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  • SEBI ने बदले निवेश के नियम: PMS के लिए विदेशी शेयर, IPO, REIT-InvIT समेत कई नए रास्ते खुले

    SEBI ने बदले निवेश के नियम: PMS के लिए विदेशी शेयर, IPO, REIT-InvIT समेत कई नए रास्ते खुले


    नई दिल्ली। शेयर बाजार में निवेश करने वालों के लिए सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने कई अहम बदलावों को मंजूरी दी है। नए नियमों के तहत पोर्टफोलियो मैनेजर्स (PMS) के निवेश का दायरा बढ़ेगा। अब विदेशी लिस्टेड शेयर, डेट सिक्योरिटीज, REIT, विदेशी म्यूचुअल फंड, ETF, इंडेक्स फंड और विदेशी सरकारी सिक्योरिटीज जैसे विकल्प भी उनके निवेश दायरे में आ सकेंगे। इसके साथ ही IPO, प्राइमरी मार्केट डेट, FPI, REIT-InvIT, विज्ञापन और सेटलमेंट से जुड़े नियमों में भी बदलाव किए गए हैं। SEBI ने 2026 के नए PMS रेगुलेशन को मंजूरी दी है।

    PMS के जरिए निवेश के विकल्प बढ़ेंगे
    SEBI ने 2020 के पुराने नियमों की जगह 2026 के नए पोर्टफोलियो मैनेजर्स रेगुलेशन को मंजूरी दी है। इसके बाद PMS के लिए निवेश के विकल्प बढ़ जाएंगे। तय नियमों और सीमाओं के तहत पोर्टफोलियो मैनेजर्स विदेशी लिस्टेड शेयरों, डेट सिक्योरिटीज, REIT, विदेशी म्यूचुअल फंड, ETF, इंडेक्स फंड और विदेशी सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश कर सकेंगे।

    क्लाइंट की मंजूरी मिलने पर पोर्टफोलियो मैनेजर उसके कुल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) का 10% तक इन्वेस्टमेंट-ग्रेड अनलिस्टेड नॉन-कन्वर्टिबल डेट सिक्योरिटीज में भी लगा सकेगा।

    IPO और प्राइमरी मार्केट में भी निवेश
    नए नियमों के तहत PMS के लिए IPO और प्राइमरी मार्केट डेट में निवेश का रास्ता भी खुला है। इसका मतलब है कि PMS के जरिए अपना पैसा मैनेज कराने वाले निवेशकों के लिए नए शेयर जारी होने के समय निवेश का विकल्प उपलब्ध होगा।

    भारतीय म्यूचुअल फंड की डायरेक्ट प्लान स्कीमों में निवेश की भी अनुमति दी गई है। इनमें ETF, इंडेक्स फंड और स्पेशलाइज्ड इनवेस्टमेंट फंड शामिल हैं। इस सुविधा के लिए न्यूनतम निवेश सीमा 25 लाख रुपए रखी गई है।

    PMS के नियमों का आकार भी हुआ छोटा
    SEBI ने निवेश के विकल्प बढ़ाने के साथ नियमों को आसान बनाने पर भी जोर दिया है। नए PMS नियमों का दस्तावेज 70 पेज से घटाकर 33 पेज कर दिया गया है। SEBI के मुताबिक, इसमें शब्दों की संख्या भी करीब 42% कम की गई है।

    इसके अलावा इंडिपेंडेंट फंड मैनेजर का नया कॉन्सेप्ट भी मंजूर किया गया है। ऐसे फंड मैनेजर रजिस्टर्ड पोर्टफोलियो मैनेजर के साथ मिलकर क्लाइंट का पोर्टफोलियो संभाल सकेंगे। हालांकि, उनके काम की जिम्मेदारी और देनदारी रजिस्टर्ड पोर्टफोलियो मैनेजर की ही रहेगी।

    प्रिंसिपल ऑफिसर बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी शर्तों में भी राहत दी गई है। वहीं, 100 करोड़ रुपए से कम AUM वाले पोर्टफोलियो मैनेजर्स को डीलिंग रूम की अनिवार्य शर्त से छूट मिलेगी। हालांकि, उन्हें ऑडिट ट्रेल और मजबूत इंटरनल कंट्रोल बनाए रखना होगा।

    FPI को कमोडिटी डेरिवेटिव्स में नया विकल्प
    SEBI ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPI के लिए भी निवेश का दायरा बढ़ाया है। अब FPI फिजिकली सेटल्ड नॉन-एग्रीकल्चर कमोडिटी डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स में हिस्सा ले सकेंगे।

    इनमें ऐसे फ्यूचर्स और ऑप्शंस शामिल होते हैं, जिनका अंतर्निहित मूल्य कृषि उत्पादों के बजाय अन्य कच्चे माल, धातुओं या ऊर्जा स्रोतों से जुड़ा होता है। हालांकि, इसके लिए समयसीमा तय की गई है। FPI को टेंडर पीरियड शुरू होने से पहले और एक्सपायरी से कम से कम तीन दिन पहले अपनी पोजिशन खत्म करनी होगी।

    5 करोड़ की संपत्ति वाले व्यक्ति भी बन सकेंगे Accredited Investor
    SEBI ने Accredited Investor की कैटेगरी का दायरा भी बढ़ाया है। अब सिक्योरिटीज मार्केट में 5 करोड़ रुपए की संपत्ति रखने वाले व्यक्तिगत निवेशक और 20 करोड़ रुपए की संपत्ति वाले बॉडी कॉरपोरेट्स भी कुछ मौजूदा आय और नेटवर्थ शर्तें पूरी करने पर इस कैटेगरी में शामिल हो सकेंगे।

    Accredited Investor ऐसे निवेशकों की श्रेणी है, जिन्हें कुछ विशेष निवेश विकल्पों में निवेश के लिए अपेक्षाकृत अधिक वित्तीय क्षमता वाला माना जाता है। SEBI ने अगस्त 2026 में इस फ्रेमवर्क की समीक्षा से जुड़ा कंसल्टेशन पेपर भी जारी किया था।

    सेलिब्रिटी के वित्तीय विज्ञापनों पर नए नियम
    वित्तीय कंपनियों और मार्केट इंटरमीडियरी के विज्ञापनों में सेलिब्रिटी की भूमिका को लेकर भी नियम बदले गए हैं। SEBI ने Common Advertisement Code को मंजूरी दी है।

    इसके तहत कोई सेलिब्रिटी किसी ब्रांड या कंपनी का प्रचार कर सकता है, लेकिन किसी खास वित्तीय प्रोडक्ट या सर्विस को सीधे एंडोर्स नहीं कर सकेगा। यानी वह किसी कंपनी के विज्ञापन में नजर आ सकता है, लेकिन निवेशकों से किसी विशेष वित्तीय प्रोडक्ट को खरीदने या उसमें पैसा लगाने की अपील नहीं कर सकेगा। इस विषय पर SEBI ने जून 2026 में कंसल्टेशन पेपर जारी किया था।

