Tag: Sharjeel Imam

  • मोनालिसा की शादी बनी विवाद का केंद्र, सुप्रीम कोर्ट वकील नाजिया बोलीं- "प्रॉपर लव जिहाद", शरजील इमाम की पैरोल के बाद आतंकी संगठन एक्टिव

    मोनालिसा की शादी बनी विवाद का केंद्र, सुप्रीम कोर्ट वकील नाजिया बोलीं- "प्रॉपर लव जिहाद", शरजील इमाम की पैरोल के बाद आतंकी संगठन एक्टिव


    नई दिल्ली।
    कुंभ की वायरल गर्ल मोनालिसा की शादी अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गई है। सुप्रीम कोर्ट की वकील नाजिया इलाही खान ने इसे सामान्य विवाह मानने से इंकार करते हुए इसे “प्रॉपर अप्रोप्रिएट लव जिहाद” बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि शरजील इमाम की अपने भाई की शादी के लिए पैरोल मिलने के बाद आतंकी संगठन सक्रिय हो गए हैं और देश की सुरक्षा एजेंसियों को इस पर तत्काल कदम उठाना चाहिए।

    हिंदू मैरिज एक्ट का उल्लंघन
    नाजिया खान ने कहा कि यह शादी सिर्फ व्यक्तिगत मामला नहीं है। इसमें इस्लामिक जिहादी रेडिकल और पीएफआई का हाथ है और हिंदू मैरिज एक्ट 1955 का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने सवाल उठाया कि एक मुसलमान व्यक्ति हिंदू प्रथा के तहत शादी कैसे कर सकता है, जबकि उसने अब तक हिंदुत्व स्वीकार करने का कोई प्रमाण नहीं दिखाया।

    शरजील इमाम की पैरोल के बाद एक्टिव हुए आतंकी संगठन
    नाजिया ने आरोप लगाया कि शरजील इमाम की पैरोल मिलने के बाद लव जिहाद और अन्य रेडिकल गतिविधियों में सक्रियता बढ़ गई है। उन्होंने उत्तर प्रदेश और बस्ती में हाल ही में देखे गए लव जिहाद मामलों का हवाला दिया और कहा कि देश की सुरक्षा एजेंसियों को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए।

    मदरसे और कट्टरपंथी गतिविधियां
    वकील ने मदरसों की भी आलोचना की और कहा कि वहाँ से कोई सभ्य नागरिक नहीं निकल रहा, बल्कि केवल लव जिहाद और कट्टरपंथी तत्व सामने आ रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की ताकि मोनालिसा सुरक्षित रहे और इस पूरे मामले में नियंत्रण स्थापित किया जा सके।

    Keywords (comma separated): मोनालिसा शादी, लव जिहाद, शरजील इमाम, नाजिया इलाही, आतंकी संगठन

  • दिल्ली दंगों में SC का बड़ा फैसला: उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं मिली जमानत, 5 आरोपियों को मिली राहत

    दिल्ली दंगों में SC का बड़ा फैसला: उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं मिली जमानत, 5 आरोपियों को मिली राहत


    नई दिल्ली । 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हिंसा में 53 लोगों की जान चली गई थी और सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। दंगों के बाद दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद शरजील इमाम समेत सात अन्य लोगों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने दंगे पूर्व-योजना के तहत आयोजित किए थे। पुलिस ने इन पर भारतीय दंड संहिता और की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। पुलिस का कहना था कि यह हिंसा एक सोची-समझी साजिश का परिणाम थी न कि एक आकस्मिक घटना।

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला 5 जनवरी 2026

    5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों के मामले में जमानत याचिकाओं पर बड़ा फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसमें जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया शामिल थे ने 7 आरोपियों में से 5 को जमानत दे दी जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी।

    क्यों नहीं मिली जमानत

    अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका को मामले में केंद्रीय और गंभीर बताया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक जेल में रहने के कारण जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने प्रत्येक आरोपी के मामले को अलग-अलग आधार पर तौला और फिर अपना फैसला सुनाया।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत देने के मामले में अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार का हवाला केवल तभी दिया जा सकता है, जब इसका आधार ठोस साक्ष्य और कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ा हो। यदि आरोप गंभीर हैं और साक्ष्य मजबूत हैं तो जीवन के अधिकार के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।

    अतीत के फैसले का संदर्भ

    उमर खालिद शरजील इमाम और अन्य आरोपियों के खिलाफ यह मामला काफी लंबा खींच चुका है। इन आरोपियों को 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रचने का आरोप है और वे पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं। 10 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने इस मामले में जमानत पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट ने भी इन आरोपियों को जमानत देने से मना कर दिया था। 2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी जिसके बाद इन आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    अन्य आरोपियों की जमानत

    सुप्रीम कोर्ट ने बाकी 5 आरोपियों को जमानत देने का फैसला सुनाया। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इन आरोपियों की जमानत से ट्रायल प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा और मामले की सुनवाई जारी रहेगी।

    फैसले का महत्व

    यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह दर्शाता है कि न्यायपालिका गंभीर साजिशों और सामूहिक हिंसा के मामलों में जमानत देने में बेहद सावधान रहती है, विशेष रूप से जब आरोप UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत होते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि संवैधानिक अधिकारों को हमेशा कानूनी ढांचे और साक्ष्यों के संदर्भ में समझा जाएगा न कि केवल व्यक्तिगत कठिनाई या जेल में लंबे समय तक रहने के आधार पर।

    आगे क्या होगा

    उमर खालिद और शरजील इमाम अब ट्रायल कोर्ट में फिर से जमानत याचिका दायर कर सकते हैं। ट्रायल की प्रक्रिया अभी भी जारी रहेगी और अदालत भविष्य में साक्ष्यों और मामलों की गंभीरता के आधार पर निर्णय लेगी। यह मामला अब भी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है और अदालत के फैसले ही इन आरोपियों के भविष्य का निर्धारण करेंगे।