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  • फोर्स लेबर आयात प्रतिबंध का मिला फायदा, अमेरिका ने भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा, कई देशों पर अधिक शुल्क

    फोर्स लेबर आयात प्रतिबंध का मिला फायदा, अमेरिका ने भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा, कई देशों पर अधिक शुल्क

    नई दिल्ली । अमेरिका ने फोर्स लेबर से बने उत्पादों के आयात को लेकर अपनी नई व्यापारिक कार्रवाई के तहत भारत पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का निर्णय लिया है। हालांकि यह दर उन कई देशों की तुलना में कम है, जिन पर 12.5 प्रतिशत तक का शुल्क लगाया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि भारत ने जांच प्रक्रिया के दौरान फोर्स लेबर से निर्मित उत्पादों के आयात पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाए, जिसके कारण उसे अपेक्षाकृत कम टैरिफ वाली श्रेणी में रखा गया।

    यह निर्णय अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) द्वारा सेक्शन 301 के तहत की गई व्यापक जांच के बाद लिया गया है। जांच में 60 प्रमुख व्यापारिक अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों और व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई। अमेरिकी प्रशासन का आरोप था कि इन देशों ने जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर प्रभावी प्रतिबंध लगाने या उसके पालन को सुनिश्चित करने में पर्याप्त कदम नहीं उठाए। इसी आधार पर विभिन्न देशों के लिए अलग-अलग टैरिफ दरें तय की गई हैं।

    यूएसटीआर के अनुसार, भारत उन 17 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जिन्हें 10 प्रतिशत टैरिफ की श्रेणी में रखा गया है। इस समूह में बांग्लादेश, कनाडा, इंडोनेशिया, मलेशिया, मेक्सिको, पाकिस्तान, श्रीलंका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देश भी शामिल हैं। वहीं चीन, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम और दक्षिण अफ्रीका सहित कई अन्य देशों पर 12.5 प्रतिशत तक का टैरिफ लागू किया जाएगा। यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और ताइवान के लिए अलग व्यवस्था अपनाई गई है।

    अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि जून में प्रस्तावित कार्रवाई सार्वजनिक किए जाने के बाद भारत ने फोर्स लेबर से बने उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लागू करने की दिशा में कदम उठाए। इसी पहल को ध्यान में रखते हुए भारत को अधिक अनुकूल श्रेणी में रखा गया। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने कहा कि यह कदम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जबरन श्रम को समाप्त करने और व्यापारिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    इस जांच प्रक्रिया के दौरान दो चरणों में सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की गई, 45 से अधिक सरकारों से परामर्श किया गया और दो हजार से अधिक सार्वजनिक टिप्पणियां प्राप्त हुईं। इसके आधार पर यूएसटीआर ने निष्कर्ष निकाला कि समीक्षा के दायरे में शामिल सभी अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों में सुधार की आवश्यकता है। इसी कारण 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत कार्रवाई का निर्णय लिया गया।

    हालांकि अमेरिका ने कुछ आवश्यक उत्पादों को इस कार्रवाई से बाहर भी रखा है। इनमें दवाएं, सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरण, चुनिंदा कच्चा माल और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला के लिए महत्वपूर्ण वस्तुएं शामिल हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन वस्तुओं पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को कम टैरिफ श्रेणी में रखा जाना द्विपक्षीय व्यापार संबंधों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा सकता है, हालांकि आगे इसका प्रभाव दोनों देशों के व्यापार और निर्यात पर नजर रखने के बाद ही स्पष्ट होगा।

  • भारत-अमेरिका ट्रेड डील अंतिम चरण में, लेकिन टैरिफ बढ़त के बिना लागू नहीं होगा समझौता: पीयूष गोयल

    भारत-अमेरिका ट्रेड डील अंतिम चरण में, लेकिन टैरिफ बढ़त के बिना लागू नहीं होगा समझौता: पीयूष गोयल