    10 लाख रुपए तक के मामलों में फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट
    शेयर बाजार से जुड़े विवादों और नियमों के उल्लंघन के मामलों में सेटलमेंट प्रक्रिया को भी बदला गया है। SEBI ने सेटलमेंट अमाउंट तय करने का नया फॉर्मूला मंजूर किया है।

    10 लाख रुपए तक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट का रास्ता होगा। गलत तरीके से कमाई गई रकम, बचाए गए नुकसान या निवेशकों को हुए नुकसान की वसूली अलग से तय होगी। नए फॉर्मूले का उद्देश्य सेटलमेंट राशि तय करते समय एक ही नुकसान या रकम की दो बार गणना की समस्या को दूर करना है।

    SEBI के आंकड़ों के मुताबिक, FY24-25 में सेटलमेंट के 703 आवेदन आए थे। FY25-26 में 439 आवेदन आए और 170 मामलों का निपटारा हुआ। इसके साथ ही 1 अप्रैल 2014 से 30 सितंबर 2015 के बीच BSE के इलिक्विड स्टॉक ऑप्शंस में गैर-असली ट्रेड से जुड़े मामलों के लिए चौथी सेटलमेंट स्कीम, 2026 को भी मंजूरी दी गई है।

    REIT और InvIT के लिए विदेशी फंड जुटाने का रास्ता
    SEBI ने REIT और पब्लिकली लिस्टेड InvIT से जुड़े नियमों में भी बदलाव किया है। अब ये मंजूर विदेशी बाजारों में डिपॉजिटरी रिसीट्स जारी कर सकेंगे। इससे इन साधनों के लिए विदेशी निवेश जुटाने का एक नया माध्यम उपलब्ध हो सकता है। REIT और InvIT से जुड़े नियमों को आसान बनाने के लिए SEBI ने अगस्त 2026 में अलग-अलग कंसल्टेशन पेपर भी जारी किए थे।

    वोटिंग नियमों में भी बदलाव किया गया है। अब 75% आउटस्टैंडिंग यूनिट्स की जगह डाले गए वोट्स का 75% होना पर्याप्त होगा। स्पॉन्सर बदलने की स्थिति में एग्जिट ऑफर के नियमों में भी बदलाव किया गया है और असहमत यूनिटहोल्डर्स के साथ व्यवहार को स्पष्ट किया गया है।

    रिसर्च एनालिस्ट और वॉल्ट मैनेजर के नियमों में बदलाव
    SEBI ने रिसर्च एनालिस्ट और रिसर्च एंटिटीज के लिए कुछ कंप्लायंस नियमों को भी आसान किया है। संस्थागत निवेशकों के साथ बातचीत की रिकॉर्डिंग रखने से जुड़ी शर्तों में राहत दी गई है।

    वहीं, वॉल्ट मैनेजर्स के लिए न्यूनतम नेटवर्थ की सीमा 50 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 75 करोड़ रुपए कर दी गई है। नए नियमों में स्टोरेज, सुरक्षा, इंश्योरेंस, गवर्नेंस और रिस्क मैनेजमेंट से जुड़ी शर्तों को भी मजबूत किया गया है। वॉल्ट मैनेजर्स के नियमों में गोल्ड और सिल्वर ETF तथा बुलियन डेरिवेटिव्स से जुड़े बुलियन को भी शामिल किया गया है।

    इस तरह SEBI के हालिया फैसलों में एक तरफ पोर्टफोलियो मैनेजर्स और कुछ निवेशकों के लिए निवेश के विकल्प बढ़ाए गए हैं, वहीं विज्ञापन, सेटलमेंट, रिस्क मैनेजमेंट और अनुपालन से जुड़े कई नियमों में बदलाव किया गया है।

  • एनएसई आईपीओ से पहले इक्विटी ऑप्शंस में मार्केट शेयर घटा, सख्त डेरिवेटिव्स नियमों से कारोबार और मुनाफे पर बढ़ा दबाव

    एनएसई आईपीओ से पहले इक्विटी ऑप्शंस में मार्केट शेयर घटा, सख्त डेरिवेटिव्स नियमों से कारोबार और मुनाफे पर बढ़ा दबाव

    नई दिल्ली । नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई का आईपीओ ऐसे समय में आने जा रहा है, जब एक्सचेंज के सामने इक्विटी ऑप्शंस कारोबार में घटती बाजार हिस्सेदारी, डेरिवेटिव्स से जुड़े सख्त नियम और सीमित विकास के अवसर जैसी चुनौतियां हैं। इन परिस्थितियों का असर एक्सचेंज के कारोबार और मुनाफे पर पड़ सकता है।

    एनएसई की ओर से रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस में दी गई जानकारी के अनुसार, इक्विटी ऑप्शंस के प्रीमियम वैल्यू सेगमेंट में उसकी बाजार हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2023-24 में 96.9 प्रतिशत थी। वित्त वर्ष 2024-25 में यह घटकर 87.4 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2025-26 में 74.71 प्रतिशत रह गई।

    इस तरह तीन वित्त वर्षों में इक्विटी ऑप्शंस के प्रीमियम वैल्यू सेगमेंट में एनएसई की बाजार हिस्सेदारी 22.2 प्रतिशत कम हुई है। हालांकि, अन्य सेगमेंट में एक्सचेंज की स्थिति मजबूत बनी हुई है।

    कैश इक्विटी सेगमेंट इसका प्रमुख उदाहरण है। वित्त वर्ष 2023-24 में इस सेगमेंट में एनएसई की बाजार हिस्सेदारी 92.7 प्रतिशत थी। अगले वित्त वर्ष में यह बढ़कर 93.6 प्रतिशत हुई और वित्त वर्ष 2025-26 में 92.99 प्रतिशत रही।

    कैश सेगमेंट में 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी एनएसई की मजबूत स्थिति को दर्शाती है। हालांकि, इतनी ऊंची हिस्सेदारी होने के कारण इस क्षेत्र में आगे बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने की गुंजाइश सीमित है। इसलिए ऑप्शंस और डेरिवेटिव्स कारोबार में होने वाले बदलाव एनएसई के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

    डेरिवेटिव्स कारोबार पर सख्त होते नियम भी एक्सचेंज के लिए चुनौती बढ़ा रहे हैं। निवेशकों को इस सेगमेंट में हुए बड़े नुकसान के बाद पिछले कुछ वर्षों में डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग को कम करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इनमें सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स यानी एसटीटी बढ़ाना और मार्जिन से जुड़े कदम शामिल हैं।

    इसके साथ ही भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी सेबी की ओर से भी डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग से जुड़े जोखिमों को लेकर निवेशकों में जागरूकता बढ़ाई जा रही है। इन उपायों का उद्देश्य डेरिवेटिव्स कारोबार में निवेशकों की गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।

