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  • शम्मी कपूर की 95वीं जयंती आज, कभी एक दिन में पी जाते थे 100 सिगरेट, जानिए प्यार से लेकर ‘याहू’ कनेक्शन तक के दिलचस्प किस्से

    शम्मी कपूर की 95वीं जयंती आज, कभी एक दिन में पी जाते थे 100 सिगरेट, जानिए प्यार से लेकर ‘याहू’ कनेक्शन तक के दिलचस्प किस्से


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ सितारे ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपनी अदाकारी से दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ फिल्मों में नायक की छवि को भी नया रूप दिया। शम्मी कपूर उन्हीं कलाकारों में से एक थे। अपने खास हेयरस्टाइल बेफिक्र अंदाज जोशीले डांस और शरारती अदाकारी के दम पर उन्होंने ऐसी पहचान बनाई जो आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा है। 21 अक्टूबर को उनकी 95वीं जयंती के मौके पर उनके फिल्मी सफर और निजी जिंदगी से जुड़े कई दिलचस्प किस्से याद किए जा रहे हैं। फिल्म जंगली में उनका मशहूर अंदाज और जोरदार आवाज में बोला गया याहू आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार पलों में गिना जाता है।

    शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर 1931 को मुंबई में हुआ था। उनका असली नाम शमशेर राज कपूर था। वह हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के बेटे और राज कपूर तथा शशि कपूर के भाई थे। कपूर परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद शम्मी के लिए अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं था। उन्होंने फिल्मों में आने से पहले पृथ्वी थिएटर में काम किया और जूनियर कलाकार के तौर पर हर महीने 50 रुपये वेतन पाया। इसी अनुभव ने उन्हें अभिनय की दुनिया को करीब से समझने का अवसर दिया।

    शम्मी कपूर ने 1953 में फिल्म जीवन ज्योति से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। उनकी शुरुआती फिल्में बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं दिखा सकीं। रेल का डिब्बा लैला मजनू ठोकर और शमा परवाना जैसी फिल्मों में काम करने के बाद भी वह बड़ी सफलता से दूर रहे। लगातार मिल रही असफलताओं के बीच उन्होंने अपनी अभिनय शैली बदलने का फैसला किया। उस दौर में जहां अधिकतर नायक गंभीर और पारंपरिक अंदाज में दिखाई देते थे वहीं शम्मी कपूर ने अपने किरदारों में मस्ती ऊर्जा और बेफिक्री को शामिल किया।

    साल 1957 में आई फिल्म तुमसा नहीं देखा उनके करियर का अहम मोड़ साबित हुई। इसके बाद उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। जंगली प्रोफेसर चाइना टाउन कश्मीर की कली तीसरी मंजिल जानवर और ब्रह्मचारी जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों का चहेता बना दिया। उन्होंने करीब 100 फिल्मों में काम किया और अपनी अलग पहचान स्थापित की। उनकी नृत्य शैली और पर्दे पर दिखाई देने वाली जबरदस्त ऊर्जा के कारण उन्हें भारत का एल्विस प्रेस्ली भी कहा गया। अमेरिकी गायक और अभिनेता एल्विस प्रेस्ली की रॉक एंड रोल शैली से प्रभावित उनका अंदाज उस समय हिंदी सिनेमा के लिए नया था।

    शम्मी कपूर की सफलता में संगीत का भी बड़ा योगदान रहा। मोहम्मद रफी की आवाज में गाए गए बदन पे सितारे आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा आसमान से आया फरिश्ता और चाहे कोई मुझे जंगली कहे जैसे गीत उनकी पहचान बन गए। शम्मी केवल गानों पर होंठ हिलाने तक सीमित नहीं रहते थे बल्कि चेहरे के भावों और पूरे शरीर की हरकतों से गीतों को जीवंत कर देते थे। संगीत की उनकी समझ ने उनके अभिनय को और प्रभावशाली बनाया।