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर महत्वपूर्ण प्रगति होने के बावजूद इसके क्रियान्वयन पर अभी अंतिम मुहर लगना बाकी है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के बीच समझौते की रूपरेखा लगभग तय हो चुकी है, लेकिन भारत तब तक इसे लागू नहीं करेगा जब तक उसे अपने प्रमुख प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में स्पष्ट और प्रभावी टैरिफ लाभ प्राप्त नहीं हो जाता।

    लंदन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय व्यापार कार्यक्रम के दौरान गोयल ने कहा कि किसी भी मुक्त व्यापार समझौते का मूल उद्देश्य प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बेहतर बाजार पहुंच हासिल करना होता है। भारत चाहता है कि उसे अमेरिका के साथ व्यापार में ऐसी टैरिफ व्यवस्था मिले, जिससे वह चीन, वियतनाम, बांग्लादेश, श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार और फिलीपींस जैसे देशों की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी स्थिति में आ सके।

    उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच इस समझौते की बुनियादी सहमति इसी वर्ष फरवरी में बन गई थी। दोनों देशों ने समझौते की व्यापक रूपरेखा पर सहमति जताई थी और उसके बाद से तकनीकी, कानूनी तथा टैरिफ संबंधी विवरणों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया जारी है। गोयल के अनुसार समझौते को लेकर किसी प्रकार की अस्पष्टता नहीं है, बल्कि अब केवल उन शर्तों को सुनिश्चित किया जा रहा है जो भारत के व्यापारिक हितों को मजबूत करें।

    व्यापार मंत्रालय का मानना है कि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है और ऐसे समय में किसी भी समझौते का वास्तविक लाभ तभी मिलता है जब उससे निर्यातकों को प्रत्यक्ष आर्थिक फायदा प्राप्त हो। इसी कारण भारत अमेरिका के साथ ऐसी टैरिफ संरचना चाहता है जो उसके उद्योगों और निर्यातकों को अन्य प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले बढ़त प्रदान करे।

    फरवरी में हुई अंतरिम सहमति के तहत अमेरिका भारतीय उत्पादों पर कुछ श्रेणियों में शुल्क दरों को कम करने पर सहमत हुआ था। इसके साथ ही कुछ अतिरिक्त शुल्कों में राहत देने पर भी चर्चा हुई थी, जिससे भारतीय निर्यातकों को फायदा मिल सकता था। उस समय प्रस्तावित व्यवस्था को भारत के लिए लाभकारी माना गया था क्योंकि इससे कई एशियाई प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर व्यापारिक स्थिति बनने की संभावना थी।

    हालांकि इसके बाद अमेरिका में कानूनी और नीतिगत परिस्थितियों में बदलाव देखने को मिला। अमेरिकी न्यायिक प्रक्रिया और टैरिफ प्राधिकरण से जुड़े निर्णयों के कारण व्यापार नीति को लेकर कुछ नई अनिश्चितताएं सामने आईं। इसी दौरान अस्थायी टैरिफ व्यवस्था लागू की गई, जिसकी समयसीमा जुलाई के अंत तक निर्धारित है। भारत अब उस अवधि के बाद बनने वाली अंतिम टैरिफ संरचना का इंतजार कर रहा है।

    इसके समानांतर अमेरिका ने कुछ व्यापारिक मामलों को लेकर जांच प्रक्रियाएं भी शुरू की हैं, जिनके निष्कर्ष भविष्य की शुल्क व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। भारत इन सभी पहलुओं का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन कर रहा है ताकि किसी भी समझौते का दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित किया जा सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह रुख उसके बदलते आर्थिक आत्मविश्वास को दर्शाता है। सरकार अब केवल व्यापार समझौते करने पर जोर नहीं दे रही, बल्कि ऐसे समझौते चाहती है जो भारतीय उद्योगों, निर्यातकों और निवेशकों को वास्तविक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्रदान करें। आने वाले हफ्तों में अमेरिका की अंतिम टैरिफ नीति और जांच संबंधी निष्कर्ष सामने आने के बाद दोनों देशों के बीच इस बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने की संभावना है।