    खुदरा निवेशकों की संख्या में आई गिरावट भी इसी चुनौती को सामने रखती है। केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी की ओर से राज्यसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, एफएंडओ सेगमेंट में विशिष्ट खुदरा निवेशकों की संख्या वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 20 प्रतिशत घटकर 78.6 लाख रह गई। वित्त वर्ष 2024-25 में यह संख्या 98.1 लाख थी।

    खुदरा निवेशकों की संख्या घटने से एफएंडओ बाजार की गतिविधियों और वॉल्यूम पर असर पड़ सकता है। इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि एनएसई ने अपने आरएचपी में खुद इस जोखिम का उल्लेख किया है।

    एनएसई के अनुसार, डेरिवेटिव्स, खासकर एफएंडओ बाजार में वॉल्यूम में कमी आने से उसके कारोबार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वॉल्यूम घटने का असर आगे उसके मुनाफे पर भी पड़ सकता है।

    इस तरह एनएसई के सामने चुनौती का मुख्य कारण इक्विटी ऑप्शंस में घटती हिस्सेदारी और डेरिवेटिव्स कारोबार को नियंत्रित करने वाले सख्त होते नियम हैं। इसका संभावित असर एफएंडओ गतिविधियों और वॉल्यूम में कमी के रूप में सामने आ सकता है, जिससे कारोबार और मुनाफे की वृद्धि प्रभावित हो सकती है।

    आईपीओ से पहले एनएसई की कैश इक्विटी में मजबूत पकड़ बनी हुई है, लेकिन इक्विटी ऑप्शंस में बाजार हिस्सेदारी की गिरावट और डेरिवेटिव्स कारोबार से जुड़े नियामकीय बदलाव एक्सचेंज के लिए महत्वपूर्ण कारोबारी चुनौतियां बने हुए हैं।

  • Jio IPO कब आएगा? अक्टूबर के अंत या नवंबर में 37,800 करोड़ रुपये के इश्यू की तैयारी, बन सकता है सबसे बड़ा आईपीओ

    Jio IPO कब आएगा? अक्टूबर के अंत या नवंबर में 37,800 करोड़ रुपये के इश्यू की तैयारी, बन सकता है सबसे बड़ा आईपीओ

    नई दिल्ली ।रिलायंस इंडस्ट्रीज के टेलीकॉम और डिजिटल कारोबार से जुड़ी कंपनी Jio Platforms के प्रस्तावित आईपीओ को लेकर निवेशकों की नजर अब इसकी संभावित लॉन्च तारीख पर है। कंपनी करीब 4 अरब डॉलर यानी लगभग 37,800 करोड़ रुपये का सार्वजनिक निर्गम ला सकती है। यदि यह इश्यू तय योजना के मुताबिक बाजार में आता है, तो यह भारतीय शेयर बाजार का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ बन सकता है।

    कंपनी के आईपीओ के अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत में आने की संभावना जताई जा रही है। संभावित समय को लेकर नवरात्रि और दिवाली के आसपास का दौर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नवरात्रि 11 से 20 अक्टूबर तक है, जबकि दिवाली 8 नवंबर को मनाई जाएगी। हालांकि अंतिम तारीख की औपचारिक घोषणा अभी बाकी है।

    कंपनी की ओर से आईपीओ की तारीख तय होने के बाद निवेशकों तक पहुंच बनाने के लिए रोड शो और प्रचार अभियान शुरू किए जाने की योजना है। प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार विदेशों में करीब तीन सप्ताह और भारत में लगभग दो सप्ताह तक रोड शो आयोजित किए जा सकते हैं। तारीख जल्दी तय होने पर विदेश और घरेलू निवेशकों के साथ बातचीत का अभियान भी जल्द शुरू हो सकता है।

    Jio Platforms ने आईपीओ की दिशा में महत्वपूर्ण नियामकीय प्रक्रिया पूरी कर ली है। कंपनी ने जून में ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस यानी DRHP दाखिल किया था। इसके बाद 28 अगस्त को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी से आईपीओ को मंजूरी मिल गई। इससे कंपनी के लिए सार्वजनिक निर्गम की राह आगे बढ़ी है।

    प्रस्तावित आईपीओ का आकार करीब 37,800 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यह रकम जुटने पर Jio का इश्यू अब तक के सबसे बड़े आईपीओ का रिकॉर्ड अपने नाम कर सकता है। फिलहाल पूरा हो चुका सबसे बड़ा आईपीओ हुंडई मोटर इंडिया का करीब 27,000 करोड़ रुपये का है। वहीं राष्ट्रीय शेयर बाजार यानी NSE का लगभग 31,000 करोड़ रुपये का आईपीओ अभी बाजार में आना बाकी है।

    Jio Platforms के प्रस्तावित इश्यू में करीब 27 करोड़ नए शेयर जारी किए जाएंगे। यह कंपनी की कुल हिस्सेदारी का लगभग 2.9 प्रतिशत हिस्सा होगा। खास बात यह है कि इस आईपीओ में मौजूदा शेयरधारकों की ओर से Offer for Sale यानी OFS के जरिए शेयर बेचने का प्रस्ताव नहीं है।

    यह रिलायंस समूह से करीब दो दशक बाद आने वाला बड़ा आईपीओ भी होगा। इससे पहले 2006 में रिलायंस पेट्रोलियम का आईपीओ आया था। ऐसे में Jio का सार्वजनिक निर्गम समूह और भारतीय पूंजी बाजार दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    आईपीओ से जुटाई जाने वाली रकम का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में इस्तेमाल किया जाएगा। प्रस्तावित योजना के अनुसार करीब 27,500 करोड़ रुपये Jio की ऑपरेटिंग कंपनी रिलायंस जियो इन्फोकॉम यानी RJIL के कर्ज को समय से पहले चुकाने के लिए लगाए जा सकते हैं। शेष राशि का इस्तेमाल कंपनी की अन्य जरूरतों के लिए किया जाएगा।

    Jio Platforms अपनी सहायक कंपनी RJIL को जरूरत के अनुसार शेयर, प्रेफरेंस शेयर, डिबेंचर या कर्ज के माध्यम से भी वित्तीय सहायता उपलब्ध करा सकती है। इससे आईपीओ से मिलने वाली पूंजी का उपयोग समूह के टेलीकॉम कारोबार की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में भी किया जा सकता है।

    Jio Platforms में कई बड़े वैश्विक निवेशकों की हिस्सेदारी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रमुख निवेशकों के पास कंपनी की करीब 30.9 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इनमें मेटा से जुड़ी जाधू होल्डिंग्स की लगभग 9.98 प्रतिशत और गूगल इंटरनेशनल की करीब 7.73 प्रतिशत हिस्सेदारी शामिल है।

    इसके अलावा सऊदी अरब का पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड, सिल्वर लेक, विस्टा इक्विटी, जनरल अटलांटिक, केकेआर और अबू धाबी की निवेश एजेंसी ADIA भी Jio Platforms में निवेश कर चुके हैं। प्रस्तावित आईपीओ के आकार और वैश्विक निवेशकों की मौजूदगी के कारण बाजार में इसकी लॉन्चिंग को लेकर खास दिलचस्पी बनी हुई है।

  • सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे बोले, विनियमित संस्थाएं एआई और मशीन लर्निंग उपकरणों के उपयोग की खुद होंगी जिम्मेदार

    सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे बोले, विनियमित संस्थाएं एआई और मशीन लर्निंग उपकरणों के उपयोग की खुद होंगी जिम्मेदार

    नई दिल्ली ।भारतीय वित्तीय बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इसी बीच भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने स्पष्ट किया है कि सेबी के दायरे में आने वाली सभी विनियमित संस्थाएं अपने द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एआई और मशीन लर्निंग उपकरणों के लिए पूरी तरह जिम्मेदार रहेंगी।

    मुंबई में आयोजित एक उद्योग सम्मेलन को संबोधित करते हुए सेबी चेयरमैन ने कहा कि किसी संस्था द्वारा इस्तेमाल की जा रही तकनीक चाहे उसके भीतर विकसित की गई हो या किसी बाहरी कंपनी अथवा तीसरे पक्ष से प्राप्त की गई हो, उसकी जिम्मेदारी संबंधित संस्था की ही होगी। इसका उद्देश्य वित्तीय बाजारों में तकनीकी नवाचार के साथ जवाबदेही की व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना है।

    तुहिन कांत पांडे ने कहा कि वित्तीय बाजारों में तकनीक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है और आने वाले समय में इसकी भूमिका और महत्वपूर्ण होगी। हालांकि, तकनीकी बदलाव के बीच निवेशकों के हितों की सुरक्षा और बाजार की विश्वसनीयता को प्राथमिकता देना जरूरी है। सेबी इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए नियामकीय ढांचे को विकसित करने पर काम कर रहा है।

    सेबी अध्यक्ष के अनुसार नियामकीय व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो नई तकनीकों और नवाचार को बढ़ावा दे, लेकिन इसके साथ पारदर्शिता और जवाबदेही से समझौता न हो। एआई आधारित प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि संस्थाएं अपने तकनीकी फैसलों और उनसे जुड़े संभावित जोखिमों की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से निभाएं।

    उन्होंने बाजार अवसंरचना संस्थानों की तकनीकी क्षमता और जोखिम से निपटने की तैयारी को मापने के लिए एक सूचना प्रौद्योगिकी सुदृढ़ता सूचकांक की संभावना पर भी जानकारी दी। सेबी इस तरह के ढांचे की व्यवहार्यता का अध्ययन कर रहा है। इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण तकनीकी प्रणालियों की मजबूती और जोखिम प्रतिरोधक क्षमता का वस्तुनिष्ठ तरीके से आकलन करना है।

    तुहिन कांत पांडे ने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि के अगले चरण में तकनीक की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होगी। वित्तपोषण के नए माध्यम विकसित करने, निवेश के अवसरों का विस्तार करने और नियामकीय व्यवस्था को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बनाने में तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। इसके लिए नियामक व्यवस्था को भी बदलते तकनीकी वातावरण के साथ आगे बढ़ना होगा।

    सेबी की रणनीति को उन्होंने संतुलित, अनुपातिक और भविष्य केंद्रित बताया। उनके अनुसार बाजार में नवाचार के लिए पर्याप्त अवसर होने चाहिए, लेकिन साथ ही निवेशकों के हित, निष्पक्षता, सुरक्षा और बाजार की विश्वसनीयता भी कायम रहनी चाहिए।

    सेबी चेयरमैन ने भारतीय पूंजी बाजार में घरेलू निवेशकों की बढ़ती भागीदारी का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि म्यूचुअल फंड और सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान के माध्यम से बड़ी संख्या में परिवार बाजार आधारित निवेश से जुड़े हैं। इससे भारतीय पूंजी बाजार की पहुंच और मजबूती बढ़ी है, हालांकि निवेशकों की भागीदारी को और व्यापक बनाने की गुंजाइश अभी बनी हुई है।

    उन्होंने कहा कि भारतीय पूंजी बाजार अब केवल आर्थिक गतिविधियों का प्रतिबिंब नहीं रह गए हैं, बल्कि आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण माध्यमों में भी शामिल हो चुके हैं। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ निवेश और वित्तपोषण की जरूरतें भी बढ़ेंगी। ऐसे में पूंजी बाजार को अधिक गहरा और नवोन्मेषी बनाने के साथ उन्हें निष्पक्ष, सुरक्षित और भरोसेमंद बनाए रखना भी जरूरी होगा।

  • सेबी प्रमुख ने क्लोजिंग ऑक्शन सेशन को बाजार सुधार बताया, कहा हेरफेर के सबूत नहीं मिले, भागीदारी बढ़ाना अब प्राथमिकता

    सेबी प्रमुख ने क्लोजिंग ऑक्शन सेशन को बाजार सुधार बताया, कहा हेरफेर के सबूत नहीं मिले, भागीदारी बढ़ाना अब प्राथमिकता


    नई दिल्ली ।भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने बुधवार को कहा कि शेयर बाजारों में हाल ही में लागू किए गए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन में अब तक हेरफेर या किसी तरह की अनियमितता के प्रमाण नहीं मिले हैं। उन्होंने नई व्यवस्था को भारतीय पूंजी बाजार की संरचना में महत्वपूर्ण सुधार बताते हुए कहा कि इससे देश का बाजार वैश्विक मानकों के और करीब आएगा।

    मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में पांडे ने कहा कि क्लोजिंग ऑक्शन सेशन बाजार की माइक्रोस्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव है और नियामक इस व्यवस्था के पीछे मजबूती से खड़ा है। उनके मुताबिक दुनिया के कई प्रमुख बाजार पहले से इस तरह की प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे हैं। जापान ने 2024 में इसे लागू किया था, जबकि हांगकांग, अमेरिका, जर्मनी, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में भी क्लोजिंग ऑक्शन जैसी व्यवस्था मौजूद है।

    सेबी प्रमुख ने कहा कि किसी शेयर के क्लोजिंग प्राइस का सही और निष्पक्ष निर्धारण पूंजी बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसी कीमत के आधार पर कई प्रमुख शेयर सूचकांकों, पैसिव निवेश उत्पादों और म्यूचुअल फंडों की नेट एसेट वैल्यू तय होती है। ऐसे में दिन के अंतिम मूल्य को अधिक पारदर्शी तरीके से निर्धारित करने की जरूरत रहती है।

    नई व्यवस्था में नियमित कारोबार समाप्त होने के बाद 20 मिनट का विशेष क्लोजिंग ऑक्शन सेशन आयोजित किया जाता है। इस दौरान शेयरों की खरीद और बिक्री से जुड़े ऑर्डर एकत्र किए जाते हैं और उस स्तर पर क्लोजिंग प्राइस निर्धारित किया जाता है, जहां अधिकतम संभव मात्रा में सौदों का मिलान हो सके। इसका उद्देश्य बाजार बंद होने के समय किसी शेयर के उचित मूल्य का बेहतर निर्धारण करना है।

