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  • सेबी की पारदर्शिता पर वैश्विक बहस तेज, स्पेसएक्स IPO नियमों के बीच भारतीय बाजार की मजबूत नियामकीय छवि की सराहना

    सेबी की पारदर्शिता पर वैश्विक बहस तेज, स्पेसएक्स IPO नियमों के बीच भारतीय बाजार की मजबूत नियामकीय छवि की सराहना

    नई दिल्ली । वैश्विक वित्तीय बाजारों में पारदर्शिता और निवेशक सुरक्षा को लेकर एक नई बहस उस समय तेज हो गई जब स्पेसएक्स के हालिया आईपीओ और उसके बाद लागू किए गए अमेरिकी ब्रोकरेज प्रतिबंधों की तुलना भारत की नियामकीय व्यवस्था से की जाने लगी। इस चर्चा के केंद्र में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी सेबी की भूमिका रही, जिसे विशेषज्ञों ने कई मामलों में अधिक पारदर्शी और निवेशक-अनुकूल बताया है।

    मामला तब चर्चा में आया जब जेरोधा के संस्थापक नितिन कामथ और कैपिटलमाइंड म्यूचुअल फंड के सीईओ दीपक शेनॉय ने अमेरिकी ब्रोकरेज फर्म फिडेलिटी द्वारा स्पेसएक्स आईपीओ निवेशकों पर लगाए गए नियमों की ओर ध्यान आकर्षित किया। फिडेलिटी की नीति के अनुसार, यदि कोई निवेशक आईपीओ में मिले शेयरों को लिस्टिंग के शुरुआती 15 दिनों के भीतर बेच देता है, तो उसे भविष्य में आईपीओ आवंटन से वंचित किया जा सकता है।

    इस व्यवस्था को लेकर नितिन कामथ ने भारत के बाजार नियामक ढांचे की तुलना करते हुए कहा कि सेबी और भारतीय स्टॉक एक्सचेंजों की वजह से देश का पूंजी बाजार अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बन पाया है। उनके अनुसार, हालांकि सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है, लेकिन भारतीय प्रणाली कई मामलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत उदाहरण पेश करती है।

    वहीं, दीपक शेनॉय ने इस अमेरिकी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसे प्रतिबंधों की कानूनी वैधता पर भी चर्चा होनी चाहिए। उनके अनुसार, भारत में ऐसी स्थिति को सेबी द्वारा तुरंत नियामकीय कार्रवाई के दायरे में लिया जा सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भारत का ढांचा निवेशकों के अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता देता है और इसी कारण इसमें कठोर नियंत्रण तंत्र मौजूद है।

    अमेरिकी ब्रोकरेज फर्म की नीतियों के अनुसार, पहली बार नियमों के उल्लंघन पर निवेशक को छह महीने तक आईपीओ में भाग लेने से रोका जा सकता है। दोबारा उल्लंघन करने पर यह प्रतिबंध एक वर्ष तक बढ़ सकता है, जबकि बार-बार उल्लंघन की स्थिति में स्थायी रोक भी लगाई जा सकती है। इस तरह की व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय निवेश समुदाय में मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच स्पेसएक्स की लिस्टिंग भी चर्चा का विषय बनी रही, जहां शेयरों में शुरुआती कारोबार के दौरान तेज बढ़त दर्ज की गई और कंपनी का बाजार मूल्य ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया। इससे वैश्विक टेक और निवेश बाजार में नई पूंजीगत हलचल देखी गई।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस केवल एक कंपनी या एक आईपीओ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर बाजार नियमन के मॉडल किस दिशा में विकसित हो रहे हैं। भारत का सेबी मॉडल जहां निवेशक सुरक्षा और पारदर्शिता पर जोर देता है, वहीं अमेरिकी प्रणाली में संस्थागत नियंत्रण और अनुशासनात्मक नीतियों पर अधिक फोकस दिखाई देता है।

    इस तुलना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भविष्य में वैश्विक पूंजी बाजारों के लिए कौन-सा नियामकीय मॉडल अधिक प्रभावी साबित होगा और निवेशकों का विश्वास किस प्रणाली में अधिक मजबूत रहेगा।

  • सेबी की सख्त कार्रवाई से घिरी Rajesh Exports, 15.15 लाख करोड़ रुपये के कथित राजस्व घोटाले ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता

    सेबी की सख्त कार्रवाई से घिरी Rajesh Exports, 15.15 लाख करोड़ रुपये के कथित राजस्व घोटाले ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता

    नई दिल्ली । देश की प्रमुख स्वर्ण आभूषण निर्यातक कंपनियों में शामिल Rajesh Exports एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) की ओर से कंपनी और उसके प्रमोटर समूह के खिलाफ कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच और अंतरिम कार्रवाई के बाद निवेशकों के बीच चिंता का माहौल बन गया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल शेयर मूल्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कंपनी की साख और कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।

