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80 वर्षीय बुजुर्ग को आया बैंक अधिकारी का वीडियो कॉल, सीनियर सिटीजन कार्ड का झांसा देकर खाते से उड़ाए 10 लाख
उज्जैन । मध्य प्रदेश के उज्जैन में साइबर ठगी का एक मामला सामने आया है जहां सीनियर सिटीजन कार्ड बनवाने का झांसा देकर साइबर ठगों ने 80 वर्षीय रिटायर्ड प्रिंसिपल के बैंक खाते से 10 लाख रुपये निकाल लिए। आरोपी ने खुद को बैंक ऑफ इंडिया का अधिकारी बताकर बुजुर्ग से वॉट्सऐप वीडियो कॉल पर बातचीत की और इसी दौरान ATM कार्ड का नंबर पिन बैंक खाते की जानकारी तथा जन्मतिथि हासिल कर ली। कुछ समय बाद बुजुर्ग को ठगी का संदेह हुआ तो उन्होंने पड़ोसी को घटना की जानकारी दी और साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराई। हालांकि तब तक उनके खाते से तीन बार में पूरी रकम निकाली जा चुकी थी। माधव नगर थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।पुलिस के अनुसार फरियादी सनत कुमार जैन उज्जैन के निर्माण नगर सेठीनगर क्षेत्र के निवासी हैं। वह आईटीआई कॉलेज में प्रिंसिपल के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। 11 अक्टूबर को सुबह करीब 11 बजे उनके वॉट्सऐप नंबर पर एक अनजान मोबाइल नंबर से वीडियो कॉल आया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को बैंक ऑफ इंडिया का अधिकारी बताया। उसने बुजुर्ग से पूछा कि क्या वह सीनियर सिटीजन कार्ड बनवाना चाहते हैं। बुजुर्ग ने जब इसमें रुचि दिखाई तो आरोपी ने कार्ड बनवाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही।इसी बहाने आरोपी ने उनसे ATM कार्ड का नंबर पिन बैंक खाते से संबंधित जानकारी और जन्मतिथि पूछ ली। बुजुर्ग को लगा कि बैंक से जुड़ी औपचारिकता पूरी की जा रही है इसलिए उन्होंने मांगी गई जानकारी साझा कर दी। जानकारी हासिल करने के बाद कॉल करने वाले ने उन्हें कुछ देर इंतजार करने के लिए कहा और फिर फोन काट दिया। इसके कुछ समय बाद सनत कुमार जैन को आशंका हुई कि उनके साथ धोखाधड़ी हो सकती है। उन्होंने तुरंत अपने पड़ोसी संजय शंकमनिरकर को पूरी घटना बताई। पड़ोसी ने भी इसे साइबर ठगी का मामला होने की आशंका जताई और शिकायत करने की सलाह दी।इसके बाद बुजुर्ग ने साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क कर शिकायत दर्ज कराई। हालांकि खाते में हुए लेनदेन की वास्तविक स्थिति जानने के लिए जब उन्होंने बैंक पासबुक में एंट्री कराई तो पता चला कि खाते से तीन अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए रकम निकाली गई है। पहले खाते से 5 लाख रुपये निकाले गए। इसके बाद 3 लाख रुपये और फिर 2 लाख रुपये का लेनदेन हुआ। इस तरह कुल 10 लाख रुपये खाते से निकल गए। घटना के सामने आने के बाद परिवार और आसपास के लोगों में भी चिंता का माहौल है।माधव नगर थाना पुलिस ने शिकायत के आधार पर केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस उस मोबाइल नंबर की जानकारी जुटा रही है जिससे बुजुर्ग को वीडियो कॉल किया गया था। साथ ही खाते से निकाली गई रकम किन खातों में पहुंची और लेनदेन में किन लोगों की भूमिका रही इसकी भी पड़ताल की जा रही है। जांच के जरिए ठगी में इस्तेमाल किए गए बैंक खातों और मोबाइल नंबरों की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है।यह घटना बुजुर्गों को निशाना बनाकर की जाने वाली साइबर ठगी के तरीकों को लेकर सतर्क रहने की जरूरत भी बताती है। बैंक अधिकारी बनकर फोन करने वाले किसी अनजान व्यक्ति को ATM कार्ड का नंबर पिन या बैंक संबंधी गोपनीय जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए। सीनियर सिटीजन कार्ड या किसी अन्य बैंकिंग सुविधा के नाम पर जानकारी मांगे जाने पर संबंधित बैंक की आधिकारिक शाखा या हेल्पलाइन से पुष्टि करना जरूरी है। -

अरेस्ट वारंट का डर दिखाया, फर्जी जज ने सुनाया संपत्ति जब्ती का फरमान; 96 दिन में बुजुर्ग दंपती से ठगे 22 लाख
