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  • भारत-अमेरिका आर्थिक रिश्तों को मिलेगी नई उड़ान, ट्रेड एग्रीमेंट पर अंतिम चरण की बातचीत जारी

    भारत-अमेरिका आर्थिक रिश्तों को मिलेगी नई उड़ान, ट्रेड एग्रीमेंट पर अंतिम चरण की बातचीत जारी


    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय व्यापार समझौता अब अपने अंतिम चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच अधिकांश महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बन चुकी है और अब केवल कुछ बिंदुओं को अंतिम रूप दिया जाना बाकी है। उनका कहना है कि कानूनी मसौदे की भाषा तय होते ही यह समझौता अगले कुछ सप्ताह या महीनों में औपचारिक रूप से पूरा हो सकता है।

    व्हाइट हाउस में दिए गए एक विशेष साक्षात्कार में सर्जियो गोर ने कहा कि हाल ही में नई दिल्ली में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर के साथ हुई बैठकों में उन्होंने केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से विस्तृत चर्चा की। उन्होंने इन वार्ताओं को बेहद सकारात्मक और सार्थक बताते हुए कहा कि अब बातचीत अंतिम चरण में है और दोनों पक्ष समझौते की भाषा तथा शेष तकनीकी पहलुओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं।

    गोर ने इस प्रक्रिया की तुलना अन्य वैश्विक व्यापार समझौतों से करते हुए कहा कि भारत और अमेरिका के बीच यह वार्ता अपेक्षाकृत बहुत तेजी से आगे बढ़ी है। उन्होंने बताया कि इस समझौते पर करीब डेढ़ वर्ष से काम चल रहा है जबकि दुनिया के कई बड़े व्यापार समझौतों को पूरा होने में दो दशक तक का समय लग चुका है। उनके अनुसार दोनों देशों ने कम समय में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है और यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

    हालांकि उन्होंने समझौते के संभावित प्रावधानों या संवेदनशील विषयों पर विस्तार से टिप्पणी करने से परहेज किया लेकिन इतना जरूर कहा कि दोनों सरकारें ऐसे समाधान की दिशा में काम कर रही हैं जिससे भारत और अमेरिका दोनों को समान रूप से लाभ मिले। उन्होंने कहा कि जब साझा हितों पर सहमति बन जाती है तभी एक सफल व्यापार समझौता संभव हो पाता है।

    सर्जियो गोर ने दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों पर भी विश्वास जताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच वर्षों से मजबूत व्यक्तिगत संबंध रहे हैं और यही रिश्ते भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी की सबसे मजबूत नींव हैं। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप भारत आने के लिए उत्सुक हैं और प्रधानमंत्री मोदी का निमंत्रण स्वीकार करने की इच्छा भी जता चुके हैं। हालांकि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के व्यस्त कार्यक्रम के कारण यात्रा की तारीख अभी तय नहीं हुई है लेकिन भारत उनकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर बना हुआ है।

    उन्होंने यह भी कहा कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते आर्थिक संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं बल्कि रक्षा, उन्नत प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, शिक्षा, निवेश और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग जैसे अनेक क्षेत्रों में साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है। दोनों देश आर्थिक सहयोग को नई ऊंचाई देने के साथ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और निवेश के अवसरों को भी विस्तार देने की दिशा में मिलकर काम कर रहे हैं।

    भारत और अमेरिका फिलहाल व्यापार समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच बाजार तक पहुंच आसान बनाना, शुल्क संबंधी बाधाओं को कम करना, निवेश को प्रोत्साहित करना और द्विपक्षीय व्यापार को नई गति देना है। माना जा रहा है कि इस शुरुआती समझौते के बाद दोनों देश भविष्य में एक व्यापक व्यापार ढांचे की दिशा में भी आगे बढ़ेंगे, जिससे दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक साझेदारी और मजबूत होगी।

  • एवरेस्ट पर हाई-टेक टकराव: अमेरिका के ड्रोन टेस्ट पर रोक, नेपाल ने चीन को पहले दी थी अनुमति; ट्रंप के दूत भी रहे मौजूद

    एवरेस्ट पर हाई-टेक टकराव: अमेरिका के ड्रोन टेस्ट पर रोक, नेपाल ने चीन को पहले दी थी अनुमति; ट्रंप के दूत भी रहे मौजूद


    नई दिल्ली। नेपाल के एवरेस्ट बेस कैंप पर अमेरिका द्वारा किए जा रहे हाई-एल्टीट्यूड ड्रोन टेस्ट को स्थानीय प्रशासन ने अनुमति न होने के कारण रोक दिया, जिससे हिमालय क्षेत्र में तकनीक और भू-राजनीति को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। यह मामला उस समय और संवेदनशील हो गया जब कार्यक्रम में अमेरिका के विशेष दूत सर्जियो गोर की मौजूदगी भी रही।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी कंपनी “Freefly Systems” के भारी-भरकम इंडस्ट्रियल ड्रोन का प्रदर्शन एवरेस्ट बेस कैंप (करीब 5,364 मीटर ऊंचाई) पर किया गया, लेकिन इसे औपचारिक उड़ान परीक्षण की मंजूरी नहीं मिली थी। नेपाली अधिकारियों ने साफ किया कि केवल डेमो हुआ था, जबकि वास्तविक फ्लाइट टेस्ट रोक दिया गया।

    इस ड्रोन की समुद्र तल पर पेलोड क्षमता लगभग 15.88 किलोग्राम बताई जाती है, लेकिन इतनी ऊंचाई और कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में इसकी वास्तविक क्षमता अभी भी परीक्षण के दायरे में ही है। अधिकारियों का कहना है कि एवरेस्ट जैसी कठिन परिस्थितियों में ड्रोन का प्रदर्शन तभी समझा जा सकता है जब इसे पूर्ण अनुमति के साथ उड़ाया जाए।

    नेपाल प्रशासन ने इस टेस्ट को लेकर सुरक्षा और डेटा कलेक्शन से जुड़ी चिंताएं भी जताई हैं, क्योंकि एवरेस्ट क्षेत्र नेपाल और चीन की सीमा पर स्थित एक संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र है। इसी वजह से सरकार ने किसी भी कमर्शियल या तकनीकी उड़ान से पहले विस्तृत अध्ययन की जरूरत बताई है।

    दिलचस्प बात यह है कि पिछले वर्ष नेपाल ने चीन की कंपनी DJI को इसी क्षेत्र में ड्रोन ऑपरेशन की अनुमति दी थी, जहां सफल हाई-एल्टीट्यूड डिलीवरी टेस्ट भी किया गया था। उस दौरान ड्रोन ने बेहद कठिन मौसम और ऊंचाई में 15 किलोग्राम तक सामान पहुंचाया था।

    अब अमेरिका और चीन दोनों की बढ़ती सक्रियता ने हिमालय क्षेत्र को हाई-टेक टेस्टिंग और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के नए केंद्र के रूप में उभार दिया है, जहां तकनीक के साथ-साथ भू-राजनीतिक संतुलन भी लगातार चुनौती बनता जा रहा है।

  • एवरेस्ट पर ड्रोन जंग: अमेरिका-चीन की हाई-टेक रेस में नेपाल बना नया मैदान, अमेरिकी टेस्ट पर लगा ब्रेक

    एवरेस्ट पर ड्रोन जंग: अमेरिका-चीन की हाई-टेक रेस में नेपाल बना नया मैदान, अमेरिकी टेस्ट पर लगा ब्रेक


    नई दिल्ली। अमेरिका और चीन के बीच ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ड्रोन तकनीक को लेकर नई प्रतिस्पर्धा तेज होती दिख रही है। नेपाल के एवरेस्ट बेस कैंप पर अमेरिकी भारी-भरकम ड्रोन “Alte X Gen 2” का परीक्षण बिना अनुमति के रोक दिया गया, जिससे कूटनीतिक और तकनीकी विवाद खड़ा हो गया है।

    रिपोर्ट के मुताबिक इस ड्रोन की समुद्र तल पर पेलोड क्षमता लगभग 15.88 किलोग्राम बताई गई है, लेकिन इतनी ऊंचाई (5,364 मीटर से ऊपर) पर इसका वास्तविक प्रदर्शन अभी स्पष्ट नहीं है। नेपाली अधिकारियों ने कहा कि कठिन पर्वतीय परिस्थितियों में इसकी क्षमता तभी समझी जा सकेगी जब इसे पूरी तरह से परीक्षण की अनुमति मिलेगी।

    अमेरिकी टीम ने एवरेस्ट बेस कैंप पर केवल प्रदर्शन किया, जबकि औपचारिक उड़ान परीक्षण के लिए जरूरी अनुमति नहीं ली गई थी। इसी कारण नेपाल सरकार ने परीक्षण रोक दिया। इस कार्यक्रम में अमेरिका के विशेष दूत सर्जियो गोर भी मौजूद थे।

    स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, नेपाल सरकार ने ड्रोन की तकनीकी क्षमताओं और संभावित संवेदनशील डेटा कलेक्शन को लेकर सुरक्षा चिंताएं जताई हैं। एवरेस्ट का क्षेत्र नेपाल और चीन की सीमा पर स्थित होने के कारण यह मुद्दा और भी रणनीतिक महत्व रखता है।

    दिलचस्प बात यह है कि पिछले वर्ष नेपाल ने चीन की कंपनी DJI को इसी क्षेत्र में कमर्शियल ड्रोन ऑपरेशन की अनुमति दी थी, जिसमें सफल हाई-एल्टीट्यूड डिलीवरी टेस्ट भी किया गया था। उस परीक्षण में ड्रोन ने बेहद कठिन मौसम और ऊंचाई में 15 किलोग्राम तक सामान पहुंचाया था।

    अब अमेरिका और चीन के बीच यह तकनीकी प्रतिस्पर्धा केवल ड्रोन क्षमता तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसे रणनीतिक और भू-राजनीतिक प्रभाव के रूप में भी देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र भविष्य में हाई-टेक परीक्षणों और रणनीतिक तकनीकी प्रयोगों का नया केंद्र बन सकता है।