    मामला कथित तौर पर राजस्व को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने और धन के संभावित दुरुपयोग से जुड़ा बताया जा रहा है। सेबी की कार्रवाई के बाद बाजार में कंपनी को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। इसका सीधा असर शेयर बाजार में भी देखने को मिला, जहां कंपनी के शेयर में पांच प्रतिशत का लोअर सर्किट लग गया और यह 104.65 रुपये के स्तर तक पहुंच गया। पिछले कुछ महीनों से शेयर में लगातार गिरावट का रुख बना हुआ है, जिससे निवेशकों की चिंता और गहरी हो गई है।

    इस घटनाक्रम का सबसे अधिक ध्यान बड़े संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी पर गया है। मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, Life Insurance Corporation of India यानी एलआईसी के पास कंपनी में 10.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसके अलावा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की हिस्सेदारी 14.19 प्रतिशत और खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी 14.55 प्रतिशत है। प्रमोटर समूह अभी भी कंपनी में 54.55 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा शेयरधारक बना हुआ है।

    विश्लेषकों का कहना है कि एलआईसी जैसे बड़े संस्थागत निवेशक के लिए यह निवेश उसके कुल पोर्टफोलियो का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा है, इसलिए इस मामले का एलआईसी की वित्तीय स्थिति या उसके शेयर पर कोई बड़ा दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने की संभावना कम है। हालांकि, Rajesh Exports के निवेशकों के लिए स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्योंकि नियामकीय जांच का असर अक्सर निवेशक विश्वास पर पड़ता है।

    इक्विटी बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि सेबी की कार्रवाई अपने आप में गंभीर संकेत है। उनके अनुसार, जब किसी सूचीबद्ध कंपनी के खिलाफ वित्तीय पारदर्शिता और फंड उपयोग को लेकर सवाल उठते हैं तो निवेशकों का भरोसा प्रभावित होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि बाजार में फिलहाल सतर्कता का माहौल दिखाई दे रहा है।

    दूसरी ओर, कंपनी ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि सेबी का आदेश केवल अंतरिम प्रकृति का है और अभी तक कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है। कंपनी का दावा है कि उसके द्वारा घोषित राजस्व आंकड़े पूरी तरह सही हैं और राजस्व बढ़ाकर दिखाने जैसी कोई स्थिति नहीं है। प्रबंधन का कहना है कि मामले में किसी प्रकार की संचार संबंधी गलतफहमी हो सकती है और जल्द ही विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया जाएगा।

    उल्लेखनीय है कि Rajesh Exports का शेयर शेयर बाजार के ‘Z’ ग्रुप में सूचीबद्ध है, जहां केवल ट्रेड-फॉर-ट्रेड आधार पर कारोबार की अनुमति होती है। इस श्रेणी में शामिल कंपनियों पर पहले से ही निवेशकों की विशेष नजर रहती है। कंपनी का शेयर दिसंबर 2025 में 239 रुपये के अपने 52 सप्ताह के उच्च स्तर से करीब 56 प्रतिशत तक टूट चुका है। ऐसे में सेबी की जांच ने निवेशकों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। आने वाले दिनों में सेबी की जांच रिपोर्ट और कंपनी के आधिकारिक स्पष्टीकरण पर बाजार की नजर बनी रहेगी, क्योंकि यही तय करेगा कि निवेशकों का भरोसा दोबारा बहाल हो पाता है या नहीं।

  • भारत के डेट मार्केट में नई क्रांति की आहट: कॉरपोरेट बॉन्ड सेक्टर को मजबूत करने के लिए बन रही नई रणनीति

    भारत के डेट मार्केट में नई क्रांति की आहट: कॉरपोरेट बॉन्ड सेक्टर को मजबूत करने के लिए बन रही नई रणनीति


    नई दिल्ली । भारत के वित्तीय बाजार को अधिक मजबूत, आधुनिक और निवेशक-अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाने की तैयारी तेज होती दिखाई दे रही है। देश में कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट को नई मजबूती देने के लिए कई सुधारों पर विचार किया जा रहा है, जिनमें टोकनाइजेशन मॉडल और नियामकीय ढांचे में बदलाव प्रमुख माने जा रहे हैं। इस पहल का उद्देश्य न केवल निवेशकों की भागीदारी बढ़ाना है, बल्कि लंबे समय के लिए पूंजी जुटाने के विकल्पों को भी अधिक प्रभावी बनाना है।

