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  • 61 दिन बाद खुलेगा समुद्र का खजाना, तमिलनाडु में फिर रफ्तार पकड़ेगा ₹7000 करोड़ का मत्स्य कारोबार और निर्यात

    61 दिन बाद खुलेगा समुद्र का खजाना, तमिलनाडु में फिर रफ्तार पकड़ेगा ₹7000 करोड़ का मत्स्य कारोबार और निर्यात

    नई दिल्ली । समुद्री मछलियों के प्रजनन काल को ध्यान में रखते हुए लागू की गई 61 दिनों की वार्षिक बंदी समाप्त होने के साथ ही तमिलनाडु में मत्स्य उद्योग एक बार फिर पूरी क्षमता के साथ शुरू होने जा रहा है। इस निर्णय से राज्य के लाखों मछुआरों, समुद्री उत्पाद कारोबारियों और निर्यात क्षेत्र को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। साथ ही राज्य सरकार के राजस्व संग्रह में भी उल्लेखनीय वृद्धि का अनुमान लगाया जा रहा है।

    हर वर्ष अप्रैल से जून के बीच समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और मछलियों के प्रजनन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यांत्रिक नौकाओं द्वारा मछली पकड़ने पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया जाता है। इस अवधि के दौरान समुद्री गतिविधियां सीमित रहती हैं, जिससे मछुआरा समुदाय की आय प्रभावित होती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रतिबंध दीर्घकालिक मत्स्य संसाधनों के संरक्षण के लिए आवश्यक है।

    बंदी अवधि समाप्त होने के बाद तमिलनाडु के तटीय इलाकों में फिर से गतिविधियां तेज हो गई हैं। मछुआरे अपनी नौकाओं की मरम्मत, इंजन परीक्षण, जालों की तैयारी और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं में जुटे हुए हैं। कई स्थानों पर समुद्र में वापसी को लेकर उत्साह का माहौल देखा जा रहा है। लंबे इंतजार के बाद अब हजारों नौकाएं दोबारा समुद्र में उतरने की तैयारी कर रही हैं।

    तमिलनाडु देश के प्रमुख मत्स्य उत्पादन राज्यों में शामिल है। राज्य की लंबी समुद्री तटरेखा और विकसित मत्स्य अवसंरचना इसे इस क्षेत्र में विशेष पहचान प्रदान करती है। समुद्री उत्पादों का उत्पादन, प्रसंस्करण और निर्यात राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। बड़ी संख्या में परिवार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग पर निर्भर हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार समुद्री मछली पकड़ने की गतिविधियां शुरू होते ही घरेलू बाजारों में आपूर्ति बढ़ेगी और निर्यात क्षेत्र को भी नई गति मिलेगी। समुद्री खाद्य उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय मांग लगातार बनी हुई है, विशेष रूप से एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बाजारों में। ऐसे में उत्पादन और निर्यात में वृद्धि से विदेशी मुद्रा अर्जन के साथ-साथ स्थानीय व्यापार को भी मजबूती मिलने की संभावना है।

    मत्स्य उद्योग से जुड़े व्यापारियों, कोल्ड स्टोरेज संचालकों, परिवहन कंपनियों और प्रोसेसिंग इकाइयों को भी इस पुनः शुरुआत से लाभ मिलने की उम्मीद है। पिछले दो महीनों के दौरान गतिविधियां सीमित रहने से कई व्यवसायों की आय प्रभावित हुई थी। अब कारोबार सामान्य होने के साथ रोजगार और आय के अवसरों में भी वृद्धि देखी जा सकती है।

    आर्थिक जानकारों का मानना है कि समुद्री उत्पादों का व्यापार दोबारा गति पकड़ने पर राज्य को हजारों करोड़ रुपये के आर्थिक लाभ मिल सकते हैं। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब सरकार विकास योजनाओं, बुनियादी ढांचे और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की तलाश में है।

    मत्स्य क्षेत्र की यह वापसी केवल एक उद्योग के पुनः संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तटीय अर्थव्यवस्था, रोजगार, निर्यात और ग्रामीण आजीविका से जुड़े व्यापक आर्थिक तंत्र को भी नई ऊर्जा प्रदान करेगी। आने वाले महीनों में इस क्षेत्र के प्रदर्शन पर राज्य की आर्थिक गतिविधियों की दिशा काफी हद तक निर्भर रहने की संभावना है।