    इससे पहले क्लोजिंग प्राइस निर्धारित करने के लिए नियमित कारोबार के अंतिम 30 मिनट के दौरान हुए सौदों के भारित औसत मूल्य को आधार बनाया जाता था। नई व्यवस्था इसी प्रक्रिया का स्थान लेती है और अंतिम कीमत तय करने में ऑर्डर मिलान की प्रक्रिया को अधिक प्रमुख भूमिका देती है।

    पांडे ने कहा कि इस समय सेबी का मुख्य ध्यान नई प्रणाली में बाजार सहभागिता बढ़ाने पर है। कई ब्रोकरों की ओर से भी यह संकेत मिला है कि निवेशकों और अन्य बाजार प्रतिभागियों की भागीदारी को बढ़ाने की आवश्यकता है। नियामक का मानना है कि व्यवस्था की बेहतर समझ विकसित होने के साथ इसमें भागीदारी भी बढ़ सकती है।

    उन्होंने कहा कि क्लोजिंग ऑक्शन एक पारदर्शी प्रक्रिया है, जिसमें बाजार गतिविधियां दिखाई देती हैं और उपलब्ध खरीद तथा बिक्री आदेशों के आधार पर निष्पक्ष मूल्य निर्धारित करने का प्रयास किया जाता है। सेबी इस व्यवस्था के संचालन की लगातार निगरानी कर रही है और बाजार से मिलने वाले फीडबैक का भी आकलन किया जा रहा है।

    सेबी प्रमुख के अनुसार नियामक विभिन्न हितधारकों के साथ लगातार बातचीत कर रहा है। यदि व्यवस्था में भागीदारी बढ़ाने या प्रक्रिया को और बेहतर बनाने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने की जरूरत महसूस होती है तो उन सुझावों पर विचार किया जाएगा। फिलहाल किसी हेरफेर के प्रमाण नहीं मिलने को उन्होंने बाजार के लिए सकारात्मक संकेत बताया।

    नई व्यवस्था का महत्व विशेष रूप से उन बड़े संस्थागत निवेशकों के लिए भी माना जा रहा है, जिनके बड़े ऑर्डर अक्सर कारोबारी सत्र के अंतिम समय में निष्पादित होते हैं। नियामक की उम्मीद है कि अधिक भागीदारी और बेहतर समझ के साथ क्लोजिंग ऑक्शन सेशन भारतीय पूंजी बाजार में मूल्य निर्धारण को अधिक कुशल, पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने में मदद करेगा।

  • सेबी का बड़ा एक्शन, पुनीत गोयनका और सुभाष चंद्रा पर शेयर बाजार में कारोबार करने पर एक साल का बैन

    सेबी का बड़ा एक्शन, पुनीत गोयनका और सुभाष चंद्रा पर शेयर बाजार में कारोबार करने पर एक साल का बैन


    नई दिल्ली। पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ने कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े गंभीर उल्लंघनों के मामले में जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड और उसके शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ बड़ा कदम उठाया है। सेबी ने कंपनी के प्रबंध निदेशक पुनीत गोयनका और एस्सेल समूह के प्रमुख सुभाष चंद्रा को एक वर्ष के लिए प्रतिभूति बाजार में कारोबार करने से प्रतिबंधित कर दिया है। इसके साथ ही जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड पर भी दो महीने तक प्रतिभूति बाजार में प्रवेश करने पर रोक लगा दी गई है। नियामक ने तीनों पक्षों पर कुल 1.48 करोड़ रुपए का आर्थिक दंड भी लगाया है।

    सेबी की जांच में सामने आया कि कंपनी की हैदराबाद स्थित मूल्यवान जमीन को आवश्यक कॉरपोरेट मंजूरियों के बिना एस्सेल समूह की कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के बदले गिरवी रखा गया था। नियामक ने इसे कॉरपोरेट गवर्नेंस और लिस्टिंग नियमों का गंभीर उल्लंघन माना। अंतिम आदेश में कहा गया कि इस प्रक्रिया में नियामकीय प्रावधानों का पालन नहीं किया गया और आवश्यक स्वीकृतियां भी नहीं ली गईं।

    सेबी के आदेश के अनुसार जी एंटरटेनमेंट पर 30 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया है जबकि पुनीत गोयनका पर 58 लाख रुपए और सुभाष चंद्रा पर 60 लाख रुपए का दंड लगाया गया है। नियामक ने सभी संबंधित पक्षों को 45 दिनों के भीतर जुर्माने की राशि जमा करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही यह भी माना कि लिस्टिंग ऑब्लिगेशंस एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स रेगुलेशंस 2015 और प्रोहिबिशन ऑफ फ्रॉडुलेंट एंड अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिसेज रेगुलेशंस 2003 के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है।

    मामले की शुरुआत वित्त वर्ष 2018-19 के वैधानिक ऑडिट के दौरान हुई थी। ऑडिट में कंपनी की कुछ अचल संपत्तियों के मूल स्वामित्व दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई थी। इसके बाद सेबी ने विस्तृत जांच शुरू की। जांच में पता चला कि दिसंबर 2016 में एस्सेल समूह की चार कंपनियों ने इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड से 726 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था। इन कंपनियों पर पुनीत गोयनका सुभाष चंद्रा और उनके परिवार का प्रभावी नियंत्रण था।

    जांच के दौरान यह भी सामने आया कि जब कर्ज लेने वाली कंपनियां आवश्यक सुरक्षा बनाए रखने में विफल रहीं तब नवंबर 2018 में अतिरिक्त संपार्श्विक उपलब्ध कराने के लिए नोटिस जारी किया गया। इसके बाद दिसंबर 2018 में जी एंटरटेनमेंट की हैदराबाद स्थित जमीन के मूल दस्तावेज कर्ज के लिए अतिरिक्त सुरक्षा के रूप में जमा कराए गए ताकि उस संपत्ति पर प्रथम श्रेणी का बंधक बनाया जा सके।

    हालांकि कंपनी ने दावा किया कि इस प्रक्रिया के लिए सभी आवश्यक मंजूरियां प्राप्त की गई थीं लेकिन सेबी की जांच में ऑडिट समिति निदेशक मंडल या शेयरधारकों की ओर से ऐसी किसी पूर्व स्वीकृति का कोई प्रमाण नहीं मिला। बाद में कंपनी ने स्वयं नियामक को बताया कि प्रबंधन और निदेशक मंडल इस बंधक की प्रक्रिया से अनभिज्ञ थे और उन्होंने इस लेनदेन को मंजूरी नहीं दी थी।