    बॉन्ड बाजार को नई तकनीक से जोड़ने की तैयारी

    वित्तीय क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में पारंपरिक निवेश प्रणालियों के साथ तकनीकी ढांचे का जुड़ना बेहद महत्वपूर्ण होने वाला है। इसी सोच के तहत कॉरपोरेट बॉन्ड्स के टोकनाइजेशन मॉडल पर विचार किया जा रहा है। इस व्यवस्था के माध्यम से बॉन्ड निवेश प्रक्रिया को अधिक सरल, पारदर्शी और व्यवस्थित बनाया जा सकता है। माना जा रहा है कि इससे छोटे निवेशकों की पहुंच भी बॉन्ड बाजार तक आसानी से बढ़ सकेगी।

    भारत की अर्थव्यवस्था लगातार विस्तार की ओर बढ़ रही है और ऐसे समय में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, औद्योगिक निवेश और दीर्घकालिक योजनाओं के लिए पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता बनी रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बैंकिंग व्यवस्था पर निर्भर रहना भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। ऐसे में कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभर सकता है।

    रिटेल निवेशकों पर विशेष फोकस

    बाजार से जुड़े जानकारों का मानना है कि रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ाए बिना बॉन्ड बाजार को व्यापक स्तर पर मजबूत करना आसान नहीं होगा। हालांकि वर्तमान समय में बड़ी संख्या में निवेशक इक्विटी और अन्य पारंपरिक विकल्पों की ओर आकर्षित रहते हैं, जबकि बॉन्ड बाजार को समझने और उसमें निवेश करने वालों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। ऐसे में नई योजनाओं और तकनीकी सुधारों के माध्यम से निवेशकों को सरल और सुरक्षित विकल्प उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि निवेशकों को बॉन्ड उत्पादों की बेहतर जानकारी और आसान निवेश प्रक्रिया उपलब्ध होती है तो भविष्य में इस क्षेत्र में बड़ी भागीदारी देखने को मिल सकती है। इससे पूंजी बाजार का दायरा बढ़ेगा और आर्थिक गतिविधियों को भी मजबूती मिलेगी।

    नियमों की समीक्षा से बढ़ सकती है पारदर्शिता

    कॉरपोरेट बॉन्ड क्षेत्र को अधिक संगठित और पारदर्शी बनाने के लिए नियामकीय ढांचे में भी कई बदलावों पर विचार किया जा रहा है। म्युनिसिपल बॉन्ड्स से जुड़े नियमों की समीक्षा के साथ-साथ डेट ब्रोकर्स के लिए अलग व्यवस्था बनाने की संभावना भी देखी जा रही है। इसका उद्देश्य बाजार में स्पष्टता और निवेशकों का भरोसा बढ़ाना माना जा रहा है।

    वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार यदि इन सुधारों को प्रभावी तरीके से लागू किया गया तो आने वाले समय में भारत का बॉन्ड बाजार अधिक गहरा और मजबूत बन सकता है। इससे कंपनियों को फंड जुटाने के नए विकल्प मिलेंगे, निवेशकों को विविध अवसर प्राप्त होंगे और देश के पूंजी बाजार को दीर्घकालिक मजबूती मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

  • सेबी की बड़ी राहत: ज्यादा लीवरेज वाले InvITs के उधारी नियम आसान

    सेबी की बड़ी राहत: ज्यादा लीवरेज वाले InvITs के उधारी नियम आसान


    नई दिल्ली। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (इनविट्स) के लिए उधारी नियमों में महत्वपूर्ण राहत देने का फैसला किया है। नए नियमों के तहत अब ऐसे इनविट्स भी अतिरिक्त कर्ज ले सकेंगे, जिनका लीवरेज उनकी कुल एसेट वैल्यू के 49 प्रतिशत से अधिक है।

    सेबी का यह कदम इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में वित्तीय लचीलापन बढ़ाने और परियोजनाओं के लिए पूंजी उपलब्धता को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है। माना जा रहा है कि इससे सड़क, परिवहन और अन्य बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को गति मिलेगी।

    पूंजीगत खर्च और क्षमता विस्तार के लिए मिलेगी मद
    सेबी द्वारा जारी सर्कुलर के अनुसार, अतिरिक्त उधारी का उपयोग पूंजीगत खर्चों के लिए किया जा सकेगा। इन खर्चों में परिसंपत्तियों के प्रदर्शन को बेहतर बनाना, क्षमता विस्तार करना और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को मजबूत करना शामिल है। नियामक ने सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए बड़े रखरखाव कार्यों पर होने वाले खर्चों को भी इस राहत के दायरे में शामिल किया है। ऐसे रखरखाव कार्य, जो सामान्य मरम्मत से अलग और कंसेशन एग्रीमेंट के तहत जरूरी होते हैं, अब अतिरिक्त कर्ज के जरिए पूरे किए जा सकेंगे।