  • वैश्विक सीफूड बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी, अगले पांच वर्षों में निर्यात को 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने का रोडमैप

    वैश्विक सीफूड बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी, अगले पांच वर्षों में निर्यात को 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने का रोडमैप

    नई दिल्ली । भारत के समुद्री उत्पाद निर्यात क्षेत्र ने पिछले एक दशक में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है और अब देश इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की तैयारी में जुट गया है। केंद्र सरकार ने अगले पांच वर्षों में समुद्री उत्पादों के निर्यात को 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। इस दिशा में निर्यात क्षमता बढ़ाने, वैश्विक बाजारों तक पहुंच मजबूत करने और मूल्य संवर्धित उत्पादों को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

    हाल ही में आयोजित राष्ट्रीय समुद्री उत्पाद निर्यात कार्यशाला के दौरान केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत का समुद्री उत्पाद निर्यात पिछले दस वर्षों में लगभग 70 प्रतिशत बढ़ा है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में वैश्विक सीफूड व्यापार में भारत की हिस्सेदारी करीब चार प्रतिशत है, जिसे आने वाले वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार, उद्योग, निर्यातक और किसानों के बीच बेहतर समन्वय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    उन्होंने कहा कि केवल पारंपरिक निर्यात पर निर्भर रहने के बजाय रेडी-टू-ईट और रेडी-टू-कुक जैसे वैल्यू एडेड उत्पादों के उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देना समय की मांग है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऐसे उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है और भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है। इसके साथ ही हाल के वर्षों में विभिन्न देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों से खुले नए बाजारों का लाभ उठाने की रणनीति पर भी बल दिया गया।

    मत्स्य पालन क्षेत्र के आंकड़े भी इस विकास यात्रा को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। देश में मछली उत्पादन वर्ष 2012-13 के लगभग 95.8 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में करीब 198 लाख टन तक पहुंच चुका है। उत्पादन में यह वृद्धि न केवल घरेलू मांग को पूरा करने में सहायक रही है बल्कि निर्यात क्षमता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत का समुद्री उत्पाद निर्यात लगभग 8.46 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।

    समुद्री निर्यात में फ्रोजन झींगा अब भी सबसे प्रमुख उत्पाद बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी मांग लगातार बनी हुई है, जिससे भारत को विदेशी मुद्रा अर्जित करने में मदद मिल रही है। सरकार इस क्षेत्र में ट्रेसबिलिटी, गुणवत्ता नियंत्रण और टिकाऊ उत्पादन प्रणालियों को मजबूत बनाने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से निवेश और सहायता उपलब्ध करा रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यात वृद्धि के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। कोल्ड चेन नेटवर्क, आधुनिक लॉजिस्टिक्स, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता, रोग प्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन मानकों का पालन जैसे क्षेत्रों में भी व्यापक सुधार आवश्यक हैं। इसी उद्देश्य से कार्यशाला में उद्योग प्रतिनिधियों, वैज्ञानिकों, स्टार्टअप्स और किसानों ने विभिन्न चुनौतियों और संभावित समाधानों पर विस्तार से चर्चा की।

    समुद्री उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने में परिवहन और एयर कार्गो अवसंरचना की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उच्च मूल्य वाले उत्पादों को तेजी से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के लिए मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी और आधुनिक कार्गो सुविधाओं के विस्तार पर काम किया जा रहा है। सरकार का मानना है कि बेहतर बुनियादी ढांचा, तकनीकी नवाचार और टिकाऊ मत्स्य पालन पद्धतियां भारत को वैश्विक सीफूड व्यापार में अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकती हैं।

    आने वाले वर्षों में यदि उत्पादन, प्रसंस्करण, गुणवत्ता नियंत्रण और बाजार विस्तार की योजनाएं प्रभावी ढंग से लागू होती हैं, तो भारत न केवल अपने निर्यात लक्ष्य को हासिल कर सकता है बल्कि वैश्विक समुद्री उत्पाद व्यापार में एक प्रमुख शक्ति के रूप में भी उभर सकता है।