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  • 110 की उम्र में भी बचपन जिंदा, बिस्मिल्लाह बी आज भी खेलती हैं छुपन-छुपाई, परिवार का प्यार बना सहारा

    110 की उम्र में भी बचपन जिंदा, बिस्मिल्लाह बी आज भी खेलती हैं छुपन-छुपाई, परिवार का प्यार बना सहारा


    इंदौर। इंदौर में अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के अवसर पर वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान का आयोजन किया गया। स्वामी विवेकानंद कम्युनिटी हॉल में नगर निगम और सामाजिक न्याय विभाग के संयुक्त तत्वावधान में हुए कार्यक्रम में 100 से अधिक वरिष्ठ नागरिक शामिल हुए। इस दौरान बुजुर्गों को शॉल श्रीफल और माला पहनाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ नागरिकों के अनुभवों और समाज में उनके योगदान को याद करने के साथ नई पीढ़ी के साथ उनके रिश्तों को भी सामने रखा गया।
    इस आयोजन में सबसे अधिक उम्र की वरिष्ठ नागरिक 110 वर्षीय बिस्मिल्लाह बी रहीं। उम्र के इस पड़ाव पर भी उन्होंने अपने बचपन की यादों को बेहद सहज अंदाज में साझा किया। उन्होंने बताया कि बचपन का समय काफी अच्छा था और उन्हें छुपन-छुपाई खेलना पसंद था। उनकी पसंद आज भी सादगी से जुड़ी हुई है। खाने में उन्हें दाल-चावल पसंद हैं जबकि मिठाई में खोपरा पाक उनका पसंदीदा है। बिस्मिल्लाह बी ने देश की आजादी की लड़ाई का दौर भी देखा है। घूमने की बात पूछे जाने पर उन्होंने बाग और बगीचों को पसंद बताया और नेहरू पार्क की बगिया में घूमना अच्छा लगने की बात कही। बातचीत के दौरान वे अपनी पोती सना को भी याद करती नजर आईं।

    कार्यक्रम में बच्चों की मौजूदगी ने पीढ़ियों के बीच रिश्तों की खूबसूरत तस्वीर पेश की। 10 वर्षीय अनाइजा नूर ने अपनी पसंद में इटली घूमना पिज्जा खाना नानी के साथ रहना चिड़ियाघर जाना और रोब्लॉक्स खेलना बताया। वहीं 7 वर्षीय उरेन फातिमा ने खाला बर्गर वॉटर पार्क और लूडो को अपनी पसंद बताया। इन बच्चों की पसंद आज की बदलती दुनिया को दिखाती है लेकिन परिवार से जुड़ाव की भावना यहां भी उतनी ही मजबूत दिखाई दी।

    बिस्मिल्लाह बी की छुपन-छुपाई से लेकर बच्चों के रोब्लॉक्स और लूडो तक खेलों का अंदाज जरूर बदल गया है लेकिन अपनों के साथ समय बिताने की खुशी आज भी कायम है। एक तरफ 110 साल की बिस्मिल्लाह बी अपनी पोती को याद करती हैं तो दूसरी तरफ अनाइजा के लिए नानी और उरेन के लिए खाला खास हैं। यही रिश्ता पीढ़ियों के अंतर को कम करता है।

    खाने और घूमने की पसंद में भी यही समानता नजर आई। बिस्मिल्लाह बी को दाल-चावल और खोपरा पाक पसंद है जबकि नई पीढ़ी के बच्चों की पसंद पिज्जा और बर्गर है। बुजुर्गों के लिए बाग-बगीचे सुकून का जरिया हैं तो बच्चों के लिए चिड़ियाघर और वॉटर पार्क आकर्षण का केंद्र हैं। पसंद बदलती रही लेकिन बाहर की दुनिया से जुड़ने और आनंद लेने की इच्छा बरकरार रही।

    कार्यक्रम में वरिष्ठ नागरिकों के लिए गीत और अन्य गतिविधियां भी आयोजित की गईं। गीतों की प्रस्तुति से माहौल खुशनुमा बना रहा। आयोजन के जरिए यह संदेश दिया गया कि बढ़ती उम्र व्यक्ति को सामाजिक जीवन से अलग नहीं करती। परिवार और समाज से जुड़े रहना लोगों से मिलना जुलना और अपनी रुचियों के अनुसार गतिविधियों में शामिल होना वरिष्ठ नागरिकों के जीवन को सक्रिय बनाए रखने में मदद कर सकता है।

    हालांकि इसी कार्यक्रम को लेकर जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए विवाद भी सामने आया। वार्ड 59 में आयोजित समारोह में स्थानीय पार्षद डॉ. रुपाली पेंढ़ारकर और क्षेत्रीय विधायक गोलू शुक्ला को आमंत्रित नहीं किए जाने पर पार्षद ने नगर निगम अधिकारियों पर मनमानी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि उनके वार्ड में कार्यक्रम आयोजित हुआ लेकिन उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई। उन्होंने भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा होने पर कड़ी नाराजगी जताई। एमआईसी सदस्य राजेंद्र राठौर ने अधिकारियों की गलती मानी और कहा कि जनप्रतिनिधियों से समन्वय रखा जाना चाहिए था। उन्होंने पार्षद और विधायक से चर्चा कर अलग कार्यक्रम आयोजित करने की बात कही।