    सड़क परियोजनाओं को होगा सबसे ज्यादा फायदा
    विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से सड़क क्षेत्र से जुड़े इनविट्स को सबसे अधिक लाभ मिलेगा। इन परियोजनाओं में समय-समय पर बड़े स्तर पर मरम्मत और रखरखाव की जरूरत होती है, जिसके लिए भारी फंडिंग की आवश्यकता पड़ती है। सेबी ने स्पष्ट किया है कि बड़े रखरखाव खर्च में केवल वही कार्य शामिल होंगे, जो सामान्य संचालन और नियमित रखरखाव से अलग हों और अनुबंध के तहत अनिवार्य हों।

    रीफाइनेंसिंग को भी मिली मंजूरी
    सेबी ने इनविट्स, स्पेशल पर्पस व्हीकल्स (SPVs) और होल्डिंग कंपनियों को कुछ शर्तों के तहत मौजूदा कर्ज की रीफाइनेंसिंग की अनुमति भी दी है। हालांकि यह सुविधा केवल मूल कर्ज राशि तक सीमित रहेगी। नियामक ने साफ किया कि जमा ब्याज, जुर्माना, फीस या अन्य शुल्कों को रीफाइनेंसिंग में शामिल नहीं किया जाएगा। यानी केवल मूल कर्ज की राशि को ही नए कर्ज से बदला जा सकेगा।

    तुरंत लागू हुए नए नियम
    सेबी ने बताया कि यह संशोधित ढांचा 17 अप्रैल 2026 को इनविट नियमों में किए गए बदलावों के बाद लागू किया गया है और नए नियम तत्काल प्रभाव से प्रभावी हो गए हैं। माना जा रहा है कि इस फैसले से इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को नई गति मिलेगी और इनविट्स को अपनी परिसंपत्तियों के विस्तार व रखरखाव में अधिक परिचालन स्वतंत्रता प्राप्त होगी।

  • IPO मार्केट में हलचल, SEBI की मंजूरी के बाद 3 कंपनियां लाएंगी पब्लिक ऑफर, निवेशकों की नजर

    IPO मार्केट में हलचल, SEBI की मंजूरी के बाद 3 कंपनियां लाएंगी पब्लिक ऑफर, निवेशकों की नजर


    नई दिल्ली । बाजार नियामक SEBI ने तीन कंपनियों को अपने प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम यानी IPO लाने की मंजूरी दे दी है, जिससे प्राथमिक बाजार में नई हलचल देखने को मिल रही है। ये कंपनियां Neolite ZKW Lightings, SS Retail और Aspri Spirits हैं, जो मिलकर बाजार से 1,200 करोड़ रुपये से अधिक जुटाने की योजना पर काम कर रही हैं। इन सभी कंपनियों ने पिछले साल अपने ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस जमा किए थे, जिन पर अब SEBI की ओर से अंतिम स्वीकृति मिल चुकी है।

    इन तीनों कंपनियों के IPO आने से निवेशकों के लिए नए अवसर खुलेंगे और विभिन्न सेक्टर्स में भागीदारी का मौका मिलेगा। ये कंपनियां स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट होने के बाद अपनी बाजार मौजूदगी को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ेंगी। प्राप्त जानकारी के अनुसार, इन IPOs के जरिए जुटाई जाने वाली राशि का उपयोग विस्तार योजनाओं, कर्ज चुकाने और कारोबारी जरूरतों को पूरा करने में किया जाएगा।

    Neolite ZKW Lightings, जो ऑटोमोबाइल लाइटिंग सेक्टर में काम करती है, इस IPO के जरिए करीब 600 करोड़ रुपये जुटाने की योजना में है। कंपनी का एक हिस्सा नए शेयर जारी कर पूंजी जुटाएगा, जबकि मौजूदा निवेशक ऑफर फॉर सेल के माध्यम से अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे। कंपनी इस फंड का इस्तेमाल उत्पादन क्षमता बढ़ाने और नए प्लांट स्थापित करने में करेगी।

    वहीं SS Retail, जो इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल रिटेल सेक्टर में काम करती है, करीब 500 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी में है। कंपनी इस पूंजी का उपयोग नए स्टोर्स खोलने और वर्किंग कैपिटल की जरूरतों को पूरा करने के लिए करेगी। इसका कारोबार कई राज्यों के शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में फैला हुआ है, जिससे इसकी ग्रोथ की संभावनाएं मजबूत मानी जा रही हैं।

    तीसरी कंपनी Aspri Spirits अल्कोहल और पेय पदार्थों के डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर में सक्रिय है और इस लिस्ट में सबसे प्रमुख नामों में शामिल है। कंपनी अपने बड़े ब्रांड पोर्टफोलियो के साथ बाजार में मजबूत स्थिति रखती है। IPO से जुटाई गई राशि का उपयोग कंपनी कर्ज चुकाने और विस्तार योजनाओं में करने की योजना बना रही है।