भोपाल । भोपाल के कोलार इलाके में रहने वाले एक बुजुर्ग दंपती के साथ डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। ठगों ने करीब 96 दिनों तक दंपती को वीडियो कॉल के जरिए अपने नियंत्रण में रखा और उन्हें करोड़ों रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसाने की धमकी दी। कभी खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताया गया तो कभी चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर और सुप्रीम कोर्ट का जज बनकर दंपती को डराया गया। आरोपियों ने गिरफ्तारी वारंट और संपत्ति सीज होने का भय दिखाकर उनसे 22 लाख रुपए ऐंठ लिए। रकम देने के बाद भी जब ठगों ने उन्हें डिजिटल निगरानी से मुक्त नहीं किया तो दंपती को शक हुआ और उन्होंने साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराई।पुलिस के अनुसार कृष्णा कॉम्प्लेक्स गणपति एन्क्लेव निवासी सुवर्णा लक्ष्मी और नरसिम्हा राव मूल रूप से आंध्र प्रदेश के पलनाडू जिले के रहने वाले हैं। परिवार के साथ फरवरी में शिवरात्रि मनाने के लिए वे आंध्र प्रदेश गए थे। इसी दौरान 19 मई को सुवर्णा के मोबाइल पर एक कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली के दरियागंज थाने का अधिकारी खन्ना बताया और दावा किया कि उनके नाम गिरफ्तारी वारंट जारी है। उन्हें बताया गया कि दिल्ली केनरा बैंक से जुड़े एक खाते के जरिए नरेश गोयल के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में करोड़ों रुपए का लेनदेन हुआ है और उसमें उनका नाम सामने आया है।
इसके बाद ठगों ने वीडियो कॉल के जरिए पूछताछ शुरू कर दी। दंपती को निर्देश दिया गया कि वे किसी दूसरे व्यक्ति से संपर्क नहीं करेंगे और घर से बाहर भी नहीं निकलेंगे। 21 मई को एक महिला ने खुद को चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बताते हुए बैंक खातों और दूसरी वित्तीय जानकारी मांगी। अगले दिन दंपती की वीडियो कॉल पर एक कथित जज से बात कराई गई। इस फर्जी जज ने उनके आधार कार्ड से जुड़ी जानकारी दिखाकर कार्रवाई का डर पैदा किया और उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश की कि वे गंभीर कानूनी मामले में फंस चुके हैं।
9 जून को कथित जज ने वीडियो कॉल पर दंपती को संपत्ति सीज करने की धमकी दी। इसके बाद निशा पटेल नाम की महिला ने उन्हें भोपाल लौटने के लिए कहा। ठगों ने मामले को खत्म करने के नाम पर एफडी और जेवर बेचने या गिरवी रखने का दबाव बनाया। डर के कारण दंपती 10 जून को आंध्र प्रदेश से भोपाल के लिए रवाना हुए और 11 जून को यहां पहुंचे। अगले ही दिन उन्होंने अपने जेवर गिरवी रखकर 22 लाख रुपए जुटाए।
आरोपियों के निर्देश पर दंपती ने पांच अलग-अलग बार रकम विभिन्न बैंक खातों में जमा की। ठगों ने संपर्क बनाए रखने के लिए सात अलग-अलग WhatsApp नंबरों का इस्तेमाल किया। इतनी बड़ी रकम देने के बाद भी दंपती को राहत नहीं मिली। उन्हें लगातार वीडियो कॉल पर निगरानी में रखा गया और किसी से बात नहीं करने का दबाव बनाया जाता रहा। यह सिलसिला 23 अगस्त तक चलता रहा। यानी 19 मई से 23 अगस्त तक करीब 96 दिनों तक बुजुर्ग दंपती साइबर ठगों के डर और दबाव में रहे।
बाद में दंपती को पूरे मामले पर संदेह हुआ और उन्होंने जब संबंधित जानकारी की जांच कराई तो पता चला कि सुप्रीम कोर्ट के नाम पर दिखाया गया आदेश भी फर्जी था। इसके बाद उन्होंने साइबर सेल से संपर्क किया। 27 अगस्त को मामले में एफआईआर दर्ज की गई और केस डायरी कोलार थाने भेजी गई। पुलिस अब सातों WhatsApp नंबरों पांच बैंक खातों में हुए ट्रांजैक्शन वीडियो कॉल और आरोपियों की पहचान से जुड़े डिजिटल सुरागों की जांच कर रही है। यह मामला एक बार फिर बताता है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों के नाम पर डर पैदा कर पैसे मांगना साइबर ठगी का बड़ा तरीका बन चुका है। किसी भी जांच या गिरफ्तारी के नाम पर वीडियो कॉल के जरिए पैसे मांगने वालों पर भरोसा करने के बजाय तत्काल संबंधित पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करना जरूरी है।