    उनकी फिल्म जंगली के गीत में इस्तेमाल हुआ याहू शब्द इतना लोकप्रिय हुआ कि बाद में इंटरनेट कंपनी याहू के नाम को लेकर भी मजेदार किस्सा सामने आया। कहा जाता है कि उनके भतीजे रणधीर कपूर ने मजाक में उनसे पूछा था कि चाचा आपने इतनी बड़ी इंटरनेट कंपनी शुरू कर दी और हमें बताया भी नहीं। हालांकि कंपनी का नाम और शम्मी कपूर का मशहूर फिल्मी उद्गार अलग-अलग संदर्भों से जुड़े हैं। शम्मी को कंप्यूटर और इंटरनेट में भी गहरी दिलचस्पी थी। भारत में इंटरनेट के आम होने से पहले ही वह इसका इस्तेमाल करने लगे थे और उन्होंने कपूर परिवार की वेबसाइट भी बनाई थी।

    शम्मी कपूर की निजी जिंदगी में अभिनेत्री गीता बाली का खास स्थान था। दोनों ने 1955 में शादी की और उनके दो बच्चे आदित्य राज कपूर तथा कंचन कपूर हुए। साल 1965 में गीता बाली के निधन ने शम्मी को गहरा दुख पहुंचाया। इसके बाद उन्होंने 1969 में नीला देवी गोहिल से विवाह किया। उनके जीवन से जुड़ा एक चर्चित किस्सा यह भी है कि वह हर साल 1 जनवरी से 21 जनवरी तक शराब नहीं पीते थे। बताया जाता है कि गीता बाली इसी अवधि में बीमार हुई थीं और 21 जनवरी को उनका निधन हुआ था।

    शम्मी कपूर की जिंदगी में कई संघर्ष और स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलें भी आईं। उनकी पत्नी नीला देवी के एक इंटरव्यू के मुताबिक वह एक दिन में 100 सिगरेट तक पी लेते थे। बाद के वर्षों में उन्हें फेफड़ों से जुड़ी गंभीर समस्याएं हुईं और स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता गया। साल 2011 में आई फिल्म रॉकस्टार उनकी आखिरी फिल्म साबित हुई जिसमें वह रणबीर कपूर के साथ नजर आए। शम्मी कपूर ने अपने अंदाज से हिंदी सिनेमा में नायक की परिभाषा बदल दी। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना उस कलाकार को सलाम करना है जिसने पर्दे पर आजादी मस्ती और संगीत को एक नई पहचान दी।

  • जब मोहम्मद रफी के सदाबहार गीत पर अड़ गए थे शम्मी कपूर: राज कपूर के दखल के बाद रिलीज हुआ गाना, प्रीमियर पर खड़े होकर तालियां बजाने लगे थे देव आनंद और आरडी बर्मन

    जब मोहम्मद रफी के सदाबहार गीत पर अड़ गए थे शम्मी कपूर: राज कपूर के दखल के बाद रिलीज हुआ गाना, प्रीमियर पर खड़े होकर तालियां बजाने लगे थे देव आनंद और आरडी बर्मन

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में मोहम्मद रफी और शम्मी कपूर की जोड़ी को संगीत की दुनिया की सबसे कामयाब जोड़ियों में से एक माना जाता है। रफी साहब की बुलंद आवाज और शम्मी कपूर के अनूठे डांसिंग स्टाइल ने मिलकर बॉलीवुड को दर्जनों सदाबहार गाने दिए हैं। हालांकि, संगीत के इस सुनहरे सफर के दौरान एक वक्त ऐसा भी आया था जब शम्मी कपूर खुद मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर के एक प्रतिष्ठित गाने के पूरी तरह खिलाफ हो गए थे। वह इस गाने को फिल्म से हटवाना या बदलवाना चाहते थे, लेकिन बाद में इसी गाने ने सिनेमाघरों में ऐसा तूफान लाया कि हर कोई देखता रह गया।