    कुल मिलाकर, SEBI की इस मंजूरी के बाद IPO बाजार में नई गतिविधियां तेज हो गई हैं। निवेशकों के लिए यह आने वाले दिनों में नए निवेश विकल्पों का संकेत माना जा रहा है, जबकि कंपनियों के लिए यह अपने कारोबार को विस्तार देने का एक महत्वपूर्ण अवसर साबित हो सकता है।

  • वित्तीय निगरानी को मजबूत करने के लिए प्रमुख नियामक संस्थानों के बीच ऐतिहासिक और व्यापक समझौता

    वित्तीय निगरानी को मजबूत करने के लिए प्रमुख नियामक संस्थानों के बीच ऐतिहासिक और व्यापक समझौता

    नई दिल्ली :वित्तीय प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने और मनी लॉन्ड्रिंग जैसी अवैध गतिविधियों पर सख्ती से अंकुश लगाने के उद्देश्य से देश के प्रमुख वित्तीय नियामक संस्थानों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। इस पहल के तहत फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट इंडिया ने सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया तथा पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी के साथ अलग अलग समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं। इस कदम को भारत की वित्तीय निगरानी व्यवस्था को और अधिक मजबूत और समन्वित बनाने की दिशा में एक अहम प्रयास माना जा रहा है।

    इस समझौते का मुख्य उद्देश्य वित्तीय क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना और संदिग्ध वित्तीय गतिविधियों की समय पर पहचान सुनिश्चित करना है। इसके माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद के वित्तपोषण और अन्य वित्तीय अपराधों पर रोक लगाने के लिए एक मजबूत ढांचा विकसित करने की योजना है। विभिन्न नियामक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय से जांच और निगरानी की प्रक्रिया अधिक तेज और सटीक होने की उम्मीद है।

    नई व्यवस्था के तहत संबंधित संस्थाएं अपने अपने डेटाबेस से आवश्यक जानकारी और खुफिया इनपुट साझा करेंगी जिससे संदिग्ध लेनदेन की पहचान करना आसान होगा। इसके साथ ही रिपोर्टिंग की एकीकृत और मानकीकृत प्रक्रिया विकसित की जाएगी ताकि वित्तीय संस्थानों द्वारा दी जाने वाली जानकारी अधिक व्यवस्थित और उपयोगी हो सके। यह प्रक्रिया मौजूदा नियमों के अनुरूप होगी और वित्तीय अनुशासन को और सख्त बनाएगी।

    इस सहयोग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सूचना साझा करने की व्यवस्था को भी शामिल किया गया है जिससे विदेशी वित्तीय खुफिया इकाइयों के साथ समन्वय स्थापित किया जा सकेगा। इससे वैश्विक स्तर पर फैले वित्तीय अपराध नेटवर्क की पहचान और नियंत्रण में मदद मिलेगी। यह कदम अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप वित्तीय निगरानी प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    समझौते के तहत प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों पर भी विशेष जोर दिया जाएगा। वित्तीय संस्थानों और नियामक एजेंसियों के अधिकारियों को मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी नियमों और आतंकवाद के वित्तपोषण की रोकथाम से संबंधित प्रक्रियाओं पर नियमित प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे संस्थागत स्तर पर जागरूकता और दक्षता दोनों में वृद्धि होगी।

    इसके अलावा जोखिम आकलन प्रणाली को भी अधिक प्रभावी बनाने पर काम किया जाएगा ताकि वित्तीय क्षेत्र में संभावित खतरों की पहचान पहले से की जा सके। संदिग्ध लेनदेन से जुड़े संकेतकों को साझा करने और विश्लेषण करने की व्यवस्था को भी मजबूत किया जाएगा जिससे निगरानी प्रक्रिया अधिक वैज्ञानिक और डेटा आधारित हो सके।

    इस पूरे ढांचे में नियमित समन्वय बैठकें भी शामिल होंगी जिनमें विभिन्न एजेंसियां समय समय पर अपने अनुभव और जानकारी साझा करेंगी। इससे नीति निर्माण और उसके क्रियान्वयन में अधिक स्पष्टता और गति आने की उम्मीद है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह समझौता भारत की वित्तीय निगरानी प्रणाली को एकीकृत दिशा देने की ओर महत्वपूर्ण कदम है जिससे न केवल घरेलू वित्तीय अपराधों पर नियंत्रण मिलेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की भूमिका और अधिक मजबूत होगी।

  • निवेशकों को बड़े नुकसान से बचाने के लिए SEBI का बड़ा फैसला… बदलेंगे Gold-Silver ETF के नियम

    निवेशकों को बड़े नुकसान से बचाने के लिए SEBI का बड़ा फैसला… बदलेंगे Gold-Silver ETF के नियम


