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  • ‘सोने का कारखाना’ बना ज्वालामुखी द्वीप, वैज्ञानिकों की खोज से खुला पृथ्वी के खजाने का रहस्य

    ‘सोने का कारखाना’ बना ज्वालामुखी द्वीप, वैज्ञानिकों की खोज से खुला पृथ्वी के खजाने का रहस्य

    वाशिंगटन। वैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर बड़े सोने के भंडार बनने की प्रक्रिया से जुड़ा अहम रहस्य उजागर किया है। जर्मनी के GOMAR हेल्महोल्ट्ज सेंटर फॉर ओशन रिसर्च के डॉ. क्रिश्चियन टिम्म (GEOMAR Helmholtz Centre for Ocean Research Kiel) के वैज्ञानिकों की टीम ने दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित Kermadec Islands को “सोने का कारखाना” करार दिया है।
    यह शोध कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट जर्नल (Communications Earth & Environment ) में प्रकाशित हुआ है।

    यहां प्रशांत महासागरीय प्लेट ऑस्ट्रेलियाई प्लेट के नीचे सबडक्शन प्रक्रिया से गुजर रही है। पानी से भरपूर तरल पदार्थ सबडक्टिंग प्लेट से निकलकर मेंटल में एंट्री करते हैं, जिससे मेंटल का पिघलने का तापमान कम हो जाता है। बार-बार पिघलने के कई चक्रों के बाद चाल्कोफाइल तत्वों जैसे सोना और तांबा मैग्मा में केंद्रित हो जाते हैं। वैज्ञानिकों ने समुद्र तल से एकत्रित ज्वालामुखी ग्लास के 66 सैंपल्स का विश्लेषण किया। इन नमूनों में सामान्य मिड-ओशन रिज की तुलना में सोने की मात्रा अधिक पाई गई, जो दर्शाता है कि गहरे मेंटल में ही सोना केंद्रित होता है।
    रिसर्च में क्या निकलकर आया सामने

    ज्वालामुखी ग्लास समुद्री पानी से लावा के तेजी से ठंडा होने पर बनता है, जो मैग्मा की मूल संरचना को बनाए रखता है। रिसर्च में पाया गया कि हाइड्रस यानी पानी-समृद्ध परिस्थितियों में ही कई चरणों वाले पिघलने से सोना पकता जाता है।

    यह प्रक्रिया बताती है कि टेक्टोनिक प्लेटों के पानी के प्रभाव से मेंटल में सोने का आगमन होता है और फिर यह समुद्र तल तक पहुंचकर हाइड्रोथर्मल वेंट्स में जमा होता है।

    इससे पहले वैज्ञानिक इस बात को नहीं समझ पाए थे कि कुछ क्षेत्रों में सोना इतना अधिक क्यों जमा होता है। यह खोज भविष्य में समुद्री खनिज संसाधनों की खोज के लिए नया ब्लूप्रिंट पेश करती है। अब भूवैज्ञानिक विशाल समुद्री सल्फाइड डिपॉजिट्स का पता लगाने में सक्षम होंगे, जहां सोना और अन्य कीमती धातुएं प्रचुर मात्रा में हो सकती हैं। इससे पृथ्वी पर नोबल मेटल्स के जीवन चक्र की समझ बढ़ेगी, गहरे मेंटल से लेकर समुद्री वेंट्स तक।

  • Research : उत्तराखंड में मामूली बारिश भी मचा सकती है भारी तबाही… वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

    Research : उत्तराखंड में मामूली बारिश भी मचा सकती है भारी तबाही… वैज्ञानिकों ने जताई चिंता


    देहरादून।
    उत्तराखंड (Uttarakhand.) के पहाड़ी क्षेत्रों (Hilly Areas) में अतिवृष्टि या बादल फटने (Heavy Rainfall or Cloudburst) से ही नहीं, बल्कि लगातार हल्की बारिश (Light Rain) से भी धराली जैसी आपदा आ सकती है। पहाड़ों पर जगह-जगह जमा मलबे के ढेर मामूली बारिश (Light Rain) में ही आपदा के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं।

    दून विश्वविद्यालय ने देश के छह नामी संस्थानों के वैज्ञानिकों के साथ किए अध्ययन में ये चिंता जताई है वैज्ञानिकों के मुताबिक, पहाड़ों पर यदि 15 से 30 दिन तक रोज छह से सात मिलीमीटर बारिश होती है तो मलबा जानलेवा हो सकता है। मलबे के ढेर पानी सोखने के बाद दस किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से खिसक सकते हैं और ये स्थिति निचले क्षेत्रों में रह रही आबादी के लिए कहर साबित हो सकती है।


    धराली जैसी आपदा का डर

    उत्तरकाशी का धराली इसका ताजा और डरावना उदाहरण है। धराली में पांच अगस्त को आई आपदा एक-दो दिन की नहीं बल्कि पूरे एक माह की बारिश का नतीजा थी। इस इलाके में पांच जुलाई से पांच अगस्त तक 195 एमएम बारिश दर्ज की गई थी। बारिश के रूप में धीरे-धीरे आए पानी को मलबे ने सोखा और बाद में खीरगंगा के बहाव के साथ धराली में तबाही मचा दी। दून विवि के भूगर्भ विज्ञान के एचओडी डॉ.विपिन कुमार के अनुसार, धराली में बारिश के बाद मलबा 60 किलो पास्कल का दबाव बनाकर दस किमी प्रति सेकेंड की गति से नीचे आकर तबाही का कारण बना था।


    मलबे का निस्तारण और निरंतर निगरानी जरूरी

    शोध रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने राज्य की प्रमुख नदियों, ग्लेशियरों के मुहाने, नाले-धारों और ऊंचाई वाले पहाड़ों पर जमा मलबे का पता लगाने की सलाह दी है, ताकि उसे निस्तारित किया जा सके। इसके अलावा ऐसे इलाकों की लगातार निगरानी और पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित करने की भी सलाह दी है।


    भविष्य के लिए सिफारिश

    सेडिमेंट सोर्स मैपिंग अनिवार्य की जाए, जिससे गिलेशियर व हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों में मलबे के स्रोतों की निरंतर पहचान और निगरानी की जा सके। सरकार की आपदा प्रबंधन नीतियों में क्वांटिटेटिव हजार्ड साइंस को शामिल किया जाए, ताकि जोखिम का वैज्ञानिक आकलन कर समय रहते टोस और प्रभावनी निर्णय लिए जा सके।


    एक नजर चेतावनी पर

    रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड राज्य में हर वर्ष औसतन 2 हजार आपदाएं आथी हैं। 2025 में उत्तराखंड राज्य ने 2100 से ज्यादा छोटी-बड़ी आपदाएं झेली। इन आपदाओं में 263 लोगों की जान चली गई थी।