    यह पूरा विवाद साल 1962 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म ‘प्रोफेसर’ के एक बेहद लोकप्रिय गीत से जुड़ा हुआ है। इस फिल्म के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी उस दौर की मशहूर संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के कंधों पर थी। उन्होंने फिल्म के लिए एक बेहद खूबसूरत और रूहानी धुन तैयार की थी, जिसके बोल थे ‘आवाज देके हमें तुम बुलाओ’। इस रूमानी गीत को सुर कोकिला लता मंगेशकर और संगीत के सरताज मोहम्मद रफी ने अपनी जादुई आवाजों से सजाया था। रिकॉर्डिंग के बाद संगीत से जुड़े सभी लोग इस गाने की तारीफ कर रहे थे, लेकिन जैसे ही फिल्म के मुख्य अभिनेता शम्मी कपूर ने इसे सुना, उन्होंने इस पर कड़ी आपत्ति जता दी।

    अभिनेता शम्मी कपूर को असल में इस बात से गहरी दिक्कत थी कि गाने की शुरुआत मुख्य अभिनेत्री की आवाज से हो रही थी और पूरे दृश्य में उनका खुद का स्क्रीन टाइम बहुत कम नजर आ रहा था। उनका मानना था कि एक मुख्य अभिनेता के तौर पर इस गाने में उनकी मौजूदगी को सही ढंग से नहीं दर्शाया गया है और वह इसमें नाममात्र के लिए ही दिखाई दे रहे हैं। शम्मी कपूर इस बात पर अड़ गए कि इस गाने को फिल्म से बदल दिया जाए। जब यह विवाद काफी बढ़ गया और मेकर्स असमंजस की स्थिति में आ गए, तब फिल्म इंडस्ट्री के ‘शोमैन’ राज कपूर को इस मामले में बीच-बचाव करने के लिए आगे आना पड़ा।

    राज कपूर ने शम्मी कपूर के गुस्से को शांत करते हुए उन्हें समझाया कि वह इस कंपोजिशन और गाने के मिजाज पर भरोसा रखें। उन्होंने शम्मी को सलाह दी कि गाने को बिना किसी बदलाव के फिल्म में वैसे ही रहने दिया जाए जैसा इसे रिकॉर्ड किया गया है। राज कपूर के दखल और उनके विजन पर भरोसा करते हुए शम्मी कपूर आखिरकार मान गए। इसके बाद जब फिल्म बनकर तैयार हुई, तो उद्योग के तमाम दिग्गजों के लिए फिल्म का एक भव्य प्रीमियर शो आयोजित किया गया। इस प्रीमियर में देव आनंद, आरडी बर्मन और महमूद जैसी सिनेमा जगत की कई नामचीन हस्तियां मौजूद थीं।

    थिएटर के भीतर जब फिल्म के दौरान यह गाना बजना शुरू हुआ, तो शुरुआत में लता मंगेशकर की सुरीली आवाज को हॉल में बैठे सभी दिग्गज बेहद शांति और एकाग्रता से सुन रहे थे। जैसे ही गाने के बीच में मोहम्मद रफी की जादुई लाइनें गूंजी, थिएटर का माहौल पूरी तरह बदल गया। रफी साहब की आवाज का जादू ऐसा चला कि वहां बैठे संगीतकार आरडी बर्मन, सदाबहार अभिनेता देव आनंद और मशहूर कॉमेडियन महमूद अपनी सीटों से खड़े हो गए और उत्साह में आकर लगातार तालियां बजाने लगे। थिएटर के अंदर मौजूद दर्शकों और फिल्म समीक्षकों का यह अद्भुत रिस्पॉन्स देखकर खुद शम्मी कपूर भी पूरी तरह हैरान रह गए थे।

    इस घटना के बाद शम्मी कपूर को भी अहसास हो गया कि स्क्रीन टाइम से ज्यादा गाने की आत्मा और उसकी गायकी मायने रखती है। बाद में यह गाना न केवल चार्टबस्टर साबित हुआ, बल्कि इसे हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन गानों की फेहरिस्त में शामिल किया गया। मोहम्मद रफी ने इसके बाद भी शम्मी कपूर के लिए ‘चाहें कोई मुझे जंगली कहे’, ‘बदन पे सितारे’, ‘तारीफ करूं क्या उसकी’, और ‘ये चांद सा रोशन चेहरा’ जैसे अनगिनत कल्ट गाने गाए, जिन्होंने शम्मी कपूर को इंडस्ट्री का ‘एल्विस प्रेस्ली’ बनाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

