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  • सोनम ने किया सरेंडर, अब छह महीने में ट्रायल पूरा करने की चुनौती, जनवरी तक आ सकता है फैसला

    सोनम ने किया सरेंडर, अब छह महीने में ट्रायल पूरा करने की चुनौती, जनवरी तक आ सकता है फैसला


    इंदौर  इंदौर के चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड में मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी के ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने के बाद अब मामले की सुनवाई निर्णायक चरण में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के पालन में सोनम ने 29 जुलाई को मेघालय के शिलॉन्ग स्थित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण किया। इसके साथ ही अब कानूनी प्रक्रिया तेज होने की संभावना जताई जा रही है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत में सुनवाई तय समय-सीमा के भीतर पूरी होती है तो इस बहुचर्चित मामले में जनवरी 2027 तक फैसला आ सकता है।

    सोनम के सरेंडर के बाद सबसे बड़ा सवाल यह सामने आया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रायल छह महीने में पूरा करने की जो समय-सीमा तय की गई है, उसकी गणना किस तारीख से होगी। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह अवधि सरेंडर की तारीख से नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट के 23 जुलाई 2026 के आदेश की तारीख से मानी जाएगी। अदालत ने अपने आदेश में कहीं भी यह उल्लेख नहीं किया कि छह महीने की अवधि सरेंडर के दिन से प्रभावी होगी। इसलिए आदेश जारी होने की तारीख ही कानूनी रूप से समय-सीमा का आधार मानी जाएगी।

    कानूनी विशेषज्ञ एडवोकेट आशीष एस. शर्मा के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने 23 जुलाई को सोनम को अंतरिम राहत देते हुए दो महत्वपूर्ण शर्तें रखी थीं। पहली, तीन सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करना और दूसरी, यदि छह महीने के भीतर ट्रायल अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ता या पूरा नहीं होता तो आरोपी को दोबारा जमानत याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता होगी।

    हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि छह महीने की शर्त केवल ट्रायल में देरी के आधार पर दोबारा जमानत मांगने से जुड़ी है। यदि इस दौरान कोई नया कानूनी आधार सामने आता है, जैसे गंभीर स्वास्थ्य समस्या, गवाहों की जिरह में कोई महत्वपूर्ण नया तथ्य या ऐसा कोई कानूनी पहलू जो मामले की दिशा बदल सकता हो, तो आरोपी छह महीने पूरे होने का इंतजार किए बिना भी नई जमानत याचिका दायर कर सकती है।

    अभियोजन पक्ष से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्य, इलेक्ट्रॉनिक सबूत, सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल रिकॉर्ड और फॉरेंसिक रिपोर्ट अदालत में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। अभियोजन को यह साबित करना होगा कि सभी साक्ष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और उनकी पूरी श्रृंखला केवल आरोपियों की संलिप्तता की ओर ही संकेत करती है। यदि यह वैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी संदेह से परे सिद्ध हो जाती है, तो इन्हीं के आधार पर दोष सिद्ध होने की संभावना मजबूत होगी।

    विशेषज्ञों के अनुसार सोनम द्वारा तय समय से पहले सरेंडर करना भी कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इससे यह संदेश जाता है कि उसने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान किया और न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग किया। भविष्य में यदि वह जमानत की मांग करती है तो उसका पक्ष यह तर्क रख सकता है कि उसने अदालत के सभी निर्देशों का समय पर पालन किया और जांच व ट्रायल में पूरा सहयोग दिया। हालांकि केवल समय पर सरेंडर करना जमानत मिलने का स्वतः आधार नहीं बनता।

    अब इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड में अदालत की कार्यवाही, आरोप तय होने की प्रक्रिया, गवाहों की गवाही और वैज्ञानिक साक्ष्यों की जांच पर सभी की नजरें टिकी हैं। यदि सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की अपेक्षित समय-सीमा के अनुसार आगे बढ़ती है तो अगले वर्ष जनवरी तक इस बहुचर्चित मामले में फैसला आने की संभावना जताई जा रही है।