  • जब डॉक्टर बने संगीतकार और बुजुर्गों ने गुनगुनाए पुराने गीत: भोपाल में अल्जाइमर-डिमेंशिया जागरूकता का खास अंदाज

    जब डॉक्टर बने संगीतकार और बुजुर्गों ने गुनगुनाए पुराने गीत: भोपाल में अल्जाइमर-डिमेंशिया जागरूकता का खास अंदाज


    भोपाल। भोपाल में रविवार को बुजुर्गों के लिए आयोजित एक खास कार्यक्रम ने संगीत और अपनत्व के जरिए जिंदगी को फिर से करीब से महसूस करने का मौका दिया। होशंगाबाद रोड स्थित होटल बैस्टियन में अल्जाइमर और डिमेंशिया से प्रभावित बुजुर्गों के साथ उनके परिवारों और केयरगिवर्स के लिए लव यू जिंदगी कार्यक्रम आयोजित किया गया। अंजलि एन एसोसिएशन ऑफ साइकोलॉजिस्ट और लव यू जिंदगी संस्था की ओर से हुए इस आयोजन का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य स्वस्थ वृद्धावस्था और अल्जाइमर तथा डिमेंशिया को लेकर जागरूकता बढ़ाना रहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिकों के साथ उनके परिजन केयरगिवर्स और स्वास्थ्यकर्मी शामिल हुए।

    कार्यक्रम में वरिष्ठ नागरिकों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को लेकर भी चर्चा हुई। मुख्य अतिथि राधारमण इंस्टीट्यूट के संजीव सक्सेना विशिष्ट अतिथि लेफ्टिनेंट वाइस एडमिरल विमल वर्मा और जनरल श्याम सुंदर श्रीवास्तव मौजूद रहे। अतिथियों ने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ बुजुर्गों की शारीरिक जरूरतों के साथ उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है। इस अवसर पर राधारमण इंस्टीट्यूट के संस्थापक स्वर्गीय राधारमण सक्सेना के शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि भी दी गई।

    कार्यक्रम का सबसे खास आकर्षण चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े डॉक्टरों के म्यूजिकल बैंड Med Beats की प्रस्तुति रही। डॉक्टरों ने बुजुर्गों की पसंद के पुराने और सदाबहार गीतों की धुनें छेड़ीं तो कार्यक्रम का माहौल पूरी तरह बदल गया। परिचित गीतों को सुनकर कई बुजुर्ग अपने पुराने दिनों की यादों में खो गए। कुछ लोगों ने गीतों के साथ गुनगुनाया तो कुछ ने संगीत की धुन पर हल्की शारीरिक गतिविधियां करते हुए खुशी जाहिर की। कई बुजुर्गों के चेहरे पर लंबे समय बाद खुली मुस्कान दिखाई दी।

    आयोजकों के मुताबिक डिमेंशिया और अल्जाइमर से प्रभावित लोगों के लिए परिचित संगीत खास अनुभव दे सकता है। पुराने और पहचाने हुए गीत व्यक्ति को बीते समय की यादों से जोड़ सकते हैं और उनके सामाजिक जुड़ाव को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। इसी सोच के साथ कार्यक्रम में संगीत को मनोरंजन के साथ भावनात्मक जुड़ाव का माध्यम बनाया गया। आयोजन में सिर्फ बुजुर्गों को ही केंद्र में नहीं रखा गया बल्कि उनकी देखभाल करने वाले परिवारों और केयरगिवर्स को भी विशेष महत्व दिया गया।

    संस्था की संस्थापक डॉ. अंजलि सहाय ने कहा कि वृद्धावस्था में अकेलापन चिंता और स्मृति से जुड़ी समस्याएं बुजुर्गों के लिए चुनौती बन सकती हैं। ऐसे समय में उन्हें सकारात्मक आत्मीय और खुशहाल वातावरण देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि अल्जाइमर और डिमेंशिया से प्रभावित व्यक्ति की देखभाल करने वाले परिवार और केयरगिवर्स भी लगातार भावनात्मक दबाव से गुजरते हैं इसलिए उनके लिए भी सहयोग और संवेदनशील माहौल जरूरी है। लव यू जिंदगी कार्यक्रम ने इसी संदेश को संगीत और सामूहिक सहभागिता के जरिए सामने रखा कि बुजुर्गों की जिंदगी में दवाओं और देखभाल के साथ खुशी अपनापन और संवाद भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

  • 10 साल से बेटे के अगले गुरुवार का इंतजार, अब आश्रम ही परिवार; भारत भवन की कलाकार की कहानी ने झकझोरा

    10 साल से बेटे के अगले गुरुवार का इंतजार, अब आश्रम ही परिवार; भारत भवन की कलाकार की कहानी ने झकझोरा


    भोपाल । भोपाल के अपना घर वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों की जिंदगी बाहर से भले ही सामान्य नजर आए लेकिन उनके भीतर कई ऐसी कहानियां दबी हैं जो रिश्तों और बदलते पारिवारिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। हाल ही में आश्रम में रहने वाले 70 वर्षीय घनश्याम की मौत के बाद जब उनके चारों बच्चे अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचे तो वहां रहने वाले दूसरे बुजुर्ग भी भावुक हो गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक घनश्याम का निधन 4 अगस्त 2026 को हुआ था। आश्रम प्रबंधन ने परिवार के आने का इंतजार किया लेकिन कोई नहीं पहुंचा। आखिरकार पुलिस की मदद से उनका अंतिम संस्कार कराया गया।

    घनश्याम की कहानी भी संघर्ष से भरी रही। वह इंदौर में टायर और ट्यूब का कारोबार करते थे और उन्होंने अपने चार बच्चों को पालने के लिए जीवनभर मेहनत की। बुजुर्गावस्था में वह भोपाल के अपना घर वृद्धाश्रम में रहने लगे। उनके निधन के बाद परिवार से संपर्क किया गया लेकिन किसी के नहीं पहुंचने पर दो दिन तक उनके शव को इस उम्मीद में रखा गया कि शायद कोई अपना अंतिम विदाई देने आ जाए। परिवार की ओर से अंतिम संस्कार आश्रम से कराने की बात कही गई। इस घटना ने आश्रम में रह रहे दूसरे बुजुर्गों के भीतर अपने भविष्य को लेकर चिंता पैदा कर दी।

    इसी आश्रम में रहने वाली 80 वर्षीय अंजली श्रीवास्तव की कहानी भी बेहद भावुक कर देने वाली है। अंजली को करीब एक दशक से आश्रम में रहते हुए बताया गया है। उन्होंने एक पुराने प्रसंग को याद करते हुए कहा कि जब उन्हें मोतियाबिंद की समस्या थी तब एक मिठाई कारोबारी उन्हें मंदिर के पास से उठाकर आश्रम छोड़ गया था। कुछ समय बाद उनका बेटा उनसे मिलने आया और अगले गुरुवार को वापस आने की बात कही। वह गुरुवार फिर कभी नहीं आया। अंजली की यह कहानी इंतजार और उम्मीद के उस दर्द को सामने लाती है जिसमें बुजुर्ग वर्षों तक अपनों के लौटने की राह देखते रहते हैं। वर्ष 2022 की एक रिपोर्ट में भी अंजली श्रीवास्तव ने बताया था कि वह अपना घर वृद्धाश्रम में करीब 11 वर्षों से रह रही थीं।

    आश्रम में रहने वाली रानी चंद्र सक्सेना की जिंदगी भी कभी कला और सम्मान से जुड़ी थी। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने भारत भवन से जुड़कर रंगमंच पर काम किया और रंग निर्देशक बाबा कारंत के साथ कई नाटकों में हिस्सा लिया। इसके बाद उन्होंने आकाशवाणी और दूरदर्शन में समाचार वाचक के तौर पर भी काम किया। उनके पति सरकारी मत्स्य विभाग में वरिष्ठ पद पर रहे थे। आज उनकी जिंदगी का एक बड़ा सहारा उनका बेटा है जो विदेश में रहता है लेकिन दूरी और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण रानी ने करीब 15 वर्ष पहले आश्रम को अपना ठिकाना बना लिया।

    रानी का कहना है कि अब आश्रम ही उनका परिवार है। उन्हें यह उम्मीद नहीं है कि विदेश में रहने वाला बेटा उनके पास लौटकर आएगा। उन्होंने आश्रम संचालिका माधुरी मिश्रा को अपने अंतिम समय की जिम्मेदारी भी सौंप दी है। यह बात केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं बल्कि उन अनेक बुजुर्गों की स्थिति को सामने लाती है जो उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं जहां उन्हें सबसे ज्यादा अपनेपन और सहारे की जरूरत होती है।

    अपना घर वृद्धाश्रम की संचालिका माधुरी मिश्रा के मुताबिक कोई भी बुजुर्ग खुशी से अपना घर नहीं छोड़ता। उनके अनुसार कई बुजुर्ग परिस्थितियों से मजबूर होकर आश्रम पहुंचते हैं। जब किसी बुजुर्ग की मृत्यु के बाद परिवार का कोई सदस्य नहीं आता तो वहां रहने वाले दूसरे लोगों को भी अपने भविष्य की चिंता सताने लगती है। भोपाल में वर्षों से बुजुर्गों की सेवा कर रहा यह आश्रम अब कई लोगों के लिए केवल रहने की जगह नहीं बल्कि उनका अंतिम सहारा और परिवार बन चुका है।

    इन कहानियों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बुजुर्गों को केवल आर्थिक मदद नहीं बल्कि समय अपनापन और सम्मान भी चाहिए। जिंदगी की भागदौड़ में परिवार कितना भी दूर क्यों न हो जाए लेकिन माता पिता के जीवन के आखिरी पड़ाव पर उनकी मौजूदगी और संवेदनशीलता सबसे बड़ी जरूरत बन जाती है।