  • जब मोहब्बत हार गई धर्म की दीवारों से, हसरत जयपुरी के दर्द ने जन्म दिया हिंदी सिनेमा के सबसे भावुक गीत को

    जब मोहब्बत हार गई धर्म की दीवारों से, हसरत जयपुरी के दर्द ने जन्म दिया हिंदी सिनेमा के सबसे भावुक गीत को

    नई दिल्ली ।  हिंदी सिनेमा के दिग्गज लिरिसिस्ट कुछ ऐसे गाने लिख गए जिन पर आज भी चर्चा होती है। ऐसा ही एक गाना है हसरत जयपुरी का लिखा गाना दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर। यह गाना शम्मी कपूर पर फिल्माया गया है। वह शूट के वक्त मुश्किल से अपने आंसू रोक पाए थे। कम लोग जानते हैं कि हसरत जयपुरी ने जिस दिन यह गाना लिखा था, उनकी प्रेमिका की शादी थी। वह जिसे पसंद करते थे वह हिंदू थी। धर्म की वजह से दोनों नहीं मिल सके और उसकी डोली उठी तो हसरत ने उसकी यादों को दुलहन बनाकर दिल के पास रखने का फैसला लिया।
    लड़कपन में लिखा था गाना
    हसरत जयपुरी ने हिंदी सिनेमा को कई बेहतरीन गाने दिए। वह छोटी उम्र से ही गीत लिखने लगे थे। जब बड़े हुए तो कच्ची उम्र के प्यार के दौरान लिखे गए गाने उन्होंने फिल्मों में दे दिए। ऐसा ही एक गाना था दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर। हसरत जयपुरी को उनके पड़ोस में रहने वाली लड़की से प्यार था। उस जमाने का प्यार बस आंखों-आंखों में और लव-लेटर वाला होता था। हसरत राधा के लिए लव-लेटर और गाने लिखते लेकिन दे नहीं पाते थे। इसी डर में उन्होंने लिख डाला था, ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर कि तुम नाराज ना होना।

    धर्म की वजह से नहीं बनी बात
    दोनों एक-दूसरे को पसंद करते थे। लेकिन धर्म अलग था तो राहें अलग होनी ही थीं। एक दिन आया जब राधा की शादी हो गई। हसरत को कुछ कर नहीं सकते थे लेकिन अपने दर्द को उन्होंने गाने का रूप दिया। उन्होंने लिखा, दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर, यादों को तेरी मैं दुलहन बनाकर, रखूंगा मैं दिल के पास, मत हो मेरी जां उदास…शम्मी कपूर की फिल्म ब्रह्मचारी की सिचुएशन पर यह गाना फिट बैठ गया। हसरत ने यह गाना दिया।

    जब शम्मी कपूर नहीं रोक पाए अपने आंसू
    इस गाने की शूटिंग से जुड़ा किस्सा भी इंट्रेस्टिंग है। इंडियन आइडल के एपिसोड में मनोज मुंतशिर ने बताया था कि गाना गाने के लिए शम्मी कपूर ने पहले मना कर दिया था। उन्होंने जब गाना सुना तो इस सिचुएशन को विजुअलाइज किया। वह इमोशंस कंट्रोल नहीं कर पाए और उनके आंसू आने लगे। उन्होंने गाना सुनकर मना कर दिया और बोले, प्लीज इसे बदल दो। दरअसल इस सीन में उनको रोना नहीं था। शम्मी को लग रहा था कि सीन में घुस गए तो आंसू रोकना मुश्किल हो जाएगा।

  • 7 साल तक रिजेक्ट रहा रफी साहब का गाना, शम्मी कपूर की फिल्म में बन गया ऑल-टाइम सुपरहिट

    7 साल तक रिजेक्ट रहा रफी साहब का गाना, शम्मी कपूर की फिल्म में बन गया ऑल-टाइम सुपरहिट



