानों से काफी मिलते-जुलते पाए गए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये दोनों क्षेत्र कभी “रेनर-ईस्टर्न घाट ओरोजेन” नाम की एक ही भूवैज्ञानिक प्रणाली का हिस्सा थे।

    यह अध्ययन भारत, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने किया है। रिसर्च में खास तौर पर ग्रैनुलाइट नाम की मेटामॉर्फिक चट्टानों का अध्ययन किया गया, जो पृथ्वी के भीतर अत्यधिक गर्मी और दबाव में बनती हैं और अरबों साल पुराने भूवैज्ञानिक बदलावों की जानकारी अपने अंदर सुरक्षित रखती हैं।

    वैज्ञानिकों ने जिरकॉन, गार्नेट और मोनाजाइट जैसे खनिजों का आधुनिक तकनीक से परीक्षण किया। इनमें जिरकॉन को सबसे अहम माना गया क्योंकि यह अत्यधिक तापमान और दबाव में भी सुरक्षित रहता है। वैज्ञानिकों ने जिरकॉन के भीतर मौजूद रेडियोधर्मी तत्वों के अध्ययन से करोड़ों साल पुराने भूवैज्ञानिक घटनाक्रमों का पता लगाया।

    रिसर्च में सामने आया कि भारत और अंटार्कटिका दोनों क्षेत्रों में भूवैज्ञानिक विकास के तीन बड़े चरण एक जैसे रहे। पहला चरण करीब 1000 से 990 मिलियन वर्ष पहले हुआ, जब विशाल महाद्वीपीय टकराव से बड़ी पर्वत श्रृंखलाएं बनीं। दूसरा चरण 950 से 890 मिलियन वर्ष पहले का था, जिसमें चट्टानों में गहरे संरचनात्मक बदलाव आए। तीसरा चरण 570 से 540 मिलियन वर्ष पहले हुआ, जब खनिजों से भरपूर तरल पदार्थ चट्टानों की दरारों से गुजरे और खास रासायनिक निशान छोड़ गए।

    वैज्ञानिकों के अनुसार, बाद में सुपरकॉन्टिनेंट Gondwana टूटने लगा और करीब 130 से 150 मिलियन वर्ष पहले भारत और अंटार्कटिका अलग हो गए। भारतीय प्लेट उत्तर दिशा में एशिया की ओर बढ़ गई, जबकि अंटार्कटिका दक्षिण की ओर खिसक गया।

    आज दोनों भूभाग हजारों किलोमीटर दूर हैं, लेकिन करोड़ों साल पुरानी चट्टानें अब भी उनके साझा इतिहास की कहानी बयां कर रही हैं।