    सेबी ने अपने आदेश में कहा कि यह संबंधित पक्षों के बीच हुआ लेनदेन था जिसके लिए नियमानुसार पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक था। वित्तीय विवरणों में भी इस संबंध में आवश्यक खुलासे और स्वीकृतियों का पालन नहीं किया गया। नियामक ने स्पष्ट किया कि सूचीबद्ध कंपनियों में निवेशकों के हितों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और कॉरपोरेट गवर्नेंस के नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ भविष्य में भी इसी तरह सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।

  • साइबर अटैक मामले में सेबी का सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज पर बड़ा एक्शन… ठोका ₹1 करोड़ का जुर्माना

    साइबर अटैक मामले में सेबी का सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज पर बड़ा एक्शन… ठोका ₹1 करोड़ का जुर्माना


    नई दिल्ली।
    देश के शेयर बाजार (Stock Market) से जुड़ी सबसे बड़ी संस्थाओं में से एक सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज (Central Depository Services- CDSL) पर SEBI ने बड़ा एक्शन लिया है। सेबी (SEBI) ने कंपनी पर 1 करोड़ रुपये का जुर्माना (A fine of ₹1 crore) लगाया है। यह कार्रवाई नवंबर 2022 में हुए एक बड़े मैलवेयर (Malware) साइबर अटैक से जुड़ी सुरक्षा खामियों के कारण की गई है। उस समय इस साइबर हमले की वजह से CDSL की कई महत्वपूर्ण सेवाएं प्रभावित हुई थीं और शेयर बाजार के सेटलमेंट (Settlement) में भी देरी हुई थी। आइए इसको जरा विस्तार से समझते हैं।

    SEBI के आदेश के मुताबिक, CDSL अपनी साइबर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत रखने में कई स्तरों पर विफल रही। नियामक का कहना है कि अगर कंपनी ने समय रहते जरूरी सुरक्षा उपाय अपनाए होते, तो इस तरह का हमला टाला जा सकता था। इसी कारण सेबी ने 90 लाख रुपये का जुर्माना SEBI एक्ट के तहत और 10 लाख रुपये डिपॉजिटरीज़ एक्ट (Depositories Act) के तहत लगाया है। कंपनी को आदेश मिलने के 45 दिनों के अंदर यह राशि जमा करनी होगी।


    क्या और कब का है मामला?

    यह मामला 18 नवंबर 2022 का है। उस दिन सुबह करीब 3 बजे, जब दिनभर के सभी ऑपरेशन पूरे हो चुके थे, CDSL ने पाया कि उसके कुछ सर्वर और कर्मचारियों के कंप्यूटर अचानक काम करना बंद कर चुके हैं। जांच में पता चला कि कंपनी के सिस्टम पर एक मैलवेयर अटैक हुआ है। इसके बाद CDSL ने तुरंत अपने नेटवर्क को डिस्कनेक्ट किया, प्रभावित सर्वर अलग किए और वायरस के फैलाव को रोकने के लिए कई कदम उठाए।


    सिस्टम करीब 54 घंटे तक प्रभावित

    हालांकि, कंपनी ने अगले दिन तक सिस्टम को काफी हद तक रिकवर कर लिया, लेकिन इस दौरान कई महत्वपूर्ण सेवाएं बाधित रहीं। सेबी के अनुसार, सेटलमेंट सिस्टम लगभग 46 घंटे और इंटर-डिपॉजिटरी ट्रांसफर सिस्टम करीब 54 घंटे तक प्रभावित रहा। इसका असर केवल CDSL तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे शेयर बाजार के सेटलमेंट सिस्टम पर भी पड़ा।

    जांच में सबसे बड़ी लापरवाही ADFS (Active Directory Federation Services) सर्वर को लेकर सामने आई। यह इंटरनेट से जुड़ा हुआ सर्वर था, लेकिन CDSL ने इसे “क्रिटिकल एसेट” नहीं माना। इसका मतलब यह हुआ कि इस सर्वर की नियमित सुरक्षा जांच, VAPT (Vulnerability Assessment and Penetration Testing) नहीं कराई गई। यही सर्वर साइबर अपराधियों के लिए कंपनी के नेटवर्क में घुसने का मुख्य रास्ता बन गया।

    SEBI ने कहा कि CDSL का यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि इस सर्वर पर निवेशकों का डेटा नहीं था, इसलिए इसे महत्वपूर्ण नहीं माना गया। नियामक ने साफ कहा कि इंटरनेट से जुड़े सभी सर्वर अपने आप में संवेदनशील होते हैं और उन्हें सर्वोच्च स्तर की सुरक्षा मिलनी चाहिए।

    इतना ही नहीं, जांच में यह भी सामने आया कि एक डोमेन एडमिन अकाउंट का पासवर्ड बेहद कमजोर था, जिसे आसानी से “ब्रूट फोर्स” तकनीक से तोड़ा जा सकता था। इसके अलावा इस अकाउंट का पासवर्ड “Never Expire” पर सेट था, यानी वह कभी समाप्त नहीं होता था। इससे साइबर हमलावर लंबे समय तक सिस्टम में बिना पकड़े सक्रिय रह सके।

    SEBI ने यह भी पाया कि CDSL ने अपने SIEM (Security Information and Event Management) सिस्टम में ADFS सर्वर को जोड़ा ही नहीं था। इसका नतीजा यह हुआ कि संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े कई अलर्ट कभी रिकॉर्ड ही नहीं हुए। कुछ मामलों में जहां अलर्ट मिले भी, उन्हें समय पर देखा या स्वीकार नहीं किया गया। इससे हमलावरों को सिस्टम के अंदर बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ने का मौका मिल गया।

    दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में उस समय के CISO (Chief Information Security Officer) राजेश नाडकर्णी और CTO (Chief Technology Officer) अमित महाजन को भी नोटिस भेजा गया था। हालांकि, सेबी ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ जांच पूरी करने के बाद उन पर कोई आर्थिक जुर्माना नहीं लगाया और कार्यवाही समाप्त कर दी।

    यह मामला पूरे फाइनेंशियल सेक्टर के लिए एक बड़ा सबक है। आज जब शेयर बाजार पूरी तरह डिजिटल हो चुका है और करोड़ों निवेशकों का डेटा ऑनलाइन मौजूद है, तब साइबर सुरक्षा में छोटी-सी चूक भी बड़े फाइनेंशियल और ऑपरेशन नुकसान का कारण बन सकती है। SEBI का यह फैसला साफ संकेत देता है कि अब बाजार से जुड़ी संस्थाओं को साइबर सुरक्षा के नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। मजबूत सुरक्षा व्यवस्था केवल कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि निवेशकों के भरोसे की भी सबसे बड़ी गारंटी है।

  • सूचीबद्ध कंपनियों की निगरानी होगी और सख्त, सेबी ने फोरेंसिक ऑडिट पैनल का किया विस्तार, 18 नई विशेषज्ञ फर्मों को मिली जिम्मेदारी

    सूचीबद्ध कंपनियों की निगरानी होगी और सख्त, सेबी ने फोरेंसिक ऑडिट पैनल का किया विस्तार, 18 नई विशेषज्ञ फर्मों को मिली जिम्मेदारी