    नई दिल्ली। मोहम्मद रफी, जिनकी आवाज को भारतीय संगीत की सबसे महान आवाजों में गिना जाता है, उन्होंने अपने करियर में एक से बढ़कर एक अमर गीत दिए। लेकिन उनके करियर में एक ऐसा भी गाना रहा, जिसे बार-बार रिजेक्ट किया गया और करीब 7 साल तक वह रिलीज नहीं हो सका। बाद में वही गाना संगीत इतिहास का सुपरहिट गाना बन गया।

    “आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे” की शुरुआत
    इस गाने की कहानी शुरू होती है 1961 में आई फिल्म “जब प्यार किसी से होता है” से। इस फिल्म का निर्देशन नासिर हुसैन ने किया था। फिल्म में देव आनंद, आशा पारेख और प्राण जैसे बड़े कलाकार थे। संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था और गीत हसरत जयपुरी और शैलेंद्र ने लिखे थे।

    इसी फिल्म के लिए एक गाना रिकॉर्ड किया गया था
    “आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हैं जुबान पर”
    जिसे मोहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर ने गाया था।

    देव आनंद ने किया सबसे पहला रिजेक्शन
    फिल्म के लिए जब यह गाना तैयार हुआ तो संगीतकारों को इससे काफी उम्मीद थी, लेकिन जब देव आनंद ने इसे सुना तो उन्होंने इसे रिजेक्ट कर दिया।
    उनका मानना था कि यह गाना उनके किरदार की गंभीरता से मेल नहीं खाता और यह स्क्रीन पर जरूरत से ज्यादा “लाउड” लगेगा।

    इस वजह से गाना फिल्म से बाहर कर दिया गया।
    5 साल बाद भी नहीं मिली जगह
    करीब 5 साल बाद, 1966 में जब शंकर-जयकिशन फिल्म “सूरज” का संगीत बना रहे थे, तो उन्होंने इस पुरानी धुन को फिर से इस्तेमाल करने की कोशिश की।
    इस बार फिल्म के हीरो राजेंद्र कुमार थे।लेकिन एक बार फिर गाने को रिजेक्ट कर दिया गया। राजेंद्र कुमार को भी लगा कि यह गाना उनके स्क्रीन इमेज से मेल नहीं खाता।

    शम्मी कपूर ने बदली किस्मत
    संगीतकार शंकर-जयकिशन इस गाने को लेकर निराश हो चुके थे, लेकिन 1968 में जब फिल्म “ब्रह्मचारी” बनी, तो कहानी बदल गई।जब शम्मी कपूर को यह धुन सुनाई गई तो उन्हें यह बेहद पसंद आई। उन्होंने तुरंत कहा कि यह गाना उनकी फिल्म में शामिल किया जाएगा।

    रिलीज होते ही बना ब्लॉकबस्टर
    फिल्म “ब्रह्मचारी” रिलीज हुई और यह गाना—
    “आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हैं जुबान पर”
    सीधा सुपरहिट बन गया।शम्मी कपूर और मुमताज की जोड़ी पर फिल्माया गया यह गाना इतना लोकप्रिय हुआ कि आज भी यह सदाबहार हिट माना जाता है। लोग इसे आज भी रीमिक्स और स्टेज परफॉर्मेंस में उतने ही उत्साह से सुनते हैं।

    रफी साहब की अमर आवाज
    मोहम्मद रफी की खासियत यह थी कि हर बड़ा अभिनेता उनकी आवाज चाहता था। शम्मी कपूर के साथ उनकी जोड़ी ने कई हिट गाने दिए। उनकी आवाज ने इस गाने को अमर बना दिया।

    करियर की शुरुआत और उपलब्धियां
    मोहम्मद रफी ने अपने करियर की शुरुआत पंजाबी फिल्म “गुल बलोच” से की थी। उनका पहला हिंदी गाना 1945 की फिल्म “गांव की गोरी” में आया था।अपने शानदार करियर में उन्हें6 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स1965 में पद्म श्री1977 में नेशनल अवॉर्डसे सम्मानित किया गया।
    7 साल तक रिजेक्ट होने के बाद भी यह गाना भारतीय संगीत का इतिहास बन गया। यह कहानी बताती है कि असली कला समय के साथ पहचान बनाती है और सही मौका मिलने पर अमर हो जाती है।