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  • जेल में तोड़ने की कोशिश पर संजय दत्त ने सुनाया किस्सा, बोले- पिता की आंखों में आंसू थे, फिर भी खुद को रखा मजबूत

    जेल में तोड़ने की कोशिश पर संजय दत्त ने सुनाया किस्सा, बोले- पिता की आंखों में आंसू थे, फिर भी खुद को रखा मजबूत

    नई दिल्ली: संजय दत्त ने जेल में बिताए अपने समय को याद करते हुए बताया कि वहां उन्हें तोड़ने की कोशिश की गई थी, लेकिन वह परिस्थितियों के सामने नहीं टूटे। एक बातचीत के दौरान उन्होंने अपने करियर में आए उतार-चढ़ाव के साथ जेल के अनुभव भी साझा किए। उन्होंने बताया कि अधिकारियों को लगता था कि उनके सेलिब्रिटी स्टेटस से जुड़ी सुविधाएं छीन लेने से वह परेशान होकर टूट जाएंगे। हालांकि, संजय दत्त के मुताबिक ऐसा नहीं हुआ और उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों में खुद को संभाले रखा। उन्होंने यह भी बताया कि जेल में उनके साथ व्यवहार और सुविधाओं में हुए बदलावों का उन पर वैसा असर नहीं पड़ा, जैसा अधिकारियों ने सोचा था।

    बातचीत के दौरान संजय दत्त से यह भी पूछा गया कि क्या जेल की कठिन परिस्थितियों में कभी उन्होंने अपना जीवन समाप्त करने के बारे में सोचा था। उन्होंने इस सवाल का जवाब साफ तौर पर ‘नहीं, कभी नहीं’ में दिया। इससे पहले बातचीत में उनके जेल में रहने और मानसिक संतुलन बनाए रखने का जिक्र किया गया था। संजय दत्त ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि वहां मौजूद अधिकारियों को लगता था कि उनके लिए उपलब्ध सुविधाएं छीन लेने से वह टूट जाएंगे। उन्होंने बताया कि जब उन्हें सिगरेट नहीं मिलने की बात कही गई, तब उन्होंने मजाकिया अंदाज में पूछा कि क्या बीड़ी मिल सकती है। उनके मुताबिक इस तरह के बदलावों से उन्हें कोई खास फर्क नहीं पड़ा।

    संजय दत्त ने जेल जाने से पहले का एक भावुक पल भी याद किया। उन्होंने बताया कि जब पुलिस ने पहली बार उन्हें हथकड़ी पहनाई, तब उनके पिता सुनील दत्त को गहरा झटका लगा था। उनकी आंखों में आंसू थे और उन्होंने पूछा था कि उनके बेटे के साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है। संजय दत्त के मुताबिक उन्होंने उस समय अपने पिता को गले लगाया और उन्हें समझाने की कोशिश की कि हथकड़ी लगना प्रक्रिया का हिस्सा है और उन्हें परेशान नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वास्तविकता यह थी कि वह खुद भी अंदर से इस स्थिति से प्रभावित थे, लेकिन उस समय उनके लिए अपने पिता के सामने मजबूत बने रहना जरूरी था।

    संजय दत्त को साल 1993 में मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर मामले से जुड़े अवैध हथियार रखने के आरोप में टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट यानी TADA और आर्म्स एक्ट के तहत कार्रवाई हुई थी। उन्होंने अलग-अलग समय में कुल मिलाकर करीब 18 महीने अंडरट्रायल के तौर पर जेल में बिताए। साल 2007 में विशेष TADA अदालत ने उन्हें आतंकवाद से जुड़े आरोपों से बरी कर दिया, लेकिन आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराते हुए छह साल की सजा सुनाई। इसके बाद साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा की अवधि छह साल से घटाकर पांच साल कर दी। जेल के अपने अनुभव को याद करते हुए संजय दत्त ने बताया कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने खुद को संभाले रखा।