    नई दिल्ली । भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ने पूंजी बाजार में पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सूचीबद्ध कंपनियों के फोरेंसिक ऑडिट के लिए अपने अधिकृत पैनल का विस्तार किया है। नियामक ने 18 नई पेशेवर फर्मों को इस पैनल में शामिल किया है, जिससे वित्तीय अनियमितताओं की जांच की क्षमता और संस्थागत निगरानी दोनों को मजबूती मिलने की उम्मीद है। यह निर्णय बाजार में विश्वास बनाए रखने और निवेशकों के हितों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लिया गया है।

    यह विस्तार उस चयन प्रक्रिया के बाद किया गया है जिसे सार्वजनिक आमंत्रण के माध्यम से शुरू किया गया था। नियामक द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, नई फर्मों को पहले से मौजूद अधिकृत सूची में शामिल किया गया है और उनका पंजीकरण तीन वर्षों तक प्रभावी रहेगा। इस अवधि के दौरान आवश्यकता पड़ने पर इन फर्मों को सूचीबद्ध कंपनियों के वित्तीय मामलों की गहन फोरेंसिक जांच की जिम्मेदारी सौंपी जा सकेगी।

    नई सूची में कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की ऑडिट एवं परामर्श फर्मों के साथ विभिन्न अनुभवी पेशेवर संस्थानों को भी स्थान दिया गया है। इन फर्मों के शामिल होने से जटिल वित्तीय मामलों, लेखा संबंधी विसंगतियों, संदिग्ध लेनदेन और संभावित कॉरपोरेट अनियमितताओं की जांच अधिक विशेषज्ञता और दक्षता के साथ किए जाने की संभावना बढ़ेगी। इससे नियामकीय जांच की गुणवत्ता में भी सुधार आने की उम्मीद जताई जा रही है।

    फोरेंसिक ऑडिट सामान्य वित्तीय ऑडिट से अलग प्रक्रिया होती है। इसका उद्देश्य केवल खातों की जांच करना नहीं, बल्कि संभावित धोखाधड़ी, वित्तीय गड़बड़ियों, धन के दुरुपयोग, लेखांकन में हेरफेर या अन्य संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े तथ्यों और साक्ष्यों का गहराई से परीक्षण करना होता है। जब किसी सूचीबद्ध कंपनी के वित्तीय विवरणों या लेनदेन को लेकर गंभीर संदेह उत्पन्न होता है, तब ऐसे मामलों में फोरेंसिक ऑडिट कराया जाता है ताकि वास्तविक स्थिति सामने लाई जा सके।

    पूंजी बाजार में निवेशकों का भरोसा बनाए रखने के लिए प्रभावी निगरानी व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी उद्देश्य से नियामक समय-समय पर अपनी प्रक्रियाओं और विशेषज्ञ संसाधनों को मजबूत करता है। विस्तारित पैनल से उम्मीद है कि जांच संबंधी मामलों का निपटारा अधिक व्यवस्थित, निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से किया जा सकेगा। साथ ही कॉरपोरेट प्रशासन के मानकों को भी बेहतर बनाने में यह पहल सहायक सिद्ध हो सकती है।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत फोरेंसिक व्यवस्था से सूचीबद्ध कंपनियों में वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा। इससे कंपनियों के प्रबंधन की जवाबदेही बढ़ेगी और निवेशकों को अधिक विश्वसनीय कारोबारी वातावरण उपलब्ध होगा। नियामकीय संस्थाओं की ऐसी पहल से पूंजी बाजार की साख मजबूत होने के साथ-साथ दीर्घकालिक निवेश को भी प्रोत्साहन मिलने की संभावना है। आने वाले समय में यह कदम वित्तीय प्रणाली को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और निवेशक-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • आईपीओ से पहले एनएसई पर उठे वैल्यूएशन के सवाल, ब्रोकरेज ने दी बिकवाली की सलाह; घटते ट्रेडिंग वॉल्यूम और मार्केट शेयर को बताया सबसे बड़ी चिंता

    आईपीओ से पहले एनएसई पर उठे वैल्यूएशन के सवाल, ब्रोकरेज ने दी बिकवाली की सलाह; घटते ट्रेडिंग वॉल्यूम और मार्केट शेयर को बताया सबसे बड़ी चिंता

    नई दिल्ली । देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के प्रस्तावित आईपीओ से पहले बाजार में इसकी वैल्यूएशन को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। एक प्रमुख ब्रोकरेज फर्म ने एनएसई की कवरेज शुरू करते हुए निवेशकों को बिकवाली की सलाह दी है। आमतौर पर किसी कंपनी के आईपीओ से पहले इस तरह की राय कम ही देखने को मिलती है, इसलिए यह रिपोर्ट निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों के बीच विशेष चर्चा का विषय बन गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक्सचेंज के ट्रेडिंग वॉल्यूम में लगातार आ रही गिरावट और बाजार हिस्सेदारी में कमी भविष्य की ग्रोथ पर दबाव डाल सकती है।

    ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि एनएसई की मौजूदा अनलिस्टेड मार्केट वैल्यू उसके वित्तीय प्रदर्शन की तुलना में अधिक दिखाई देती है। इसी आधार पर कंपनी के लिए 1,550 रुपये का लक्ष्य मूल्य निर्धारित किया गया है, जो अनलिस्टेड बाजार में प्रचलित करीब 2,085 रुपये के मूल्य से लगभग 26 प्रतिशत कम है। फर्म का कहना है कि मौजूदा स्तर पर निवेशकों को भविष्य में अपेक्षित रिटर्न सीमित मिल सकता है।

    रिपोर्ट के अनुसार, हाल के वर्षों में एनएसई के परिचालन प्रदर्शन में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। कंपनी की कुल परिचालन आय में वर्ष-दर-वर्ष गिरावट दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि कारोबार की रफ्तार पहले की तुलना में कुछ धीमी हुई है। विशेष रूप से इक्विटी डेरिवेटिव्स से जुड़े कारोबार में ट्रेडिंग वॉल्यूम कम होने का असर कंपनी की कमाई पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। इससे एक्सचेंज के बाजार हिस्से पर भी दबाव बढ़ा है।

    एनएसई की आय का सबसे बड़ा स्रोत ट्रांजैक्शन चार्जेज माना जाता है। उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, इस मद से प्राप्त होने वाली आय में भी पिछले वित्त वर्ष की तुलना में कमी दर्ज की गई है। इसके अलावा क्लियरिंग और सेटलमेंट सेवाओं से होने वाली कमाई में भी गिरावट देखने को मिली है। इन दोनों प्रमुख आय स्रोतों में कमी आने से कंपनी के कुल राजस्व पर प्रभाव पड़ा है, जिसे बाजार विशेषज्ञ भविष्य की चुनौती के रूप में देख रहे हैं।