    नई दिल्ली।
    बाजार नियामक सेबी (Market Regulator SEBI) ने सोने और चांदी के ईटीएफ (Gold-Silver ETF) के कारोबारी नियमों में बदलाव करने का फैसला किया है। इसका मकसद है कि इनकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव के ज्यादा करीब रहें और निवेशकों को सही भाव पर खरीद-फरोख्त का मौका मिल सके। इससे आम निवेशकों को काफी फायदा होगा और अनचाहा नुकसान होने से बचाव हो सकेगा।

    दरअसल, दुनियाभर में सोने और चांदी की खरीद-बिक्री 24 घंटे होती है। अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी एक्सचेंज में भी इनकी कीमतें लगातार ऊपर-नीचे हो जाती हैं लेकिन भारत में ईटीएफ की खरीद-बिक्री शेयर बाजार के समय मुताबिक सुबह 9:15 से दोपहर 3:30 बजे तक ही होती है। इस दौरान इनके भाव एक तय सीमा (फिक्स्ड प्राइस बैंड) के भीतर ही घट-बढ़ सकते हैं।

    इस तय सीमा और समय अंतर की वजह से अक्सर भारतीय ईटीएफ की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों से पिछड़ जाती हैं या उनमें बड़ा अंतर आ जाता है। इसके चलते आम निवेशकों को सही दाम पर खरीद-बिक्री नहीं मिल पाती और कई बार बिना वजह नुकसान हो भी जाता है। वर्तमान में सोने-चांदी की कीमतों में लगातार तेज उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है जिसकी वजह से निवेशकों को नुकसान भी झेलना पड़ रहा है। इसके चलते सेबी ने ईटीएफ के कारोबारी नियमों में बदलाव का प्रस्ताव रखा है।


    क्या है नया प्रस्ताव

    सेबी ने अब ‘डायनामिक प्राइस बैंड’ लागू करने का सुझाव दिया है। इसका मतलब यह है कि कीमतों की सीमा बाजार की स्थिति के अनुसार बदली जा सकेगी। शुरुआत में एक तय सीमा रहेगी, लेकिन अगर बाजार में ज्यादा हलचल होती है तो यह दायरा बढ़ाया जा सकेगा। हर बड़े बदलाव के बाद कुछ समय का अंतर भी दिया जाएगा, ताकि बाजार स्थिर हो सके और घबराहट में खरीद-फरोख्त न हो। सेबी ने हाल ही में प्रस्ताव का मसौदा जारी किया है और मार्च 2026 तक लोगों से राय मांगी है, जिसके बाद इसे अंतिम रूप दिया जाएगा।


    निवेशक ऐसे समझें योजना को

    प्रस्ताव के मुताबिक, नया दायरा छह फीसदी का होगा। यानी एक दिन में ईटीएफ के भाव छह फीसदी तक ऊपर या नीचे हो सकते हैं। अगर बाजार में तेज हलचल होती है तो इस दायरे को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जा सकेगा और हर बार यह तीन फीसदी तक बढ़ेगा। हर बदलाव के बाद बाजार को स्थिर होने के लिए 15 मिनट का समय दिया जाएगा। एक दिन में कुल दायरा ±20% की सीमा तक जा सकेगा। इसका सीधा फायदा यह होगा कि निवेशक को ईटीएफ की जो कीमत स्क्रीन पर दिखेगी, वह उसकी वास्तविक वैल्यू के करीब होगी।


    बाजार खुलने से पहले ही तय होगी दिशा

    सेबी ने एक और महत्वपूर्ण सुझाव दिया है, जो है ‘प्री-ओपन सेशन’ की शुरुआत। शेयर बाजार की तरह अब गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ के लिए भी बाजार खुलने से पहले एक खास सत्र हो सकता है। इसका मकसद यह है कि रातभर में विदेशी बाजारों में जो भी बदलाव हुए हैं, उन्हें भारतीय बाजार खुलने से पहले ही समायोजित कर लिया जाए। इससे सुबह बाजार खुलते ही कीमतों में दिखने वाले भारी गैप को कम किया जा सकेगा और निवेशकों को एक संतुलित शुरुआत मिलेगी।

  • सेबी का बड़ा फैसला… एक अफ्रैल से बदल जाएंगे म्यूचुअल फंड से जुड़े ये नियम

    सेबी का बड़ा फैसला… एक अफ्रैल से बदल जाएंगे म्यूचुअल फंड से जुड़े ये नियम


    नई दिल्ली।
    भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) (Securities and Exchange Board of India + SEBI) ने म्यूचुअल फंड (Mutual Fund ) से जुड़े नियमों में अहम बदलाव किए हैं। इसका मकसद पारदर्शिता बढ़ाना, निवेशकों के हितों की सुरक्षा करना और फंड हाउसों में बेहतर गवर्नेंस सुनिश्चित करना है। ये नए नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे।


    क्या हैं नए नियम?

    नए नियमों के तहत म्यूचुअल फंड योजनाओं के खर्च ढांचे में अहम बदलाव किए गए हैं। म्यूचुअल फंड योजनाएं अब अपने प्रदर्शन से जुड़ा बेस एक्सपेंस रेशियो वसूल सकेंगी। सेबी ने स्पष्ट किया है कि जो योजनाएं प्रदर्शन आधारित बेस एक्सपेंस रेशियो लेने का विकल्प चुनेंगी, उन्हें बोर्ड द्वारा समय-समय पर तय किए गए खर्च ढांचे और डिस्क्लोजर नियमों का पालन करना होगा। इसके अलावा कुल खर्च को अलग-अलग हिस्सों में दिखाना अनिवार्य होगा। इसके अलावा ब्रोकरेज सीमा में भी सेबी ने कटौती की है। कैश मार्केट में ब्रोकरेज की अधिकतम सीमा को घटाकर 6 बेसिस पॉइंट कर दिया गया है। वहीं डेरिवेटिव सेगमेंट में नेट ब्रोकरेज कैप को 3.89 बेसिस प्वाइंट से घटाकर 2 बेसिस प्वाइंट कर दिया गया है।

    इसके अलावा पहले ब्रोकरेज, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT), स्टांप ड्यूटी और एक्सचेंज फीस जैसे खर्च टोटल एक्सपेंस रेशियो (TER) में शामिल रहते थे। वहीं अब इन्हें अलग-अलग दिखाना होगा। नया बेस एक्सपेंस रेशियो केवल एसेट मैनेजमेंट कंपनी द्वारा निवेशकों का पैसा मैनेज करने के लिए ली जाने वाली फीस को दिखाएगा। इसके अलावा, सेबी ने ट्रस्टी और प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMPs) की जिम्मेदारियों को भी बढ़ाया है। इससे एसेट मैनेजमेंट कंपनियों पर निगरानी और जवाबदेही और सख्त होगी, जिससे गवर्नेंस मानकों को मजबूती मिलेगी।


    शेयर बाजार में बदलाव के भी प्रस्ताव

    हाल ही में सेबी ने शेयर बाजारों में कारोबार से संबंधित ढांचे में बड़े बदलाव का प्रस्ताव किया। इसका मकसद नियमों को सरल बनाना, दोहराव को हटाना और बाजार सहभागियों के लिए अनुपालन के बोझ को कम करना है। ये प्रस्ताव शेयर बाजारों और जिंस वायदा-विकल्प बाजारों में कारोबारी सुगमता बढ़ाने की सेबी की व्यापक पहल का हिस्सा हैं।

  • एनएसई का बड़ा IPO आने वाला, निवेशकों के लिए संकेत: सेबी से जल्द मिल सकता है NOC

    एनएसई का बड़ा IPO आने वाला, निवेशकों के लिए संकेत: सेबी से जल्द मिल सकता है NOC

    नई दिल्ली| नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का आईपीओ भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) से जल्द ही नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) मिलने के करीब है। सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने शनिवार को चेन्नई में प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि नियामक एनएसई को अप्रूवल देने की प्रक्रिया इस महीने के अंत तक पूरी कर सकता है। एनओसी मिलने के बाद एनएसई अपने पब्लिक इश्यू को बाजार में उतारने के लिए तैयार हो जाएगा, और लिस्टिंग की प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय एक्सचेंज के हाथ में होगा।

    डार्क फाइबर विवाद ने रोके एनएसई के रास्ते

    एनएसई का आईपीओ कई सालों से अटका हुआ था, जिसका मुख्य कारण 2010-2014 के बीच हुए तथाकथित डार्क फाइबर केस हैं। आरोप था कि कुछ हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स को एनएसई के को-लोकेशन सर्वर तक खास एक्सेस दिया गया था, जिससे वे अन्य बाजार भागीदारों की तुलना में तेजी से ट्रेडिंग कर पाते थे। अप्रैल 2019 में, सेबी ने एनएसई को कथित गैर-कानूनी मुनाफे के रूप में 62.58 करोड़ रुपये लौटाने और कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को मार्केट से जुड़े पदों पर कार्य करने से रोकने का निर्देश दिया था। 2022 में एक्सचेंज पर 7 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था, जिसे बाद में सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल ने रद्द कर दिया।

    रिटेल निवेशकों की बड़ी भागीदारी

    एनएसई ने पिछले साल जुलाई में जानकारी दी थी कि लगभग 1.46 लाख रिटेल निवेशक उसके शेयरों में निवेश कर चुके हैं। ये शेयर ग्रे (अनलिस्टेड) मार्केट में हैं और हर निवेशक के पास की कीमत 2 लाख रुपये से कम है। इसके बावजूद रिटेल निवेशकों की दिलचस्पी लगातार बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि आईपीओ के बाद इस हिस्सेदारी और बढ़ सकती है, क्योंकि निवेशकों को लंबे समय से एक्सचेंज के शेयर में संभावित मुनाफा नजर आ रहा है।