  • जब चमकदार परदे से संसद तक का सफर अधूरा रह गया: राजनीति में ज्यादा दिन टिक नहीं पाए ये बॉलीवुड स्टार्स

    जब चमकदार परदे से संसद तक का सफर अधूरा रह गया: राजनीति में ज्यादा दिन टिक नहीं पाए ये बॉलीवुड स्टार्स


    नई दिल्ली ।बॉलीवुड और राजनीति का रिश्ता नया नहीं है। फिल्मों की लोकप्रियता और जनता के बीच गहरी पैठ के चलते कई सितारों ने सोचा कि वे सियासत में भी उतनी ही सफलता हासिल कर लेंगे। कुछ स्टार्स ने चुनाव जीते तो कुछ को हार का सामना करना पड़ा लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इनमें से कई ज्यादा समय तक राजनीति में टिक नहीं पाए और फिर वापस अपनी पुरानी दुनिया या निजी जिंदगी में लौट गए।

    महानायक अमिताभ बच्चन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। साल 1984 में उन्होंने एक्टिंग से ब्रेक लेकर राजनीति में कदम रखा और इलाहाबाद सीट से रिकॉर्ड जीत दर्ज की। उस वक्त माना जा रहा था कि वह राजनीति में लंबी पारी खेलेंगे लेकिन तीन साल बाद ही 1987 में उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में कई मौकों पर बिग बी ने यह संकेत दिया कि राजनीति उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं थी।

    गोविंदा भी उन स्टार्स में शामिल हैं जिन्होंने राजनीति को लेकर खुलकर पछतावा जताया। साल 2004 में कांग्रेस के टिकट पर मुंबई नॉर्थ से लोकसभा चुनाव जीतने वाले गोविंदा ने 2009 में राजनीति से दूरी बना ली। कई इंटरव्यू में उन्होंने माना कि राजनीति ज्वाइन करना उनके जीवन की एक बड़ी गलती थी।

    उर्मिला मातोंडकर ने भी कांग्रेस के साथ राजनीति में एंट्री ली। उन्होंने मुंबई नॉर्थ सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार का सामना करना पड़ा। चुनाव के कुछ ही दिनों बाद उर्मिला ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और राजनीति से पूरी तरह किनारा कर लिया।

    साउथ के सुपरस्टार रजनीकांत ने भले ही चुनाव नहीं लड़ा लेकिन उनकी राजनीतिक घोषणा ने देशभर में हलचल मचा दी थी। 2017 में उन्होंने रजनी मक्कल मंडराम पार्टी बनाने का ऐलान किया मगर 2021 में खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए राजनीति में सक्रिय रूप से उतरने से इनकार कर दिया।

    संजय दत्त ने भी समाजवादी पार्टी के साथ सियासी सफर शुरू किया था। साल 2008 में पार्टी से जुड़े संजय को जनरल सेक्रेटरी बनाया गया लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने न सिर्फ पद छोड़ा बल्कि पार्टी से भी इस्तीफा दे दिया।

    जावेद जाफरी ने 2014 में आम आदमी पार्टी ज्वाइन की और चुनाव लड़ा लेकिन हार के बाद वे राजनीति में सक्रिय नजर नहीं आए। वहीं शेखर सुमन ने 2009 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा हार के बाद 2012 में पार्टी छोड़ दी और बाद में साफ कहा कि वह दोबारा राजनीति में नहीं आएंगे।

    मराठी सिनेमा के चर्चित नाम महेश मांजरेकर ने भी 2014 में चुनाव लड़ा लेकिन हार के बाद उनका राजनीतिक सफर वहीं थम गया। इन सभी उदाहरणों से साफ है कि फिल्मों की लोकप्रियता राजनीति में सफलता की गारंटी नहीं होती। राजनीति की जटिलताएं दबाव और जिम्मेदारियां हर किसी के बस की बात नहीं होतीं और यही वजह है कि कई सितारे जल्द ही इस दुनिया से दूरी बना लेते हैं।