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  • SC-ST एक्ट को चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, 2020 के फैसले की समीक्षा से किया इनकार

    SC-ST एक्ट को चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, 2020 के फैसले की समीक्षा से किया इनकार


    नई दिल्ली ।
    अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अत्याचार रोकने के लिए बनाए गए SC/ST अत्याचार निवारण कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि कानून में आरोपी को उत्पीड़न से बचाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं और 2020 में दिए गए फैसले के कुछ ही वर्षों बाद उसकी दोबारा समीक्षा करने का फिलहाल कोई आधार नहीं दिखता।

    याचिका में SC/ST एक्ट के कई प्रावधानों को समानता के अधिकार के खिलाफ बताते हुए उनमें बदलाव की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता बृजभूषण सैनी की ओर से कानून के प्रावधानों पर सवाल उठाए गए और यह दलील दी गई कि एक वर्ग को सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाए गए कानून का इस्तेमाल दूसरे वर्ग के उत्पीड़न के लिए नहीं होना चाहिए।

    याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन ने अदालत के सामने कानून के कथित दुरुपयोग का मुद्दा उठाया। उनका तर्क था कि कई मामलों में कानून के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल होने की आशंका बनी रहती है। उन्होंने सजा की दर कम होने का भी उल्लेख किया और कहा कि गलत मामलों के कारण आरोपियों को गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

    याचिका में FIR दर्ज करने और गिरफ्तारी से पहले शुरुआती जांच की व्यवस्था पर भी सवाल उठाया गया। दलील दी गई कि बिना प्रारंभिक जांच के FIR दर्ज करने और आरोपी की गिरफ्तारी की व्यवस्था से कानून के दुरुपयोग की संभावना बढ़ सकती है। इसके साथ ही SC/ST एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर लागू प्रतिबंध को भी चुनौती दी गई।

    याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि कानून के तहत गलत तरीके से दर्ज किए गए मामलों में आरोपियों को आर्थिक नुकसान और अन्य परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी आधार पर कानून के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार की मांग की गई थी।

    मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। पीठ में जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए 2020 के अपने फैसले का संदर्भ दिया।

    पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही SC/ST एक्ट से जुड़े प्रावधानों और उनमें किए गए बदलावों को लेकर अपना फैसला दे चुका है। उस निर्णय के बाद अभी केवल छह वर्ष का समय बीता है। ऐसे में इस अवधि के भीतर ही पुराने फैसले की दोबारा समीक्षा करने का कोई पर्याप्त आधार अदालत को नजर नहीं आता।

    अदालत की टिप्पणी के बाद SC/ST एक्ट के संबंधित प्रावधानों में तत्काल बदलाव की मांग वाली यह याचिका आगे नहीं बढ़ सकी। मामले में उठाए गए मुद्दों में FIR, गिरफ्तारी, अग्रिम जमानत और कानून के संभावित दुरुपयोग से जुड़े सवाल प्रमुख थे।

    SC/ST एक्ट का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकना और ऐसे मामलों में कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराना है। मौजूदा सुनवाई में अदालत ने कानून के मूल उद्देश्य के साथ-साथ आरोपियों के लिए उपलब्ध कानूनी सुरक्षा उपायों को भी ध्यान में रखा और 2020 के फैसले को तत्काल दोबारा खोलने से इनकार किया।

  • धर्म परिवर्तन के बाद SC/ST एक्ट की सुरक्षा नहीं मिलेगी, बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला; IPC के तहत मुकदमा जारी रहेगा

    धर्म परिवर्तन के बाद SC/ST एक्ट की सुरक्षा नहीं मिलेगी, बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला; IPC के तहत मुकदमा जारी रहेगा


    नई दिल्ली ।
    बॉम्बे हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेता है, तो वह एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन का प्रभाव भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं के तहत दर्ज आपराधिक मामलों पर नहीं पड़ेगा और ऐसे मामलों की सुनवाई सामान्य प्रक्रिया के अनुसार जारी रहेगी।

    यह मामला एक पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा था, जिसमें महिला ने अपने रिश्तेदारों के खिलाफ मारपीट और जातिसूचक टिप्पणी करने के आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया था। शिकायत में एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराएं भी शामिल की गई थीं। विवाद की पृष्ठभूमि में परिवार के भीतर साथ रहने के दौरान स्वच्छता, पानी के उपयोग और घरेलू व्यवस्थाओं को लेकर मतभेद सामने आए थे।

    सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि विवाह के समय महिला ने अपने पति के साथ इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। उसने अपना नाम भी बदल लिया था और लंबे समय से मुस्लिम धर्म का पालन कर रही थी। इसी आधार पर अदालत के समक्ष यह कानूनी प्रश्न उठा कि क्या धर्म परिवर्तन के बाद भी वह एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत संरक्षण की पात्र मानी जा सकती है।

    आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि यह मूल रूप से पारिवारिक और संपत्ति से जुड़ा विवाद है तथा अधिनियम के प्रावधान इस मामले में लागू नहीं होते। वहीं सरकारी पक्ष ने भी सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन के बाद संबंधित व्यक्ति को एससी/एसटी अधिनियम के तहत मिलने वाला संरक्षण उपलब्ध नहीं रहता। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद अपना निर्णय सुनाया।

    न्यायमूर्ति वृषाली वी. जोशी की एकल पीठ ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद संबंधित व्यक्ति पर एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होंगे। इस आधार पर अदालत ने आरोपियों को इस विशेष अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों से राहत प्रदान की। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि शिकायत में भारतीय दंड संहिता के तहत लगाए गए अन्य आरोप प्रथम दृष्टया विचारणीय हैं और उनकी सुनवाई कानून के अनुसार जारी रहेगी।

    अदालत के इस फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि विशेष कानूनों के तहत मिलने वाले अधिकार और संरक्षण संबंधित वैधानिक प्रावधानों तथा न्यायालयों की स्थापित व्याख्याओं के अनुरूप ही निर्धारित किए जाते हैं। साथ ही यह भी रेखांकित किया गया कि यदि किसी मामले में अन्य आपराधिक आरोप बनते हैं, तो केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर उन मामलों की सुनवाई समाप्त नहीं हो जाती।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के दायरे और धर्म परिवर्तन से जुड़े कानूनी प्रभावों को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण फैसला है। इससे भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के दौरान संबंधित कानूनों की व्याख्या और न्यायिक दृष्टिकोण को समझने में सहायता मिलेगी, जबकि प्रत्येक मामले का अंतिम निर्णय उसके तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाएगा।