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  • 51 शक्तिपीठों में शामिल उत्तर प्रदेश के पांच प्रमुख धाम, कहीं मां विशालाक्षी तो कहीं कात्यायनी रूप में होती हैं पूजा

    51 शक्तिपीठों में शामिल उत्तर प्रदेश के पांच प्रमुख धाम, कहीं मां विशालाक्षी तो कहीं कात्यायनी रूप में होती हैं पूजा

    नई दिल्ली । नवरात्रि का पर्व शुरू होते ही देशभर के देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना और दर्शन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। उत्तर प्रदेश में भी माता रानी के कई प्रसिद्ध मंदिर और शक्तिधाम स्थित हैं, जिनसे जुड़ी पौराणिक मान्यताएं भक्तों की आस्था का प्रमुख आधार हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता सती के शरीर के अंग या आभूषण जहां-जहां गिरे, उन स्थानों को शक्तिपीठ कहा जाता है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी, प्रयागराज, चित्रकूट, वृंदावन और बलरामपुर में स्थित देवी मंदिरों को इसी परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। नवरात्रि के दौरान इन मंदिरों में विशेष पूजा होती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

    वाराणसी को भगवान शिव की नगरी के रूप में जाना जाता है। यहां मणिकर्णिका घाट के पास मां विशालाक्षी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, जिसे शक्तिपीठों में विशेष स्थान प्राप्त है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्थान पर माता सती के कुंडल या मणिकर्णिका से संबंधित अंग गिरने की कथा प्रचलित है। मां विशालाक्षी को देवी शक्ति के स्वरूप में पूजा जाता है। श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और माता का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं। नवरात्रि के दिनों में मंदिर में भक्तों की संख्या बढ़ जाती है। काशी की धार्मिक पहचान और मां विशालाक्षी से जुड़ी मान्यताओं के कारण यह मंदिर देवी उपासना के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है।

    प्रयागराज में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम का विशेष धार्मिक महत्व है। इसी शहर में मां ललिता देवी का मंदिर स्थित है, जिसे प्रसिद्ध शक्तिधामों में शामिल माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस स्थान पर माता सती की अंगुली गिरी थी। प्रयागराज में मां कल्याणी देवी और अलोपी देवी के मंदिर भी श्रद्धालुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। इन मंदिरों में नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भक्त देवी के दर्शन करने और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के लिए यहां पहुंचते हैं। प्रयागराज के ये तीनों देवी मंदिर शहर की धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और पर्व के अवसर पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है।

    चित्रकूट भगवान श्रीराम से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां रामगिरि क्षेत्र में स्थित शक्तिपीठ को लेकर मान्यता है कि माता सती का वक्ष इस स्थान पर गिरा था। यहां देवी को मां शिवानी के रूप में भी पूजा जाता है। नवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु मां शिवानी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं। चित्रकूट की धार्मिक पहचान भगवान राम से जुड़ी परंपराओं के साथ-साथ देवी उपासना से भी संबंधित है। यहां स्थित देवी धाम भक्तों के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। नवरात्रि के दौरान पूजा-अर्चना और दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोतरी होती है।

    वृंदावन भगवान श्रीकृष्ण की नगरी के रूप में प्रसिद्ध है, लेकिन यहां देवी उपासना की भी महत्वपूर्ण परंपरा है। यहां मां कात्यायनी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, जिसे शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्थान पर माता सती के केश या चूड़ामणि गिरे थे। नवरात्रि में श्रद्धालु मां कात्यायनी के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के तुलसीपुर में स्थित देवीपाटन मंदिर मां पाटेश्वरी को समर्पित है। भारत-नेपाल सीमा के पास स्थित यह मंदिर प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। मान्यता है कि यहां माता सती का स्कंध यानी कंधा गिरा था। नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजा होती है और दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इन धामों से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं उत्तर प्रदेश में देवी उपासना की विविध परंपराओं को दर्शाती हैं।

  • 'माई के हार' से बना मैहर, जानिए मां शारदा धाम का रहस्य, आल्हा की भक्ति और संगीत घराने का इतिहास

    'माई के हार' से बना मैहर, जानिए मां शारदा धाम का रहस्य, आल्हा की भक्ति और संगीत घराने का इतिहास


    मध्य प्रदेश का मैहर शहर सिर्फ एक आम धार्मिक जगह नहीं है, यह भक्ति, रहस्य और संगीत का एक अनोखा संगम है। त्रिकूट पर्वत पर बसा मां शारदा का यह धाम पूरी दुनिया में जाना जाता है। हर साल लाखों भक्त यहां अपनी मुराद लेकर आते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि इस पवित्र शहर के नाम और इतिहास के पीछे कितनी दिलचस्प कहानियां छिपी हैं।

    शक्तिपीठ की महिमा हो, अमर योद्धा आल्हा की भक्ति हो या फिर संगीत की दुनिया का मैहर घरानायह जगह हर किसी को अपनी ओर खींचती है।

    माई का हार से कैसे बना मैहर?
    मैहर नाम के पीछे भगवान शिव और माता सती से जुड़ी एक पौराणिक कथा है। माना जाता है कि जब सती के वियोग में शिवजी तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए थे।

    उसी समय माता सती का हार यहां त्रिकूट पर्वत पर गिरा था। हार गिरने की वजह से इस जगह को पहले ‘माई का हार’ कहा गया। धीरे-धीरे समय बीतने के साथ यही नाम बदलकर ‘मैहर’ हो गया। आज यह धाम देश के 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

    1063 सीढ़ियों पर बसा 1500 साल पुराना मंदिर

    पर्वत की चोटी पर स्थित यह मंदिर करीब 1500 साल पुराना बताया जाता है। इतिहासकार भी प्राचीन शिलालेखों के आधार पर इसकी प्राचीनता को मानते हैं।

    मंदिर तक जाने के लिए श्रद्धालुओं को 1063 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

    हालांकि अब यहां रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे बुजुर्ग और बीमार लोग आसानी से ऊपर पहुंच सकते हैं।

    9वीं शताब्दी में आदिगुरु शंकराचार्य ने यहां पहली बार विधिवत पूजा की थी। तांत्रिक साधना करने वालों के लिए भी यह जगह बेहद खास है।

    आज भी आल्हा करते हैं पहली पूजा
    मैहर की सबसे हैरान करने वाली बात अमर योद्धा आल्हा से जुड़ी है। स्थानीय लोगों और पुजारियों का कहना है कि आज भी आल्हा सबसे पहले मां शारदा की पूजा करते हैं।

    रोज सुबह जब मंदिर के दरवाजे खुलते हैं, तो माता के चरणों में ताजे फूल और चंदन चढ़ा हुआ मिलता है। हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक या लिखित सबूत नहीं है, लेकिन यहां आने वाले भक्तों की इस चमत्कार में अटूट श्रद्धा है। उनका मानना है कि आल्हा आज भी अदृश्य रूप में यहां आते हैं।

    संगीत की दुनिया में मैहर का नाम
    धार्मिक पहचान के अलावा मैहर को संगीत की नगरी भी कहा जाता है। मशहूर सरोद वादक उस्ताद अलाउद्दीन खां ने इसी शहर में ‘मैहर संगीत घराने’ की नींव रखी थी। उन्होंने और उनके शिष्यों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को दुनिया भर में फैलाया। इसलिए संगीत प्रेमियों के लिए मैहर किसी तीर्थ से कम नहीं है।