    एनएसई के लिए रास्ता अब साफ

    सेबी से एनओसी मिलने के बाद एनएसई को अपने पब्लिक इश्यू को समयबद्ध तरीके से लॉन्च करने का अधिकार मिलेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, आईपीओ के लिए निवेशक पहले से उत्साहित हैं और बाजार में इसकी मांग अच्छी रहने की संभावना है। लंबे समय से रुका यह आईपीओ न केवल एनएसई के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि भारतीय शेयर बाजार में भी नया उत्साह और रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने में मदद करेगा।

  • जोमाटो-स्विगी को बाजार में भी मिलेगी टक्कर होश उड़ाने आ रहा Zepto IPO

    जोमाटो-स्विगी को बाजार में भी मिलेगी टक्कर होश उड़ाने आ रहा Zepto IPO


    नई दिल्ली । जहां एक ओर जोमाटो और स्विगी को डिलीवरी के मोर्चे पर सड़क पर तगड़ी टक्कर मिल रही है. वहीं अब शेयर बाजार में भी बड़ी चुनौती का सामना भी करना पड़ सकता है. दोनों कंपनियों का होश उड़ाने के लिए रोजमर्रा की जरूरत के सामान डिलीवर करने वाली कंपनी जेप्टो अपना आईपीओ लेकर आ रही है. शुक्रवार यानी आज कंपनी गुपचुप तरीके से अपना ड्राफ्ट पेपर सेबी दफ्तर में दाखिल करेगी. जानकारों का कहना है कि जेप्टो आईपीओ का साइज 11 हजार करोड़ या उससे ऊपर जा सकता है.
    लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है. अभी तक जितनी भी जानकारी सामने आई है वो सभी सूत्रों के हवाले से की गई है.कंपनी का अगले साल शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने का इरादा है. मामले से परिचित सूत्रों ने जानकारी देते हुए कहा कि जेप्टो 26 दिसंबर को सेबी के पास निर्गम संबंधी मसौदा प्रस्ताव डीआरएचपी दाखिल करने जा रही है.

    जोमैटो-स्विगी की राह पर जेप्टो

    आईपीओ संबंधी मसौदा प्रस्ताव को सेबी की मंजूरी मिलने की स्थिति में जेप्टो भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने वाले सबसे नई स्टार्टअप फर्मों में से एक बन जाएगी. आईपीओ लाने के साथ ही जेप्टो वह अपने क्षेत्र के प्रतिद्वंद्वियों जोमैटो एवं स्विगी की कतार में खड़ी हो जाएगी जो पहले से ही शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं. कंपनी का अगले साल शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने का इरादा है. मामले से परिचित सूत्रों ने जानकारी देते हुए कहा कि जेप्टो 26 दिसंबर को सेबी के पास निर्गम संबंधी मसौदा प्रस्ताव डीआरएचपी दाखिल करने जा रही है. अभी तक कंपनी की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है.
    गुपचुप तरीका अपना आईपीओ
    सूत्रों के मुताबिक जेप्टो गोपनीय मार्ग से आईपीओ के लिए आवेदन करने की तैयारी में है. इस मार्ग के तहत कंपनी सेबी के साथ अपने मसौदा दस्तावेज को सार्वजनिक किए बगैर उस पर शुरुआती चर्चा कर सकती है. हाल के वर्षों में गोपनीय मार्ग से आईपीओ लाने का तरीका उन कंपनियों के बीच लोकप्रिय हुआ है जो आईपीओ से पहले बाजार की स्थिति को देखते हुए अधिक लचीलापन चाहती हैं और नियामक से प्रारंभिक सुझाव लेना चाहती हैं.
    कंपनी कितना जुटा सकी पैसा
    जेप्टो का मौजूदा मूल्यांकन सात अरब अमेरिकी डॉलर आंका गया है. कंपनी अपने गठन से लेकर अब तक कुल 1.8 अरब डॉलर करीब 16000 करोड़ रुपये का कोष जुटा चुकी है. कंपनी ने अगस्त 2023 में एक अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन वाली कंपनी यानी यूनिकॉर्न होने का दर्जा हासिल किया था. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई अधूरी छोड़ने वाले युवाओं आदित पलिचा और कैवल्य वोहरा ने इस कंपनी की स्थापना की थी. जेप्टो ने 10 मिनट में किराना के सामान की आपूर्ति का मॉडल अपनाकर बड़े भारतीय शहरों में तेजी से विस्तार किया.