    वित्तीय वर्ष 2026 के दौरान कंपनी की कुल परिचालन आय पिछले वित्त वर्ष की तुलना में तीन प्रतिशत से अधिक कम रही। वहीं ट्रांजैक्शन चार्जेज से प्राप्त आय में लगभग चार प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। विश्लेषकों का मानना है कि यदि ट्रेडिंग गतिविधियों में तेजी नहीं आती और बाजार हिस्सेदारी में सुधार नहीं होता, तो भविष्य में कंपनी के लिए उच्च वैल्यूएशन को बनाए रखना आसान नहीं होगा।

    हालांकि एनएसई भारतीय पूंजी बाजार का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण एक्सचेंज बना हुआ है तथा निवेशकों के बीच उसकी मजबूत पहचान है, लेकिन किसी भी कंपनी की दीर्घकालिक वैल्यू उसके वित्तीय प्रदर्शन और कारोबार की वृद्धि पर निर्भर करती है। इसी कारण विशेषज्ञ निवेशकों को आईपीओ से पहले कंपनी के वित्तीय आंकड़ों, आय के स्रोतों, भविष्य की विकास संभावनाओं और वैल्यूएशन का संतुलित आकलन करने की सलाह दे रहे हैं।

    आने वाले समय में एनएसई का आईपीओ भारतीय पूंजी बाजार की सबसे चर्चित सार्वजनिक पेशकशों में शामिल हो सकता है। ऐसे में निवेशकों की नजर कंपनी के आगामी वित्तीय प्रदर्शन, नियामकीय प्रक्रियाओं और बाजार की प्रतिक्रिया पर बनी रहेगी। यदि कंपनी अपने कारोबार की गति बढ़ाने और आय के प्रमुख स्रोतों को मजबूत करने में सफल रहती है, तो भविष्य में निवेशकों का भरोसा और अधिक मजबूत हो सकता है। फिलहाल ब्रोकरेज की इस रिपोर्ट ने एनएसई के आईपीओ से पहले वैल्यूएशन और ग्रोथ को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।

  • सेबी का बड़ा एक्शन कर्मचारियों पर सख्त हुई आचार संहिता शेयर बाजार में निवेश से लेकर नई नौकरी तक हर कदम पर रहेगी नजर

    सेबी का बड़ा एक्शन कर्मचारियों पर सख्त हुई आचार संहिता शेयर बाजार में निवेश से लेकर नई नौकरी तक हर कदम पर रहेगी नजर


    नई दिल्ली ।  भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी सेबी ने अपने कर्मचारियों के लिए सेवा नियमों में व्यापक बदलाव करते हुए आचार संहिता को पहले से अधिक सख्त बना दिया है। नए संशोधित नियमों का उद्देश्य हितों के टकराव की संभावना को कम करना पारदर्शिता को बढ़ावा देना और बाजार नियामक संस्था की निष्पक्षता को और मजबूत बनाना है। सेबी द्वारा अधिसूचित कर्मचारी सेवा संशोधन विनियम 2026 के तहत कर्मचारियों के निवेश खुलासे नौकरी बदलने और उपहार स्वीकार करने से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रावधान लागू किए गए हैं।

    नए नियमों के अनुसार अब कर्मचारियों के साथ उनके परिवार और आश्रितों की परिभाषा का भी विस्तार किया गया है। इसमें गोद लिए गए बच्चे सौतेले बच्चे और ऐसे लोग भी शामिल होंगे जो किसी कर्मचारी पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं। इससे अब निवेश और सेवा संबंधी नियमों का दायरा पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो जाएगा और किसी भी प्रकार के हितों के टकराव की संभावना पर अधिक प्रभावी निगरानी रखी जा सकेगी।

    सेबी ने कर्मचारियों के निवेश नियमों में सबसे बड़ा बदलाव किया है। अब कर्मचारी और उनके परिवार के सदस्य नौकरी के दौरान शेयर इक्विटी में परिवर्तनीय प्रतिभूतियों और डेरिवेटिव उत्पादों में नया निवेश नहीं कर सकेंगे। हालांकि म्यूचुअल फंड रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट यानी रीट्स और अन्य विनियमित सामूहिक निवेश योजनाओं में निवेश की अनुमति पहले की तरह जारी रहेगी। इसके साथ ही ऐसे निवेश उत्पादों में निवेश की अधिकतम सीमा भी तय कर दी गई है जो किसी कर्मचारी के कुल निवेश पोर्टफोलियो के 25 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।

    कुछ विशेष परिस्थितियों में कर्मचारियों को छूट भी दी गई है। इनमें जीवनसाथी को मिलने वाले एम्प्लॉई स्टॉक ऑप्शन और विवेकाधीन पोर्टफोलियो प्रबंधन सेवाओं के माध्यम से किए गए निवेश शामिल हैं। सेबी का मानना है कि इन प्रावधानों से कर्मचारियों की निष्पक्षता बनी रहेगी और बाजार से जुड़े संवेदनशील निर्णयों पर किसी प्रकार का निजी प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    संशोधित नियमों के तहत यदि कोई कर्मचारी इस्तीफा देता है या सेवानिवृत्त होता है तो उस पर दो वर्ष का कूलिंग ऑफ पीरियड लागू रहेगा। इस अवधि के दौरान वह किसी भी व्यक्ति कंपनी या संस्था की ओर से सेबी के समक्ष किसी मामले में पैरवी नहीं कर सकेगा। यह प्रतिबंध जांच सुनवाई सेटलमेंट और विभिन्न मंजूरियों से जुड़े मामलों पर भी लागू रहेगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सेवा के दौरान प्राप्त गोपनीय जानकारी का निजी लाभ के लिए उपयोग न किया जा सके।

    नौकरी बदलने से जुड़े नियमों को भी अधिक पारदर्शी बनाया गया है। यदि कोई कर्मचारी किसी अन्य संस्था या कंपनी में नौकरी के लिए बातचीत शुरू करता है तो उसे एक महीने के भीतर इसकी जानकारी सेबी को देना अनिवार्य होगा। इससे संभावित हितों के टकराव की समय रहते पहचान की जा सकेगी और आवश्यक कदम उठाए जा सकेंगे।

    सेबी ने उपहार स्वीकार करने के नियमों में भी संशोधन किया है। अब कर्मचारियों को 50 हजार रुपए तक के उपहार की रिपोर्ट करने की आवश्यकता नहीं होगी जबकि पहले यह सीमा 10 हजार रुपए थी। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि सामाजिक और पारंपरिक अवसरों पर मिलने वाले कौन से उपहार नियमों के अनुरूप स्वीकार किए जा सकते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सेबी के ये नए नियम नियामकीय संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इससे न केवल कर्मचारियों के आचरण पर बेहतर निगरानी रखी जा सकेगी बल्कि निवेशकों का भरोसा भी और मजबूत होगा। बदलते वित्तीय माहौल में यह पहल भारतीय पूंजी बाजार की विश्वसनीयता को नई मजबूती देने वाली मानी जा रही है।